शुरुआत होगी प्रेम से; प्रेम माने, संवेदनशीलता; संवेदनशीलता माने, दुख। दुख का उदय नहीं, दुख का अनुभव। दुख तो है ही, पर असंवेदन बनकर हम उस दुख से किसी तरह बच लेते हैं। किसी चीज़ का होना और उसका अनुभव होना, दो अलग-अलग बातें हैं। दुख है, पर हम उसके अनुभव से बच जाते हैं। कैसे? सुन्न पड़कर। असंवेदनशील होकर हम दुख के अनुभव से कन्नी काट लेते हैं।
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आचार्य प्रशांत: ‘जैसे वायु-रहित स्थान।’ ‘जैसे,’ ये तो बहुत बड़ा ‘जैसे’ हो गया न; शुरू ही कर रहे हैं श्रीकृष्ण क्या कह के? जैसे वो दीप वहाँ होता है, यथा दीपो, पर ऐसा ज़िंदगी में तो देखने को मिलता नहीं कि हवा न चल रही हो। हवा तो छोड़िए, टर्बुलेंस किस-किस को मिली है फ़्लाइट में? कइयों को तो इतनी मिली है कि अभी तक आ ही नहीं पाए। वो चलते समय ही सुबह फ़ोन कर रहे थे इनको कि, “भाई, फ़्लाइट लेट होती जा रही है, हम तो 12:00 बजे तक पहुँचेंगे।” अभी आएँगे सब।
तो ज़मीन तो ज़मीन, आसमान में भी कभी ऐसा होता है, वात-रहित स्थान? होता है? तो ये तो फिर बहुत बड़ी शर्त रख दी गई न, कि ‘निवातस्थो।’
‘वात’ माने क्या होता है?
श्रोता: वायु।
आचार्य प्रशांत: ‘निवात’ माने?




