
आचार्य प्रशांत: जीवन कैसे जीना है, किसके लिए जीना है, कैसे खाना-पीना है साधारण बातें, उन पर बहुत स्पष्ट निर्देश दे रहे हैं श्रीकृष्ण आज। पहले थोड़ा अन्वय के माध्यम से सिद्धांत समझ लेते हैं।
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यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम।।
अर्थ:
वे अमृत रूप यज्ञावशिष्ट भोजन करने वाले सनातन नित्य ब्रह्म को प्राप्त करते हैं। हे अर्जुन, यज्ञ न करने वाले का यह लोक नहीं है तो अन्य लोक भी कहाँ है?
~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोक 4.31
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"अवशिष्ट" किस अर्थ में उपयोग हो रहा है? "अवशिष्ट," बचा हुआ तो ठीक है। पर बच कैसे जाएगा?
"यज्ञ" का अर्थ है, जो कुछ भी किसी निचले स्तर पर है उसे उठाकर ऊँचे स्तर पर रख देना। साधारण तेल हो, वो कई दिशाओं में जा सकता है। एक तो ये कि तेल ही रह जाए, किसी पात्र में पड़ा रह जाए या पात्र में भी काहे को पड़ा रह जाए, मिट्टी के नीचे दबा रह जाए जहाँ से आता है। एक ये है कि तेल ले लिया, पर तेल से सब कुछ बनता है आप जानते हैं न, जो क्रूड ऑयल होता है उससे सैकड़ों तरह के उत्पाद निकलते हैं, सिर्फ़ पेट्रोल-डीज़ल ही नहीं।
तो एक है कि उसको ले लिया और उससे किसी का घर जला दिया। एक है कि उसको ले लिया और उसको सौंदर्य प्रसाधन बना दिया। बहुत सारे जो सौंदर्य प्रसाधन होते हैं, कॉस्मेटिक्स उनमें भी उसका उपयोग होता है। एक है कि उसको ले लिया, उससे चूल्हा-चौका कर लिया, रोटी बना ली। एक है कि उसको ले लिया और उसको प्रकाश बना दिया, उसको किसी दीये को अर्पित कर दिया।
ये यज्ञ है, जो भी संसाधन आपके पास है उसे उच्चतम को समर्पित कर देना है। उसका ऊँचे से ऊँचा उपयोग हो सके। जहाँ का वो था, वहीं पड़ा रहता तो किसी काम नहीं आता। दुरुप्युक्त भी हो सकता था, और अगर काम आता भी तो साधारण। उसको जाकर के दीये की बाती को दे दिया, तेल मिट गया प्रकाश बन गया, ये यज्ञ है। अब इसमें बचेगा क्या? तो "अवशिष्ट" माने क्या हुआ?
तो आप इसी का ले लीजिए जो क्रूड ऑयल होता है, एक पूरा जीवाश्म ईंधन का क्षेत्र है। इनमें से सब कुछ ही ऐसा नहीं निकलता, जो प्रज्वलित, प्रकाशित होने के काम आ सके। जो किसी ऊँचे काम में उपयुक्त हो ही नहीं सकता, वो है अवशेष। "अवशेष" माने ये नहीं, कि वो चीज़ लग तो सकती थी यज्ञ में पर हमने बचा कर रख ली। ऐसे नहीं "शेष" रखना है, वो एक तरह का अपशिष्ट है। जो इसको आप कह रहे हो न अवशिष्ट, वो एक तरह का अपशिष्ट है। वो मैंने मजबूरी में अपने पास रख लिया। अगर वो भी समर्पित हो सकता तो समर्पित कर दिया होता। पर उसको मैं अगर दीये को समर्पित करूँगा तो उससे रोशनी बढ़ेगी नहीं, ये और हो सकता है कि दीया बुझने लग जाए।
जो कुछ ऐसा हो जो दीये के प्रकाश को बाधित करेगा, बस वही अपने पास रोक लेना है। जो कुछ ऐसा हो जो मेरे पास रहता तो अंधेरे की ही खुराक बनता, उसको दीये को दे देना है। और दीये से यहाँ पर क्या आशय है? यज्ञ-वेदी, अग्नि ही होती है न। तो दीया मैं कह रहा हूँ तो आपको लग रहा है कि थोड़ी-सी अग्नि उसी को आप हवन-वेदी बना दीजिए, तो बड़ी भारी अग्नि, पर आशय वही है।
जब कोई संसाधन ऐसा है जो प्रकाश के काम आ सकता है, तो उसको अपने पास क्यों रखूँ? ये यज्ञ है। और इसमें हमेशा यही नहीं बात है कि किसी दूसरे को दे देना है। आपके पास समय है, आप अपना समय दो अलग-अलग कामों में लगा सकते हो। निचले तल के काम से आपने समय को काटा, उसमें आप रोज़ एक घंटा लगाते थे, आपने उसको कर दिया आधा घंटा। और जो ऊँचे तल का काम था, उसको आप एक घंटा देते थे, आपने उसको कर दिया डेढ़ घंटा। ये यज्ञ हो गया। समझ में आ रही है बात?
ये समय की बात करी है — यही बात धन पर लागू होती है, यही बात श्रम पर, ऊर्जा पर भी लागू होती है। कोई ऊँचे तल का काम था — बच्चों की पढ़ाई, आपकी पढ़ाई, पुस्तकें खरीदना। उसमें आपने बाँधा हुआ था कि महीने का ₹1000 लगाऊँगा, और ₹1000 आपने अपनी किसी चीज़ और चीज़ के लिए लगा रखा था। भाई, महीने में एक बार तो मैं साथ लेकर के सबको जाता हूँ पिक्चर देखने, चार-पाँच लोग हैं परिवार के ₹2000 तो लगता ही लगता है। तो उसमें से पैसा काटा और बच्चों की किताबों की ओर लगा दिया, ये यज्ञ हो गया। यज्ञ माने, यही नहीं कि आप मंत्रोच्चारण करोगे और एक आसन में बैठ जाओगे और स्थूल अग्नि प्रज्वलित करोगे, तो ही यज्ञ होगा।
समय, ध्यान, चिंतन, धन, श्रम — ये सब किसी निचली जगह से उठाकर किसी ऊँची जगह पर लगा देना ही यज्ञ है।
समझ में आ रही है बात?
बहुत लोगों को विचित्र लगता है, कहते हैं: "सब कुछ ऊँची जगह पर लगा देंगे, हम तो नीची जगह पर हैं न, हमें क्या मिलेगा? हम तो ऊँचे नहीं हो गए, ऊँची जगह पर लगा दिया हमें क्या मिल जाएगा?"
श्रीकृष्ण कितने कड़े हैं, कैसी सख़्त बात कर रहे हैं। कह रहे हैं कि "अवशिष्ट तुम खा लो, सब दे दो और देने के बाद जो बच जाए — बच भी ऐसे नहीं जाए कि उसमें से 5% बचा लिया, जो दिया ही नहीं जा सकता क्योंकि बेकार है वो तुम खा लो। उससे ज़्यादा तुम ले भी मत लेना।" ये तो बहुत कड़ी बात कर दी, कुछ हमारा भी ख़याल करिए।
तो एक बार ऐसा ही जो है — विरोध, संशय, एक पेड़ की सब पत्तियों को हो गया। उन पत्तियों ने कहा "यार, एक बात बताओ, बारिश होती है और पड़ती बारिश सारी हम पर है। और हम जो हमारा जल है, बारिश हो रही है पहले तो हम ही को मिली न? वो हमारा जल है, हम उस पर से अपना अधिकार छोड़ देते हैं वो नीचे गिर के जड़ को मिल जाता है सारा पानी। हम अपनी चीज़ जड़ को क्यों दें?"
जब आसमान से पानी आता है तो पहले जड़ को तो नहीं मिलता, पहले किसको मिलता है? पत्ती को मिलता है। पत्ती बोली, "फालतू में फिर हमें जड़ का मुँह ताकना पड़ता है कि पानी दे दो। हमारा पानी हमें मिला, हम नहीं देते।" तो सब पत्तियों ने अपने आप को ऐसा कर लिया, पात्र के आकार में — पात्राकार। बोली "इस बार जब गिरेगा पानी तो उसको अपने में ऐसे रोक लेंगे। पानी हमें भी चाहिए होता है।" हमारे अंदर भी 90% पानी है” पत्तियाँ बोलीं। “चाहिए हमें पानी और हम कुछ अपना ख़याल ही नहीं रखते, हम सारा पानी नीचे फेंक देते हैं। तो अब पानी की बूँद गिरेगी तो हम ऐसे झुक के उसको नीचे नहीं गिरने देंगे, हम उसको ऐसे करेंगे कटोरे की तरह अपने में बैठा लेंगे। तो सब पत्तियों ने यही करा।
उन्होंने सारा पानी अपने में इकट्ठा कर लिया और बहुत खुश हुईं, दो-चार दिन तक ज़बरदस्त उत्सव चला। किसी ने 10 ग्राम पानी, किसी ने 20 ग्राम पानी। कोई बहुत ज़बरदस्त पत्ती निकली, बोली — “मेरे पास है 100 ग्राम,” बढ़िया इतना! मतलब पकड़-पकड़ के बैठ गई, अब पानी तो खूब है। दो दिन के बाद, लेकिन सब पत्तियाँ लगीं मुरझाने। तो बूढ़ा था तना। जैसे बुढ़ों के मुँह पर झुर्रियाँ होती हैं, वैसे ही उसके मुँह पर छाल। तो तब वो खखार के बोला, "अरे पगलियों! पानी छोड़ दो।” ये यज्ञ है।
तुम्हारा कोई नुकसान नहीं होगा देने से, तुम्हें एक ही तरीक़े से मिल सकता है। तुम छोड़ दो वो पानी जड़ को मिल जाए, जड़ को मिलेगा तभी तुम्हें मिलेगा। तुम सोचोगी सीधे-सीधे तुम्हें मिल जाएगा, तो तुम भूखे मरोगी। तुम उसको दे दो, जिसको मिलना चाहिए। उसको दे दोगे तो तुम्हें भी मिलेगा। और उसको नहीं दोगे ख़ुद पकड़ के बैठे रहोगे, तो तुमने अपनी छोटी बुद्धि लगा तो दी पर तुम्हारी ये छोटी बुद्धि तुम्हारा बड़ा नुकसान कर जाएगी। यज्ञ समझ में आ रहा है?
यज्ञ कुछ ये नहीं है कि परोपकार। अपना नुकसान करके दूसरे का फायदा कर देना, ये नहीं यज्ञ होता। बहुत लोगों को लग रहा हो ऐसी बात हो रही है, वो सब लोक-नैतिकता है। वो सब सस्ती बातें हैं कि "मेरा नुकसान करके भी मैंने दूसरे का हित कर दिया, देखो मैं कितना अच्छा आदमी हूँ।" अस्तित्व ऐसे नहीं चलता, पागल!
अहंकार मिथ्या है। इसका मतलब क्या होता है? इसका मतलब ये होता है कि मैं और तुम अलग-अलग नहीं हैं। मुझको और तुमको अलग-अलग क्या बनाता है? व्यक्तिगत अहंकार। आप कहते हो, आप अलग, मैं अलग। “मैं” अगर नहीं है, तो हम और आप क्या हैं? एक ही प्रवाह के हिस्से हैं। समझ में आ रही बात?
आप भी एक लहर हो और मैं भी एक लहर हूँ, तो अलग-अलग तो है नहीं। तो जिसमें आपका फायदा, उसी में मेरा फायदा है। तो परोपकार कुछ हो ही नहीं सकता न। पर-उपकार कुछ नहीं हो सकता। उसका अगर भला हो रहा है तो मेरा हो रहा है, और मेरा हो रहा है तो उसका हो रहा है। और जहाँ उसका हो रहा है और मेरा नहीं हो रहा, वहाँ किसी का नहीं हो रहा। जहाँ मेरा हो रहा और उसका नहीं हो रहा, वहाँ मेरा भी नहीं हो रहा। समझ में आ रही है बात?
पत्ती की भलाई इसी में है कि वो पानी जड़ को दे दे, जितना भी उसे पानी मिले। कोई बूँद मिले खट से पत्ती क्या करती है? उसको चुआ देती है जड़ की ओर, वो जड़ को दे देती है। फिर जड़ क्या करती है? उसको पत्ती को दे देती है। यही विधान है। अपने लिए माँगोगे, तो भीख भी नहीं पाओगे। यज्ञ करते चलोगे तो अमृत मिल जाएगा, बिना माँगे। पर ये स्थूल आँखों को नहीं दिखाई देता। स्थूल आँखों को तो ये लगेगा कि पत्ती का बड़ा भारी नुकसान हो गया। पानी मिला था जड़ को दे दिया। और कोई तरीक़ा नहीं है पाने का। समझ में आ रही है बात ये?
गीता में अनेक अध्यायों में इतनी बार यज्ञ का उल्लेख आया है। जैसे गीता की पूरी सीख इस छोटे से दो अक्षर में समा जाती हो — "यज्ञ"।
आरोहण है गीता, नीचे से ऊपर की ओर बढ़ते चलो, यही यज्ञ है। एक बार जान जाओ कि कोई चीज़ ऊँची है, सर्वस्व समर्पित कर दो। अपने लिए कुछ बचाकर मत रखो।
श्रीकृष्ण साफ़ बोल देते हैं, जो ऐसा कर रहा है वो चोर है। जो यज्ञ में आहुति देने की जगह अपनी जेब में, अपने घर में बचा कर रखता है, वो चोर ही है। और आज क्या कह रहे हैं? आज वही चोरी वाली बात और आगे बढ़ा दी। बोले, "ये लोग जो यज्ञ नहीं करते, पता नहीं कौन से ब्रह्मलोक की सोच रहे हैं, इन्हें तो इस लोक में भी न शांति मिलेगी, न मुक्ति, न आनंद। वही कटोरी-नुमा पत्तियों जैसी इनकी दशा हो जाएगी, कि अपने संसाधनों को घेर कर बैठे हुए हैं और उसमें से पा कुछ नहीं रहे। पत्ती प्यासी मर रही है। इतना पानी लेकर बैठी है पत्ती और प्यासी मर रही है। पानी इतना लेकर बैठी है और मर रही है प्यास से।"
श्रीकृष्ण कह रहे हैं, जो तुम्हारे पास है सब मूल को अर्पित करते चलो। उसको दे दोगे वो तुम्हें लौटा देगा, तुम्हें वापस मिल जाएगा। उसे दे दो, सिर्फ़ उसी के रास्ते तुम्हें वापस मिल सकता है। नहीं तो कोई तरीक़ा नहीं है वापस पाने का। यज्ञ न करने वाले का इसी लोक में कोई निस्तार नहीं है, तो वो अन्य किन लोकों की कल्पना कर रहा है?
जो अपने लिए बचा कर रखता है, वो हर तरीक़े के नरक और पाप का भागी बनता है। इसमें समय बहुत महत्त्वपूर्ण है, मैं आप लोगों से बार-बार कहा करता हूँ। जब पहली बार कहा था तो लोग बिदक गए थे। पर्सनल टाइम इज़ हेल। जो कुछ भी तुमने अपने लिए बचा कर रखा, उसी में तुम अपने लिए नरक खड़ा करोगे। मत बचाओ अपने लिए।
समय है, उसे किसी ऊँचे काम को समर्पित कर दो। संसाधन में पैसा ही थोड़ी आता है, समय सबसे बड़ा संसाधन होता है क्योंकि हम सब मरने वाले हैं न।
जिस जीव की अवधि निश्चित है, उसके लिए सबसे बड़ा संसाधन क्या हो गया फिर?
श्रोता: समय।
आचार्य प्रशांत: तो अपना समय जो है, ज़रा भी तुमने अपने लिए बचा के रखा। उसी में तुम ख़ुद को चोट पहुँचाओगे। और आपको आज तक जो चोट पहुँची भी होंगी, वो सारी उसी समय में पहुँची होंगी जिसको आप बोलते हो — ये मेरा फ्री टाइम, व्यक्तिगत समय, मेरा पर्सनल टाइम है। मत बचाओ।
जो पर्सनल टाइम बचाएगा, वो पर्सनल सेल्फ को बचा गया ना? पर्सनल सेल्फ को क्या बोलते हैं? अहंकार। और जो कुछ भी, जीवन में जो कुछ भी पर्सनल है वही तुम्हारा नरक है। मत रखो पर्सनल। पर्सनल मतलब जिसका संबंध तुम्हारे व्यक्तित्व से है, पर्सनहुड से है। जो कुछ तुम्हारी देह से संबंध रखता है, उसको कम से कम संसाधन दो।
दो तरह की भूलें होती हैं, पहला, बचा के रख लिया। दूसरा, यज्ञ के नाम पर न जाने कहाँ डाला है। दुनिया भर में — यूरोप में, चीन में, जापान में, भारत में, श्रीलंका में, अरब में, ईरान में, तुर्की में जब बड़ी लड़ाइयाँ हुई हैं, तो उनमें धर्मस्थलों का बड़ा एक किरदार रहा है। पता नहीं क्यों रहा है। आप कभी सोचते नहीं? अभी भी जो लड़ाई चल रही है मध्य पूर्व में, कहाँ चल रही है?
श्रोता: इज़राइल।
आचार्य प्रशांत: उसमें बार-बार आता है अल-अक्सा, जेरूसलम। ये तो धार्मिक स्थल हैं, इनका लड़ाई से क्या रिश्ता होना चाहिए? रिश्ता ये रहा है कि धर्मस्थलों के पास या धर्मों के पास, ज़बरदस्त तरीक़े से ज़मीन और पूंजी रही है। और उसी ज़मीन की खातिर और उसी पूंजी की खातिर, उन पर बड़ी-बड़ी चढ़ाइयाँ हुई हैं दुनिया भर में।
उसमें आप "प्रतिष्ठा" और जोड़ सकते हो। तो पृथा माने ज़मीन, पूंजी, प्रतिष्ठा, ये सब रही हैं धार्मिक संस्थानों के पास। और इसीलिए फिर उनका राजनीति से बड़ा व्यवहार चलता है। क्योंकि ये सब बातें राजनेता को भी चाहिए, पैसा, ज़मीन, प्रतिष्ठा। मैं ये क्यों कह रहा हूँ आपसे? मैं इसलिए कह रहा हूँ कि इसका संबंध झूठे यज्ञ से है। दुनिया भर के धर्मस्थलों को या धार्मिक संस्थानों को इतनी बड़ी राशियाँ कैसे मिल जाती हैं?
आप समझते हो ज़मीन कितनी महंगी होती है, रियल एस्टेट। आप समझते हो कि एक साधारण घर बनाने में आपकी हालत क्या होती है। आप समझते हो कि दुनिया भर में अनगिनत देवालय हैं, कई-कई-कई-कई लाख! और एकदम जो छोटे वाले हैं, उनको गिन लो तो करोड़ों में पहुँचेगा मामला। और उनमें से बहुत सारे संस्थान शायद अधिकांश किसी महत्त्व के नहीं हैं, बल्कि फ़र्ज़ी हैं। फिर भी उनको प्रतिष्ठा मिल जाती है।
उनको प्रतिष्ठा देना क्या है? उनको पूँजी देना क्या है? और उनको पृथा देना क्या है? झूठा यज्ञ। ये सब किसने दिया है? ये आपने दिया है। तभी तो जब ये सब रिलीजियस इंस्टीट्यूशन्स होते हैं, इनका कोई प्रमुख मर जाता है, तो उसके बाद देखा है उत्तराधिकार के लिए कैसी खूनी लड़ाइयाँ होती हैं? क्यों होती हैं? खूनी लड़ाई धार्मिकता का प्रमाण तो नहीं लग रही। क्यों होती हैं खूनी लड़ाइयाँ? क्यों होती हैं? इसको मिलेगी गद्दी। जिसको मिलेगी गद्दी, उसको हो गया सारा पैसा। उसको मिल गई सारी प्रतिष्ठा। और उसको मिल गई सारी ज़मीन।
चलो, उसको तो मिल गई। पर सबसे पहले वो ज़मीन उस संस्थान के पास आई कैसे? वो पैसा कैसे आया? और वो प्रतिष्ठा कैसे आई? झूठा यज्ञ है ये।
यज्ञ "ना करना" सिर्फ़ इसी में निहित नहीं है कि मैंने अपने पास बचा लिया। यज्ञ ना करने का ज़्यादा बड़ा उदाहरण होता है कि जहाँ नहीं देना चाहिए था, वहाँ दे आए और सोचा कि किसी ऊँची जगह पर दिया है। ये सब ऊँची-ऊँची मस्जिदों वाले, गिरजे वाले, मंदिरों वाले, ये सब चिल्ला के कह रहे हैं "आओ हमको दे दो, हम तुमको स्वर्ग पहुँचा देंगे।" और आम आदमी इनको इतना देता है, इतना देता है कि दुनिया भर की कुल संपत्ति का बहुत बड़ा हिस्सा धार्मिक संस्थानों के पास बैठा हुआ है। ये झूठा यज्ञ है।
आप सोच रहे हो कि मैंने अपने पैसे को किसी ऊँचे काम में लगा दिया। वो आपने ऊँचे काम में नहीं लगा दिया है। आपने अपना पैसा बिल्कुल जला दिया है, बल्कि गलत जगह डाल दिया है। आप सोच रहे थे कि आपने ऊँचा काम करा। आपकी सोच पर तो ज़िंदगी नहीं चलती ना। आपने परखा नहीं, आपने जाना नहीं।
श्रीकृष्ण यहाँ पर कह रहे हैं — "अयज्ञ।" नया शब्द है, हम भी पहली बार उसको आज प्रयुक्त कर रहे हैं — "अयज्ञ।" तो अयज्ञ इन दो तरीक़ों से हो सकता है, पहला, पकड़ कर बैठे रहे, अपनी ही जेब में, ख़ुद ही खा गए। ऐसों को श्रीकृष्ण क्या बोल गए थे? चोर। यज्ञ में अर्पित करने की जगह बैठा ख़ुद ही खाए जा रहा है, वो चोर है। और अयज्ञ का दूसरा उदाहरण क्या है? जहाँ नहीं देना चाहिए था वहाँ दे दिया, ये सोच के कि ये जगह ऊँची है या धार्मिक है। वो धार्मिक है ही नहीं।
कल मैं ईरान के एक शासक के बारे में पढ़ रहा था। आपको ये जान के थोड़ा हैरत होगी, वो बौद्ध था। उसका नाम शायद इलख़ान। नाम से नहीं लगता ना? पर वो बौद्ध था। वो ज़बरदस्त तरीक़े से बौद्ध हो गया, 12वीं-13वीं शताब्दी का ईरान। उसने अपने सैनिक भेज कर के कश्मीर में — वो उस समय का जो कश्मीर है वो बौद्ध मत का बड़ा केंद्र हुआ करता था। तो उसने अपनी सेना भेज कर के कश्मीर के सारे बौद्ध मंदिर, सब विहार सब तुड़वा दिए। वहाँ जो कुछ था, सब लुटवा लिया, सबको भगा दिया। ख़ुद बौद्ध था वो।
उसके बाद एक जगह उसने जो अभी पाकिस्तान में है, जगह का नाम मैं भूल रहा हूँ। वहाँ उसने एक बहुत बड़ा बौद्ध भवन स्थापित किया अपने नाम से। ये सब हैं झूठे यज्ञों के उदाहरण। तुड़वा क्यों दिया? क्योंकि ये सब तो आक्रांता हैं, हमलावर हैं। इन्हें धर्म से क्या लेना देना? इन्हें तो धन चाहिए। और धर्म की जगहों पर धन कूट-कूट के भरा होता है। उतना धन वहाँ पहुँचा कैसे? कैसे पहुँचा? झूठा यज्ञ।
उसने सब तुड़वा दिया। और फिर बोलता है, "मैं तो ख़ुद बौद्ध हूँ।" तो फिर उसने ईरान से थोड़ा पूरब की तरफ़ पाकिस्तान में एक जगह, उसने वहाँ बड़ा भारी एक बौद्ध केंद्र स्थापित किया। तो बौद्ध हूँ। समझ में आ रही है बात ये?
अगर वो अपना पैसा लगाकर एक बौद्ध केंद्र स्थापित कर रहा है, तो क्या वो निचली जगह से उठाकर ऊँची जगह पर डाल रहा है? डाल रहा है क्या? नहीं। लगेगा यही कि देखो, इन्होंने मंदिर बनवाया, तो ये ऊँचे आदमी हैं? और इतना ही नहीं था। ईरान के आखिरी बौद्ध शासकों में से वो था, उसके बाद वो सब के सब मुस्लिम हो गए। और जितना उन्हीं के बाप-दादाओं ने बनवाया था, उन्होंने ही तोड़ दिया। बोले, "ये बेकार की बात सब।"
उनको भी लग रहा था, "हम धर्म के नाम पर कुछ कर रहे हैं।" जो बनवा रहे थे, उनको भी लग रहा था "हम धर्म के नाम पर कुछ कर रहे हैं।" जो उनसे पहले तुड़वा रहे थे, उनको भी लग रहा था "हम धर्म के नाम पर कुछ कर रहे हैं।" मुसलमान हो गए, उनको भी लगा "हम धर्म के नाम पर कुछ कर रहे हैं।" सबको लग रहा है "हम धर्म के नाम पर कुछ कर रहे हैं।" सिर्फ़ इसलिए कि आपको लग रहा है कि आप धर्म के नाम पर कुछ कर रहे हो — यज्ञ?
श्रोता: नहीं है।
आचार्य प्रशांत: श्रीकृष्ण उसको "अयज्ञ" कह रहे हैं। सिर्फ़ इसलिए कि आपको लगता है कि आप कोई ऊँचा काम कर रहे हो, वो काम ऊँचा हो नहीं जाता। पहले पता होना चाहिए। बल्कि यज्ञ के नाम पर कहीं आप जाकर के ऐसी जगह संसाधन दे आए हो जहाँ उसका घोर दुरुपयोग ही होने वाला है, तो ये तो छोड़िए आपने यज्ञ किया आपने पाप कर दिया। इससे भरा था तो अपनी ही जेब में रखे रहते, कहीं कुछ ना देते।
अंधविश्वास फैलाने वाली, इंसान को दबाकर रखने वाली ताकतों के पास सिर्फ़ बहुत बड़ा मुँह और आवाज़ ही नहीं है, सबसे पहले उनके पास बहुत बड़ा?
श्रोता: पैसा है।
आचार्य प्रशांत: रुपए का थैला है — मनी बैग। अंधविश्वास ऐसे ही नहीं फैल जाता। कुछ भी ऐसे नहीं फैल जाता। उसके पीछे संसाधन लगाने पड़ते हैं, और वो संसाधन उनको कौन देता है? आम आदमी देता है, ये सोच के कि वो यज्ञ कर रहा है, पुण्य कर रहा है, धर्म का कुछ काम कर रहा है। उसमें कोई धर्म नहीं है। तुमने नाश और कर दिया धर्म के नाम पे। तो ये हमारे लिए बड़ी कड़ी परीक्षा है। एक ओर तो जो कुछ है उसमें सबसे बड़ी चीज़ है समय, जीवन मात्र, पूरी ज़िंदगी ही। एक ओर तो जो कुछ है, उसको अर्पित करना बहुत ज़रूरी है, अपने पास तो नहीं रख सकते। दूसरी ओर, अर्पित करते वक़्त ये भी ख़याल रखना बहुत ज़रूरी है कि कहाँ दे आए।
आज दुनिया की बड़ी से बड़ी समस्या यही है कि जहाँ नहीं होना चाहिए था पैसा, वहाँ बहुत है। वो गरीबी से ज़्यादा बड़ी समस्या है। लोग कहते हैं, संसार में इतने गरीब हैं और असमानता बढ़ती जा रही है आर्थिक। दिक्कत ये नहीं है कि लोग गरीब हैं; उससे पहले की दिक्कत ये है कि जिन्हें अमीर नहीं होना चाहिए, वो अमीर हैं — चाहे वो व्यक्ति हो, चाहे संस्थान।
और चूँकि वो अमीर हैं, इसीलिए उन्होंने सुनिश्चित कराया कि लोग गरीब रहेंगे। सही हाथों में पैसा रहेगा, तो वो गरीबी बचने ही नहीं देगा। गरीबी बची इसलिए हुई है क्योंकि आपने सारा पैसा उठा के गलत हाथों में दे दिया है। सारी ताक़त भी, सारी सत्ता भी, सारी प्रतिष्ठा भी। जिनको सम्मान नहीं देना चाहिए, उनको सम्मान दे दिया। जिनको संसाधन नहीं देना चाहिए, उनको संसाधन दे दिया। अब वही लोग ताकतवर होकर के आपके घर में और मन में घुसते हैं, और आपको बंधक बनाते हैं। सही बात है कि नहीं?
मौन सहमति। कौन सा आप हमारी सुनोगे? तो जो बोल रहे हो, वही ठीक है। यज्ञ समझ में आ रहा है क्या है? अवशिष्ट क्या है समझ में आया? मात्र वो अपने पास रखना, जो दीये के काम आ ही नहीं सकता। बल्कि उसको अगर डालोगे हवन-वेदी में, तो आग के लिए ख़तरा हो जाएगा। उतना रख लो अपने पास। बाक़ी जो कुछ वहाँ इस्तेमाल में आ सकता, वो वहाँ दे दो। ये पहली चीज़ थी आज की।
दूसरी चीज़ हमने समझी थी, यज्ञ क्या होती है? जिस पर पहले भी बहुत चर्चा हो चुकी है। नीचे से उठा के ऊपर के काम में संसाधन को डाल देना — यज्ञ हो गया। फिर हमने समझा अयज्ञ क्या होता है। तो अयज्ञ हमने पहले कहा, अपनी ही गांठ में बांधे रहना कहलाता है अयज्ञ। फिर हमने कहा, अयज्ञ का एक प्रकार और होता है, कि गलत जगह जाकर के दे आए और ये ज़्यादा ख़तरनाक होता है।
विवेक जब नहीं होता न, तो ये समस्या आती है। आप निकल तो पड़ते हो कुछ अच्छा करने के लिए, आप जानते ही नहीं कि अच्छा किसके साथ करना है। आप उनके साथ अच्छाई शुरू कर देते हो जो अच्छाई पाने के लायक नहीं है। और संसाधन है आपके पास सीमित। तो जब उनको दे दोगे जो उनके लायक नहीं है। तो उनको देने को कैसे बचेगा, जो उसके? फिर वहाँ खड़े हो जाओगे हाथ जोड़ के कि "हमारे पास तो कुछ नहीं है।"
जो भी संसाधन था जीवन में — समय, धन, श्रम, भाव, सम्मान, वो सब तो वहाँ दे आए। आपके लिए तो हमारे पास अब एक ही चीज़ है — क्या?
श्रोता: शत-शत नमन।
आचार्य प्रशांत: अब आप लोग मेरे शब्द पकड़ने लग गए हो न। ठीक बोला बिल्कुल, आपके लिए तो यही है शत-शत नमन। बाक़ी सब कहाँ दे आए? बोले, वो वहाँ वो। जब मैं कॉर्पोरेट में था, तो एक मेरा वर्टिकल था — उसका नाम था: एफ.वी.एस – फुल वैल्यू स्पेंड।
तो उसमें हम कॉरपोरेशन्स को डिफ़ाइन करते थे — ऐज़ स्पेंडिंग एंटिटीज़। व्हाट इज़ अ कॉरपोरेशन? एन एंटिटी दैट स्पेंड्स। और कंसल्टिंग ज़्यादातर मैन्युफैक्चरिंग ऑर्गनाइज़ेशंस को थी, जिनकी मार्जिन्स बहुत छोटी होती थीं — 2%, 2.5%, 4%, 6%, 6% भी नहीं होती थी। अब अगर कोई ऑर्गनाइज़ेशन है उसको ₹100 आता है, एक बिल्कुल दूसरी दिशा से उदाहरण लेकर आ रहा हूँ। उसको ₹100 आते हैं टर्नओवर, और ₹97 उसका ख़र्चा है, तो कितने पर चलता है? ₹3 पर।
तो जो मेरी फर्म थी, उसका काम था कि उनको कहना कि "मैं इस ₹97 को ₹94 कर दूँगा।" ये बहुत बड़ी बात नहीं है, ₹97 को ₹94 करा जा सकता है। उनकी जो स्पेंड है, उसको पकड़ करके उसका रिगरस अनालिसिस करके, हर जगह जो लीकेज है, उसको बंद कर-कर के, कर-कर के ₹97 को ₹94-₹95 कुछ कर दिया। वो बहुत बड़ी बात तो लगी नहीं, ₹97 का ₹94-₹95 कर दिया।
लेकिन उससे उसका जो सरप्लस था, वो कितना हो गया? तो स्पेंडिंग और रिसोर्स एलोकेशन जैसे एक कंपनी की तक़दीर बदल सकते हैं, वैसी एक इंसान की भी। आपके पास जो कुछ है आप उसको कहाँ लगा रहे हो, इसी से एक तरह से आपकी ज़िंदगी तय हो जाती है। है ना?
तो मेरा काम यही था कि बस ये निकाल लो कि जो ₹97 है, इसमें से फालतू कितना हिस्सा है। और बहुत नहीं निकालना होता था, ₹97 में से ₹1, ₹2, ₹3, ₹4। जितने भी निकाल सको कि ये फालतू ख़र्च हो रहे हैं, वो पकड़ के निकाल लो। यही रोकना होता है।
आपके जो संसाधन हैं, वो फालतू कहाँ जा रहे हैं। वहाँ तो बात मुनाफ़े की थी कि जो बच गया, वो बस मुनाफ़ा है। श्रीकृष्ण वाली बात वहाँ नहीं थी। पर मैं इस अर्थ से आपको बता रहा हूँ, कि हमें नहीं पता होता कि हम अपना रिसोर्स एलोकेशन कितना गलत कर रहे हैं — ना कंपनी को पता होता, ना आदमी को पता होता। और उसको अगर आप थोड़ा सा भी बेहतर कर लो, तो ज़िंदगी बदल जाती है।
कोई आपको हमेशा मिले बिल्कुल बौराया घूम रहा है, "समय नहीं है! समय नहीं है!" समय की समस्या नहीं है। तुझे पता ही नहीं है, समय जा कहाँ रहा है। तो पहली चीज़ होती है, पता करना कि सब कहाँ जा रहा है। और दूसरी चीज़ फिर उसका वैल्यू ऑडिट। पहली चीज़ तो उसका डॉक्यूमेंटेशन। हमें पता ही नहीं है, हमने आज तक उसको कभी रजिस्टर ही नहीं करा ना। तो पहली चीज़ है कि रजिस्टर करो, कि जो भी तुम्हारे पास है वो कहाँ जा रहा है — समय, पैसा सब कुछ, ऊर्जा सब कुछ कहाँ जा रहा है। और फिर उसका क्या करना है? वैल्यू ऑडिट।
वैल्यू ऑडिट माने, कि ये जहाँ जा रहा है, यहाँ जाना भी चाहिए? इनमें से ये जगहें किसी मूल्य, किसी वैल्यू की हैं भी? फिर उसमें से जो ऊँचे मूल्य की जगह निकले, वहाँ पर अधिक से अधिक संसाधन अलॉट करना है, यही यज्ञ है।
और जो बेकार जगहें हैं, जहाँ सब जा रहा है। बेकार कब है, पता चलेगा तभी जब पहले वैल्यू ऑडिट होगा कि इसका मूल्य क्या है? ये पूछना पड़ेगा अपने आप से, कि इसमें समय तो इतना देते हैं इसका मूल्य क्या है? और ये आप अपने साथ करोगे तो पाओगे कि समय, पैसा, ऊर्जा सब बच रहा है। और जब बचेगा तो आप पाओगे कि अब आपके हाथ में आ गया है उसे सही जगहों को अर्पित करने के लिए।
और ये सब नहीं करना है। जैसा चल रहा है, वैसे ही चलना है तो श्रीकृष्ण ने ऐसे ही कह दिया है कंधे उचका के, क्या? कि "तुम कहाँ अपने लिए स्वर्ग, नरक और ब्रह्मलोक सोच रहे हो?" तुम्हें तो इस लोक में भी कोई ढंग की जगह नहीं मिलेगी, क्योंकि तुम एक स्पेंडिंग एंटिटी हो। बिल्कुल एक ऑर्गेनाइज़ेशन की तरह। जैसे मैंने कहा न, हम कैसे डिफ़ाइन करते थे — "ऑर्गेनाइज़ेशन्स आर?"
श्रोता: स्पेंडिंग एंटिटी।
आचार्य प्रशांत: सिमिलरली, ह्यूमन बीइंग्स आर “स्पेंडिंग एंटिटीज़।” हम भी तो हर समय ख़र्च ही कर रहे हैं। तुम नहीं भी ख़र्च कर रहे हो, तो एक चीज़ तो बिना ख़र्च किए ख़र्च हो रही है — क्या? ज़िंदगी, समय। तो हम भी स्पेंडिंग एंटिटी हैं। तुम्हारी ज़िंदगी का क्या होगा, इससे तय हो जाता है कि तुम किसके लिए स्पेंड कर रहे हो। जो उच्चतम है, उस पर स्पेंड करो।
और जो मेरी पहली कंपनी थी, जेनरल इलेक्ट्रिक उसने एक सूत्र दिया था। उनका सूत्र था — "अगर तुम्हें व्यय का पता नहीं है, तो अपव्यय ही हो रहा होगा।" अगर तुम्हें पता नहीं है कि ख़र्चा कहाँ को और क्यों हो रहा है, तो वो ख़र्चा गलत ही होगा। तो कहते थे, "इफ इट इज़ इंपॉर्टेंट, इट विल बी रजिस्टर्ड। दैट विच इज़ नॉट रजिस्टर्ड इज़ नॉट गिवेन इंपॉर्टेंस।"
अगर कोई चीज़ ज़रूरी है, तो वो तुम्हारे पास लिखित में होनी चाहिए। अगर कोई चीज़ तुम लिखित में रख ही नहीं रहे हो प्रॉपर डेटा फॉर्मेट में, टेबल के साथ, रिपोर्ट के साथ — अगर रिपोर्ट नहीं बना रहे हो तो इसका मतलब तुम्हारा मन उस बात को महत्त्व भी नहीं दे रहा है। जिस व्यय का तुम्हें पता नहीं वो व्यय नहीं, अपव्यय है।
और फिर यहीं से उनकी सिक्स सिग्मा वाली पूरी आइडियोलॉजी निकलती थी। बोलते थे, एक-एक चीज़ को क्वांटिफ़ाइ करके लिखो। सिक्स सिग्मा का मतलब समझते हो क्या होता है? क्या? "वन एरर इन टेन टू द पावर सिक्स ट्रांज़ैक्शन्स" — ऑपरेशनल एक्सिलेंस, सिक्स सिग्मा। और इतना सटीक होना चाहिए काम, कि 10⁶ टाइम्स हो तब एक एरर होनी चाहिए। इससे ज़्यादा बर्दाश्त नहीं करेंगे। सिक्स सिग्मा।
और वो तभी हो सकता है, जब छोटी से छोटी बात डॉक्यूमेंटेड हो। जो डॉक्यूमेंटेड नहीं है, वो गलत ही हो रहा है। सोचने की भी ज़रूरत नहीं है कि सही हुआ कि गलत हुआ। कोई चीज़ अगर डॉक्यूमेंटेड नहीं है तो गलत ही हो रही है। इन सब बातों का यज्ञ से कोई रिश्ता है या मैं मैनेजमेंट वर्कशॉप ले रहा हूँ? कुछ रिश्ता दिख रहा है? नहीं दिख रहा है?
जब तुम्हें पता ही नहीं है कि ज़िंदगी कहाँ ख़र्च कर रहे हो, तो उसे सही दिशा में कैसे ख़र्च करोगे? और ज़िंदगी और उसके सारे संसाधनों को सही दिशा में ख़र्च करने को ही बोलते हैं — यज्ञ। और कैसे पता चलेगा कि पल-पल कहाँ को जा रहा है? उसका क्या तरीक़ा है? आत्म-अवलोकन।
तो ऑपरेशनल एक्सिलेंस के लिए भी, लगातार अपने ऊपर निगाह ज़रूरी है। मेरा पिछला आधा घंटा बह कहाँ गया? समय तो रेत ऐसे मुट्ठी से फिसलता है, कहाँ चला गया? पता होना चाहिए। नहीं पता, कब नहीं पता होता? जब नशा ज़्यादा होता है। हा..हा..हा, चिंघाड़ रहे थे और उतने में सुई ऐसे हो गई (आधी घूम गई)। आधा घंटा बह गया, पता ही नहीं चला।
आत्म-अवलोकन का मतलब है, मुझे पता है मेरा समय कहाँ जा रहा है।