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भगवती महामाया – दुःख की स्रोत भी और मुक्ति दायिनी भी || दुर्गासप्तशती पर (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: तो ऋषि मारकंडेय हैं मार्कंडेय पुराण में और वे अपने शिष्यों को दीक्षा दे रहे हैं, सुना रहे हैं, समझा रहे हैं। और शिष्यों में कौन हैं? पक्षी हैं। तो ऐसा ही है, भाई। पुरुष प्रकृति को कुछ कह रहा है तो प्रकृति पक्षी का रूप लेकर भी तो हो सकती है न? तो उसी मार्कंडेय पुराण से दुर्गा सप्तशती का प्रादुर्भाव है। तेरह अध्याय हैं सप्तशती में। नाम से ही स्पष्ट है कि सात सौ श्लोक होंगे। और जो तेरह अध्याय हैं, ये तीन चरित्रों में बांटे जा सकते हैं।

जो तीन चरित्र हैं, वो तीन तरह के अज्ञान और दंभ, और मद और मोहरूपी राक्षसों को केंद्र में रखकर हैं। जो पहला चरित्र है, उसमें सिर्फ़ पहला अध्याय आएगा। उसमें मधु और कैटभ का संहार होता है। जो दूसरा चरित्र है, उसमें अध्याय क्रमांक दो से चार तक आते हैं, जिसमें महिषासुर का संहार होता है। और फिर जो तीसरा चरित्र है, उसमें पाँचवे अध्याय से लेकर के तेरहवें अध्याय तक सम्मिलित होते हैं, जिसमें शुंभ निशुंभ का संहार होता है। ठीक है?

और संहार करने वाली भी जो तीन देवियाँ हैं, वो वास्तव में महाप्रकृति के तीन गुणों का प्रतिनिधित्व करती हैं। प्रथम चरित्र में तमोगुणी महाकाली हैं, दूसरे चरित्र में रजोगुणी महालक्ष्मी हैं और तीसरे चरित्र में सतोगुणी महा सरस्वती हैं। ठीक है?

देशभर में जो आप देवी का रूप आम तौर पर देखते हैं, वो महिषासुरमर्दिनी के रूप में हैं। वह दूसरे चरित्र से आता है। तो तेरह अध्यायों वाली दुर्गा सप्तशती में जो दूसरा चरित्र है, उसकी सबसे ज़्यादा मान्यता और महत्व है। यहाँ तक भी होता है कि अगर आपको सप्तशती का पाठ करना है और किसी कारणवश आप तीनों चरित्रों और तेरह अध्यायों का पाठ नहीं कर सकते तो मान्यता है कि सिर्फ़ दूसरे चरित्र का पाठ कर लो तो भी सुफल उपलब्ध हो जाएगा। लेकिन मात्र पहले या तीसरे चरित्र का पाठ करने को वैध नहीं माना जाता। महालक्ष्मी का ही वो रूप जिसमें वो महिषासुर वध करती हैं, दुर्गा कहलाती हैं। वहीं से इस ग्रंथ का नाम भी है।

तो राजा सुरथ हैं। वे बड़े न्याय प्रिय राजा थे। और उनकी जो दंड नीति है, सप्तशती कहती हैं कि बड़ी प्रबल थी। प्रजा के शुभेच्छु थे, जन-कल्याण में सदा उत्सुक रहते थे, और बड़ा उनका राज्य था। लेकिन समय की मार, कोला विध्वंसी नामक एक समुदाय उनका शत्रु हो गया और इन शत्रुओं ने कम संख्या होते हुए भी राजा सुरथ को युद्ध में हरा दिया, राज्य का बड़ा हिस्सा छीन लिया उनसे। तो राजा सुरथ वापस अपनी राजधानी में आ गए। जब राजधानी में आते हैं वापस तो वहाँ पाते हैं कि उनको अब दुर्बल जान करके उनके ही मंत्रियों इत्यादि ने उनके विरुद्ध षड्यंत्र कर रखे हैं। बाहर वे हारे शत्रुओं से, और ऐसे शत्रुओं से हारे जिनकी संख्या भी कुछ कम ही थी राजा की सेना की अपेक्षा।

ये राजा बड़े पराक्रमी थे, उनका बड़ा नाम था। तो पहले तो बाहर हारने का अपमान झेलना पड़ा, वह भी किसी छोटी सी सेना से। और जब वापस आते हैं अपने राज्य में तो यहाँ पाते हैं कि इन्हीं के लोगों ने इनके विरुद्ध षड्यंत्र रच रखे हैं। तो राजा बड़े क्षुब्ध हो गए, भीतर से जैसे टूट गए एकदम। और वो जो शत्रु थे जिन्होंने राजा के राज्य का बड़ा हिस्सा छीन लिया था, अब वो राजधानी पर भी आक्रमण करने की चेष्टा करने लगे। और राजा के मंत्री वगैरह तो सब पहले ही टूटे हुए थे, टूटे हुए थे माने राजा से विमुख हो चुके थे, सत्ता वगैरह छीनना चाहते थे।

तो राजा एक दिन राजधानी से निकले, बोले कि शिकार खेलने जा रहा हूँ। भीतर से बड़े विरक्त हो गए थे, अन्यमनस्क हो गए थे। शिकार खेलने के बहाने जंगल गए और वहाँ पाते हैं कि एक मुनि का आश्रम है, मेधा मुनि, और उस आश्रम में उन्हें एक विचित्र चीज़ दिखी कि कई तरीके के पशु वहाँ बैठे हुए हैं और हिंसक, पर कोई हरकत कर नहीं रहे हैं। छोटे-छोटे जो पशु होते हैं, उनकी तो बात ही अलग है कि पक्षी आ गए हैं या खरगोश आ गए हैं या हिरण आ गए हैं, वह तो वहाँ पर शांति से बैठे ही हुए थे, ऋषि के आश्रम में, हिंसक पशु जो होते हैं, वो भी जब आश्रम के आसपास आते थे तो उनकी हिंसात्मकता कम हो जाती थी, राजा ने देखा।

वहाँ एक अपूर्व शांति थी। तो ऐसा नहीं है कि वहाँ आश्रम में अगर गाय है या हिरण है या खरगोश है तो बाहर के पशु आ करके उन पर आक्रमण कर रहे हैं। बाहर के पशु आए भी है तो वह अपना कुछ खरगोशों वगैरह को कुछ कर नहीं रहे हैं, अपना बस बैठे हैं। तो राजा को अद्भुत लगा।

मन उनका पहले से ही बेचैन था। तो वो गए वहाँ पर मुनि के पास और तभी वे पाते हैं कि एक और व्यक्ति आता है मुनि के पास। उसका नाम था समाधि और वह एक व्यापारी था, वैश्य था, और इसका एक समय पर बड़ा अच्छा लंबा-चौड़ा, फलता-फूलता व्यापार होता था। जब इसका अच्छा व्यापार होता था तो इसकी पत्नी, इसके बेटे, इसके भाई, ये सब इसको बड़ा स्नेह, सम्मान देते थे। फिर समय की बात, समाधि का जो व्यापार था, वह चौपट हो गया। जब चौपट हो गया तो समाधि की ही पत्नी ने और पुत्र-पुत्रियों ने और भृत्यों ने समाधि को घर से निकाल दिया। उसी के घर से उसे निकाल दिया, बोले, "भगो! तुम किसी काम के नहीं।" और बड़ा अपमान किया।

तो यह व्यक्ति भी बड़ा आहत मन ले करके जंगल ही निकल आया। सोचा होगा कि अब जंगल में जा रहा हूँ, कोई जानवर ही खा ले, खत्म हो जाऊँ, यही ठीक है। जीने का मन ही नहीं बचा होगा। यह भी वहाँ आता है तो मुनि का आश्रम देखता है। जंगल में एकदम एकांत में, निर्जन जगह पर। वहाँ मुनि हैं, मुनि के कुछ शिष्य वगैरह हैं, और ये सब पशु हैं और ये पशु बड़ी मौज़ में हैं। तो समाधि को भी विस्मय हुआ। कहे, यह क्या बात है!

तो ये दोनों जाते हैं मुनि के पास। और मुनि से जिज्ञासा करते हैं, वह जिज्ञासा आधारभूत है दुर्गा सप्तशती में। जिज्ञासा क्या है, समझिए। वह जिज्ञासा अगर हम नहीं समझेंगे तो हम इससे संबंध ही नहीं बना पाएँगे।

जैसे भगवत गीता में बड़ा आवश्यक है कि पहले ही अध्याय में अर्जुन की स्थिति को समझ लिया जाए, क्योंकि अर्जुन की स्थिति को नहीं समझा तो यह भी नहीं समझेंगे कि गीता आवश्यक क्यों है, पहली बात और दूसरी बात कि गीता का हमारे जीवन से क्या संबंध है। मैं हमेशा कहा करता हूँ कि पहले तो तुम मानो कि हम सब अर्जुन हैं अपने-अपने तरीके से, जीवन रण क्षेत्र है। रण क्षेत्र दुर्गा सप्तशती में भी लगातार है और श्रीमद्भगवद्गीता में भी लगातार है।

जैसे भारत की प्रज्ञा ने इस बात को साफ़ समझा हो कि जीवन संघर्ष तो है ही, यहाँ लड़े बिना बात बनेगी नहीं। बाहरी लड़ाई प्रतीक मात्र है भीतरी लड़ाई का कि भीतर तो सतत एक संग्राम चलना ही है। वही संग्राम आपको देखने को कहाँ मिलता है? भगवत गीता में। और वही संग्राम अलग-अलग रूपों में आपको सप्तशती में भी देखने को मिलेगा।

तो ये दोनों ऋषि के पास जाते हैं और ऋषि से जो कहते हैं, समझिए कि वह किस तरीके से हम सब की बात है। जैसे अर्जुन की स्थिति हम सबकी स्थिति थी। अर्जुन मोह ग्रस्त था न और अज्ञान ग्रस्त था। दो चीजें थी जो अर्जुन को पकड़ रही थी: मोह और अज्ञान। वैसे ही देखिए कि जिज्ञासा क्या करते हैं दोनों, और इनकी जिज्ञासा अर्जुन की जिज्ञासा से कम नहीं है वास्तव में।

राजा कहते हैं – “मुझे सब कुछ जानते-समझते भी मुनिवर बताइए कि इतना दु:ख क्यों है।” राजा कहते हैं कि आपको पता है कि मैं क्या सोच रहा हूँ? मैं सोच रहा हूँ कि मेरे सब जो प्रजागण थे, यहाँ तक कि दास-दासियाँ थे, इनको मैं बड़े सदाचार में रखता था। मैं इनका राजा ही नहीं था, मैं इनके पिता तुल्य था, तो मैं इनको बड़ा सदाचारी बना करके रखता था। मुझे अब यह बड़ा दु:ख रहता है कि मेरे शत्रुओं ने अब राज्य हाथ में ले करके मेरे लोगों को कहीं दुराचारी तो नहीं बना दिया। और मैं सोचता हूँ कि मेरा प्यारा हाथी था जिसको मैं इतने प्यार से रखता था, उसका क्या हुआ होगा, उसको कहीं कष्ट तो नहीं मिल रहा। और मैं कोई मूर्ख व्यक्ति नहीं हूँ, मुनिवर। मैं समझदार हूँ लेकिन फिर भी मोह मुझे पकड़े हुए हैं। यह क्या बात है? राजा कहते हैं, “मैं समझदार व्यक्ति हूँ फिर भी मोह मुझे पकड़े हुए हैं। यह क्या बात है?”

राजा ने, जहाँ तक मैं समझता हूँ, विधिवत शिक्षा पाई होगी, ग्रंथ पढ़ें होंगे, वो भली-भाँति समझते थे कि दुष्ट लोग बहुत दिनों तक तो चलते नहीं हैं। जिन लोगों ने उनकी सत्ता छीनी और जिन लोगों ने उन पर भीतरघात किया, वे लोग स्वयं ही अपने अंत को प्राप्त होंगे। यह सब जानते हुए भी राजा बड़े दु:ख में थे; जिया नहीं जा रहा था राजा से। और राजा ने कहा कि मुझे अपनी सत्ता का, अपने लिए कोई लोभ नहीं है, मैं तो बस कुछ ऐसा चिटक सा, दरक सा गया हूँ भीतर से कि शत्रुओं का सामना करने की जगह मैं आज बस यूँ ही घोड़ा ले करके जंगल निकल आया। यह राजा की मनोस्थिति है।

अगर आप ये समझ पाएँ कि ये आपके भी जीवन का हाल है तो आगे फिर आपको देवी से बोध और आशीर्वाद प्राप्त होगा। इसी तरीके से जो बात वैश्य ने कही, वह तो और भी ज़्यादा मार्मिक है। ग्रंथ में प्रस्तुति इस तरह से है कि समाधि वैश्य वास्तव में सुरथ राजा से थोड़ा अधिक ही समझदार है। वो बात आप तब भी देखेंगे कि जब देवी अंततः उन्हें वर देती हैं तो राजा क्या माँगते हैं और वैश्य ने क्या माँगा। वह बात आपको तब भी दिखाई देगी पर अभी बस मैं इतना बताए देता हूँ कि वैश्य और ज़्यादा समझदार है, फिर भी वह मोह ग्रस्त है, राजा तो है ही।

वैश्य कहता है कि मैं तो सब जानता हूँ, समझता हूँ—अध्यात्मिक आदमी रहा होगा अपनी तरह का‌—लेकिन फिर भी मैं देखिए कितना टूटा हुआ हूँ। कोई ऐसा सिद्धांत नहीं जीवन का जो मुझे स्पष्ट न कर दिया गया हो। मैं विचार करने बैठूँ तो मुझे साफ़ दिखाई देता है कि ये सब परिवार के लोग, व्यापार, धन, समृद्धि, प्रतिष्ठा आदि तो आवागमन की चीज़ें हैं, इनसे क्या मन लगाना और इनके खोने पर क्या दुख पाना! मान-अपमान तो मिथ्या है। लेकिन मैंने जो धन खोया है, जो प्रतिष्ठा खोयी है और फिर जो मैंने अपमान पाया है, उसकी चोट छप गई है, भूलती ही नहीं। जानता मैं सब हूँ लेकिन फिर भी वह ज्ञान मेरे काम नहीं आ रहा।

ऋषि का जो उत्तर है, उसका आरंभ ही ऐसा है कि जो समझ ले, वह तर जाए। ऋषि कहते हैं, "हाँ-हाँ, समझदार तो हो तुम दोनों, पर समझदार तो मेरे आश्रम के ये सब पशु-पक्षी भी हैं। तुम उतने ही समझदार हो जितनी समझदारी पशुओं में होती है।" बड़ी गहरी बात कह दी। ऋषि कहते हैं कि समझदार तो तुम हो पर तुम्हारी सारी समझदारी पशुओं की समझदारी है। मतलब समझ रहे हो?

पशु माने प्रकृति और बुद्धि माने भी प्रकृति। आपकी बुद्धि और आपके विचार का फैलाव आपको समझदार नहीं बना देता। ठीक वैसे जैसे सारे पशु प्रकृति से आते हैं न, वैसे ही मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार — जो अंतःचतुष्टय है, यह भी पूरा प्राकृतिक ही है। तो पशु अपनी वृत्ति से जो कुछ करता है और मनुष्य अपनी बुद्धि से जो कुछ करता है, वह सब एक ही तरह की समझदारी है मूलतया। पशु अपनी वृत्ति से जो कुछ करता है और मनुष्य अपनी बुद्धि से जो कुछ करता है, वह एक ही तरह की है।

मनुष्य की बुद्धि उसे पशुओं से भिन्न नहीं बना देती। मनुष्य को यदि पशुओं से भिन्न होना है तो उसे कुछ और चाहिए, बुद्धि भर से काम नहीं चलेगा। बहुत-बहुत बुद्धिमान (मनुष्य) जानवरों जैसे ही होते हैं। बुद्धि तुम भरपूर रखकर भी पशु ही रहोगे, क्योंकि बुद्धि भी प्राकृतिक ही है, स्मृति भी प्राकृतिक है। पूरा अंतःकरण ही प्राकृतिक मात्र है। बात समझ में आ रही है?

एक पशु अपनी वृत्ति पर चल करके अपने शत्रुओं को जीतना चाहता है, ठीक? मनुष्य की भी वृत्ति उसे शत्रुओं से उलझाती है, बस उसके पास बुद्धि है तो वह शत्रुओं से उलझने के बड़े बुद्धिमत्ता पूर्ण तरीके ढूँढ लेता है। जंगल में दो पशु लड़ेंगे तो वो बस अपने दाँतों से, पंजों से, सींगो से और खुरों से लड़ेंगे। दो मनुष्य लड़ेंगे तो हो सकता है दोनों के हाथ में अत्याधुनिक बंदूके हो, एके-47। दो राष्ट्र लड़ेंगे उनके पास मिसाइलें होंगी, बम होंगे। पर बात तो एक ही है न? है तो यह सब हमारी प्राकृतिक वृत्तियों का ही निरूपण, या कुछ अलग है?

तुम मूल में जो पशु हो, वही पशु अभिव्यक्ति पा रहा है और बुद्धि का भी अपनी अभिव्यक्ति के लिए प्रयोग भर कर रहा है। बुद्धि उसे पशु से अलग नहीं बना रही है; बुद्धि उसकी पशुता को और ज़्यादा विस्तार दे रही है। और ये कितनी खतरनाक बात है! आपकी बुद्धि आपको पशुओं से अलग नहीं बना देती है, आपकी बुद्धि बस आपकी पशुता को और बल दे देती है। समझना आगे कि फिर दैत्य कौन होता है। दैत्य के पास भी बड़ा बल होता है। तो बल पाने से आप देवता छोड़िए, मनुष्य भी नहीं हो जाते। बल तो दैत्यों के पास भी होता है। मनुष्य आपको कुछ और है जो बनाता है। वह क्या है, वह हम समझेंगे।

यहाँ तक स्पष्ट है? तो मूल प्रश्न क्या है सप्तशती में? जो वहाँ पर मूल समस्या है, वह कोई दैवीय समस्या नहीं है, वह कोई शास्त्रीय समस्या नहीं है, वह कोई पारलौकिक समस्या नहीं है, वह पूरे तरीके से हमारी-आपकी मानवीय समस्या है। और जो भी ग्रंथ किसी मानवीय समस्या से नहीं उलझ रहा, मूल्यहीन है, व्यर्थ, त्याज्य है। मनुष्य ग्रंथ के पास जाता ही क्यों है? अपनी समस्याएँ सुलझाने के लिए। हमेशा पूछा करो कि यह जो ग्रंथ है, क्या यह अपने केंद्र में मेरी समस्या को रख रहा है? अगर रख रहा है तो वो ग्रंथ आपके काम का है, जैसे हमने कहा कि भगवत गीता में अर्जुन की जो समस्या है, वह हमारी आपकी पूरे विश्व की समस्या है इसलिए गीता हमारे इतने काम की है।

इसी तरीके से सप्तशती में सुरथ और समाधि की जो समस्या है, वह हमारी-आपकी, सबकी समस्या है। इसलिए यह ग्रंथ हमारे काम का है और अब मुनि आगे जो कुछ भी बताएँगे, वह बात हमारे काम की है। ध्यान दीजिएगा कि आगे जो कुछ बताया जा रहा है, वह बड़े प्रतीकात्मक तरीके से बताया जा रहा है। कोई ऐसी गुप्त बात को सरल करने के लिए बताया जा रहा है जो यदि सरल नहीं की गई तो आम मन में उतरेगी नहीं।

निश्चित रूप से जो बताया जा रहा है, वो इतिहास नहीं है। जिन घटनाओं का वर्णन किया जा रहा है, वो स्थूल घटनाएँ नहीं है, वो मानस घटनाएँ हैं, सूक्ष्म घटनाएँ हैं। वो ज़मीन पर नहीं घट रही हैं, वह धरा लोक पर नहीं घट रही हैं; वो मानस लोक में घट रही हैं। वो किसी समय पर नहीं घटी थी; वो हर समय घट रही हैं। वो किसी काल की बात नहीं है कि इतिहास में आज से इतने हज़ार वर्ष पूर्व या इतने लाख वर्ष पूर्व ऐसा हुआ, वो वह घटना है जो निरंतर हम सबके भीतर घट रही है। वो काल के एक बिंदु में सीमित घटना नहीं है, वो काल का निरंतर प्रवाह ही है घटना। वो किसी समय नहीं हुई थी बात, वह लगातार हो रही है। कौन सी बात? आदमी का मोह में ग्रस्त रहना। आदमी का अपमान पा करके दु:ख झेलना।

यह बात उस समय नहीं हुई थी, यह बात आज भी हो रही है। तो इसको ऐसे नहीं पूछना है कि अच्छा यह क्या सचमुच कभी हुआ था? अच्छा बताओ ऐसा कैसे हो सकता है कि ऐसा कोई दैत्य हो, ऐसा कोई राक्षस हो? ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई देवी हों जिनकी इतने हाथ या इतने पाँव हो? ऐसा कैसे हो सकता है कि स्मरण मात्र से किसी बालिका की उत्पत्ति हो जाए? ऐसा कैसे हो सकता है?

ये सब बातें और इस तरह के प्रश्न मत पूछिएगा, और इस तरह के प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं कि फलाने ग्रंथ में लिखा है कि फलाने ऋषि आए और उन्होंने फल दे दिया और फल खाने से इन महापुरुष का जन्म हो गया। तो लोग कहते हैं कि अच्छा, ऐसे कैसे हो सकता है कि फल खाने से किसी का जन्म हो जाए? अरे बाबा! वो बात स्थूल नहीं है। तुम इसको किस तल पर समझना चाह रहे हो? यह क्या दुर्बुद्धि है? वह बात क्या है? अति सूक्ष्म है, वह मानस घटना है। तो उसको वैसे ही समझना है।

तो अब ऋषि कुछ बताना शुरू करते हैं। मैं जो श्लोकों का अनुवाद ही है, इस स्थान पर उसको आपके लिए पढ़ देना चाहता हूँ। बड़ा रोचक है।

सुरथ और वह समाधि नामक वैश्य दोनों साथ-साथ मेधा मुनि की सेवा में उपस्थित हुए और उनके साथ यथा योग्य न्यायानुकूल विनयपूर्ण बर्ताव करके बैठे। तत्पश्चात वैश्य और राजा ने कुछ वार्तालाप आरंभ किया।

यह सप्तशती का प्रथम अध्याय ही है, हम लगभग छत्तीसवें श्लोक पर हैं।

तो राजा ने कहा – "मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ। मेरा चित्त मेरे अधीन न होने के कारण यह बात मेरे मन को बहुत दु:ख देती है। जो राज्य मेरे हाथ से चला गया है, उसमें और उसके संपूर्ण अंगों में मेरी ममता बनी हुई है। चला गया है और राज्य और राज्य संबंधित जो कुछ था, उसमें मेरा ममत्व बना हुआ है। मुनिश्रेष्ठ! यह जानते हुए भी कि वह अब मेरा नहीं है, अज्ञानी की भाँति मुझे उसके लिए दुख होता है। यह दुख क्या है?"

यह सवाल देखिए कि "दु:ख क्या है?"

"मैं जानता हूँ लेकिन नहीं जानता। यह जानते हुए भी कि राज्य चला गया है अज्ञानी की भाँति मुझे दु:ख होता है।" यह है यहाँ पर मूल प्रश्न, 'विचार की विफलता’। "विचार के तल पर जानता हूँ, वृत्ति के तल पर नहीं जानता।" यह मूल समस्या है जिसको ग्रंथ संबोधित कर रहा हैं।

"(राजा कह रहे हैं) इधर यह वैश्य भी घर से अपमानित होकर आया है। इसके पुत्र, स्त्री और भृत्तियों ने, तीनों ने इसे छोड़ दिया है। स्वजनों ने भी इसका परित्याग कर दिया है तो भी यह उनके प्रति अत्यंत हार्दिक स्नेह रखता है। उन्होंने इसको छोड़ दिया है और यह उनकी याद में और चिंता में व्याकुल है अभी भी। इस प्रकार यह तथा मैं (सुरथ और समाधि) दोनों ही बहुत दु:खी हैं।"

और अब जो वाक्य आएगा ध्यान दीजिएगा।

"जिसमें प्रत्यक्ष साफ़-साफ़ दोष देखा गया है, उस विषय के लिए भी हमारे मन में ममता जनित आकर्षण पैदा हो रहा है। यह बात नहीं समझ में आ रही।"

यह केंद्रीय प्रश्न है, समझे?

"हम जानते हैं कि उस विषय में दोष है। मेरी स्त्री, मेरे पुत्र, ये गलत लोग हैं। इन्होंने मुझे घर से निकाल दिया सिर्फ़ इसलिए कि मेरा व्यापार ठप्प हो गया था, लेकिन फिर भी मेरे दिल से उनकी ललक जाती नहीं। मेरे मन से उनका स्नेह और आकर्षण मिटता नहीं।"

यह प्रश्न है कि ऐसा क्या है?

ज्ञान अपर्याप्त सिद्ध हो रहा है। यह क्या हो रहा है? ज्ञान अपर्याप्त सिद्ध हो रहा है।

फिर ऋषि को संबोधित करके कहते हैं, "महाभाग! हम दोनों समझदार हैं, लेकिन दोनों को अभी तक यह भ्राँति बनी हुई है कि दोनों समझदार हैं।"

तो ऋषि से कहते हैं "महाभाग! हे विप्र वर! हम दोनों समझदार हैं, तो भी हममें जो मोह पैदा हुआ है, वह क्या है? हम समझदार तो इतने है लेकिन फिर भी मोह नहीं छूट रहा। विवेक शून्य पुरुष की भाँति मुझमें और इसमें भी यह मूढ़ता प्रत्यक्ष दिखाई देती है।"

मूढ़ता तो दोनों को प्रत्यक्ष दिखाई देती है लेकिन फिर भी लगे हुए हैं अपने-आपको समझदार बोलने में और यही उनके सामने बड़ी विडंबना है कि यह हो कैसे रहा है। "हम समझदार हैं लेकिन फिर भी हममें इतना मोह, इतनी ममता क्यों, जैसे अविवेकी हों?"

तो ऋषि बोलते हैं – "देखिए, विषय मार्ग का ज्ञान सब जीवो को है। विषयों में आसक्ति सब जीवों को है, आप अकेले नहीं हैं। इसी प्रकार विषय भी सबके लिए अलग-अलग हैं, बस विषय सबके अलग-अलग होते हैं, जैसे कि कुछ प्राणी दिन में नहीं देखते, दूसरे रात में नहीं देखते। कुछ के विषय दिन के होते हैं, कुछ के विषय रात के होते हैं तथा कुछ जीव ऐसे हैं जो दिन-रात में बराबर ही देखते हैं।"

“कुछ ऐसे होते हैं जो दिन में भी देखते हैं, रात में भी देखते हैं, बस विषयों का अंतर है।” माने किन विषयों का? जिनसे तुम्हारी आसक्ति होती है, जिनसे तुम संबंध, ममता, स्नेह वगैरह बना लेते हो।

ऋषि कहते हैं कि यह ठीक है कि मनुष्य समझदार होते हैं। राजा का मन रखने के लिए ऐसा कह दिया, लेकिन आगे क्या कहा है, समझ लो। "यह ठीक है कि मनुष्य समझदार होते हैं।" इसको ऐसा पढ़ो: यह ठीक है कि मनुष्य अपने-आपको समझदार मानते हैं, लेकिन केवल मनुष्य ही समझदार नहीं होते। वो यह नहीं कह रहें, अगर साफ़-साफ़ कहते मुनि तो कह देते कि तुम समझदार नहीं हो। पर राजा हैं सामने तो कह रहें हैं, “ठीक है, तुम समझदार हो लेकिन तुम अकेले समझदार नहीं हो, और भी हैं समझदार।" कौन है समझदार? अब सुनो।

यह मुनि का विशेष तरीका है कहने का, "यह ठीक है कि मनुष्य समझदार होते हैं, किंतु केवल वे ही समझदार नहीं होते, पशु-पक्षी और मृग आदि सभी प्राणी समझदार होते हैं।"

वे कह रहे हैं राजा से कि बेटा, अगर तुम समझदार हो न, तो मेरा यह घोड़ा भी समझदार है, इतनी समझ है तुममें। अगर तुम समझदार हो तो यह जो यहाँ यह गाय चर रही है और यह जो खरगोश घूम रहा है, यह भी समझदार है। तुम्हारी समझदारी का स्तर इतना ही है।

सीधे-सीधे राजा को यह नहीं कहा, शालीनता की बात है, कि तुम नासमझ हो या अविवेकी हो, क्योंकि राजा को यह बात समझ में आनी होती तो स्वयं ही आ जाती। पर राजा कह रहे हैं कि हम तो विवेकपूर्ण होते हुए भी मोह ग्रस्त हैं। तो राजा से कहा, "तुम समझदार हो और मेरी बिल्ली भी समझदार है। अब तुम खुद समझ लो कि तुम कितने समझदार हो।"

"पशु-पक्षी और मृग आदि सभी प्राणी समझदार होते हैं। मनुष्यों की समझ भी वैसे ही होती है जैसी उन मृग और पक्षियों की होती है।" बिल्कुल खुलासा कर दिया। तुम्हारी समझ है तो, लेकिन वैसी ही जैसी मृग की होती है, पक्षियों की होती है।

"तथा जैसी मनुष्यों की समझ होती है, वैसे ही उन मृग-पक्षी आदि की होती है। मृग-पक्षी की जैसी समझ है, वैसी तुम्हारी है और तुम्हारी जैसी है, वैसी ही मृग और पक्षी की है। यह बात तथा अन्य बातें भी प्रायः दोनों में समान ही हैं। मनुष्य में और पशु-पक्षियों में यह बात भी समान है और बाकी सब बातें भी समान है; तुम पशुओं से ज़्यादा अलग हो नहीं अभी।”

"समझ होने पर भी इन पक्षियों को तो देखो न, ये स्वयं भूख से पीड़ित होते हुए भी मोहवश बच्चों की चोंच में कितने चाव से अन्न के दाने डाल रहे हैं।"

वहाँ पक्षी रहे होंगे तब तरह-तरह के। तुम कल्पना कर सकते हो कि भोर का या साँझ का समय है और पक्षी ला-ला करके अपने बच्चों को दाना खिला रहे हैं, या मुर्गा है वहाँ पर, मुर्गी है। ऋषि का आश्रम है, वो घूम रहे हैं वहाँ पर पास ही और ऋषि उसकी ओर ऐसे संकेत करके कह रहे हैं कि देखो, यह मुर्गी खुद भूखी है और यह आठ-दस पीछे-पीछे चूजे़ हैं, उनको खाना खिला रही है। तुम अकेले हो जो मोह ग्रस्त हो? मादा हिरण है, उसका देखो अपने शावक से क्या संबंध है। वह गाय है, देखो उसका अपने छौने से क्या संबंध है। उस मुर्गी का अपने चूज़ों से, मादा खरगोश का भी छोटे-छोटे खरगोशों से, देखो, इनका संबंध देखो। तुम इनसे अलग कैसे हो? तुम्हें ममता है, इन्हें भी तो ममता है।

"नरश्रेष्ठ! क्या तुम नहीं देखते कि मनुष्य समझदार होते हुए भी लोभवश अपने किए हुए उपकार का बदला पाने के लिए ही पुत्रों की अभिलाषा करते हैं?"

तुम कह रहे हो कि तुम्हें अपने पुत्रों से ममता है। क्या तुम्हें नहीं पता कि तुम पुत्रों की अभिलाषा करते ही इसीलिए हो ताकि तुम पुत्रों पर उपकार करो और बाद में तुम्हें उस उपकार का फल मिले पुत्रों से?

क्या कह दिया मुनि ने! कल्पना करो कि समाधि वैश्य को कैसा लग रहा होगा अब यह सुनकर। वह कह रहा है कि—जानते हो मुनि से उसने क्या कहा था?—बोला कि मुझे तो बड़ी चिंता होती है कि कहीं मेरे जो बेटे हैं, जिन्होंने मुझे घर से निकाल दिया है, कहीं वो बिगड़ न गए हो, कहीं मेरा धन वगैरह पा करके वो गलत मार्ग पर न चल दिए हो। तो मुनि से कह रहा था कि मुझे तो बड़े नि:स्वार्थ भाव से अपने पुत्रों की चिंता होती है। और मुनि ने कह दिया कि बेटा, पुत्र तो तुम पैदा ही इसलिए करते हो कि उन पर उपकार करो और फिर वो जो बच्चे हैं तुम्हारे, वो आगे चल करके तुम्हारे उपकार का तुमको बदला चुकाएँ।

यह आज ही नहीं हो रहा है, तब से यही चल रहा है। कि जो बार-बार आप पाएँगे कि साहित्य में, धार्मिक साहित्य में भी हर जगह मनुष्य जब संतान माँग रहा है, तो वे कहते भी यही हैं कि पुत्र चाहिए, पुत्री नहीं कहते हैं। जब वरदान भी माँगने जाते हैं तो कहते हैं कि स्त्री हो, पुत्र हो, धन हो, प्रतिष्ठा हो; पुत्री नहीं कहते। कारण यही है: आगे चल करके भविष्य में सुख पाने की संभावना पुत्री की अपेक्षा पुत्र से ज़्यादा होती है। तो मनुष्य फिर कहता आया है कि पुत्री की जगह पुत्र मिल जाए तो बेहतर है। कुछ नहीं है, लाभ-हानि का गणित है बस, और कुछ नहीं है, सीधा-सीधा स्वार्थ शास्त्र है। उसी स्वार्थ शास्त्र को हम अर्थशास्त्र भी बोलते हैं, *इकोनॉमिक्स*। ठीक है?

तो यहाँ पर आ करके समाधि वैश्य ने मुनि से कहा कि मैं तो बड़ा अच्छा आदमी हूँ। देखिए, मुझे अपने घर की चिंता इसलिए हो रही है कि कहीं मेरे बच्चे बिगड़ न जाएँ; मैं नि:स्वार्थ भाव से उनकी चिंता कर रहा हूँ। मुनि ने उस पर घड़ों पानी डाल दिया। मुनि ने कहा कि बेटा, किसको बना रहे हो? मैं मुनि हूँ। मनुष्य संतान पैदा ही इसीलिए करता है ताकि आगे चल करके संतान से सुख वसूल सके।

"क्या तुम नहीं देखते कि मनुष्य समझदार होते हुए भी लोभवश अपने किए हुए उपकार का बदला पाने के लिए पुत्रों की अभिलाषा करते हैं? जैसे तुम कहते हो कि तुममें समझ की कमी नहीं है, वैसे ही यद्यपि उन सबमें समझ की कमी नहीं है।” व्यंग है मुनि का, “यद्यपि उन सबमें समझ की कमी नहीं है, तथापि वे संसार की स्थिति माने (जन्म-मरण की परंपरा) बनाए रखने वाले भगवती महामाया के प्रभाव द्वारा ममतामय भँवर से युक्त मोह के गहरे गर्त में गिराए जाते हैं।"

महामाया आ गईं। भगवती देवी आ गईं।

समझ तुममें पूरी है लेकिन फिर भी भगवती महामाया ने जो यह मोह का भँवर रचा है, इसमें सब गिरते हैं। तुम्हारी समझ माया के आगे नहीं चलती। तो इस तरीके से जो आधारभूत ढाँचा है ग्रंथ का, वह रखा जा रहा है।

एक क्षत्रिय और एक वैश्य। क्षत्रिय ने क्या खोया? राज्य खोया। वैश्य ने क्या खोया? धन खोया। और दोनों कुछ खो करके बड़े क्षुब्ध मन के साथ मुनि के सामने आ रहे हैं और कह रहे हैं कि हम बहुत समझदार लोग हैं, ऊँचे लोग हैं, हमने यह हासिल किया, वह किया, ऐसा-वैसा और हमने अब खो दिया है। बड़े विवेकी हैं लेकिन फिर भी खोया है, उसके लिए बड़ी ममता है। तो ऋषि कह रहे हैं कि ममता इसलिए है क्योंकि वह ममता महामाया तुम्हारे भीतर संचारित करती हैं। उस महामाया के आगे तुम्हारा विवेक, विचार और बुद्धि कुछ नहीं है; पशुओं जैसे हैं।

दोहरा रहा हूँ, "यद्यपि मनुष्य में समझ की कमी नहीं है तथापि वें भगवती महामाया के प्रभाव द्वारा ममतामय भँवर से युक्त मोह के गहरे गर्त में गिराए जाते हैं।"

तो कहाँ से आया तुममें मोह? वो भगवती महामाया ने भेजा है इसलिए आया।

"इसमें कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए। जगदीश्वर भगवान विष्णु की योग निद्रा रूपा जो भगवती महामाया हैं, उन्हीं के कारण जगत मोहित हो रहा है।"

जगत मोह में इसीलिए फँसा हुआ है क्योंकि विष्णु की योग निद्रा स्वरूप जो भगवती महामाया हैं, वो जगत को मोह ग्रस्त करे हुए हैं।

"वें भगवती महामाया ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक खींच करके मोह में डाल देती हैं।"

अरे! तुम होंगे बड़े ज्ञानी, महामाया तुम्हारे चित्त को खींचेंगी और मोह में डाल देंगी। उन्होंने तो भगवान विष्णु को भी सुला रखा है योग निद्रा में। तुम क्या चीज हो!

"भगवती महामाया ही संपूर्ण चराचर जगत की सृष्टि करती हैं तथा वे ही प्रसन्न होने पर मनुष्यों को मुक्ति देती हैं।"

यह जो जन्म-मरण युक्त संसार है, इसकी सृष्टि भी वही करती हैं और अगर प्रसन्न हो गईं तो मुक्ति भी तुम्हें वे ही देंगी।

"वे ही पराविद्या, संसार, बंधन और मोक्ष की हेतूभूता सनातन देवी तथा संपूर्ण ईश्वरों की भी अधीश्वरी हैं।" सभी ईश्वरों की भी आधारभूत हैं वो।

तो इन्होंने पूछा, “मोह कहाँ से आया? माया कहाँ से आई? ममता कहाँ से आई? तो यहाँ पर भगवती देवी को ऋषि संबोधित करते हैं।

राजा पूछते हैं, “जिन्हें आप महामाया कहते हैं, वे देवी कौन हैं?"

मुनि ने जो अब सामने आख्यान रख दिया है, उसमें बताया जा रहा है कि राजा और वैश्य दोनों के दुःख के मूल में और दोनों की संभावित मुक्ति के मूल में एक ही हैं: भगवती महामाया। तो फिर स्पष्ट ही है कि राजा की उत्सुकता होगी यह जानने में कि यह महामाया हैं कौन। इन्होंने ही मुझे फँसाया और ये ही मुझे मुक्ति देंगी। तो ऋषिवर मुझे बताइए कि महामाया कौन हैं? तो आगे का जो पूरा ग्रंथ है, वो महामाया का वृतांत देगा। समझ में आ रही है बात?

तो अब राजा ने पूछा, “मुझे महामाया के बारे में बताइए।” तो ऋषि अब इस अध्याय में और जो शेष बारह अध्याय हैं उनमें महामाया का पूरा वृतांत देंगे। और जैसा कि स्पष्ट ही है ग्रंथ के समापन तक आते-आते राजा को और वैश्य को अपने-अपने मनोवांछित पदार्थों का और स्थितियों का लाभ होगा। हम देखेंगे।

"(राजा कहते हैं) जिन्हें आप महामाया कहते हैं, वे देवी कौन हैं? ब्रह्मन्! उनका आविर्भाव कैसे हुआ? उनके चरित्र कौन-कौन हैं? ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ महर्षे! उन देवी का जैसा प्रभाव हो, जैसा स्वरूप हो और जिस प्रकार प्रादुर्भाव हुआ हो, वह सब मैं आपके मुख से सुनना चाहता हूँ।"

मुझे बताइए कि देवी कौन है? प्रादुर्भाव क्या है उनका? कहाँ से आईं? क्या करती हैं? और यह भी कहिए कि उन्हें प्रसन्न करना कैसे संभव हो।

तो ऋषि कहते हैं – "राजन्! वास्तव में तो वे देवी नित्यस्वरूपा ही हैं।”

जो नित्य है, उसका स्वरूप हैं। नित्य कौन है? ब्रह्म, सत्य। ब्रह्म के स्वरूप को ही माया कहते हैं।

"संपूर्ण जगत उन्हीं का रूप है। उन्होंने ही सारे विश्व को व्याप्त कर रखा है, उनका प्राकट्य अनेक प्रकार से होता है। यद्यपि वें नित्य और अजन्मा हैं, तथापि देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए प्रकट होती हैं, उस समय वे लोक में उत्पन्न हुई कहलाती हैं।"

वो नित्य और अजन्मी। क्योंकि वास्तव में वों कौन हैं? ब्रह्म हैं और ब्रह्म नित्य है, अजात है अजन्मा है। लेकिन हमें जब वह प्रकट होती हुई दिखती हैं तो हम कह देते हैं इस प्रकार कि उनका प्रादुर्भाव हुआ, अन्यथा वो नित्य हैं।

तो फिर अब इसके बाद मधु-कैटभ संहार की कथा है प्रथम चरित्र में, उसकी हम चर्चा करेंगे।

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