यह आदमी जो अपने ऊपर हंसना शुरू करता है, यह अकर्ता हो जाता है। नॉन-डूअर हो जाता है। नॉन-डूअर का मतलब यह नहीं कि अब नॉन-डूइंग हो गई। डूइंग तो बहुत होगी! ज़बरदस्त होगी! घनघोर होगी! कल्याणप्रद होगी! ऑसपिसियस होगी! डूइंग होगी, डूअर नहीं होगा। पर कर्ता नहीं होगा। और जो यह कर्ता-हीन कर्म होता है, "द डीड विदाउट डूअर", इसके क्या कहने! यह फिर अवतारों की लीला समान हो जाता है। यह जीवन को खेल बना देता है। यह पृथ्वी पर स्वर्ग उतार देता है। यह बहुत पुराना जो कैदी है, उसे आकाश की आज़ादी दे देता है।
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आचार्य प्रशांत: श्रद्धा का अर्थ है कि कर्म के लिए किसी कर्म करने वाले की जरूरत नहीं होती, कि कर्म के लिए कर्ता आवश्यक नहीं है। हमारा कहना होता है कि मैं नियंत्रण में ना रहूँ, मैं ना संभालूँ, मैं ना करूँ, तो कुछ होगा कहाँ? और यदि कुछ होगा भी, तो अनाप-शनाप हो जाएगा, अनियंत्रित होगा, तो अव्यवस्थित हो जाएगा? हम अपने करने को बड़ा भारी मूल्य लगाते हैं और हमारे पास प्रमाण भी होते हैं।
हम कहेंगे, ‘गाड़ी चल रही है, हम चालक हैं, हम स्टीयरिंग पर हैं। हम ना चलाएँ, तो चलेगी कैसे? और चलाते-चलाते अगर कभी झपकी आ जाए या बेध्यानी हो जाए, तो गाड़ी भिड़ जाती है ना?"
ऐसा हम उदाहरण देंगे। तो रोजमर्रा के जो हमारे अनुभव और हमारे उदाहरण होते हैं, उनके द्वारा हमें ऐसा प्रतीत होता है और हम ऐसा सिद्ध भी कर देते हैं कि कुछ होता रहे, ठीक से होता रहे, शुभता से होता रहे, व्यवस्था से होता रहे—उसके लिए हमारा करना बहुत जरूरी है।
ये एक तरह से आरंभ का बिंदु है, जहाँ से सारी कहानी आत्मज्ञान की शुरू होती है क्योंकि यही धारणा लेकर हर आदमी बैठा है। यहीं से हमारी शुरुआत होती है, और यहीं से सर दर्द, तनाव और हिंसा की भी शुरुआत होती है। "मुझे करना है। मैं जानता हूँ, उचित क्या है, वह मुझे करना है।"










