मनुष्य की देह होने भर से आपको कोई विशेषाधिकार नहीं मिल जाता, यहाँ तक कि आपको जीवित कहलाने का अधिकार भी नहीं मिल जाता। सम्मान इत्यादि का अधिकार तो बहुत दूर की बात है, ये अधिकार भी नहीं मिलेगा कि कहा जाए कि ज़िन्दा हो।
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आचार्य प्रशांत: अर्जुन को तीन सत्ताओं में दीक्षित कर रहे हैं। पहली अहम्, दूसरी प्रकृति और तीसरी आत्मा। प्रकृति से क्या सही संबंध रखना है? यही धर्म की विषय वस्तु है। तो प्रकृति से सही संबंध वही होता है जो अहम् को आत्मा की ओर ले जाए।
तो हमने पिछले सत्र में कहा था, ‘जो आत्मा की ओर ले जाए उसको पूजना है और जो आत्मा के आड़े आए उसको तोड़ना है।’ यही सही संबंध है प्रकृति से। और कैसे पता चलता है कि अहम् की दिशा है आत्मा की ओर ही? प्रकृति से संबंध बनाने की अनिवार्यता, विवशता कम होने लगती है। अगर आपकी आंतरिक यात्रा सही दिशा में जा रही है तो एक यह आपको प्रमाण मिलेगा—प्रकृति से संबंध बनाने की जो आंतरिक मजबूरी होती है, कम होने लगती है। प्रकृति का दृष्टा होना पर्याप्त लगने लगता है। संबंध बनाना ज़रूरी नहीं है। जानना पर्याप्त है। जान गए, इतना काफ़ी है। ठीक है?
तो प्रकृति से ही सही संबंध क्या होता है? यही बात यहां पंद्रहवें श्लोक में भी है।
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ। समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते।।२.१५।।










