साल बदल गया, हम कब बदलेंगे?

Acharya Prashant

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साल बदल गया, हम कब बदलेंगे?
शुरुआत होगी प्रेम से; प्रेम माने, संवेदनशीलता; संवेदनशीलता माने, दुख। दुख का उदय नहीं, दुख का अनुभव। दुख तो है ही, पर असंवेदन बनकर हम उस दुख से किसी तरह बच लेते हैं। किसी चीज़ का होना और उसका अनुभव होना, दो अलग-अलग बातें हैं। दुख है, पर हम उसके अनुभव से बच जाते हैं। कैसे? सुन्न पड़कर। असंवेदनशील होकर हम दुख के अनुभव से कन्नी काट लेते हैं। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

आचार्य प्रशांत: ‘जैसे वायु-रहित स्थान।’ ‘जैसे,’ ये तो बहुत बड़ा ‘जैसे’ हो गया न; शुरू ही कर रहे हैं श्रीकृष्ण क्या कह के? जैसे वो दीप वहाँ होता है, यथा दीपो, पर ऐसा ज़िंदगी में तो देखने को मिलता नहीं कि हवा न चल रही हो। हवा तो छोड़िए, टर्बुलेंस किस-किस को मिली है फ़्लाइट में? कइयों को तो इतनी मिली है कि अभी तक आ ही नहीं पाए। वो चलते समय ही सुबह फ़ोन कर रहे थे इनको कि, “भाई, फ़्लाइट लेट होती जा रही है, हम तो 12:00 बजे तक पहुँचेंगे।” अभी आएँगे सब।

तो ज़मीन तो ज़मीन, आसमान में भी कभी ऐसा होता है, वात-रहित स्थान? होता है? तो ये तो फिर बहुत बड़ी शर्त रख दी गई न, कि ‘निवातस्थो।’

‘वात’ माने क्या होता है?

श्रोता: वायु।

आचार्य प्रशांत: ‘निवात’ माने?

श्रोता: बिना वायु के।

आचार्य प्रशांत: और ‘निवातस्थो’ माने? ‘निवातस्थ’ माने ऐसा स्थान जहाँ…।

श्रोता: वायु आती न हो।

आचार्य प्रशांत: हाँ, वायु चल ही न रही हो, या हो ही न वायु। तो हम कह रहे हैं, ज़िंदगी में तो ऐसा देखने को मिलता नहीं कि कोई जगह ऐसी है जहाँ पर वायुजनित कंपन न हो। जीवन का तो मतलब ही यही है कि प्रकृति गति करती रहेगी। और जब प्रकृति गति करेगी, तो उसके थपेड़े जीव पर पड़ेंगे, क्योंकि जीव भी क्या है? प्रकृति का पुतला मात्र। ठीक है?

“जैसे वायु-रहित स्थान पर स्थित दीपक की लौ कंपित नहीं होती, वैसे ही वो योगी जिसका चित्त संयमित है कंपित नहीं होता, क्योंकि वो आत्मा में युक्त है।”

संयमित-चित्त वाला योगी जीवन में वैसे ही कंपित नहीं होता, जैसे दिया रखा हो और हवा न चल रही हो, तो लौ स्थिर प्रतीत होती है। पर हमें तो दिख रहा है कि जीवन में दिया क्या, आँधी, तूफ़ान, झंझावात सब चलते रहते हैं। है न? तो फिर ये बात भौतिक शरीर के लिए तो नहीं कही जा रही होगी। क्योंकि जितने भी भूत हैं, भूत मतलब भौतिक तत्त्व, वे तो सब लगातार गति करते ही रहते हैं। करते ही रहते हैं न। बाहर कुछ नहीं भी हो रहा हो, तो भी हो सकता है कि शरीर में कुछ हो जाए। कोई आवश्यक नहीं है कि बाहर से आकर के कोई आपको ठोकर मारे, तो ही शरीर बीमार हो। आवश्यक है क्या?

आप अपने आपको बहुत सहेजकर रुई के फाहे में लपेटकर रखते हों, तो भी शरीर बीमार हो सकता है। हो सकता है न? तो ज़रूरी नहीं होता कि बाहरी जो शरीर है उसको सुरक्षित रखा जा सके, कंपने से बचाया जा सके। ज़रूरी छोड़िए, संभव ही नहीं है। तो फिर हम वेदान्त की विशेष शर्त के अनुसार स्वयं से सवाल करेंगे कि ये संबोधित किसको है बात। तन को संबोधित तो नहीं हो सकती, क्योंकि तन तो लगातार; वायु से क्या आशय है? यही सब जो भौतिक तत्त्व हैं। वैसे भी जो पंचभूत होता है, उसमें वायु सम्मिलित है। तो वायु को प्रतिनिधि मानिए पूरे संसार की भौतिकता का। और वो आकर के शरीर को तो कभी भी कँपा सकती है।

बहुत कुछ हो सकता है। जो कुछ भी भौतिक है, उसको भौतिक जगत निश्चित रूप से हिला-डुला सकता है, कँपा सकता है। हिलाना-कँपाना छोड़िए, धूल-धूसित कर सकता है। बिल्कुल मिट्टी में मिला सकता है। है न? बाहर से एक गोली आएगी, गोली भी बड़ी चीज़ होती है। एक वायरस आएगा, बाहर से ही आता है, और हमें वापस मिट्टी कर जाएगा। होता है न ऐसा? तो फिर ये बात संबोधित किसको है? शरीर को तो नहीं संबोधित है। किसको संबोधित है? अहम् को संबोधित है। पूरी गीता ही किसको संबोधित है?

श्रोता: अहम् को।

आचार्य प्रशांत: कोई भी श्लोक ऐसे नहीं कर लेना है कि जैसे बात भौतिक हो। ठीक है न? अर्जुन के शरीर में कुछ खोट आ गई थी क्या? तो श्रीकृष्ण अर्जुन के शरीर को क्यों संबोधित करेंगे? समस्या कहाँ आ रही थी? अहम् जो आसक्त हो रहा था, भ्रमित, मोहित हो रहा था, समस्या वहाँ आ रही थी न। शरीर तो संभावना है कि अर्जुन का हो सकता है श्रीकृष्ण से भी ज़्यादा बलिष्ठ रहा हो। ज़्यादा लड़ाइयाँ अर्जुन ही लड़ते थे। तो शरीर को तो नहीं संबोधित किया गया है, कि किया गया है?

शरीर तो स्वयं गीताकार का एक दिन एक बाण का शिकार हो गया। हो गया न? तो शरीर को तो नहीं संबोधित किया गया है। किसको संबोधित किया गया है? अहम् को। तो जो बात कही जा रही है, बड़ी सीधी, बड़ी प्यारी और बड़ी काव्यात्मक है। बाहर से हिलते-डोलते रहना उस पर तुम्हारा बस नहीं चलेगा, प्रयास भी मत करना कि तुम बाहर से स्थिर हो जाओ। मूर्खता है ये कि हम अडोल बैठते हैं, अकंप बैठते हैं, हिलते ही नहीं। नहीं कर पाओगे। बाहर जो हो, उसको प्रकृति के हवाले कर दो। प्रकृति का शरीर है माँ ने दिया है माँ देख लेगी। बाहर जो है, उसको अस्तित्व के हवाले कर दो।

अस्तित्व से क्या आशय होता है, जब भी हम कहते हैं, अस्तित्व? प्रकृति। अस्तित्व माने आत्मा नहीं होता, अस्तित्व माने कोई रहस्यमयी, ख़ुफ़िया चीज़ नहीं होता कि आप कहें अस्तित्व की मंशा है और इस तरह से, हमें बड़ा अच्छा लगता है जो हमें नहीं पता माने अज्ञात है उसको अज्ञेय जैसा बना देना। अहंकार अज्ञात को अज्ञेय क्यों बनाना चाहता है? अज्ञात का अर्थ होता है, मुझको नहीं पता। मेरी सीमा है, या हो सकता है मेरा आलस हो, मेरी मूर्खता हो तो इस कारण मैं नहीं जानता। अहंकार नहीं कहेगा कि मुझे ज्ञात नहीं है, मेरे लिए अज्ञात है। वो क्या कहेगा? अज्ञेय है।

अज्ञेय माने, जाना जा ही नहीं सकता। माने, मैं तो ठीक हूँ, ये जो विषय है यही अज्ञेय है, तो मैं क्या करूँ? मेरी थोड़ी कोई गलती हो गई। विषय ही अज्ञेय है। तो एक तो अपनी जान बच गई, और ज़िम्मेदारी भी बच गई। क्योंकि यदि मात्र अज्ञात है, तो ज़िम्मेदारी आ जाती है कि भाई, अज्ञात है, तो जाकर ज्ञात करो। भाई, अज्ञात है तो जाकर ज्ञात करो। नहीं पता तो जाकर पता करो। तो एक तो अपनी ज़िम्मेदारी बच गई, और दूसरे, बड़े दंभ का दावा करने को मिल गया। क्या दावा? “हम तो अज्ञेय के सम्मुख खड़े हैं। फलानी बात अज्ञेय है।”

अरे, फलानी बात अज्ञेय है तो तुम अपने मुँह से क्या बोल रहे हो? अज्ञेय तो वो है जिसको उच्चारित भी न कर पाओ, जो वचन में ही न आ पाए, जो अवचनीय है, वही होता है अज्ञेय। तो तुम मुँह से कैसे बोल रहे हो? समझ में आ रही है बात ये?

तो ये जो शरीर है, इसके तल पर वो सब नहीं साधना है जो साधा मात्र अहंकार के तल पर जा सकता है। अकंप, अचल, अडोल शरीर कभी नहीं हो पाएगा, क्योंकि शरीर वो दिया है जो सदा हवाओं के हवाले है।

आप अपनी ओर से बहुत कोशिश कर भी लो। थोड़ी तार्किक, वैज्ञानिक दृष्टि से भी देख लो, आप अपनी ओर से बहुत प्रयास कर लो। आप कहो कि, “मैं तो बिल्कुल स्थिर बैठा हूँ।” क्या आप वाक़ई स्थिर बैठे हो? नहीं। आप इतने ही स्थिर बैठे हो कि आँखों से लग रहा है कि स्थिर हो। अगर कोई संवेदनशील यंत्र लगा दिया जाए, तो बिल्कुल पता चलेगा कि आप में अभी भी कंपन, वाइब्रेशन हो रहा है। आप स्थिर तो बैठे ही नहीं हो। शरीर के तल पर स्थिरता संभव नहीं है। क्योंकि शरीर वो दिया है जो वात के, वायु के, सब तत्त्वों के हवाले है। हवाले भी क्या है, उन्हीं से उठा है, उन्हीं में से एक है। जब प्रकृति में सब कुछ निरंतर गति कर रहा है, तो ये शरीर भी तो क्या है? शरीर क्या है? प्राकृतिक ही तो है न।

संभव ही नहीं है कि शरीर गति करना बंद कर दे। आप मर भी जाइए शरीर तब भी गति करेगा, शरीर की गति रोक कर दिखाइए। क्या मुर्दा गति नहीं करता? अरे भाई, हम वो मिस्टिकल बात नहीं कर रहे हैं कि मुर्दे भी हिलते हैं, उठ गए और बहुत सारी बातें। शरीर का सड़ना भी क्या है? गति ही तो है। शरीर आपको लग रहा है कि लाश पड़ी हुई है, वो भी गति कर रही है। गति माने बदलाव। जो लाश पड़ी है, वो बदलती नहीं है क्या? इतनी तेज़ी से बदलती है कि सब प्यार-व्यार भूल जाता है, जल्दी से लेकर भागते हैं, कि फूँको इसको।

गति को रोकना संभव नहीं है। प्रयास भी मत करिएगा, जो गति, अर्थात् बदलाव के विरुद्ध हो गया, वो जीवन के ही विरुद्ध हो गया। बदलाव को बाहर-बाहर रोकने का प्रयास नहीं करना है। बाहर चल रही है चक्की, वो चलेगी।

तो मतलब क्या है, बाहर जो हो रहा है, होने दें?

आपका प्रश्न ही ठीक नहीं है। क्योंकि जैसे हम हैं, बाहर जो हो रहा होता है, हम उसको होने दे नहीं सकते। पूछो, क्यों? क्योंकि हमने अपनी पहचान ही बाहर से बना ली होती है। तो बाहर जो चल रहा होता है, अगर हम उसको चलने देंगे, तो हम भीतर भी चलने लग जाएँगे। ये हॉल है, ठीक है? आप यहाँ बैठे हो। अगर आपकी कमर में एक रस्सी बँधी हो, और वो रस्सी जाती हो दूसरे छोर पर बाहर तक, और बाहर लोग उस रस्सी को पकड़-पकड़कर चलें, तो आपका क्या होगा? आप भी हिलने-डोलने लग जाओगे न? हाँ, तो यहाँ जो भीतर बैठा है, घट-भीतर जो तत्त्व विराजे, ये जो यहाँ भीतर बैठा है, ये कौन है? यही है, अहंकार है, ये यहाँ बैठा हुआ है। लेकिन ये अकेला तो कभी रह नहीं सकता। अहंकार माने द्वैत, अकेला वो रह नहीं सकता।

अहंकार अकेला हो गया तो क्या हो जाएगा? आत्मा हो जाएगा, तो उसमें दम नहीं है कि अकेला रहे। तो उसने अपनी डोर जो है, बाहर से बाँध रखी होती है। तो बाहर जब भी कुछ चलता है, तो भीतर वाला भी चलना शुरू कर देता है। बाहर कोई गति होती है उसके परिणाम में, उसकी प्रतिक्रिया में भीतर भी गति शुरू हो जाती है। तो ये प्रश्न ही ठीक नहीं है कि “बाहर जो हो रहा है, क्या होने दें? क्या हम कुछ न करें?”

अरे भाई, बाहर जो हो रहा है, वो आप होने दे ही नहीं सकते। वास्तव में, चूँकि बाहर से आपने नाता जोड़ लिया है, नाता भी ऐसा गहरा कि उसे नाता नहीं कहते, उसे तादात्म कहते हैं। संबंध नहीं कहते, संबंध छोटी बात होती है। शुद्ध कहना है तो हम कहते हैं, तादात्म। “वो तद् मैं हूँ।” वो मैं हूँ। “मैं, मैं हूँ” नहीं। “वो मैं हूँ।”

बाहर से नाता हम ऐसा जोड़ते हैं, कहते हैं, वो मैं हूँ। तो बाहर जो हो रहा है, उसे हम होने दे ही नहीं सकते। फिर बाहर से वो आपको ऐसे खींचेगा डोर, नाड़ा आपने बाँध रखा है, उसने पकड़ रखा है, वो खींचेगा। तो फिर आप क्या करोगे? आप उसको खींचोगे। वो आपको खींच रहा है, तो आप यहाँ हिलोगे, डुलोगे, गिरोगे। सोचो, वो आपको खींच रहा है तो आपकी क्या हालत होगी यहाँ पर? आप बैठे हो, आपको पता भी नहीं, क्योंकि बाहर तो मात्र संयोग है, संयोग आपको किधर भी खींच सकते हैं। आप यहाँ बैठे हो, जमकर कुर्सियों पर, और कोई इधर को खींच रहा है, कोई उधर खींच रहा है, कोई हवा में उछाल रहा है।

स्वभाव क्या है? भीतर स्थिरता। और आपने अपनी डोर बाँध दी है बाहर की गति से। और बाहर की गति कभी भी आयोजित हो नहीं सकती, और आपके अनुकूल हो नहीं सकती, और न ही शून्य हो सकती। चलेगी, और विचित्र संयोगों से चलेगी, कोई नहीं जानता कि बाहर क्या गति होगी। तो बाहर जब गति होती है, तो वो आपको खींचती है, तो आप क्या करते हो फिर? आप उसको खींचते हो। इसी का नाम क्लाइमेट चेंज है। बाहर जो हो रहा है, उसको अपने अनुसार बदलने का, नियंत्रित करने का, तोड़ने-फोड़ने का प्रयास करना, और ये प्रयास करना मजबूरी बन जाती है। क्योंकि हम क्या करें, हमने अपने आप को बाँध दिया है बाहर से। और जो बाहर हो रहा होता है, वो हमें बड़ा दुख देता है। देगा न?

बाहर मेरी कामनाएँ स्थित हैं। बाहर मेरे डर स्थित हैं। बाहर मेरी आशाएँ, मेरे रिश्ते स्थित हैं। सब स्थित बाहर हैं, और मेरे हिसाब से चलते नहीं। आप में से किस-किस के संबंधी आपके हिसाब से चलते हैं? अब हो गया न दुख हो गया न? हो गया कि नहीं हो गया? आपने अपनी कामनाएँ दुनिया से जोड़ी हैं। दुनिया आपकी कामनाओं के हिसाब से चल रही है क्या?

अच्छा, ठीक है, किस-किस की कोई न कोई कामना;बहुत लंबी डोर दे रहा हूँ, किस-किस की कोई न कोई कामना पिछले 24 घंटों में अधूरी रह गई है या टूट गई है? (कुछ श्रोता हाथ उठाते हैं), बाक़ी महापुरुष हैं। समझ रहे हैं? अब मैं जो चाहता हूँ, वो सब दुनिया पर आश्रित है और दुनिया मेरे हिसाब से चलती नहीं। जब दुनिया मेरे हिसाब से नहीं चलेगी, तो मैं दुनिया के साथ खींचतान करूँगा कि नहीं करूँगा?

मैंने यहाँ पर अपनी कमर में बाँधी एक रस्सी। ठीक है? और वो रस्सी दे दी वहाँ उनके हाथ में। मैं चाहता हूँ कि मैं मंच पर खड़ा रहूँ, उन्हें खाना है पॉपकॉर्न, और वहाँ बगल में लगी है सैयारा। ठीक? तो वो तो अपने हिसाब से चलेंगे। मुझे मेरे हिसाब से जीना है, ये मेरा क्षेत्र है। ठीक है? मैं भीतर वाला, ये मेरा क्षेत्र है, मुझे यहाँ रहना है। उनको जहाँ होना है, उनको वहाँ होना है। प्रकृति के अपने इरादे हैं। उनका भी कहना ठीक है उनको अपने हिसाब से चलना है। मैं क्यों रोकूँ? और मेरा भी कहना ठीक है, मुझे यहाँ रहना है। मुझे कोई क्यों रोके? समस्या न उनमें है, न मुझमें है। समस्या इस रस्सी में है। इसी का नाम हमने कहा, क्लाइमेट चेंज है।

अब जब तक वो ताक़तवर थे, वे क्या कर लेते थे? वो मुझे घसीट ले जाते थे। और मैं भी वहाँ बैठकर आपको छोड़कर, सैयारा या सरदार सनंस, जो भी पिक्चरें आई हैं सब मैं देख रहा हूँ बैठकर। लेकिन समय बीता, मेरे हाथ में आर्थिक, तकनीकी, सामरिक, हर तरह की ताक़त आ गई। मैं ज़्यादा ताक़तवर हो गया, रस्सी लेकिन बँधी हुई है। और कितनी भी मैंने ताक़त अर्जित कर ली हो, ये ताक़त कभी नहीं अर्जित कर पाया कि रस्सी…। रस्सी बँधी है।

तो अब मैं क्या करता हूँ? वे अपना काम करना चाह रहे होते हैं, और मैं उनको घसीटता रहता हूँ अपने मंसूबों के अनुसार। इसको क्लाइमेट चेंज कहते हैं। जो मुझे अपने लिए ठीक लगता है, लगता है, है नहीं; प्रतीत होता है, बस, है नहीं। जो कुछ मुझे अपने लिए ठीक प्रतीत होता है, उसको मैं प्रकृति पर थोपना चाहता हूँ, लादना चाहता हूँ, आरोपित करना चाहता हूँ। प्रकृति को विवश करना चाहता हूँ कि वो मेरी कामनाओं का पालन करे। ये क्लाइमेट चेंज है। क्लाइमेट चेंज पूरे तरीक़े से आध्यात्मिक समस्या है। आध्यात्मिक समस्या माने, ये रस्सी-जनित, अज्ञान-जनित, तादात्म-जनित; और कुछ नहीं है, क्लाइमेट चेंज।

“अभी तक क्लाइमेट चेंज फिर क्यों नहीं हुआ? क्या पहले रस्सी नहीं थी?” थी। “फिर क्या नहीं था?” ताक़त नहीं थी। पहले मेरी इतनी ताक़त नहीं थी कि ये मुझे घसीटे, तो मैं इनको घसीटना शुरू कर दूँ। अब काल का प्रवाह इंसान को पिछले सौ साल में पहली बार ऐसी जगह ले आया है, जहाँ वो प्रकृति पर पूरे तरीके से हावी हो सकता है। हो सकता है नहीं, कब का हो चुका है। वरना हमारे इतिहास में हमारे पास कभी ताक़त नहीं थी कि हम प्रकृति को पूरे तरीके से नियंत्रित, निर्देशित कर सकें। अब पहली बार हुआ है। क्योंकि अब पहली बार हमारे हाथ में ताक़त आई है कि प्रकृति को नियंत्रित कर सकें। इसीलिए पहली बार ये क्लाइमेट चेंज की चीज़ देखने को मिल रही है।

और हमारी ताक़त दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, और रस्सी मोटी होती जा रही है। रस्सी टूटने का तो नाम ही नहीं ले रही, और ताक़त मेरी बढ़ती जा रही है। इसको तो मैं ऐसे-ऐसे नचाऊँगा, हवा में। ये कौन है? यही क्लाइमेट चेंज है।

जिनको समझ में आना हो उनको श्रीकृष्ण के इस श्लोक में जलवायु परिवर्तन का हल दिख जाएगा। जलवायु परिवर्तन, और यहाँ भी बात किसकी हो रही है? इसलिए नहीं कि वायु की बात हो रही है, दर्शन के तल पर, स्थिति को समझने के तल पर। बात आ रही है समझ में?

वो प्रकृति है, वो शरीर भी है। शरीर भी पूरे तरीके से प्राकृतिक है, मिट्टी है। शरीर में कोई ख़ास रहस्य नहीं है। जादू नहीं है, दैवीयता नहीं है, कुछ नहीं है। प्रकृति का एक संयोग है मानव शरीर और कुछ नहीं है। और चूँकि सिर्फ़ संयोग है, इसीलिए इतना समय लगा मनुष्य की प्रजाति को अपने इस स्थान पर पहुँचने में। अगर निर्माण हुआ होता मनुष्य के शरीर का, तो निर्माण तो यूँ हो जाता है। जो भी प्रक्रिया होती है निर्माण की, वो पूरी हो जाती है। पर हम बहुत अच्छे से जानते हैं कि पृथ्वी कितनी पुरानी है। कितने बिलियन साल पुरानी है?

श्रोता: 4.5 बिलियन।

आचार्य प्रशांत: और हम ये भी जानते हैं कि मनुष्य कितना पुराना है। 10,000 साल पहले तो बसना शुरू हुआ था, खेती शुरू हुई थी।

ऐसे समझिए, कि अगर पृथ्वी एक साल पुरानी है। पृथ्वी एक साल पुरानी है, मान लीजिए पृथ्वी बनी थी 1 जनवरी 2024 को। अगर पृथ्वी बनी थी 1 जनवरी 2024 को, तो मनुष्य बना है 31 दिसंबर 2024 की रात, 12 बजने से 4 सेकंड पहले, 11:59:56।

अब समझो, ये रिश्ता है हमारा और प्रकृति का। प्रकृति अगर एक साल पुरानी है, तो हम चार सेकंड पुराने हैं। इतना समय लग ही गया मनुष्य के शरीर को बनने में क्योंकि हम सिर्फ़ संयोग हैं। और संयोगों में समय लगता है।

मैं आपके हाथ में एक डाइस दे दूँ। डाइस कौन-सी? वो जो बच्चे उछाल-उछालकर खेलते हैं। उसमें कितने फ़ेस होते हैं? छह। और मैं आपसे कहूँ, तब तक उछालो, जब तक 60 बार छह न आ जाए, एक के बाद एक। आपको कब तक उछालनी पड़ेगी? मैं कहूँ, तब तक उछालो, जब तक एक के बाद एक 60 बार छह न आ जाए। तब तक उछालो। कब तक उछालनी पड़ेगी? और अगर मैं कहूँ कि बस 60 बार ऐसे ले-लेकर रख दो छह, तो कितनी देर करना पड़ेगा? तो तुरंत हो जाएगा। लो, एक बार, दो बार, तीन बार, चार बार, हाथ से रख दो। पर संयोग है, उछालने में जो आ जाता है, वो एक रैंडम अकरेन्स है, संयोग है। तो आपको अगर 60 बार छह लाना है, तो आपको हो सकता है, साल, दो साल, तीन साल उछालनी पड़े। निर्भर करता है कि आप कितनी गति से उछाल रहे हैं। समझ में आ रही है बात?

तो इसलिए मनुष्य को बनने में इतना समय लगा है। वरना जिस दिन पृथ्वी आई थी, मनुष्य भी उसी दिन आ गया होता न साथ में। समझ में आ रही है बात? मनुष्य संयोग मात्र है मिट्टी का, मिट्टी ही है। उसे और कुछ समझने का प्रयास मत करो। शरीर में जो कुछ हो रहा है, वो बिल्कुल वैसे ही है। जैसे नदी-नाले बह रहे हैं, जैसे पक्षी हैं, जैसे फसलें हैं, जैसे बैक्टीरिया है, जैसे बादल हैं। वो और कुछ नहीं है। कोई बादल कभी थमा देखा? देखा क्या? गंगा को कभी जमा देखा? आप भी नहीं थम पाओगे, किस तल पर? वहाँ अपनी ऊर्जा मत लगाओ, नहीं, बड़ी गड़बड़ हो जाएगी। मैं बताता हूँ क्या गड़बड़ होगी।

आपने तय कर लिया कि मुझे शरीर को अकंप रखना है। किसी भी मामले में, एक तो हो सकता है कि मैं जिस मुद्रा में बैठा हूँ उस मुद्रा में और किसी भी तरीके से हो सकता है, अकंप रहना है। उदाहरण के लिए, मैं दिन में बस एक बार खाऊँगा और मैं इस व्रत पर अकंप रहूँगा। ये भी तो शरीर को अकंप रखने वाली बात ही हो गई न। मेरे कदम उस दिशा में कभी नहीं जाने चाहिए। ये भी तो शरीर को अकंप रखने वाली बात हो गई ना। है न? आप अगर शरीर को अकंप रखना चाहोगे, तो बताओ, क्या करना पड़ेगा? शरीर बंधा किससे हुआ है? शरीर प्रकृति से बंधा हुआ है, प्रकृति लगातार चल रही है। आप इसको चलाना नहीं चाहते, तो आपको प्रकृति को बांधना पड़ेगा। वही क्लाइमेट चेंज है।

तो ये जो फिजूल क़िस्म के धार्मिक हठ होते हैं कि शरीर को बाँधो, शरीर को बाँधो, ये करो, वो करो। ये भी क्लाइमेट चेंज के लिए उत्तरदायी हैं। नहीं समझ में आ रही बात?

मैंने कहा, मैं ऐसे रहूँगा, रस्सी खोलना मैं चाहता नहीं। जो वास्तविक अध्यात्म है, वो क्या है कि मैं वो नहीं हूँ, मैं ये हूँ, तो रस्सी खोल दो। रस्सी मुझे खोलनी नहीं है। प्रण पूरा कर लिया है कि मैं ऐसे रहूँगा। बंधा मैं उससे हूँ। वो इधर-उधर मचल रहा है, तो मैं क्या करूँगा? और ज़्यादा वो भागेगा, तो क्या करूँगा? गोली मार दूँगा? ये प्रकृति का नाश है।

झूठी धार्मिकता भी प्रकृति का उतना ही नाश करती है जितनी कि भोगवादिता। भोगी भी क्या कहता है? मुझे संतुष्टि मिलेगी, प्रकृति को नियंत्रित करके। उसे भी प्रकृति को नियंत्रित करना है। और जो उथली धार्मिकता होती है, लोकधर्म, वो भी क्या कहती है? मुझे शांति मिलेगी, प्रकृति को नियंत्रित करके। प्रकृति को क्यों नियंत्रित करना चाहता है? क्योंकि वो शरीर को नियंत्रित करना चाहता है। और शरीर तो प्रकृति है उसको नियंत्रित करना है, तो फिर बहुत सारी चीज़ें नियंत्रित करनी पड़ेंगी।

बात आ रही है, समझ में?

जो बहता है, वो बहेगा; तुम प्रयास कर भी लो, तो भी वो रुकना तो है नहीं। गीता कह रही है आज, “उसको मत बहाने लग जाना, बहना जिसका स्वभाव नहीं।” अहंकार मात्र गति में ही जीवित रह सकता है, और अहंकार को गति मिलती है उस रस्सी से; रस्सी काट दो अहंकार के पास गति का न बहाना बचेगा, न साधन। अहंकार हमने जैसे कहा कि मिट जाए तो आत्मा है। इसको दूसरे तरीके से भी समझिए आज। अहंकार रुक जाए, तो भी आत्मा है। मिटना ही ज़रूरी नहीं है, रुकना भी पर्याप्त है।

बंधी रहने दो, रस्सी पर किसी ऐसे से बाँध दो जो ख़ुद गतिशील नहीं है, माने नित्य है। फिर वो प्राकृतिक तो हो नहीं सकता, क्योंकि प्रकृति में तो सब भाग ही रहा है, इधर-उधर। ठीक है अहंकार है, उसे पेट पर शौक है रस्सी बाँधने का, बंधी ही रहने दो। ले जा रस्सी आसमान में टांग दे, रस्सी को ले जाकर आसमान में टांग दो। जो भी तरीका हो सकता है, लगाओ हुक वहाँ, जो भी विधि हो सकती है, रस्सी को ले जाओ आसमान में टाँग दो। अब गति कैसे होगी?

अहंकार को गति के लिए कोई विषय चाहिए। विषयों के पीछे-पीछे ही तो भागता है न वो। विषयों के साथ ही तो बदलता है न वो। तुम्हें बँधे ही रहना है, बड़ा अकेलापन लगता है कि अरे, किसी से नहीं जुड़ेंगे, तो अकेले हो जाएँगे। अकेले हो जाएँगे, तो जुड़ जाओ न, आसमान से जुड़ जाओ। न वो गति करेगा, न तुम करोगे। वो भी चैन से बैठा है, तुम भी चैन से बैठोगे। आ रही है बात समझ में?

तो इसलिए ये यथा है, यथा, बाहर गति जैसे वायुहीन, गतिहीन जगह पर आपको अकंप दिया दिखाई देता है, वैसे भीतर हो जाओ; वैसे भीतर हो जाओ। और वैसा होने के लिए जिसकी आवश्यकता पड़ती है, उसको संयम कहते हैं। संयम माने विलंबित कामना नहीं होता।

हम में से ज़्यादातर लोगों के लिए संयम का क्या मतलब है? अभी पिज़्ज़ा चाहिए, रात में 11:00 बज चुके हैं। इधर-उधर फोन लगाया, दौड़ लगाई, नहीं मिला। सब बंद है। संयम धरो, बेटा। संयम धरो, सो जाओ। सुबह उठोगे, दुकान खुल जाएगी। है न?

हमारे लिए संयम का अर्थ होता है, सस्पेंडेड डिजायर। डिॉल्व्ड डिजायर नहीं, अंडरस्टुड डिजायर नहीं। क्या? सस्पेंडेड, विलंबित कामना। थोड़ी देर के लिए भविष्य में धकेल दी, वो भी मजबूरी में। इसको बोलते हैं संयम। नहीं, संयम का वास्तविक अर्थ है, वही रहना जो तुम हो। नित्य की अनित्य से गांठ न बाँधने को संयम कहते हैं। जब नित्य की अनित्य से गांठ ही नहीं, तो फिर संयम की आवश्यकता भी नहीं न?

कौन से संयम की?

जो आम क़िस्म का होता है, जिसमें कामना बची रहती है, पूरी तरह से, पर कामना पर ढक्कन धरा जाता है। कामना तो है, पर उस पर ढक्कन लगाकर बैठे हैं, मजबूरी में। इसे क्या बोलते हैं? सस्पेंडेड डिजायर। संयम, साधारण क़िस्म का संयम। ये नहीं है संयम। यम शब्द ही बहुत महत्त्वपूर्ण है, उस पर ही ग़ौर करेंगे तो समझ में आ जाएगा, योग सूत्र में यम नियम आते हैं न? तो यम से आशय ही होता है आध्यात्मिक प्रक्रिया का शुरू होना। और शुरू होना का मतलब ये नहीं कि वहाँ बेबी स्टेप्स होते हैं। वहाँ शुरुआत में ही बात आ जाती है फिर, ब्रह्मचर्य, अचौर्य, ये सब वहीं आना शुरू हो जाता है। छोटी बात नहीं, वहाँ शुरुआत ही बड़ी बात से होती है। बड़ी बात का आपको छोटा मतलब निकालना है, तो आप निकाल लो।

तो इसी तरह से संयम का भी छोटा मतलब मत निकालो, कि धीरज धरना, संतोष करना, ये नहीं है संयम। संयम यही है, समझना। ये जो रस्सी है न, ये सिर्फ़ समझने से खुलती है। ये झूठे ज्ञान की डोर है। क्या समझना? आत्मा अपनी प्रकृति पराई, पराई चीज़ से गाँठ नहीं बाँधते। पराई चीज़ से गाँठ नहीं बाँधते।

नैतिकता की बात नहीं है। यहाँ पर “पराए” से मतलब ये नहीं है कि किसी दूसरे द्वारा नियंत्रित, किसी दूसरे के स्वामित्व में, उसको नहीं पराया कहते। पराया माने केंद्र से पराया, स्वभाव से पराया। मैं और वो इतने अलग हैं कि हम चाहें भी तो एक नहीं हो सकते। मैं और वो इतने अलग हैं, हमारा स्वभाव अलग है, हमारी हस्ती अलग है। मैं आत्मा हूँ और वो। और “वो” माने उधर नहीं, “वो” माने ये, ये कंधा, ये खोपड़ा, यही है प्रकृति। उसको भी इन्हीं आँखों से देखते हो न? “वो” माने ये आँख होता है। ये पूरी दुनिया क्या है? यही है। कोई इंद्रिय न हो यदि आपके पास, तो क्या विश्व शेष बचेगा आपके लिए? ये है परायापन। और इस पराएपन को जानना ही संयम है, जिसकी बात हो रही है श्लोक में।

कोई बहुत बड़ी सिद्धि नहीं चाहिए फिर ये जानने के लिए, माने संयम साधने के लिए। साधारण, निर्मल दृष्टि चाहिए और दिख ही जाएगा कि “वो” और “मैं” पराए हैं; कि “मैं” और “मैं” पराए हैं; कि दो “मैं” होते हैं। एक जो मैं बना बैठा हूँ, जो “मैं” हूँ; और जो ये दूसरा “मैं” है ये पराया है, इससे रस्सी बाँध के कुछ होना नहीं है। कुछ होना नहीं है, रस्सी मत बाँधो।

पहले ही एक रस्सी बँधी हुई है वो काफ़ी नहीं है क्या? कौन-सी रस्सी? शरीर की, कि चेतना बिना शरीर के हो ही नहीं सकती। ये रस्सी बँधी हुई है पहले ही, और यही रस्सी दुख का कारण है। एक पहले ही बँधी हुई है, उसी के कारण परेशान घूमते हो। अब उसके बाद पाँच रस्सियाँ और बाँधनी हैं? पाँच रस्सियाँ और बाँधनी हैं?

यही संयम है, जान लेना। और ये जानने के लिए ज्ञान नहीं चाहिए; निर्मलता चाहिए, इनोसेंस। बात इतनी सीधी है कि दिख जाएगी, किन्हीं किताबों का मोहताज होना भी ज़रूरी नहीं। कोई बहुत बड़ा ज्ञान है नहीं ये, अज्ञान होता है बहुत बड़ा और बड़ी मेहनत करके उसको रोकना पड़ता है। बताओ, यहाँ कमर पर रस्सी बाँधे, वो भी एक नहीं न जाने कितनी। मेहनत किसमें है? साधारण चलने के जैसे बच्चे होते हैं रस्सी-वस्सी कुछ नहीं। चप्पल भी पहनाओ तो इधर-उधर छोड़ दी, भाग रहे हैं। उसमें मेहनत है या आप एक रस्सी, दो रस्सी, दस रस्सी, कमर पर रस्सी, हाथ में रस्सी, टाँग में रस्सी, इसमें मेहनत है? किसमें मेहनत है?

तो फिर क्यों कहते हो, “मुक्ति बड़ा कठिन काम है? मुक्ति, अरे बाप!” मुक्ति तो सहज, साधारण काम है। कठिन काम तो वो है जो हम रोज़ कर रहे होते हैं। ऐसे आँख बंद करिए और कल्पना करिए आपके पूरे शरीर में रस्सियाँ ही रस्सियाँ बँधी हैं। और रस्सियाँ भी खिंची हुई हैं, खिंची हुई हैं, सब दिशाओं से रस्सियाँ खिंची हुई हैं। मोटी रस्सियाँ बाँधे हुए हैं। करिए, ये हैं हम। ये हम हैं।

और जब कहा जाए कि ये हम हैं, काहे बाँधे बैठे हो? खोल दो। क्योंकि दूसरा सिरा कहीं भी हो, हमें नहीं पता। गाँठ तो यहाँ बँधी है न, ये तो खोल सकते हो। उस पर अधिकार नहीं है। वो नहीं मालूम कौन ले कहाँ भाग जाएगा वो दूसरा छोर, काल जाने, संयोग जाने, हमें नहीं पता दूसरे छोर का क्या होगा। इधर वाला छोर तो मेरे पास है न, इसको तो खोल सकता हूँ न। नहीं खोलता।

सही रिश्ता क्या होना चाहिए शरीर के साथ, माने ज़िंदगी के साथ, माने पूरे संसार के साथ, ये सिखा रहे हैं श्रीकृष्ण आज। सही रिश्ता कैसे रखना है, माने जीना कैसे है। इसको आप जीवन-सूत्र भी बोल सकते हैं।

जब भीतर से आज़ाद होते हो, तो बाहरी विषयों पर निर्भरता शून्य हो जाती है।

तो व्यक्ति क्यों जीता है फिर? आज़ाद हैं, बाहर प्रकृति है, प्रकृति अपना काम कर रही है। हमारा कोई काम हैं नहीं, तो हम जिए क्यों? निरुद्देश्य हो गए? नहीं, निरुद्देश्य नहीं हो जाते। ये 800 करोड़ तो इंसान ही हैं, और इनके अलावा अरबों-अरब जीव-जंतु, पेड़-पौधे, पक्षी, ये सब हैं। और तुम भी वैसे ही हो, उनमें और तुम में मूल रूप से कोई अंतर नहीं है। स्वयं को आत्मा कहो, तो आत्मा वो भी है। और स्वयं को मिट्टी कहो, तो मिट्टी वो भी है। और इन दो के अलावा हम कुछ होते नहीं। तो वो क्यों तड़प रहे हैं? और तुम क्यों अब आनंद में बैठे हुए हो? जब वो वही हैं जो तुम हो, तो आनंद पर उनका भी उतना ही हक़ है जितना तुम्हारा है। ये जीवन का उद्देश्य बन जाता है।

अच्छा, मान लीजिए, किसी दिन ये पूरी प्रकृति, जितने जीव-जंतु हैं समष्टि, सब मुक्त हो गए। पकड़ में आ ही गए, बच्चू! बहुत स्मार्ट बनता है, आचार्य। तब क्या करेंगे? वो भी आज़ाद हैं, तुम भी आज़ाद हो जाओ उनके साथ खेलो, और क्या करेंगे दो आज़ाद लोग?

और क्या खेला जा सकता है जब सामने वाला तकलीफ़ में हो? इनका सिर फटा हुआ है। इनकी टाँग टूटी हुई है। उनके सीने में दर्द है। और मैं जाकर मचल रहा हूँ, आओ खेलते हैं, आओ खेलते हैं, लेट्स पार्टी। शोभा देता है? हाँ, बिल्कुल, पीड़ा स्वभाव है। अहेतुक जीना आनंद है। निष्काम, निष्प्रयोजन गति मुक्ति है; पर तब नहीं जब तुम्हारे आसपास बीमारी और बंधन फैले हुए हों। तब नहीं बिल्कुल नहीं।

और जैसे-जैसे ये सब जो हैं, बिल्कुल अपने ही जैसे, अपनी ही प्रतिकृतियाँ बिल्कुल अपने जैसे; जैसे-जैसे ये भी आज़ाद होते जाएँगे, तुम्हें खेलने की भी छूट मिलती जाएगी। खेलना, ख़ूब खेलना, ख़ूब खेलना।

वो प्रहार मूवी के अंत में दृश्य आता है, तो जो उसका मेजर है कर्नल है, मेजर है शायद; का जो किरदार है, उसको तो उन्होंने पकड़ के बंद कर दिया होता है या साझा है ये, या मार वार दिया होता है दो-चार गुंडों को। तो बहुत सारे नंगे बच्चे हैं वो उनको दौड़ा रहा है। चलो, दौड़ो, थोड़ा वर्ज़िश करो, दौड़ लगाया करो। पहले वो ट्रेनर था आर्मी में, अब उसको डाल दिया है भीतर क़ैद में। बच्चे ले लिए हैं बहुत सारे, नंगे-नंगे, छोटे-छोटे, उनको दौड़ा रहा है। चलो, तुम लोग करो।

फिर एक आकर उनसे पूछता है कि तुम यहाँ क़ैद में कब तक रहोगे? तुम बाहर कब निकलोगे? तुम कब आज़ाद होओगे? ये लोग तुम्हें छोडेंगे कब? बोलता है, जब तुम्हारे जैसे मेरे बहुत सारे दोस्त हो जाएँगे न, तब मैं आज़ाद हो जाऊँगा। समझ में आ रही है बात?

जब वो सब आज़ाद हो जाएँगे बच्चे, तो आप भी आज़ाद हो जाओगे। अभी आप यहाँ आए हो, सुबह-सुबह देखा होगा इतनी सारी गाड़ियाँ निकल रही होंगी, क्योंकि आज छुट्टी का दिन है, ख़ास दिन है और पर्यटक देश भर से आकर के यहाँ पर; इतनी गाड़ियाँ आपने देखी होंगी निकल रही होंगी: मुर्गे लेकर के, मछली लेकर के। और वो दिखाई नहीं देते, क्योंकि वो बंद गाड़ियों में जाते हैं, भैंसे लेकर के। वही हैं सब बच्चे। इंसान तो हैं ही हैं, वो भी हैं।

जब वो सब आज़ाद हो जाएँगे, तो आप भी आज़ाद हो जाओगे। और उनकी आज़ादी की बात भी आप तभी कर सकते हो, जब आज़ादी पहले आपके भीतर कम-से-कम अंकुरित होने लगी हो, फूटने लगी हो। पर पूर्ण आज़ादी आपको नहीं मिल सकती उनके मुक्त हुए बिना। जो क़ैद में हैं, उनको वहाँ से रिहा कराने के लिए आपको भी क़ैद में जाना पड़े तो स्वीकार करिए। क्योंकि आज़ाद तो हो सकते भी नहीं न, जब तक वो लोग क़ैद में हैं।

आ रही है बात समझ में?

जो अपनी गाँठें खोल देता है, वो फिर दूसरों की गाँठें खोलता है और कारण अद्वैत में स्थित है। क्योंकि अपनी गाँठ खोलने का मतलब होता है अपनेपन की गाँठ खोल देना। जो झूठा स्वतः है न, कि “मैं इतना ही हूँ” इसकी गाँठ भी खुल गई। तो जैसे ही तुम अपनी गाँठ खोलते हो, तुम्हें पता चलता है, अरे, अभी बहुत गाँठें बाक़ी हैं। बताओ क्यों? क्योंकि मैं इतना नहीं हूँ। ये सब मैं हूँ, मैं हूँ। जब तक गाँठ बँधी थी, तो गाँठ के घेरे में जितना था, बस उतना था मैं। जब तक यहाँ गाँठ लगी हुई है, रस्सी बँधी हुई है, तो उसके घेरे में, उसके पेरिमीटर में जितना आ रहा था मैं बस उतना था। वो खुली, तो पता चला कि अपनापन खुल गया। अपनी गाँठ ही नहीं खुली है, अपनापन भी खुल गया है।

समझ में आ रहा है अरे, मैं अपनी परिभाषा ही गलत कर रहा था। मैं इतना ही नहीं हूँ, मैं ये सब कुछ हूँ (बाहर की तरफ़ इंगित करते हुए)। सब कुछ मैं ही हूँ। और अगर यहाँ से खुल गया हूँ मैं, तो वहाँ से बँधा हूँ मैं। तो खुला कहाँ हूँ मैं? यहाँ से खुल (अपने भीतर की तरफ़ इंगित करते हुए) गया हूँ मैं, पर यहाँ (बाहर की तरफ़ इंगित करते हुए) से बँधा हूँ मैं। तो बताओ, खुला कहाँ हूँ मैं?

तो चिंता मत करिए। जीवन आपको कभी निष्प्रयोजन नहीं होने देगा। बहुत काम है, बहुत काम है। कभी-कभी तो मेरे मन में आता है कि ये जो व्यक्तिगत पुनर्जन्म होता है, इसको स्वीकार कर ही लेते हैं। क्योंकि काम इतना है, निपटेगा तो नहीं। तो लगता है कि हाँ, दो-चार कम-से-कम और मिल जाएँ ज़िंदगियाँ, तो अच्छा रहे। मिलेंगी नहीं, ठीक? मुझे आप पर कोई भरोसा नहीं है, एकदम नहीं है।

अगर समय कम पड़ रहा है, तो जान और लगाइए। अगले जन्म की कामना से लाभ नहीं है, मिलना नहीं है, यही है। समझो, समझना संयम है। समझोगे, ये गाँठ खुलेगी, और ये गाँठ खुलते ही समझ में आएगा, कुछ नहीं खुला। क्योंकि ये गाँठ खुलते ही “मैं” की परिभाषा बदल जाएगी। अभी आप “मैं” बोलती हैं, तो मतलब क्या होता है? ये शरीर, ये। और ये गाँठ खुलते ही पता चलेगा, मैं ये तो हूँ ही नहीं। मैं क्या हूँ? ये सब मैं ही मैं हूँ। और ये तो बँधे हैं, तो मैं कहाँ आज़ाद हुआ? मैं कहाँ आज़ाद हुआ? इसलिए अपनी मुक्ति बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी होती है, क्योंकि अपनी मुक्ति जैसा कुछ होता नहीं।

अब समझ में आ रहा है कि क्यों मैं ये एनलाइटनमेंट वग़ैरह, सब इसको एकदम बर्ख़ास्त करता हूँ। दुनिया बर्बाद है, तुम मुक्त कैसे हो गए? क्योंकि मुक्ति का तो मतलब ही होता है “मैं” की सीमित अवधारणा से मुक्त होना। तुम कह रहे हो कि दुनिया बर्बाद ही रही, मैं अकेला उड़ गया। और अगर अभी तुम अपने आप को ऐसा मानते हो जो अकेला उड़ सकता है, तो तुम मुक्त कहाँ हो? अकेला तो उड़ा जा ही नहीं सकता। और ऐसे तो हमें कोई प्रमाण मिलते नहीं कि तुम मुक्त हुए थे, तो तुम्हारे साथ समष्टि भी मुक्त हो गई थी। तो मतलब, अगर तुम फिर मुक्ति का दावा कर रहे हो, तो झूठ ही बोल रहे हो। तुम्हारी मुक्ति तो छोटे बंधन से ज़्यादा और बड़ा बंधन हो गया, अगर तुमने अपने मुँह से दावा किया है।

हाँ, तुम्हारे बाद और लोगों ने आकर के गुब्बारा फुला दिया, तो अलग बात है। फिर कोई दिक़्क़त नहीं। दूसरे तो मूर्ख हैं, उन्होंने करा होगा कुछ। पर जो अपने मुँह से खुद ही घोषित करे कि दुनिया बर्बाद है, मिट रही है, दुख में है और मैं मुक्त हूँ, गड़बड़ बात। समझ में आ रही है बात?

शुरुआत किससे होगी? शुरुआत होगी प्रेम से। प्रेम से क्या दूसरों के प्रति प्रेम? नहीं। दूसरों के प्रति प्रेम हम कर ही नहीं सकते, ये अच्छे से समझ लीजिएगा। आप पर अगर कोई आरोप लगाए, कि यू डोंट लव मी न, तो इसमें नाराज़ होने की कोई बात नहीं है, क्योंकि आप बेबस हैं। इट्स नॉट दैट यू डोंट लव हिम न। यू कांट लव हिम। बताओ क्यों? क्योंकि हम स्वार्थी होते हैं, और स्वार्थ सदा स्वयं से शुरू होता है। जब हमने स्वयं को ही नहीं प्रेम किया कभी, तो दूसरे को कैसे कर लेंगे?

उसको बोलिए, हाँ, क्या बताऊँ? बात तो सही है। तुझसे प्यार नहीं है। पर मैं क्या करूँ? एक तरह की ईमानदारी है यह। क्योंकि मुझे तो ख़ुद से भी प्यार नहीं है। और कैसे कह दूँ कि तुझसे प्यार है, जब ख़ुद से ही नहीं है? शुरुआत होती है प्रेम से। वो प्रेम आपको बताता है आप तकलीफ़ में हो। प्रेम माने संवेदनशीलता। जिसके प्रति प्रेम होता है, आप उसके प्रति संवेदनशील हो जाते हो न। जैसे जो साधारण ममता भी होती है घर में बच्चा होता है, वो “कुकू-कुकू” कर रहा है, माँ संवेदनशील हो जाती है। हो जाती है न?

ये बैठा हुआ है। दरवाज़े पर घंटी बज रही है, टन-टन-टन, भले ही न सुनाई दे। कुछ कर रहे हैं घर में काम, वो दरवाज़े की घंटी नहीं सुनाई दे रही। कुकर की सीटी बज रही है, हो सकता है वो भी न सुनाई दे। टीवी पर कुछ चल रहा है ज़ोरों से, वो भी न सुनाई दे। पर इन सबके बीच में वो दूर बेडरूम में पड़ा हुआ है। वहाँ पर वो कुकवाना शुरू कर दे अगर, माँ को एकदम सुनाई दे जाता है। ये संवेदनशीलता है, ये प्रेम नहीं है। मुझे आप पर भरोसा?

श्रोता: नहीं है।

आचार्य प्रशांत: मैं इसको प्रेम नहीं कह रहा हूँ। मैं कह रहा हूँ, जो साधारण किस्म की ममता होती है, आप उसमें भी पाते हो कि आप संवेदनशील हो गए। तो प्रेम संवेदनशीलता है, प्रेम गहन संवेदनशीलता है। और जब आप संवेदनशील होते हो, तो आपको पता चलता है कि आप बहुत दुख में हो। शुरुआत वहाँ से होती है। जब दुख में हो, तो आप कहते हो, दुख क्यों हो रहा है? छाती में दर्द क्यों रहता है? फिर आप देखते हो पहली बार, इसे क्या बोलेंगे? अवलोकन।

आत्मावलोकन अगर आप नहीं कर पाते हो, तो उसका कारण है कि आत्म-प्रेम की कमी है कुछ। स्वयं से इतनी नफ़रत क्यों करते हो? किसने सिखा दिया, ख़ुद के ही प्रति हिंसा से भरे रहना? आप ऐसे देखते हो, कहते हो, दर्द क्यों होता रहता है? तो कहते हो, रस्सी इतनी ज़ोर से, इतनी मोटी रस्सी बाँध रखी है। पता चलता है, हम बँधे हुए हैं। शुरुआत हमेशा किससे होगी? प्रेम से। प्रेम के बिना कोई शुरुआत नहीं होती। ज्ञान बेचारा बहुत परेशान रहता है। प्रेम नहीं है तो ज्ञान ऐसा हो जाता है जैसे औंधे घड़े पर, चिकने घड़े पर पानी पड़ रहा हो। दुनिया भर का ज्ञान डाल दो, पत्थर पर या उल्टे घड़े पर, कुछ होगा? कुछ नहीं होता।

तो इसीलिए सबसे पहले थोड़ा प्रेम चाहिए होता है, कम-से-कम थोड़ा-सा। फिर ज्ञान आकर प्रेम को और बढ़ा देगा। पर अगर थोड़ा भी प्रेम नहीं है, तो आप ज्ञान दोगे, वो गाली देगा। ये देखा है न? ज्ञान को जितनी गालियाँ पड़ी हैं, उतनी किसी और को नहीं पड़ीं आज तक। ज्ञान को गाली पड़ती है, इसीलिए क्योंकि ज्ञान को भी स्वीकार करने के लिए प्रेम चाहिए। ज्ञान आश्रित है प्रेम पर। प्रेम नहीं है, ज्ञान देना बड़ा मुश्किल हो जाएगा।

शुरुआत होगी प्रेम से; प्रेम माने, संवेदनशीलता; संवेदनशीलता माने, दुख। दुख का उदय नहीं, दुख का अनुभव। दुख तो है ही, पर असंवेदन बनकर हम उस दुख से किसी तरह बच लेते हैं। किसी चीज़ का होना और उसका अनुभव होना, दो अलग-अलग बातें हैं। दुख है, पर हम उसके अनुभव से बच जाते हैं। कैसे? सुन्न पड़कर। असंवेदनशील होकर हम दुख के अनुभव से कन्नी काट लेते हैं।

प्रेम आएगा तो गहरा दुख प्रतीत होगा। पैदा नहीं हुआ है, अब अनुभव होना शुरू हुआ है। ठीक? और ये अनुभव आपको विवश करेगा जानने को। यहाँ भी आपके पास दो विकल्प हैं, कि रस्सी बँधी हुई है, और रस्सी आपको यहाँ भी दर्द दे रही है, और खींच-तान रहे हैं, तो आप साधारण आदमी जैसा काम शुरू कर दें। उन्होंने क्या किया? उन्होंने कहा, जो खींच रहा है, मैं उसको अपने नियंत्रण में कर लूँगा। तो एक तो ये आप कर सकते हो। वो नहीं करना है। समझना है कि जो खींच रहा है उस बेचारे की गलती नहीं, क्योंकि वो भी संयोगों के हवाले है। वो बह रहा है, हवाओं की तरह, मैं क्यों उसको क़ाबू में करना चाहता हूँ?

प्रेम, संवेदनशीलता, दुख, अवलोकन, ज्ञान, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, या आज़ादी, जानबूझकर मैं उसको मुक्त नहीं बोल रहा हूँ। उसके आते ही व्यक्तित्व का विगलन, “मैं व्यक्ति नहीं हूँ, मैं समष्टि हूँ।”

ये कोई सूत्र, सिद्धांत, नारा नहीं है कि आप ज़ोर-ज़ोर से बोलोगे तो हो जाएगा। ये दर्शन है। दर्शन माने, ये दिखता है। ये दिखाई देता है बिल्कुल और ये अनुभव होता है। उसकी पीड़ा ख़ुद को अनुभव होने लग जाती है। तब कहिएगा, मैं व्यक्ति नहीं हूँ, मैं समष्टि हूँ। नारेबाज़ी से आप समष्टि नहीं हो जाएँगे। उधर वाला तकलीफ़ में है, और वही तकलीफ़ आपको महसूस होने लग गई, तो जानिएगा कि “मैं” हट गया है। अब मैं, और मैं, और मैं, और मैं, हम सब “मैं” हैं।

आ रही है बात समझ में?

इसी तरीके से वो मुक्त हुआ आनंद आपको मिला, तो जानिएगा कि “मैं” गिरा है। तो फिर व्यक्तिगत रूप से स्वतंत्र हो गए; मुक्त नहीं कह रहा हूँ। क्या? व्यक्तिगत रूप से स्वतंत्र। ये “मुक्ति” से नीचे की बात है ज़रा। स्वतंत्र हो गए और फिर दिखाई दिया, अरे बाप रे बाप! एक गाँठ खोली, तो करोड़ दिखाई दीं। एक गाँठ खोली अपनी, तो दिखाई दिया एक गाँठ नहीं थी अपनी, करोड़ थीं। तो अब लगिए इनके साथ, लगिए।

ये जीवन जीने का तरीका है, आप इसीलिए पैदा हुए हो और कोई कारण नहीं है। जीवन का और कोई उद्देश्य नहीं है। यही है उद्देश्य। पहले थोड़ा अपने प्रति उदार होकर, अपनी हालत पर एक तरह से तरस खाना, अपनी ओर देखना और कहना, “क्या यार, ये क्या कर डाला तेरे साथ मैंने?” वो जो आईने में है, उसे वैसा किसने बनाया? हमने बनाया न। तो उसके प्रति थोड़ी संवेदनशीलता, थोड़ी करुणा, थोड़ा प्रेम, थोड़ी उदारता। जैसे बोलना हो।

और फिर देखना, पूछना, तेरी ये हालत चल कैसे रही है? तेरी ये हालत हुई कैसे? ये पूछोगे तो सारा दोष अतीत को दे दोगे, “वो माँ-बाप ने पीट दिया था और स्कूल ख़राब था, और बीवी डायन थी, पति राक्षस था, तो इसलिए मेरी हालत ऐसी हो गई।”

मेरी ये हालत चल कैसे रही है? अभी बताओ अभी। अभी ऐसे क्यों चल रहा है? जो चल रहा है अभी ऐसा क्यों चल रहा है? और जब ये प्रश्न करते हो, तो समझ में आता है, किसी से बँधे हुए हो। बहुतों से बँधे हुए हो, बहुत सारी बाहरी ताक़तों से, तत्त्वों से, विषयों से, तादायद में कर लिया है। इसलिए अपनी हालत ऐसी है। ये समझ में आते ही गाँठ खुलने लगती हैं। जब खुलने लगें, तो खुलने देना, डर मत जाना। “Lonely… I am so lonely…” गाँठ खुल रही है।

हम में से ज़्यादातर तो ऐसे हैं कि सर्जरी हो और वहाँ से भी गाँठ निकाली जा रही हो, तो भी लोनली हो जाएँ। ऐसे नहीं करते। गाँठ खुल रही है, तो खुलने देते हैं। और जब खुलती है, तो आप कोई बहुत ऊँची जगह पर तो बैठे हो नहीं। जब गाँठ खुलती है, भावनाएँ थोड़ा-सा काँपती हैं, ठीक है काँपने देना। पत्थर नहीं हूँ मैं, मैं समझता हूँ, जिन चीज़ों से आज तक आपने आस लगा रखी है, जो आगे के लिए उम्मीदें बाँध रखी हैं, जो बहुत सारी डोरें आपने खींच रखी हैं, जब ये टूटती हैं, कटती हैं तो दुख होता है। ये मैं जानता हूँ, समझता हूँ, गुज़रा हूँ, गुज़रता हूँ। कोई तरीका नहीं है, इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है।

और वो दुख अगर हो रहा हो, तो उसको होने देना। वो आपको लगातार याद दिलाता रहेगा कि ये पूरी दुनिया ही कितने दुख में है। वो दुख आपके लिए रोशनी बनेगा। पत्थर से भी नाता जोड़ लिया हो और पत्थर को भी अगर छोड़ना हो, तो भी तकलीफ़ हो जाती है। मैं समझता हूँ उस तकलीफ़ को। वो तकलीफ़ अगर हो रही है, तो जियो उसके साथ। उस तकलीफ़ को जब ईमानदारी से, खुलेपन से स्वीकार करोगे, अनुभव करोगे, तो पता चलेगा दुनिया कितनी तकलीफ़ में है।

सोचो, तुम्हें तो आज़ाद होकर इतनी तकलीफ़ हो रही है। जो आज़ाद भी नहीं हैं, उन्हें कितनी हो रही होगी? आ रही है बात समझ में?

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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