आचार्य प्रशांत: हम देखेंगे कि श्रीकृष्ण अर्जुन के सब भावुक, मार्मिक वक्तव्यों को किस प्रकाश में देख रहे हैं। तो अपनी ही मोहजनित पीड़ा को आगे अभिव्यक्त करते हुए कहते हैं अर्जुन कि
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतस:। कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्।।
कथं न ज्ञेयम स्माभि: पापादस्माननिवर्तितुम। कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यदिर्जनार्दन।।
“यद्यपि ये धृतराष्ट्र-पुत्र लोभ से अन्धे होने के कारण कुलनाशकारी दोष से उत्पन्न पाप को नहीं समझ रहे ,तो भी हे जनार्दन, कुलक्षय से होने वाले दोष को देख-सुन कर भी हम लोगों को इस पाप से निवृत्त होने का विचार क्यों नहीं करना चाहिए?”
श्रीमद्भागवद्गीता ( अध्याय १, श्लोक ३८-३९)
तो अड़तीसवाँ श्लोक है कि ये धृतराष्ट्रपुत्र तो लोभ से अन्धे हैं, और कुल का क्षय, कुल का नाश करने के ही घोर पाप, भीषण दोष को ये कुछ समझ नहीं पा रहे हैं क्योंकि लोभ ने दृष्टि पर पर्दा डाल दिया है। फिर आगे कहते हैं कि वो ऐसे हैं तो हैं, हमें नहीं समझना चाहिए क्या? देखिये, बात जटिल है, ठीक वैसे जैसे आदमी का अंतस जटिल होता है।
एक ओर तो ये बात बिलकुल ठीक है कि कम-से-कम दुर्योधन जैसों से श्रेष्ठतर अवस्था में है इस वक्त अर्जुन। व्यक्तिगत लाभ और लोभ से ऊपर उठकर कुछ और देख पा रहे हैं। लेकिन व्यक्तिगत लाभ से ऊपर पारमार्थिक भर ही नहीं होता, सत्य भर ही नहीं होता। बीच में एक बड़ा लम्बा-चौड़ा क्षेत्र है। एक विकराल अंतराल है, जिसमें तमाम तरह की ग्रन्थियाँ काम करती हैं। और झूठ, असत्य वास्तव में बचा रहता है तो इसलिए क्योंकि विशुद्ध झूठ और विशुद्ध सच के बीच में आंशिक झूठों का एक बड़ा लम्बा फ़ैलाव होता है। जिसमें झूठ को छुपने की जगह मिल जाती है सिर्फ़ इस कारण से कि वहाँ आंशिकता है। विशुद्ध झूठ नष्ट हो जाएगा, बच ही नहीं सकता। और विशुद्ध सत्य अनन्त है, लगभग अप्राप्य है, उसकी बात क्या करें, उसे किसी सुरक्षा की आवश्यकता नहीं। झूठ बचा कैसे रह जाता है? झूठ बचा रह जाता है, सच की ताकत पर। झूठ बचा रह जाता है, अपनेआप को आंशिक रूप से क्षीण करके। झूठ और सच के बीच में हमने कहा, जो बड़ा भारी मैदान है, वहाँ पर छुपा रहता है झूठ खरा झूठ, पूरा झूठ। अपनी ही सच्चाई तले ध्वस्त हो जाएगा। झूठ की सच्चाई क्या है, कि वो झूठ है। चूँकि वो झूठ है इसीलिए बच ही नहीं सकता। झूठ का अर्थ ही है वो जो है नहीं, वो बचेगा कैसे।




