“यज्ञ” का अर्थ है — जो कुछ भी किसी निचले स्तर पर है, उसे उठाकर ऊँचे स्तर पर रख देना। जो भी संसाधन आपके पास है — समय, ध्यान, चिंतन, धन, श्रम — उसे उच्चतम को समर्पित कर देना, यज्ञ है। एक बार जान जाओ कि कोई चीज़ ऊँची है, सर्वस्व समर्पित कर दो। अपने लिए कुछ बचाकर मत रखो। “आरोहण है गीता” — नीचे से ऊपर की ओर बढ़ते चलो, यही यज्ञ है।
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आचार्य प्रशांत: जीवन कैसे जीना है, किसके लिए जीना है, कैसे खाना-पीना है साधारण बातें, उन पर बहुत स्पष्ट निर्देश दे रहे हैं श्रीकृष्ण आज। पहले थोड़ा अन्वय के माध्यम से सिद्धांत समझ लेते हैं।
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यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम।।
अर्थ:
वे अमृत रूप यज्ञावशिष्ट भोजन करने वाले सनातन नित्य ब्रह्म को प्राप्त करते हैं। हे अर्जुन, यज्ञ न करने वाले का यह लोक नहीं है तो अन्य लोक भी कहाँ है?
~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोक 4.31







