अपने आप को लग्ज़री देने से पहले मैं क्या पूछूँगा? क्या मेरा काम इस लायक है? बस। और जितना मेरे काम का स्तर बढ़ता जाएगा, उतना मैं अपने आप से कहता जाऊँगा, “हाँ, काम अब माँग रहा है एक नया मोबाइल फ़ोन। काम अब माँग रहा है लैपटॉप। काम माँग रहा है कि मैं ऐसी जगह पर न रहूँ जहाँ बहुत भीड़-भड़ाका हो, क्योंकि भीड़-भड़ाके में काम नहीं हो पाता।” तो मैं उस हिसाब से फिर काम की ख़ातिर, काम के सेवक की तरह, काम के साधन की तरह, काम के निमित्त की तरह, मैं अपने आप को फिर सुविधाएँ देती चलूँगी। उससे पहले नहीं।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, जब मैं सोशल मीडिया चलाती हूँ, रील्स देखती हूँ, तो मैं अक्सर पाती हूँ कि लोग बड़ी महँगी गाड़ियाँ ख़रीद रहे हैं, ऑडी, मर्सिडीज़। एक भीड़ है उनके साथ, जो मिलकर सेलिब्रेट कर रही है।* शो-ऑफ* कर रहे हैं लोग, महँगी हॉलिडेज़ में जा रहे हैं। बिज़नेस क्लास की फ्लाइट्स बुक कर रहे हैं। एक्सपेंसिव होटल रूम्स में रह रहे हैं और अपने *पार्टनर्स, सुंदर पार्टनर्स को दिखा रहे हैं।
जब मैं देखती हूँ, तो मेरे मन में एक प्रश्न उठता है कि जब कोई नौजवान, जो कि अठारह बीस वर्ष का है, वो ये सब देखेगा तो बिल्कुल पगला ही जाएगा और इसके पीछे पाने की वो लालसा करेगा। तो क्या हमारी युवा पीढ़ी ख़तरे में है? हम क्या कर सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: पहली बात तो यूँ ही कोई आपको उतना पैसा और उतनी अय्याशी दे नहीं देगा। ठीक है? कोई-न-कोई आप कीमत चुका रहे होंगे, आमतौर पर अपनी स्वतंत्रता की कीमत चुकाई जाती है। दूसरी बात ये, कि आप भोगने के लिए पैदा नहीं हुए हो। ये कोई नैतिक नियम नहीं है, ये मनोवैज्ञानिक बात है। आपको जो शांति, संतुष्टि चाहिए, वो




