कौन है जीवन्मुक्त? कौन हैं क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ? || आचार्य प्रशांत, जीवन्मुक्त गीता पर (2020)

तत्व क्षेत्रं व्योमातीतमहं क्षेत्रज्ञ उच्यते। अहं कर्ता च भोक्ता च जीवनमुक्त: स उच्यते।।
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश इन पंच तत्वों से बना ये शरीर ही क्षेत्र है तथा आकाश से परे अहंकार ही क्षेत्रज्ञ है। ये ‘मैं’ ही समस्त कर्मों का कर्ता और कर्म फलों का भोक्ता है, इस ज्ञान को धारण करने वाला ही वस्तुतः जीवनमुक्त कहा जाता है।
~ जीवनमुक्त गीता, श्लोक क्रमांक ६
आचार्य प्रशांत: तो दो हैं — क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ। आत्मा दो हैं माने एक वो अद्वैत का जोड़ा है और दूसरा जो इस जोड़े से बिलकुल पृथक; साक्षी है। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ क्या हैं? द्वैत के जोड़े की दो इकाइयाँ। ठीक है?
‘मैं’ है विषयेता। और ये जो सब पंचभूत बताये गए, ये दुनिया के सब जो विषय बताये गए, ये हैं उस विषयेता के सामने के दृश्य, विषय। ठीक है? विषयेता माने ‘मैं’, इन पंचभूतों के साथ कुछ-कुछ जुगाड़, खिलवाड़ करता रहता है और जो कुछ भी वो इनके साथ करता है उसका वो नतीजा भुगतता है। ठीक है? जो कुछ भी वो करता है उसका वो नतीजा भुगतता है। जीवनमुक्त वो जिसने अपनी पहचान का नाम क्षेत्रज्ञ से हटाकर के आत्मा कर लिया। उसका मैं अब क्षेत्रज्ञ के साथ नहीं जुड़ा है, उसका ‘मैं’ अब जुड़ा हुआ है आत्मा के साथ।
ये जो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ जिस तरीके से यहाँ जीवनमुक्त गीता में बताये गए हैं ये वैसे ही हैं जैसे श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता में कहते हैं— 'प्रकृति और परा प्रकृति'। वो कहते हैं कि जिसको आप साधारणतया प्रकृति कहते हो वो वास्तव में बस ‘अपरा प्रकृति’ है और जिसको आप अहम् कहते हो वो भी प्रकृति ही है, बस उसको कह दो ‘परा प्रकृति’। दो तरह की प्रकृति हो गयी।









