गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके। हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान्तधिरप्रदिग्धान् ।।५।।
“मैं तो महानुभाव गुरुओं को न मारकर, इस लोक में भिक्षान्न भोजन करना कल्याणकर मानता हूँ, क्योंकि गुरुओं का वध करके मैं रक्त से सने हुए अर्थ और काम रूपी भोगों को ही तो भोगूँगा।“
~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोक ५, अध्याय २, सांख्य योग
आचार्य प्रशांत: कह रहे हैं कि गुरुओं को मारने की अपेक्षा भिक्षाटन करना श्रेष्ठ समझते हैं क्योंकि गुरुओं को अगर मारेंगे भी तो जो सुख भोगेंगे वह रक्तिम होगा, स्वजनों की रक्त से सना हुआ।
फिर आगे कहा, तर्क पर विचार करियेगा, "फिर हम यह भी तो नहीं जानते हैं कि हमलोगों के लिए श्रेयस्कर क्या है!" हम माने? ‘न मैं जानता हूँ, न आप जानते हैं।‘
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः । यानेव हत्वा न जिजीविषाम स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः।।६।।
“फिर हम यह भी तो नहीं जानते हैं कि हम लोगों के लिए श्रेयस्कर क्या है। हम उन्हें जीत लें या वे हमें जीत लें। जिन लोगों को मारकर हम जीना नहीं चाहते, वे ही धृतराष्ट्र के पुत्र सामने खड़े हैं।“







