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भीतर और बाहर के दैत्यों के संहार का वास्तविक अर्थ || श्रीदुर्गासप्तशती पर (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जिस तरह से दैत्यों की सेना के बारे में बताया है कि बहुत शक्तिशाली हैं, बहुत सारे सैनिक हैं, तो ये क्या जो हमारी वृत्तियाँ हैं, उनकी शक्तियों के बारे में बताया जा रहा है?

आचार्य प्रशांत: बिल्कुल वही है, बिल्कुल वही बात है।

प्र: उनकी शक्ति के आगे देवी ही हैं जो उनका सामना कर सकीं। तो देवी के प्रकट होने का क्या मतलब है? वृत्तियाँ तो हमेशा हमारे अंदर रहती हैं, तो देवी के प्रकट होने का क्या मतलब है?

आचार्य: आपके भीतर जो भी अच्छाइयाँ हैं, जो भी सद्गुण हैं, उनके ऊपर से यह भार हटाइए कि वो आपके अहंकार की रक्षा करने में प्रयुक्त रहें। उदाहरण के लिए, आपके पास बुद्धि है, बुद्धि भी देवी का एक रूप है, दैवत्व का एक रूप है; बुद्धि के ऊपर से यह ज़िम्मेदारी बिल्कुल हटा दीजिए कि बुद्धि आपके अहंकार की रक्षा करे। बुद्धि का प्रयोग दोनों चीज़ों के लिए हो सकता है न – अहंकार की रक्षा के लिए, सत्य की साधना के लिए या सत्य के शोध के लिए।

आपके पास धैर्य है, धैर्य के ऊपर से यह कर्त्तव्य बिल्कुल हटा दीजिए कि तुझे मेरे रेत के पुतले को बचाने के लिए प्रयुक्त होना है। आपके पास जो कुछ भी है, उसको बस एक कर्त्तव्य दीजिए, कि तुझे धर्म की, चेतना की, सत्य की जीत के लिए अभियान करना है। तब देवी प्रकट होती हैं। देवी ऐसे ही प्रकट हुई हैं न?

सब देवताओं ने अपनी-अपनी शक्ति एकीकृत कर दी तो देवी प्रकट हो गईं। सब देवताओं ने कहा, “हमारी व्यक्तिगत सत्ता को बचाने के लिए हमारी शक्ति की कोई ज़रुरत नहीं, हम अपनी ऊँची-से-ऊँची शक्ति दे रहे हैं किसी निर्वैयक्तिक अभियान के लिए। अब हम पीछे हुए, हमारा अभियान आगे हुआ। हम छोटी चीज़ बने, हमारा काम बड़ी चीज़ हुआ।”

"तो हम अपनी सारी ताकतों के ऊपर से यह ज़िम्मेदारी हटाते हैं कि वो हमारे रेत के पुतले की रक्षा करें। हम हमारी सारी ताकतों को बस एक ज़िम्मेदारी देते हैं। हम अपने ज्ञान को अब यह ज़िम्मेदारी नहीं दे रहे हैं कि हमारा ज्ञान हमारे अहंकार को बचाने के काम आए। हमारे ज्ञान के पास बस अब एक ज़िम्मेदारी है – धर्म को आगे बढ़ाओ। हमारे बल के पास अब यह ज़िम्मेदारी नहीं है कि हमारा अहंकार बचाओ। बल के पास अब क्या ज़िम्मेदारी है? सत्य की सेवा में नियुक्त रहो।"

जब आप अपनी सारी शक्तियों को बस एक लक्ष्य के लिए तैनात कर देते हैं, नियुक्त कर देते हैं, तो देवी का जन्म हो जाता है।

प्र: आचार्य जी, जो देवी का युद्ध बताया गया है तो उसमें जो धर्म की रक्षा है, उसका मतलब क्या है? वृत्तियों के ख़िलाफ़ ही लड़ना या कोई बाहरी चीज़ भी है जिससे लड़ना है?

आचार्य: देखिए, मूल रूप से तो वही है, वृत्तियों को मारना ही। लेकिन अंदर आपके जो कुछ है, उसका सम्बन्ध बाहर से भी होता है। आपके सिर पर कोई चढ़कर बैठा हुआ है जो बलपूर्वक आपसे अधर्म कराता है। अब पहली बात यही है कि अपने भीतर उस लोभ को या भय को आप मार दें जिसके कारण आपको उस अधर्मी के सामने झुकना पड़ता है। लेकिन भीतर के उस अधर्मी को मारने भर से काम पूरा नहीं हो जाएगा, क्योंकि आपने अपने भीतर वाले को मार दिया, चलिए अच्छी बात है, लेकिन जो बाहर अधर्मी है, वह दूसरों से फिर अधर्म कराएगा।

तो भीतर वाले के साथ-साथ बाहर वाले का भी संहार करना पड़ता है। दोनों में सबसे पहले तो निश्चित रूप से भीतर वाला ही है। पहले तो भीतर का जो दैत्य है, उसको ही मारना होगा, लेकिन स्थितियाँ वो भी जीवन में आती हैं जब भीतर के दैत्य के साथ-साथ बाहर के दैत्य का भी संहार करना पड़ता है।

प्र२: आचार्य जी, कई बार ऐसा होता कि आप बाहर कोई सही काम कर रहे हो। और जो रेत के पुतले की आपने बात कही थी, अहंकार की, वह काम करते समय बार-बार आप पर हावी होता है। तो कई बार ऐसा होता है कि उस काम के प्रति उदासीनता शुरू हो जाती है। उसका क्या उपाय है?

आचार्य: देखो, ज्ञान ही काम आएगा। उस वक्त तो यह ज्ञान ही आपके काम आएगा कि आप किसी ऐसी चीज़ को बचाने में अपनी ऊर्जा लगा रहे हो जो बचाई जा नहीं सकती। और आप किसी ऐसी चीज़ को बचाने का अवसर गँवा रहे हो जिसको बचाना अति आवश्यक है। इस ज्ञान के अलावा क्या आपकी मदद कर सकता है? हाँ, यह ज्ञान आपको याद रहे सही समय पर, तो आप इसके लिए कोई उपाय अवश्य कर सकते हैं। अंतिम मदद तो ज्ञान से ही मिलनी है न।

प्र१: आचार्य जी, जैसा इस कहानी में बताया गया है कि देवी और दैत्यों का जो युद्ध हो रहा है, वह बहुत ही घमासान युद्ध है। देवी बहुत तेजी से राक्षसों का संहार कर रही हैं, पर फिर भी यह बहुत लम्बा चला। तो देवी जैसा बल, ऊर्जा और साथ में लम्बा समय भी, तो यह बल, यह ऊर्जा लगातार कायम रख पाना और इतने लम्बे समय तक, क्या ये दोनों असली जीवन में संभव है?

आचार्य: देखो, ये जो दैत्य हैं न, इन्हें भी वास्तव में ऊर्जा वहीं से मिल रही है जहाँ से देवी का जन्म हुआ है। दैत्य हो ही नहीं सकते थे अगर देवता धर्म को समर्पित होते पूरी तरह। तो देवताओं से ही जन्म है दैत्यों का।

अधर्म या असत्य की अपनी तो कोई सत्ता होती नहीं, वह तो मिथ्या होता है। वास्तविक सत्ता, अस्तित्व तो बस सत्य का ही है।

तो ये दैत्य फिर आ कहाँ से गए इतने सारे, इतने फल-फूल कैसे रहे हैं? इनको जीवन और ऊर्जा कहाँ से मिल रही है? इनको जीवन और ऊर्जा देवताओं से ही मिल रही है। देवताओं का अपना स्वार्थ और अहंकार ही दानव बनकर प्रकट होता है। देवताओं में स्वार्थ न हो, अज्ञान न हो, अहंकार न हो, तो दानव कहाँ से होंगे?

तो देवताओं से ही दानव हैं इसीलिए दानवों में इतनी शक्ति है, और फिर देवताओं से ही देवी हैं। इसीलिए तो ये जो सब दानव हैं, ये देवी के विरुद्ध इतने बल और इतनी ऊर्जा, और इतने भीषण संग्राम के साथ खड़े हो पाते हैं। यह करतूत वास्तव में देवताओं की है। दानवों को बल देवों से ही मिल रहा है, और देव जब सुधर जाते हैं तो हम पाते हैं कि बार-बार दैत्यों का नाश भी होता है। तो यह संग्राम भीषण इसीलिए है क्योंकि यह आपकी ही लड़ाई है आपसे ही। देवताओं से ही दैत्य हैं, देवताओं से ही शक्ति है, लड़ाई तो भीषण होगी न।

आपका ही एक हिस्सा, आपके ही दूसरे हिस्से से लड़ रहा है और वो दोनों ही हिस्से एक ही जगह से अपना पोषण पा रहे, जैसे आपने अपने एक हाथ को दूसरे हाथ से लड़ाया हो। नहीं तो फिर दैत्यों में इतनी शक्ति कहाँ कि वे देवताओं से पाँच हज़ार साल संघर्ष करें, देवी का इतना विरोध करें। देवी का विरोध करते हैं, पर यह भी तो है न कि देवी उनका झट से सफ़ाया भी कर देती हैं, क्यों? क्योंकि देवी के प्रकट होने का मतलब ही यह है कि अब देवताओं ने अहंकार त्याग दिया है। देवताओं ने अहंकार त्यागा नहीं कि दैत्यों का सफ़ाया हो गया।

प्र१: आचार्य जी, इसी सन्दर्भ में आपसे एक बार प्रश्न पुछा था कि ये फूहड़ फिल्में कैसे चलती हैं या समाज में जो भी अजीब बातें हो रही हैं, जो नहीं होनी चाहिए, वो कैसे हो रही हैं, तो आपने कहाँ था कि इनको हम ही फण्ड करते हैं। तो जैसा आपने बताया कि देवता सुधर गए, तो क्या वे वाकई सुधर गए या अभी बहुत मार पड़ी है इसलिए?

आचार्य: वे जितनी देर के लिए सुधर गए। मार पड़नी ज़रूरी होती है न कई बार।

प्र१: आचार्य जी, फिर तो यह नेवर एंडिंग साइकल (कभी न ख़त्म होने वाला चक्र) है।

आचार्य: यह नेवर एंडिंग साइकल है। इसका अंत तो बस मुक्ति में है। जब आप इस खेल से ऊब जाओ, तब आप कहते हो, ‘मुक्ति’। जब तक यह खेल चल रहा है, यही चलता रहेगा।

अभी महिषासुर का वध हुआ, अब सत्ता पुनः देवताओं के हाथ में आ जाएगी। और जहाँ उनके हाथ में आयी, तहाँ उन्होंने फिर से सुरापान आरम्भ किया, फिर से वे मदोन्मत हो गए। सबके पास अपनी-अपनी देवियाँ हैं, रत्न हैं, आभूषण हैं, सम्पदाएँ हैं, राज्य है, अधिकार है। वे फिर उसी में खो गए, सुख-सागर में गोता मारने लगे, और इतनी देर में पीछे से फिर से कोई दैत्य खड़ा हो जाएगा। फिर संग्राम होगा, फिर मारे जाएँगे देवता, फिर आकर कहेंगे, “अरे, अरे, बड़ा नशा चढ़ गया था, देखो, हमारी हार हुई।” फिर किसी को जन्म लेना पड़ेगा किसी शक्ति को, किसी अवतार को दैत्यों के संहार के लिए।

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