आचार्य प्रशांत: तो शंखनाद होता है दोनों सेनाओं की ओर से। और संजय बताते हैं कि शंखनाद ने विशेषतया धृतराष्ट्र के पुत्रों के, कौरवों के हृदय में हलचल कर दी। मन उनके कम्पित हो गये, हृदय विदीर्ण हो गया। ये सुनने के बाद अब आते हैं दूसरे पक्ष पर। अर्जुन की ओर क्या चल रहा है।
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्। कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुघमे।।(२०)
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते। सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत।।(२१)
संजय कह रहे हैं, ‘हे! राजन, उसके अनन्तर, उसके बाद कपिध्वज — अर्जुन के ध्वज पर कपि चिह्न था — तो कपिध्वज पाण्डव (माने अर्जुन ने) धृतराष्ट्र के पुत्रों को युद्ध के लिए अवस्थित देखकर और अस्त्र संचालन करने के लिए उद्यत होकर, धनुष उठाकर ऋषिकेश कृष्ण से कहा। क्या कहा अर्जुन ने? ‘हे! अच्युत, उभय(माने दोनों) सेनाओं के मध्य में मेरा रथ स्थापित करो।‘
श्रीमद्धभगवद्गीता (अध्याय १, श्लोक २०-२१)
हम जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगे, हमें श्रीकृष्ण के कई नाम सुनने को मिलेंगे। तो केशव, ऋषिकेश और अभी यहाँ पर कहा ‘अच्युत’— अच्युत माने जो बँटा हुआ नहीं है, जो खंडित नहीं है।
नामों की बड़ी महत्ता है, अनाम यूँही नहीं होते। नाम सिर्फ़ किसी व्यक्ति विशेष की ओर संकेत करने को नहीं होता। नाम उस व्यक्ति को, और नाम लेने वाले को ये स्मरण कराने के लिए भी होता है, कि जिस व्यक्ति का वो नाम है, वो सिर्फ़ व्यक्ति नहीं है।







