कोई एक उत्तर नहीं दिया जा सकता। बहुत सारे ऐसे कार्यकर्ता भी होते हैं उनके लिए यही उचित है कि वो उस जगह पर न रहें जहाँ पर वो फिलहाल हैं। वो अगर निकाले जाते हैं या वो स्वेच्छा से ही अपने *ऑर्गेनाइज़ेशन* (संस्था) का, कम्पनी का, संगठन का त्याग कर देते हैं तो इसमें उनके साथ अन्याय नहीं हो रहा, भलाई हो रही है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। एकलव्य की कहानी है सुनकर बड़ा दुख होता है कि द्रोणाचार्य जैसा स्वाभिमानी और श्रेष्ठ गुरु भी अपने स्वार्थ और पक्षपात के चलते श्रद्धावान एकलव्य से अन्याय करता है।
एकलव्य इस अन्याय के प्रति आदर प्रकट करते हुए अपना अँगूठा देकर भी गुरु के प्रतिष्ठा से प्रेरित हुए। मेरी दृष्टि में एकलव्य का आदर ज़्यादा है। मैं भी इसी तरह की घटनाएँ कॉरपोरेट (निगमित) जगत में रोज़ देखता हूँ। जहाँ पक्षपात की वजह से प्रतिभाशाली एम्प्लॉइ (कर्मचारी) के विरुद्ध साज़िशे होती हैं। जो प्रतिभाशाली एम्प्लॉइ है वो अपने काम को प्राथमिकता देता है, न कि अपने बॉस (मालिक) इत्यादि की चापलूसी को। फिर वो धीरे-धीरे पिछड़ जाता है और उत्साहीन हो जाता है।
ऐसा कईयों के लिए तो मैं मैनेजमेंट से लड़ता भी हूँ और सच्ची बात भी बताता हूँ तो फिर ये मिलता है काम को मैनेज (प्रतिबन्धित) करो। मैं कई अच्छे एम्प्लॉइज़ को कम्पनी से बाहर निकाले जाते देखा है और बड़ा दुख हुआ है। मैंने ये एक नहीं, कई कम्पनीज़ (संगठन) में होते देखा है।




