सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेषः योऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १० ॥
अर्थ: सृष्टि के आरंभ में ही ब्रह्मा ने कहा था कि यज्ञ के द्वारा ही वृद्धि को प्राप्त करोगे। यह यज्ञ ही तुम लोगों को अभीष्ट फल देगा और कामधेनुतुल्य सर्वाभीष्टप्रद होगा।
काव्यात्मक अर्थ:
सगुण हो बंधन चुना जब कामना की बात से यज्ञ मुक्ति मार्ग है अस्तित्व की शुरुआत से
आचार्य प्रशांत: श्रीमद्भगवद्गीता, तीसरा अध्याय, 10वा श्लोक।
तो, शुरू हो रही है श्रृंखला, अर्जुन के संशय से, संशय पूर्ण आग्रह से। क्या? नहीं करूंगा कर्म, ज्ञान आपने बता तो दिया, कर्म नहीं करूंगा। फिर कृष्णा अर्जुन को ले आते हैं, सर्वप्रथम कर्म की अनिवार्यता पर। तुम प्रकृति के पुतले खड़े होकर कह रहे हो, कर्म नहीं करूंगा जबकि प्रकृति स्वयं ही कर्म है। कर्मा माने गति और प्रकृति माने भी गति। तो अर्जुन, तुम जो मेरे सामने खड़े हो जीव हो न, हार्ड मास के पिंड हो न।
बाहर तन है भीतर मन हैं, और मन माने लगातार समय, विचार, गति, यही सब है ना। प्रकृति माने ही होता है समय, गति, कर्म, और तुम कह रहे हो कर्म नहीं करूंगा। कर कर्म नहीं करना था तो पैदा नहीं होते। जो पैदा हो गया कर्म की उसकी श्रंखला शुरू हो गई। तो कर्म से तो नहीं बच सकते ठीक है। फिर कर्म के बारे में आगे बढ़ें हैं और छठे-सातवें श्लोक में कहा है कि क्रम दो केंद्रों से आ सकते हैं। कौन से दो केंद्र से आ सकते हैं कर्म? है ना यह तो कर्म के दो प्रकार हो गए। कर्म को ही आचरण मान लीजिए। तो जब कोई बोले आचरण माने क्या? तो कर्म। तो मिथ्याचरण जो उठता है ब्रह्म और प्रकृति के केंद्र से।







