महँगी चीज़ें, सस्ता जीवन? सोशल मीडिया की लग्ज़री लाइफ़!

Acharya Prashant

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महँगी चीज़ें, सस्ता जीवन? सोशल मीडिया की लग्ज़री लाइफ़!
अपने आप को लग्ज़री देने से पहले मैं क्या पूछूँगा? क्या मेरा काम इस लायक है? बस। और जितना मेरे काम का स्तर बढ़ता जाएगा, उतना मैं अपने आप से कहता जाऊँगा, “हाँ, काम अब माँग रहा है एक नया मोबाइल फ़ोन। काम अब माँग रहा है लैपटॉप। काम माँग रहा है कि मैं ऐसी जगह पर न रहूँ जहाँ बहुत भीड़-भड़ाका हो, क्योंकि भीड़-भड़ाके में काम नहीं हो पाता।” तो मैं उस हिसाब से फिर काम की ख़ातिर, काम के सेवक की तरह, काम के साधन की तरह, काम के निमित्त की तरह, मैं अपने आप को फिर सुविधाएँ देती चलूँगी। उससे पहले नहीं। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, जब मैं सोशल मीडिया चलाती हूँ, रील्स देखती हूँ, तो मैं अक्सर पाती हूँ कि लोग बड़ी महँगी गाड़ियाँ ख़रीद रहे हैं, ऑडी, मर्सिडीज़। एक भीड़ है उनके साथ, जो मिलकर सेलिब्रेट कर रही है।* शो-ऑफ* कर रहे हैं लोग, महँगी हॉलिडेज़ में जा रहे हैं। बिज़नेस क्लास की फ्लाइट्स बुक कर रहे हैं। एक्सपेंसिव होटल रूम्स में रह रहे हैं और अपने *पार्टनर्स, सुंदर पार्टनर्स को दिखा रहे हैं।

जब मैं देखती हूँ, तो मेरे मन में एक प्रश्न उठता है कि जब कोई नौजवान, जो कि अठारह बीस वर्ष का है, वो ये सब देखेगा तो बिल्कुल पगला ही जाएगा और इसके पीछे पाने की वो लालसा करेगा। तो क्या हमारी युवा पीढ़ी ख़तरे में है? हम क्या कर सकते हैं?

आचार्य प्रशांत: पहली बात तो यूँ ही कोई आपको उतना पैसा और उतनी अय्याशी दे नहीं देगा। ठीक है? कोई-न-कोई आप कीमत चुका रहे होंगे, आमतौर पर अपनी स्वतंत्रता की कीमत चुकाई जाती है। दूसरी बात ये, कि आप भोगने के लिए पैदा नहीं हुए हो। ये कोई नैतिक नियम नहीं है, ये मनोवैज्ञानिक बात है। आपको जो शांति, संतुष्टि चाहिए, वो कंज़म्प्शन से मिल नहीं सकती है। वो तो बस मिलती है सही काम करने से, सही ज़िंदगी जीने से।

वो सही ज़िंदगी न हो और उसके विकल्प के तौर पर आप अय्याशी करो, तो उससे जो क्षतिपूर्ति है कम्पेन्सेशन, वो नहीं हो पाएगा। सही ज़िंदगी जीने में आपको जिन संसाधनों की ज़रूरत हो, वो ले लीजिए बेशक। क्योंकि अगर वो न हों तो आपका काम रुकेगा और यही नियम है।

कभी पूछना हो अपने आप से, मैं अपने आपको कितना दूँ? मान लीजिए आपके पास हो भी। आप अच्छा कमाने लग गए, क्योंकि आपको आपके काम में सफलता मिल रही है, काम आगे बढ़ रहा है, आपके पास पैसा आने लग गया। तब भी अपने आप से प्रश्न पूछिएगा कि मैं अपने आप को कितना दूँ, उसमें से? कितना ख़र्च करूँ?

क्योंकि भारत में ये हो रहा है न। पिछले बीस चालीस साल में प्रति व्यक्ति आय बढ़ी है काफ़ी। तो अगर आज का कोई पैंतीस चालीस साल का व्यक्ति है, या पचीस तीस साल वाले भी हैं, तो उन्होंने बचपन में अपने पिताजी को एक पुराने स्कूटर को घसीटते देखा है। देखा है न? और ये भी देखा है कि कैसे वही ठेले से हम कुछ ख़रीद के चाट पकड़ी खा लेते थे। वो दो, पाँच, एक रुपये में काम भी चल जाता था। आज से बीस पचीस तीस साल पहले की बात है।

और फिर शिक्षा के कारण या आर्थिक अवसरों के कारण समृद्धि आ गई, और आज उसी घर में पैसा आ गया है। पैसा आ गया है पर उस घर को ये भी याद है कि बिना पैसे के भी काम चल तो रहा ही था मज़े में, इस बजाज के स्कूटर पर भी काम चल रहा था।

पर आज इतना पैसा है कि आप गाड़ी ख़रीद सकते हो। आप बड़ी गाड़ी ख़रीद सकते हो। आप शायद एक नहीं, दो गाड़ियाँ ख़रीद सकते हो। तो वहाँ ये सवाल लाज़मी हो जाता है कि पैसा तो आ गया है, पर खर्च करूँ कितना? क्योंकि काम तो हमारा तब भी चल रहा था, जब बजाज स्कूटर था, वही पुराना-सा। तो अब क्या करें? छोटी गाड़ी लें, बड़ी गाड़ी लें, एक गाड़ी लें, दो गाड़ी लें, क्या करें?

तो वहाँ पर जवाब ये होता है, उतना लो जितना ज़रूरी है, तुम्हारा काम पूरा करने के लिए।

जब तुम्हें दिखाई दे कि तुमने जितना ले रखा है वो कम पड़ रहा है, क्योंकि उतना कम लेने के कारण काम में ही बाधा आ रही है, तब अपने आप को और दे दो।

मोबाइल फ़ोन है, कैसे पता करें कि नया मोबाइल फ़ोन ले लेना चाहिए? जब दिखाई दे कि वो जो मोबाइल फ़ोन है, वही अब बाधा बन रहा है काम को आगे बढ़ाने में। उसकी स्पीड कम हो गई है। उसकी मेमोरी छोटी पड़ रही है, कोई और बात हो रही है। उसकी टच स्क्रीन उतनी रिस्पॉन्सिव नहीं रही। कुछ ऐसा हो रहा है कि अब उसके कारण समय ख़राब होने लगा है। हर चार घंटे में उसको चार्ज करना पड़ता है। जब दिखाई दे कि अब ये मेरे काम में एक बाधा है, एक बॉटलनेक बन रहा है तब नया ले लो। समझ में आ रही है बात?

उसको बिज़नेस क्लास बोलते हैं फ्लाइट में, बिज़नेस क्लास। बिज़नेस क्यों बोलते हैं? वो उनके लिए है दोज़ हू हैव अ बिज़नेस इन लाइफ़। बिज़नेस माने व्यापार ही नहीं होता। जब कहा जाता है “माइंड योर ओन बिज़नेस”, तो उससे क्या आशय है? अपना व्यापार संभालो। बिज़नेस माने क्या? काम। तो जिनके पास कोई सार्थक काम है करने के लिए, वो अगर कहें कि साहब, हमारे वो तीन घंटे जो फ्लाइट के हैं, वो भी बहुत-बहुत ज़रूरी हैं, हम उन तीन घंटे में भी काम निपटा लेंगे और वो काम इकॉनमी में बैठ के नहीं हो पाएगा, तो अगर फिर वो बिज़नेस क्लास में चल रहे हैं तो बात जायज़ है, जस्टिफ़ाइड है।

पर बाप के पैसों पर आप कहो, नहीं साहब, इकॉनमी का दस हज़ार का टिकट है, बिज़नेस का चालीस हज़ार का टिकट है। मैं तो चालीस वाले में चलूँगा, क्योंकि बाप पैसा देने को तैयार है। मैं बोलूँगा, “चालीस दे दो”, दे देगा। तो ये बात कहीं से ठीक नहीं है।

और अजीब भी लगेगा, वहाँ लोग बैठे होंगे, सब अपना-अपना काम कर रहे होंगे। बिज़नेस में कोई ऐसे ही नहीं उड़ने लगता। वहाँ जितने बैठे होते हैं, वो सब काम कर रहे होते हैं। और वहाँ बीच में एक जाकर बैठ गया झुनू का नुन्नू। और वो क्या कर रहा है? उसके पास कुछ नहीं बस इधर-उधर ऐसे-ऐसे देख रहा है, कि डैडी जी का पैसा और बेटा जी की ऐश। तो वो ख़ुद को ही भीतर से ग्लानि उठेगी, गरिमा नहीं रह जाती है किसी दूसरे के पैसों पर ऐश करने में। या अपने ही पैसे पर, ज़बरदस्ती, ज़रूरत है नहीं और ख़र्च कर रहे हो।

कोई भी ख़र्चा अपने आप में न जायज़ होता है, न नाजायज़ होता है। ख़र्चा कितना करना है, ये इस बात से नापो कि उतना ख़र्चा करना तुम्हारे काम के लिए ज़रूरी है क्या? फिर से समझो, उतना ख़र्चा करना तुम्हारे काम के लिए ज़रूरी है क्या? काम के लिए ज़रूरी हो तो करो। और कहो कि नहीं, इससे कम में भी काम तो मज़े में चलता। काम माने कौन सा काम? जो भी तुमने जीवन में सार्थक कर्म पकड़ा है।

जब दिखाई दे कि इससे कम में भी हो जाता, ये तो मैं यूँ ही बस अपने आप को एक मनोवैज्ञानिक विलास देने के लिए, इंद्रियगत अपने आप को एक उत्तेजना देने के लिए, सेंसुअल ग्रैटिफ़िकेशन के लिए बस ख़र्च कर रहा हूँ, तो जान लो कि ये बात, देखो, ठीक नहीं है। ये फिर ठीक नहीं है। बात समझ में आ रही है?

सादगी और मितव्ययता इसमें नहीं है कि कम ख़र्च करना है। वो इसमें है कि सही ख़र्च करना है। ये दो बहुत अलग-अलग बातें हैं, कम ख़र्च करना और सही ख़र्च करना।

क्यों एंबुलेंस आती है? वो फोर-व्हीलर क्यों होनी चाहिए? रोगी को बाइक के पीछे बैठा दो न। क्यों नहीं? क्यों इतना पैसा ख़र्च कर रहे हैं? तो अगर एंबुलेंस जैसी ज़रूरत है, तो वहाँ फोर-व्हीलर चाहिए। पर यहाँ ऐसे भी सूरमा घूम रहे हैं जो दो मिनट वाली फ्लाइट लेते हैं प्राइवेट जेट पर। सेलिब्रिटीज़ हैं, यह-ये तक कर रहे हैं कि थोड़ी-सी दूर कहीं जाना है, 50 कि.मी., वहाँ भी वो अपने प्राइवेट जेट पर बैठ के जा रहे हैं। वो ऐसे होता है, पूरा ऊपर पहुँच भी नहीं पाता और नीचे आ जाता है।

यहाँ पूछना ज़रूरी है कि साहब, आप अमेरिका में हो और आप कोई भीड़-भाड़ वाले इलाके में तो रहते नहीं हो। ऐसे लोग हमेशा शहरों से बाहर रहते हैं थोड़ा। चौड़ी रोड है और जहाँ आपको जाना है, वहाँ तक कोई ट्रैफ़िक नहीं। ये आपने क्यों इतना कार्बन ख़र्च किया? क्यों आपने इसमें इतना फ़्यूल जलाया? क्या ज़रूरत थी? ये बर्बादी है, ये अय्याशी है। कोई ज़रूरत नहीं थी, पर जलाया गया है। समय भी नहीं बचा, क्योंकि टेक-ऑफ़ और लैंडिंग में जो समय लगा है, उतनी देर में तो आप गाड़ी से, कार से भी पहुँच जाते, बल्कि शायद कम समय लगता। ये अय्याशी है।

पर आप कहो, नहीं, मैं तो यहाँ से अगर मुझे चेन्नई जाना है, तो मैं ट्रेन से जाऊँगा, तो ये कुछ गड़बड़ वाला मामला है। इसका अर्थ ये है कि आपके समय की कीमत नहीं है फिर, आपके समय की कोई कीमत नहीं है। आपके चालीस घंटों की ज़िंदगी में कोई कीमत नहीं है।

तो फ्लाइट कब लेनी है ट्रेन की जगह? जब आपके समय की इतनी कीमत हो जाए कि आप कहो कि अगर मैं ट्रेन की अपेक्षा फ्लाइट से जा रहा हूँ, तो मेरे ₹4000 ज़्यादा लग रहे हैं मान लो, लेकिन मैं बचा रहा हूँ बीस घंटे। ₹4000 ज़्यादा देकर मैं कितने घंटे बचा रहा हूँ? और आप साफ़-साफ़ ईमानदारी से अपने आप से कह पाओ कि मेरे बीस घंटों की कीमत चालीस हज़ार से ज़्यादा है, तब ट्रेन छोड़ के फ्लाइट पर चलना शुरू कर दो।

तो इसमें नैतिकता की बात नहीं है। इसमें सीधे-सीधे व्यावहारिकता का तर्क है। ख़र्च कर रहे हो किसके लिए? अपने भोग के लिए या अपने कर्म के लिए? और यहाँ पर ख़ुद को धांधली में डालना बहुत आसान है। बेईमानी करना, कि नहीं-नहीं-नहीं, ये तो ऐसा नहीं है कि मैं अपने भोग के लिए कर रहा हूँ, मैं अपने काम के लिए कर रहा हूँ। तो इसमें तो आप किस वजह से कर रहे हो, किस केंद्र से ख़र्च कर रहे हो, इसके निर्धाता आप ही हो सकते हो। आप ख़ुद से बेईमानी करना चाहो, तो उसका कोई जवाब नहीं है।

नया लैपटॉप लेना है। पुराने में क्या सचमुच काम नहीं चल रहा? अगर सचमुच नहीं चल रहा, तो बेशक लो। चालीस हज़ार वाला नहीं, एक लाख वाला लो। अगर एक लाख वाले में ही काम चल सकता है तो। लेकिन अगर आपके पास एक लैपटॉप है जिसमें आपका काम बखूबी चल रहा है, तो फिर दो रुपए भी क्यों ख़र्च करने हैं और। अगर जिस लैपटॉप में, जो आपके पास है, उसमें आपका काम चल रहा है तो दो रुपए भी और मत ख़र्च करिए।

लेकिन अगर काम के लिए ज़रूरी है कि साहब, मेरे पास ₹30,000 वाला है और ₹40,000 वाले में भी काम नहीं चलेगा, मुझे तो सीधे-सीधे लाख का डेढ़ लाख वाला लैपटॉप चाहिए, तो डेढ़ लाख वाला बिल लो। वो जो काम है सार्थक कर्म है वही सब कुछ है। अगर वो आपके संसाधनों की आहुति माँगता है, तो दीजिए। बात समझ में आ रही है?

आप जिसको लग्ज़री बोलते हो, उस दिन उसमें कदम रखना जिस दिन वो लग्ज़री न रहे आपकी नीड बन जाए, ये सूत्र है।

जिसको आप लग्ज़री बोल रहे हो, उसको तब तक ठुकराते रहो, जब तक वो लग्ज़री लग रही है। लग्ज़री माने विलासिता, अय्याशी, नवाबी। जिस दिन तक उसमें प्रवेश करना बस अय्याशी है, उसमें प्रवेश मत करो। और जिस दिन दिखाई दे कि अगर इसमें प्रवेश नहीं किया तो काम का घाटा है, अब ये मेरी ज़रूरत है। वास्तविक ज़रूरत है, स्वार्थ की ज़रूरत नहीं है मेरे सार्थक कर्म की ज़रूरत है, उस दिन उस लग्ज़री में चले जाना।

संभावना यही है कि अगर ये सूत्र लगाओगे, तो बहुत ज़्यादा लग्ज़री की ज़रूरत पड़ेगी नहीं।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, पर जैसे देखते हैं हम आमतौर पर कि पहले ये सोचते हैं कि अय्याशी करनी है, उसके बाद सोचते हैं कि कौन-सा काम करें कि वो उतना सुख मिल सके।

आचार्य प्रशांत: ये तो बहुत उल्टा तरीका है, कि मुझे जाकर के स्पेन में हॉलिडे करना है। मैं इस हिसाब से पढ़ाई कर रहा हूँ कि एक दिन करियर ऐसा बनेगा कि मैं स्विट्ज़रलैंड में या कहीं पर हॉलिडे मनाऊँगा। ये बहुत उल्टा तरीका है। और ऐसे लोगों को आमतौर पर कोई हॉलिडे मिलता भी नहीं है फिर। ये बेकार का तरीका, ये नहीं है।

तुम काम करो। अगर काम में डूब गए हो, तो सबसे मज़ेदार बात ये होती है कि काम से हटना बुरा लगता है। जिसको आप वेकेशन बोलते हो न, वो चुभने लगती है। बहुत खुजली हो जाए वेकेशन जाना है, जाना है। चले जाओगे। दूसरे दिन से कहोगे, काम करना है, क्यों आ गए? ये होता है जब सही ज़िंदगी जियो और काम से प्यार हो जाता है, काम छूटता ही नहीं। काम नहीं छूटता।

अभी बीते महीनों में तुम लोग संस्था से कुछ लोग नैनीताल गए थे, कुछ लोग गोवा गए थे, और कहाँ-कहाँ गए थे? ऋषिकेश गए थे। तो जब वहाँ गए थे तो क्या काम बंद कर दिया था? काम बंद कर दिया था क्या? जहाँ भी हो, काम तो चलेगा न। काम करते रहो, काम नहीं छूटता। बल्कि फिर आप कहते हो कि मैं वहाँ जा ही इसलिए रहा हूँ कि वहाँ से मैं और बेहतर काम कर पाऊँगा। मैं वहाँ जा ही इसलिए रहा हूँ कि वहाँ से और बेहतर काम कर पाऊँगा।

अब देखो, ये कितना विपरीत तरीका हो गया और कितना सुंदर। एक आदमी होता है, जो छुट्टी मनाने जाता है ये बोलकर कि मैं काम बंद करके जा रहा हूँ। मैं वहाँ इसलिए जा रहा हूँ कि वहाँ जाऊँगा तो मेरा काम बंद हो जाए। और दूसरा आदमी होता है, जो कहता है कि मैं बाहर कहीं जा रहा हूँ ताकि वहाँ से मैं काम और ज़्यादा कर सकूँ। मैं बाहर जा रहा हूँ ताकि मैं वहाँ से काम और ज़्यादा कर सकूँ। मज़ेदार है कि नहीं? है कि नहीं? मैं वेकेशन ले रहा हूँ ताकि वहाँ और ज़्यादा काम कर सकूँ।

और सचमुच ऐसा होता है। संस्था में तो हो रहा है ऐसा, निश्चित रूप से हो रहा है। जो यहाँ पर हैं, उनके काम में थोड़ा ऊँच-नीच, 19-20 हो जाए चलता है। जो बाहर गए हैं, संस्था से खुद ही भेजती है, अच्छा, जाओ, हर महीने कुछ लोग जाते हैं, तुम लोग जाओ। जो बाहर गए हैं, उनसे तो और ज़्यादा, हाँ भाई, कितना रहा, वो बहुत पूछना भी नहीं पड़ता कर ही लेते हैं। वहाँ घाट पर बैठकर के और अच्छे से काम चल रहा है। कैफ़े में बैठे हुए हैं और बढ़िया, लैपटॉप ही तो लेकर बैठना है और क्या करना है? मस्त है न तरीका जीने का।

कह रहे हैं, वाह साहब, टूरिस्ट स्पॉट पर दिखाई दिए आप। क्या कर रहे हो यहाँ पर? क्या करने आए? क्या जवाब दिया? काम। तो टूरिस्ट स्पॉट पर क्यों आए? क्योंकि सुंदर जगह है, यहाँ पर काम और अच्छे से होता है। पहाड़ है या समुद्र है, कुछ है, गंगा है, घाट है। यहाँ पर काम हमारा और अच्छे से होता है, इसलिए आए हैं यहाँ पर।

आ रही है बात समझ में?

तो तभी जाएँगे जब वहाँ जाने से हमारा काम और अच्छे से हो। तभी ख़रीदेंगे जब उसको ख़रीदने से हमारा काम और अच्छे से हो।

ये होटल लूँ या ये होटल लूँ? एक हज़ार वाला भी है, चार हज़ार वाला भी है, चौदह हज़ार वाला भी है, चौबीस हज़ार वाला भी है। कौन-सा लूँ? जहाँ काम अच्छा हो वो ले लूँगा। जहाँ काम अच्छा होगा वो ले लूँगा, बात ख़त्म। मैं अपने आप को कितना दूँगा, इसका फैसला मेरे काम का स्तर करेगा। और अगर मेरे काम में कोई स्तर नहीं, तो मैं अपने आप को कुछ दूँगा भी नहीं। और मैं अपने आप को जो भी दूँगा, अपने लिए नहीं दूँगा अपने काम के लिए दूँगा।

उदाहरण देता हूँ। मेरे पास दो तरीके के कपड़े हैं, एक मेरे एक संस्था के। जो मेरे हैं, वो ऐसे हैं कि उनमें ये लोग फ़ोटो वग़ैरह नहीं लेते। सारी ये कैमराबाज़ी तब करते हैं जब संस्था वाले कपड़े होते हैं। और मेरे अपने कपड़े हैं, वो एक उसमें पाइल में आ जाते हैं। और जो संस्था वाले हैं, वो यहाँ पर होते हैं इस्तेमाल। और यहाँ इस्तेमाल हो के वापस जाते हैं। खूंटी पर टँग जाते हैं, उनको प्रेस करके वापस वहाँ रख दिया जाता है कि दोबारा, जब कैमरा आएगा तो इनका इस्तेमाल होगा।

समझ में आ रही है बात?

अपने लिए जो लेना है, वो इतना ही काफ़ी है। काम के लिए ज़रूरत है, तो एक अलग ख़र्चा है फिर। वो तभी किया जाएगा जब निश्चित हो कि वो करने से काम को लाभ होता है। हाँ, काम को लाभ होता है, ठीक है।

ये प्रयोग करके, परीक्षण करके, नाप-तोल करके पता चल गया कि आचार्य जी, जब आप वो सड़ा कुर्ता पहन के बैठ जाते हो, तो व्यूज़ नहीं आते। तो ये बात अब निश्चित हो चुकी है। आचार्य जी, जाओ, कोट ख़रीद लो। उस कुर्ते में और वो सब जो आप बैठा करते थे, उसमें काम नहीं बन रहा। ठीक है, फिर ठीक है।

अपने आप को लग्ज़री देने से पहले मैं क्या पूछूँगा? क्या मेरा काम इस लायक है? बस। और जितना मेरे काम का स्तर बढ़ता जाएगा, उतना मैं अपने आप से कहता जाऊँगा, “हाँ, काम अब माँग रहा है एक नया मोबाइल फ़ोन। काम अब माँग रहा है लैपटॉप। काम माँग रहा है कि मैं ऐसी जगह पर न रहूँ जहाँ बहुत भीड़-भड़ाका हो, क्योंकि भीड़-भड़ाके में काम नहीं हो पाता।” तो मैं उस हिसाब से फिर काम की ख़ातिर, काम के सेवक की तरह, काम के साधन की तरह, काम के निमित्त की तरह, मैं अपने आप को फिर सुविधाएँ देती चलूँगी। उससे पहले नहीं।

ये नहीं कि करते कुछ नहीं हैं, बस ऐश करते हैं। वो नहीं होना चाहिए। सपना वही होता है। कोई पूछे, क्या करते हो आजकल? हमारा जवाब आए, ऐश। वो नहीं।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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