आचार्य प्रशांत: केतन हैं, गीता के पाँचवे अध्याय से अट्ठारवाँ श्लोक उद्दृत किया है। श्लोक कहता है-
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनी | शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिन: ||
“वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्शी ही होते हैं।”
भगवद्गीता,अध्याय ५,श्लोक १८
और फिर अट्ठारवें अध्याय का सड़सठवॉ श्लोक है-
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन | न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति||
“तुझे यह गीता का रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तपरहित मनुष्य से कहना चाहिए, न भक्ति-रहित से और न बिना सुनने की इच्छा वाले से ही कहना चाहिए,तथा जो मुझमें दोषदृष्टि रखता है, उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहिए।”
भगवद्गीता,अध्याय १८, श्लोक ६७










