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माया: न समझो तो बंधन, समझ गए तो मुक्ति का द्वार || दुर्गासप्तशती पर (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। उपनिषद् या जितने भी प्रमुख ग्रंथ हैं, वहाँ पर, जितना मुझे पता है, फेमिनिन ऐसपेक्ट (स्त्रीत्व) की जब भी बात हुई है तो प्रकृति के रूप में या माया के रूप में हुई है और इसको बहुत ग्राॅस टर्म्स में (मोटे तौर पर) कहें तो एक तरीके से थोड़ा सा नेगेटिव (नकारात्मक) रूप में हुई है शायद। और इसीलिए शायद कई बार ग्रंथों में ऐसे वाक्य भी सुनने के लिए मिले हैं कि स्त्री से बच के रहो, स्त्री मोह में मत पड़ो। इसके बारे में आपने काफ़ी स्पष्टता भी दी है लेकिन इनको वहाँ पर कहा गया है। साथ में इन्हीं कारणों से भी हिंदू धर्म को या ग्रंथों को हमेशा से रिग्रेसिव (प्रतिगामी) या सप्रेसिव (दमनकारी) कहा गया है महिलाओं के प्रति। लेकिन अभी जो आप बात कर रहे हैं पूरी, वह उससे काफ़ी अलग सुनाई पड़ रही है। तो यह भेद क्यों है?

आचार्य प्रशांत: देखो, जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगे न, वैसे-वैसे समझ में आएगा। भेद नहीं है, एक अपूर्व, आश्चर्यजनक और मन को स्तंभित कर देने वाला मिलन है। बात यहाँ यह नहीं है कि जो मातृशक्ति है, जो स्त्रीत्व है, उसको अच्छा मानना है या बुरा मानना है। वो अच्छे और बुरे के बिल्कुल बायनरी (दोहरा) विभाजन में समाता नहीं है।

देवी को लेकर मैंने बोला न, जन्म भी देती हैं, पोषण भी करती हैं परंतु कष्ट भी वही देती हैं और मृत्यु भी वही देती हैं। देवी कह लो, प्रकृति कह लो, माँ कह लो। तो सही दृष्टि क्या होनी चाहिए देवी के प्रति, यह बड़ी सूक्ष्म बात है। उतनी सूक्ष्मता आम चित्त में होती नहीं। जब होती नहीं तो फिर इस तरह की बातें आ जाती हैं कि नारी नर्क का द्वार है, कभी कह दिया जाता है। और कभी कह दिया जाता है कि माँ ही मोक्ष है। ये दोनों ही बातें पूरी बात का अंश भी नहीं है। जो पूरी बात है उसको जो समझ गया, वो मुक्त हो जाएगा‌। क्योंकि जो पूरी बात है, वह यह है कि पुरुष का, माने हमारे चित्त का प्रकृति से संबंध ही क्या होना चाहिए?

न तो आप यही कह सकते हो कि प्रकृति ही सब कुछ है, उसी में लिप्त हो जाओ, लीन हो जाओ और न ही आप प्रकृति के विरोधी और शत्रु हो सकते हो कि प्रकृति का निषेध करो, प्रकृति नर्क है, इससे दूर ही रहना है, उसका बहिष्कार कर दो, इत्यादि-इत्यादि। इन दोनों ही रास्तों में से कोई भी रास्ता अगर यदि अपनाता है कोई तो दु:ख पाएगा।

और वास्तव में यह पूरा दर्शनशास्त्र ले-दे करके बात इसी की है कि व्यक्ति का संसार से संबंध क्या होना चाहिए। व्यक्ति माने चेतना या पुरुष। संसार माने स्त्री, प्रकृति, देवी, माँ, जो भी बोलो। तो संपूर्ण दर्शन, संपूर्ण अध्यात्म के मर्म में, केंद्र में यही गुत्थी है, इसी प्रश्न का उत्तर देना है, इसी समस्या को तो सुलझाना है न, क्या? कि स्त्री-पुरुष का संबंध क्या हो? मनुष्य का और संसार का संबंध क्या हो?

संसार में ही तुम्हें जीना है पर संसार में उलझ गए, फँस गए तो पता नहीं क्या बात है। मुक्ति तुम्हें पानी है पर संसार के अलावा कौन सा माध्यम है, कौन सा उपाय है जिसका प्रयोग करके तुम मुक्ति पाओगे? तो उससे दूर भी नहीं जा सकते, उसमें फँस भी नहीं सकते—दूर चले जाओगे तो मुक्ति नहीं मिलेगी, फँस जाओगे तो मुक्ति नहीं मिलेगी।

स्त्री से दूर हो गए तो मुक्ति नहीं मिलेगी। स्त्री माने क्या? यह बात समझ रहे हो न, किन-किन चीज़ों को यहाँ पर्याय की तरह ले रहा हूँ। स्त्री माने देवी, प्रकृति, स्त्री माने संसार, स्त्री माने माँ। जैसे भी अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तरीके से संबोधित किया जाएगा पर आशय एक ही है। संसार का अगर बहिष्कार कर दिया तो विचित्र हो जाएगा तुम्हारा जीवन। झूठ में जियोगे। कौन जीत सकता है संसार से हटकर? शरीर ही संसार है। संसार का बहिष्कार हो गया मानव मात्र का बहिष्कार, स्वयं का बहिष्कार। नहीं, कर नहीं पाओगे। और लिप्त हो गए तो फिर तो पूछो ही नहीं कि कैसा नर्क है। तो क्या होना चाहिए उचित संबंध? वो उचित संबंध हमको, मैं कह रहा हूँ, श्रीदुर्गासप्तशती में समझने को मिलेगा। अगर आप ध्यान से और समर्पण से सुनोगे-समझोगे तो। ठीक है?

प्र२: आचार्य जी, जैसा अभी तक उपनिषदों में सीखा है आपसे कि उपनिषदों में बात होती है प्रकृति के परे सत्य की जो हम न देख सकते हैं, न उसका उसको वर्णन कर सकते हैं, पर यहाँ पर अभी पूरा नया आयाम खुलकर आ रहा है जिसमें प्रकृति को ही उच्च दर्ज़ा दिया जा रहा है। तो दोनों बातें एक दूसरे से कैसे संबंध रखती है?

आचार्य: आपका प्रश्न लगभग वही है जो अभी पूछा गया था। मैं आप लोगों को जो विस्मय हो रहा है उसे समझ सकता हूँ। और उसमें फिर मुझे लग रहा है कि शायद मेरे ही पहले के समझाने में कोई त्रुटि रह गई है।

देखिए, वेदांत के साथ मैं जिनको सबसे ज्यादा नमन करता रहा हूँ वो हैं गुरु कबीर, उनका श्लोक है एक, ध्यान दीजिएगा: "माया दो प्रकार की जो जाने सो खाए, एक मिलावे राम से और दूजी नरक ले जाए।" तो बहुत साफ़-साफ़ उन्होंने कहा है और बहुत दफ़े मैंने भी स्पष्ट करा है कि और कोई मार्ग नहीं है माया के अलावा; संसार के अलावा कोई दूसरा मार्ग नहीं है जो आपको मुक्ति की ओर ले जाए। लेकिन हमारा जो मन है, वो आसान समाधान चाहता है, वो अनसर्टेंनिटी , अनिश्चितता में नहीं जीना चाहता। समझ रहे हो? उसको फज़ी लॉजिक (अस्पष्ट तर्क) नहीं चाहिए, उसको बायनरी लाजिक (दोहरा तर्क) चाहिए। तो वो क्या करता है? वो हर चीज़ का वर्गीकरण करना चाहता है: यह अच्छा है, यह बुरा है। तो मैंने माया के बारे में कुछ कहा, कुछ मेरे समझाने में भी कमी हो, कुछ आपके सुनने में, तो आपने उसको इस तरह से सुना कि माया छी-छी है, बुरी चीज़ है; ब्रह्म अच्छी चीज है।

उपनिषद् साफ़-साफ़ कहते हैं कि ब्रह्म की ही योग शक्ति को माया कहते हैं। ब्रह्म की ही शक्ति है माया। जैसे अनादि ब्रह्म है, वैसे ही अनादि है माया।

यहाँ तक कि अपनी पुस्तक आ रही है 'माया' नाम से। तो उसमें मैंने शीर्षक के साथ लिखा है: माया आई बो टू थी, यू कैन नॉट बी ओवरकम (माया मैं आपको नमन करता हूँ, आपको हराया नहीं जा सकता), ठीक है? अब इस पर प्रकाशक ने और कुछ और हमारे हितैषियों ने आपत्ति भी करी है। उन्होंने कहा कि यह कैसी बात है? आप तो अद्वैतवादी हैं और अद्वैतवाद मायावाद होता है, जिसको माना जाता है कि वहाँ पर तो माया का पूर्ण निषेध है। और अद्वैतवादी होते हुए भी आप अपनी पुस्तक में, जो उसका मुख्य पृष्ठ है, आप उसी पर यह लिखवा रहे हैं: आई बो टू थी, यू कैन नॉट बी ओवरकम * । आप माया के सामने * बो डाउन माने नमित होने की बात कर रहे हैं, यह क्या बात है? “नहीं, यूँ ही रहेगा,” जब बोला था तो बहुत सोच कर बोला था। अभी भी जब शीर्षक तय किया है तो कुछ समझ कर किया है, नहीं हटाना है। और जो मुझे विकल्प दिए गए माया को ले करके कि आप उसके साथ ये सब लिखिए। वो सारे वैसे ही थे जिसमें माया का निषेध है, तिरस्कार है या माया को हटा देने की, मिटा देने वगैरह-वगैरह की बातें हैं। मैंने वो सब नकार दिया। कुछ नहीं, मैंने कहा: *माया आई बो टू थी यू कन्नौट बी ओवरकम*। आप बात समझ रहे हैं?

हराया नहीं जा सकता। प्रकृति को मिटाना नहीं होता। श्री कृष्ण कहते हैं, ‘मम् माया’, मेरी माया है। आप कौन हैं उसको मिटा देने वाले? श्री कृष्ण कहते हैं कि मेरी दो तरह की प्रकृतियाँ हैं: अपरा प्रकृति, परा प्रकृति। आप कौन होते हैं उससे झगड़ा मोल लेने वाले? कि नहीं, प्रकृति से तो हम उत्पात करेंगे, यह करेंगे, वह करेंगे, गंदी चीज़ है। नहीं-नहीं, ऐसा नहीं है, जो माया में उलझ गया है, उनसे कहा जाता है कि माया से बचो। समझिए बात को। जो माया में उलझ गया है, उनसे कहा जाता है कि माया से बचो।

संतो की तरफ़ जाएँ तो संत कहते हैं कि माया तो मेरे यहाँ आ करके मेरी चाकरी करती है, मुझे खाना बना-बनाकर खिलाती है। उनका माया से संबंध दूसरा हो जाता है, उन्हें फिर माया से लड़ना नहीं पड़ता। माया उनके लिए फिर कोई राक्षसी इत्यादि नहीं है। माया उनके लिए परिचारिका है, कभी सखी, कभी सहेली है। श्रीहरि को मायापति भी बोलते हैं, माया को मारने वाला नहीं। मायापति, जो माया के साथ है, माया जिसकी हो गई है। जिसको माया से प्रेम है, माया को जिससे प्रेम है। जो कुछ ऐसा हो गया है कि माया भी अब उसका अनुगमन करती है प्रेम में, जैसे कोई पति का करे, डंडे के ज़ोर पर नहीं, प्रेम और बोध के ज़ोर पर। बात समझ रहे हैं कुछ?

तो बिल्कुल सही बात है कि ऋषियों ने, विशेषकर अद्वैत वेदांत में माया के विरुद्ध बार-बार चेताया है। पर क्यों चेताया है? क्योंकि आम व्यक्ति चूँकि माया को समझता नहीं है इसीलिए माया उसके लिए पीड़ा का कारण बनती है।

अभी हम देवी महात्म्य पढ़ेंगे, उसमें देवता बार-बार देवी से बोलते हैं, "हम भली-भाँति जानते हैं कि हमारे कष्टों का कारण तुम ही हो, देवी! हमें जितने दु:ख मिल रहे हैं, तुम्हारे कारण ही मिल रहे हैं। हम दैत्यों से हार रहे हैं। हम अज्ञान में फँस जाते हैं, हम भूल कर बैठते हैं, इसका कारण तुम ही हो, देवी! लेकिन हम यह भी जानते हैं इसका कारण यह था देवी कि हम तुम्हारे सत्य को, तुम्हारे मूल स्वरूप को भूल गए थे। और अब हमें कष्टों से मुक्ति भी फिर उसी रास्ते से मिलेगी‌।" किस रास्ते से? देवी के मूल स्वरूप को भूल गए थे इसीलिए देवी का उल्लंघन किया, देवी की अवज्ञा की, अवमानना की और कष्ट पाया। और अब दु:खों से मुक्ति कैसे मिलेगी? देवी का स्मरण करके, देवी की भक्ति करके।

तो समझ जाओ तो दु:खों से मुक्ति मिलती है, नहीं समझोगे तो वही प्रकृति, वही देवी तुम्हें इतने दु:ख देगी कि जी नहीं पाओगे। उसी चीज़ को आप पाते हो कि आज भी भारत में ऐसा कह देते हैं कि किसी के घर पर आफ़त आ जाती हैं तो कहते हैं देवी कुपित हो गई हैं, देवी रूठ गई हैं। सुना है? देवी का प्रकोप है। मतलब क्या है? तुमने प्रकृति के साथ वह सम्यक संबंध नहीं रखा है जो तुम्हें रखना था इसीलिए प्रकृति रूठ गई हैं, संसार ही तुमसे विमुख हो गया है।

इसी तरह से जो वर्णन है देवी का, एक तरफ तो उनसे ज़्यादा रुष्ट कोई नहीं दिखाई देता। कुपित रहती हैं देवी बिल्कुल, लगातार क्रोध में भरी हुई हैं, लाल-लाल आँखें। याद करो उनके काली रूप को। और दूसरी ओर वो भक्तवत्सला हैं, कि भक्तों को गोद में ही बैठा रखा है।

जो उनके निकट आ गया, जो समझने लग गया, उसको गोद में बैठा लेती हैं। और जो अपनी ही मान्यताओं में, सिद्धांतों में, अज्ञान में खोया हुआ है, उस पर कुपित रहती हैं।

कुछ समझ में आ रही है बात?

ब्रह्म के सगुण हो जाने को देवीत्व कहते हैं। शिव से अनन्य हैं शिवानी; महादेव से अभिन्न हैं भवानी। तो आप यह नहीं कह सकते कि मैं ब्रह्म उपासक हूँ लेकिन शक्ति से मेरा कोई संबंध नहीं। आप शिव-शिव करते रह जाएँगे, शक्ति से अगर आपका कोई संबंध नहीं तो कुछ नहीं पाएँगे। क्योंकि शिव से तो आप संबंध बना ही नहीं सकते, शिव तो असंबद्ध हैं। निराकार हैं शिव, उनसे क्या संबंध बनाओगे? संबंध तो सगुणी प्रकृति से ही बन सकता है न, जहाँ गुण है, वहीं संबंध बन सकता है।

तो शिव आपके अस्तित्व के केंद्र में हो सकते हैं, पर उनसे आपका संबंध नहीं हो सकता। वे निर्गुण हैं, निराकार हैं। संबंध तो शिवानी से ही बन सकता है। कुछ-कुछ समझ में आ रही है बात? गलत संबंध बनाओगे तो शिव को कैसे पाओगे? शिव तक जाने का मार्ग हैं माया, शिवानी। शिवानी का ही दूसरा नाम माया है। महा दुर्गा का ही एक नाम महामाया भी है, उन्हीं का एक नाम महामारी भी है, उन्हीं का एक नाम महामृत्यु भी है।

अगर तुम नासमझ हो तो वो तुम्हारे लिए महामारी हैं। तुम समझदार हो तो वो तुम्हारे लिए वह महामाँ हो जाएँगी। अब वह तुम्हारे लिए महामाँ हैं या महामारी हैं, यह उन पर नहीं, तुम पर निर्भर करता है। समझ रही हैं बात कुछ? स्पष्ट हो रहा है कुछ?

असल में सारी गलती यहाँ पर हो जाती है कि हम यह समझ ही नहीं पाते कि सत्य का निर्गुण और सगुण स्वरूप वास्तव में अभिन्न है। सत्य अरूप है, उसके दो स्वरूप वास्तव में हो ही नहीं सकते। तो इसीलिए वो जो दो दिखते हैं, वो क्या हैं? अभिन्न हैं न। सत्य के कोई दो रूप कहाँ से हो जाएँगे? सत्य क्या है? अरूप है। तो अगर तुम्हें उसके दो रूप दिखते भी हैं सगुण और निर्गुण तो उनको क्या होना पड़ेगा? एक होना पड़ेगा न। क्योंकि सत्य दो तो नहीं होता न।

'द्वितीयो नास्ति', दो तो होता नहीं। लेकिन रूप तुम्हें दो दिखते हैं। अरूप दो नहीं होता। उसके दो रूप दिख रहे हैं तुमको, तो माने वो दोनों रूप क्या है वास्तव में? एक। तो शिव और शक्ति क्या हुए फिर? ब्रह्म और माया क्या हुए? एक हुए। लेकिन वह दो हमें इसलिए दिखते हैं क्योंकि हम माया को समझते नहीं। जो माया को समझ गया उसके लिए माया बचती नहीं, माया मिट जाती है। मिट जाती है माने क्या हो जाती हैं? मार नहीं डाला, अब वह ब्रह्म से एकाकार हो गई, उसका ब्रह्म से अब सायुज्य हो गया। समझ में आ रही है बात?

तो माया को कैसे देखना है? ब्रह्म को जब तुम नहीं समझ पाते तो ब्रह्म ही तुम्हारे सामने माया होकर प्रकट होता है। क्योंकि ब्रह्म अप्रकट हो, ऐसा तो हो नहीं सकता। ब्रह्म के अतिरिक्त कुछ है नहीं, सत्य के अतिरिक्त कोई दूसरा तो हो नहीं सकता। लेकिन ब्रह्म क्या है? यह चीज़ तुम्हारी दृष्टि में धुँधली हो सकती है अगर तुम बेहोश हो, अगर तुम अज्ञान की गिरफ़्त में हो। और जब ब्रह्म तुम्हें स्पष्ट नहीं होता, क्योंकि तुम अज्ञान द्वारा आवृत्त होते हो, जब तुम अहंकार के पाश में होते हो, तो ब्रह्म ही तुम्हें माया सा प्रतीत होता है। अब लेकिन अब फँस तो गए ही हो। ब्रह्म से तो दूर हो गए, अपनी ही करनी, अपनी ही करतूत अपना ही चुनाव, तो अब इसी माया का सहारा लेकर, इसी माया की उपासना करके, इसी माया को समझ करके फिर ब्रह्म तक पहुँचते हैं। मानो भटके हुओं को रास्ता दिखाने के लिए ब्रह्म स्वयं माया बन गया हो।

तुम ऐसे भी कह सकते हो माया वो है जो तुम्हें भटकाती है या ऐसे भी कह सकते हो कि माया वो है जो तुम्हें ब्रह्म तक ले जाती है। वह तुम पर निर्भर करता है, भाई कि तुम्हारा भटकते रहने का इरादा है या ब्रह्म तक जाने का इरादा है। तुम्हारा भटकने का ही इरादा है तो तुम माया की निंदा-भर्त्सना करते रहो। और जिनका ब्रह्म तक जाने का इरादा होता है, वे फिर माया को देवी मानकर पूजते हैं। पूजने का क्या मतलब है? कि भिन्नता मैं देखूँगा ही नहीं, मैं देवी को ही ब्रह्म मान लूँगा। मैं देवी को ऐसा याद रखूँगा कि ब्रह्म भी मुझे भूल जाए। क्योंकि अगर ये दोनों अलग-अलग दिख रहे हैं तो भी तो तुम फँसे ही हुए हो न?

मुक्ति का फिर तरीका ही यही है कि माया को ही ब्रह्म मान लो। मानना माने मैं यहाँ पर किसी अंधविश्वास की बात नहीं कर रहा हूँ, यहाँ मैं एक बड़ी ज़बरदस्त आंतरिक समझदारी की बात कर रहा हूँ जो कहती है कि मेरे पास इसके अलावा विकल्प ही क्या है मुक्ति का। जंगल में यदि फँसा हुआ हूँ मैं तो जंगल से हो करके ही रास्ता जाता है जंगल से मुक्ति का। भीतर की अगर गहरी काली रात में फँसा हुआ हूँ मैं तो प्रतीक्षा नहीं कर सकता मैं कि अपने-आप कोई सूर्य उदित होगा, मुझे इसी काली रात के मध्य, रात से ही सहारा माँग करके आगे बढ़ते रहना है। रात में तुम्हें सहारा भी कौन देने आएगा? रात ही तो सहारा देगी न? कभी कोई छोटा सा तारा टिमटिमा देगा, कभी चंद्रिका तुम्हारा मार्ग प्रशस्त कर देगी।

तो माया से ही सहारा माँगना है। माया सहारा देती है। यही बात हमें अभी दुर्गा सप्तशती में भिन्न-भिन्न तरीकों से स्पष्ट होने वाली है।

प्र: आचार्य जी, तो फिर सत्संगति और ग्रंथ भी एक प्रकार से दूसरी माया है, जिनके बारे में कबीर साहब ने बात करी थी, वो वही हुए। तो माया को पूजने का जो आपने अर्थ कहा है वो वही है जो दूसरी प्रकार की माया है?

आचार्य: देखो, समझो‌। समय, काल, आकाश, मन, भाव, विचार, इनकी परिधि में जो कुछ भी आता है, सब माया है। तो उपनिषद् भी, मैं बहुत-बहुत विचार से कह रहा हूँ, उपनिषद् भी हैं तो माया ही। पर वो, वो माया है जो तुम्हें माया के पार ले जाएँगे। यह होता है माया से सम्यक संबंध, कि पुस्तक हाथ में उठानी है। जितनी पुस्तके हैं दुनिया की, सब माया हैं क्योंकि सब पुस्तकों में मनुष्य मात्र के विचार इत्यादि ही हैं। प्रश्न यह उठता है कि कौन सी पुस्तक?

तो माया का इस प्रकार से वरण करना है कि वह तुमको ब्रह्म तक पहुँचा दे। इसी तरीके से जितने नर-नारी हैं, सब मायावी हैं। जितनी जगहें हैं, सब मायावी हैं। फिर क्यों कोई पुरुष विज्ञ कहलाता है, विप्र कहलाता है, श्रेष्ठ कहलाता है, वरणीय कहलाता है? क्यों पृथ्वी पर कोई जगह तीर्थ कहलाती है? क्यों? सब माया है। माया दो प्रकार की है।

यह भेद, यह विवेक ही तुम्हारे जीवन का निश्चय कर देता है, तुम्हारी गति निर्धारित कर देता है—तुमने माया में भी चुना किसको? मैंने ही कहा था न एक दफ़े: ‘न अच्छा है, न बुरा है संसार, समझ गए तो रास्ता, न समझे तो दीवार’। तुम्हें रास्तों का चयन करना है, दीवारों का नहीं।

उन जगहों का, उन लोगों का, उन पुस्तकों का, उन परिस्थितियों का, उन भावों का, उस अंतःस्थिति का चयन करो जो तुम्हारे लिए रास्ता बन जाए। न भीतर से, न बाहर से कुछ भी ऐसा मत चुनो जो तुम्हारे लिए दीवार बनेगा। यह बात है। न बाहर कुछ ऐसा चुनो, न अपने भीतर कुछ ऐसा चुनो। इन दोनों में भी, भाई, एक साम्य है न। बाहर जिसको चुनते हो भीतर का माहौल बना देता है‌, भीतर जिसको चुनते हो वो बाहर का निर्धारण कर देता है। बाहर तुम संगति चुनते हो, भीतर तुम अपनी अवस्था चुनते हो कि मुझे किस विचार को ऊर्जा देनी है, किस भावना को ईंधन देना है। इन दोनों का ही चयन बड़े विवेक से करो।

प्र३: आचार्य जी, चुनने की स्वतंत्रता हमारे पास होती है संसार में, तो संसार में ऐसा क्या है कि कुछ चीज़ें चुनने पर हम लोग दूर हो जाते हैं अपनी शांति से और कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं कि जिसको चुनने से हम लोग शांति के करीब जाते हैं?

आचार्य: इसका कोई उत्तर नहीं है। इसका उत्तर यही है कि बड़े अचेतन तरीके से आप चुनाव कर रहे हो, और चूँकि आप जानते ही नहीं कि आपने चुनाव क्यों करा तो फिर आप बड़े आश्चर्य में भरकर पूछते हो कि हम गलत चुनाव क्यों करते हैं? क्योंकि आप अचेतन हैं। तो हम अचेतन हुए ही क्यों? क्योंकि आप इस क्षण भी अचेतन हैं। अगर आप इस क्षण सचेत होंगे तो आप यह नहीं पूछेंगे कि हम अचेत क्यों हुए, इस क्षण आप पूछेंगे कि मुझे तुरंत बताओ कि मैं अभी सचेत कैसे हो सकता हूँ। जो व्यक्ति बार-बार यह पूछने जाए कि अच्छा, मुझे बताओ कि मैं अचेत कब, क्यों और कैसे हुआ था? तो अभी उसकी अचेत बने रहने में बड़ी रूचि है, बहुत रूचि है। अगर उसका मन ठीक होता तो अभी वह यह सवाल नहीं पूछता कि मुझे बताओ कि मैं अचेत क्यों हुआ था। वह तो कहता कि क्या मैं तत्काल सचेत हो सकता हूँ? हो सकता हूँ तो हो जा रहा हूँ न, आगे-पीछे की क्या पूछूँ। वह सब तो सपने की, बेहोशी की बात थी।

कोई बार-बार यह पूछे कि बताओ सपने में क्या हुआ था, कब हुआ था, सपने में किस गली में गए थे, किस नंबर के मकान में घुस गए थे, तो क्या यह कोई पूछने की बातें हैं? जो हुआ था, सपने में हुआ था। क्या तुम्हें जागरण से प्रेम भी है। जागरण से प्रेम होगा तो यह कोई पूछने की बात नहीं कि पीछे क्या था, कैसे था, हमने गलत चुनाव क्यों किए? पीछे तुमने गलत चुनाव क्यों किए, यह बात तुम्हें अभी स्मरण भी इसलिए है क्योंकि तुम अभी भी सही चुनाव नहीं करना चाहते। ठीक अभी सही चुनाव करो, बस इतना मायने रखता है और कुछ नही।

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