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महिषासुर वध से हम क्या सीख सकते हैं? || श्रीदुर्गासप्तशती पर (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: अब हम तृतीय अध्याय में प्रवेश करते हैं। जहाँ पर दूसरे अध्याय का समापन है, तृतीय अध्याय वहीं से आगे बढ़ता है। तो युद्ध चल रहा है विकराल, और एक के बाद एक दैत्य सेनापति आ करके देवी से संघर्ष कर रहे हैं।

चिक्षुर नाम का असुर आता है जो कई तरीके से संग्राम करता है और अंततः देवी के शूल से उसकी मृत्यु होती है। फिर उसके बाद चामर नाम का दैत्य आता है, वह संघर्ष करता है। देवी का सिंह उस चामर के हाथी के मस्तक पर चढ़ बैठता है और उसको मारता है और अंततः चामर का वध भी सिंह ही करता है।

"सिंह बड़े वेग से आकाश की ओर उछला और उसने गिरते समय पंजों की मार से चामर का सिर धड़ से अलग कर दिया।"

फिर कराल नाम का दैत्य आता है, और भी दैत्य आते हैं।

"क्रोध में भरी हुई देवी ने गदा की चोट से उद्धत का कचूमर निकाल डाला। भिन्दिपाल से बाष्कल को और बाणों से ताम्र और अंधक को मौत के घाट उतार दिया। तीन नेत्रों वाली परमेश्वरी ने त्रिशूल से उग्रास्य, उग्रवीर्य तथा महाहनु नामक दैत्यों को मार डाला। तलवार की चोट से बिडाल के मस्तक को धड़ से काट गिराया। दुर्धर और दुर्मुख, इन दोनों को भी अपने बाणों से यमलोक भेज दिया।"

तो इस तरह से महिषासुर की पूरी सेना का संहार हो रहा है। देवी के सामने एक से बढ़कर एक दैत्य आ रहे हैं और देवी किसी को गदा से, किसी को बाण से और किसी किसी को तो बस घंटे की नाद से धराशायी कर रही हैं। कुछ तो ऐसे हैं जो देवी से थप्पड़ खाकर मर रहे हैं। तो ये सब चल रहा है कार्यक्रम।

"इस प्रकार अपनी सेना का संहार होता देख महिषासुर ने भैंसे का रूप धारण करके देवी के गणों को त्रास देना आरम्भ किया। किन्हीं को थूथुन से मारकर, किन्हीं के ऊपर खुरों का प्रहार करके, किन्हीं-किन्हीं को पूँछ से चोट पहुँचाकर, कुछ को सींगों से विदीर्ण करके, कुछ गणों को वेग से, किन्हीं को सिंहनाद से, कुछ को चक्कर देकर और कितनों को श्वास वायु के झोंके से धराशायी कर दिया।"

तो अब महिषासुर क्या बन गया है? भैंसे का रूप ले करके महिषासुर कहता है कि मैं शेर को मारूँगा, जो देवी का सिंह है। तो फिर वह सिंह को मारने के लिए झपटा।

"इससे जगदम्बा को बड़ा क्रोध हुआ। उधर महापराक्रमी महिषासुर भी क्रोध में भरकर धरती को खुरों से खोदने लगा तथा अपने सींगों से ऊँचे-ऊँचे पर्वतों को उठाकर फेंकने लगा। उसके वेग से चक्कर देने के कारण पृथ्वी क्षुब्ध होकर फटने लगी। उसकी पूँछ से टकराकर समुद्र सब ओर से धरती को डुबोने लगा। हिलते हुए सींगों के आघात से विदीर्ण होकर बादलों के टुकड़े-टुकड़े हो गए। उसके श्वास की प्रचण्ड वायु के वेग से उड़े हुए सैकड़ों पर्वत आकाश से गिरने लगे।"

"इस प्रकार क्रोध में भरे हुए उस महादैत्य को अपनी ओर आते देख चण्डिका ने उसका वध करने के लिये महान क्रोध किया। उन्होंने पाश फेंककर उस महान असुर को बाँध लिया। उस महासंग्राम में बँध जाने पर उसने भैंसे का रूप त्याग दिया और तत्काल सिंह के रूप में वह प्रकट हो गया।"

"उस अवस्था में जगदम्बा ज्यों ही उसका मस्तक काटने के लिये उद्यत हुईं, त्यों ही वह खड्गधारी पुरुष के रूप में दिखायी देने लगा। तब देवी ने तुरंत ही बाणों की वर्षा करके ढाल और तलवार के साथ उस पुरुष को भी बींध डाला। इतने में ही वह महान् गजराज के रूप में परिणत हो गया तथा अपनी सूंड से देवी के विशाल सिंह को खींचने और गर्जने लगा। खींचते समय देवी ने तलवार से उसकी सूंड काट डाली, तब उस महादैत्य ने पुनः भैंसे का शरीर धारण कर लिया और पहले की ही भाँति चराचर प्राणियों सहित तीनों लोकों को व्याकुल करने लगा।"

तो इस प्रकार संग्राम चल रहा है, और देवी क्या करती हैं।

"तब क्रोध में भरी हुई जगन्माता चण्डिका बारं-बार उत्तम मधु का पान करने और लाल आँखें करके हँसने लगीं। उधर वह बल और पराक्रम के मद से उन्मत्त हुआ राक्षस गर्जने लगा और अपने सींगों से चण्डी के ऊपर पर्वतों को फेंकने लगा। उस समय देवी अपने बाणों के समूहों से उसके फेंके हुए पर्वतों को चूर्ण करती हुई बोलीं। बोलते समय उनका मुख मधु के मद से लाल हो रहा था और वाणी लड़खड़ा रही थी। देवी बोलीं, 'ओ मूढ़! मैं जब तक मधु पीती हूँ, तब तक तू क्षणभर के लिये खूब गरज ले। मेरे हाथ से यहीं तेरी मृत्यु हो जाने पर अब शीघ्र ही देवता भी गर्जना करेंगे'।"

"यों कहकर देवी उछलीं और उस महादैत्य के ऊपर चढ़ गईं। फिर अपने पैर से उसे दबाकर उन्होंने शूल से उसके कण्ठ में आघात किया। उनके पैर से दबा होने पर भी महिषासुर अपने मुखसे (दूसरे रूप में बाहर होने लगा) अभी आधे शरीर से ही वह बाहर निकलने पाया था कि देवी ने अपने प्रभाव से उसे रोक दिया। आधा निकला होने पर भी वह महादैत्य देवी से युद्ध करने लगा। तब देवी ने बहुत बड़ी तलवार से उसका मस्तक काट गिराया। फिर तो हाहाकार करती हुई दैत्यों की सारी सेना भाग गई तथा सम्पूर्ण देवता अत्यन्त प्रसन्न हो गए।"

बहुत आसान है न इसको किसी आम कथा की तरह सुन लेना, बालकों की भाँति। और बालकथाओं के रूप में भी महिषासुर संग्राम खूब दिखाया जाता है। छोटे बच्चों की कहानियों में दिखा देंगे, कॉमिक्स में दिखा देंगे। छोटे बच्चों को क्या कहें, बड़े-बड़े वयस्क लोग भी इस संग्राम का वास्तविक अर्थ समझने से चूँक जाते हैं, उनको लगता है कि ऐसे ही किसी संग्राम का यह कोई वर्णन है।

जब इसके नाट्य रूपांतरण होते हैं, तब भी तो बस ऐसे ही दिखाते हैं कि एक असुर आ रहा है, देवी से लड़ रहा है, और अंततः देवी उसका वध कर देती हैं। उसके पीछे सन्देश क्या है, उसे समझने में हम आमतौर पर रूचि दिखाते नहीं।

कई रूप लेता है महिषासुर, ठीक वैसे जैसे कई रूप लेता है हमारा अहंकार। अभी थोड़े समय पहले तुमने कहा था न कि चेतना के स्तर होते हैं। मैंने कहा था कि रूप तो बहुत हैं, पर सब रूपों के केंद्र में कौन है? अकृष्णतत्व। महिषासुर इतने रूप लेता है, सब रूपों के केंद्र में क्या है? उसका अधर्म। जितने भी वह रूप ले रहा है, किसलिए ले रहा है? देवी को मारने के लिए ही तो है। तो यह मत कहो कि यह आदमी अब बदल गया है, उसके बदलने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। वह भैंसे से शेर बनता है, शेर से हाथी बनता है, बदल तो वह रहा ही है, पर किसलिए बदल रहा है?

धोखा मत खा जाया करो। किसी को बदलता देखो तो जल्दी से इस निर्णय पर मत आ जाया करो कि यह व्यक्ति सुधर ही रहा है। बदलते तो हम हैं ही, पर अपने दूषित लक्ष्यों की पूर्ति हेतु बदलते हैं। हम इसलिए नहीं बदलते की बदल ही जाएँ, कि केंद्र ही बदल जाए हमारा, कि आधार ही बदल जाए हमारा। हम तो इसलिए बदलते हैं ताकि हमारे आधार को बदलना न पड़े। तो ऊपर-ऊपर से कुछ रंग-रोगन कर दो, कुछ ऊपरी, सतही बदलाव दिखा दो ताकि असली बदलाव न करना पड़े। हमारे बदलाव ऐसे होते हैं।

और देखो कि एक बिंदु पर देवी मधुपान करती हैं, मदोन्मत हो जाती हैं। श्लोक कहते हैं कि उनकी आँखें लाल हो जाती हैं और वाणी लड़खड़ाने लगती है। दैत्य के संहार के लिए, ऊर्जा को आमंत्रण देने के लिए जब मधुपान का प्रयोग हो रहा है तो जैसे वो भी एक पुण्य कर्म हो गया। ये बातें हमारी आम नैतिकता के कितने विरुद्ध जाती हैं न। क्रोध करना, मधुपान करना, हत्या करना, जो कुछ आम नैतिकता में हमें ग़लत बताया जाता है, वर्जित सिखाया जाता है, वो सब कुछ है कथा में।

संदेश क्या है, समझो। कुछ भी अपने-आपमें अच्छा या बुरा नहीं होता। वह अच्छा है या बुरा है, उसका निर्धारण ऐसे होगा कि उसका प्रयोग कौन कर रहा है, किस हेतु कर रहा है और किस केंद्र से प्रयोग किया जा रहा है। अस्त्र देवी के पास भी है, अस्त्र दैत्य के पास भी है, अस्त्र अच्छा है या बुरा है? न अच्छा है, न बुरा है, जिसके हाथ में है, वैसा है।

क्रोध अच्छा है या बुरा है? देवी का क्रोध अच्छा है, दैत्य का क्रोध बुरा है। प्रश्न यह मत करो कि क्रोध की क्या बात है, प्रश्न यह करो कि कौन कर रहा है क्रोध, किसके ऊपर कर रहा है क्रोध। कृष्ण भी क्रोध कर रहे थे भीष्म के ऊपर, बल्कि अर्जुन के ऊपर। प्रतिज्ञा तोड़ देना अच्छी बात है? कृष्ण अगर प्रतिज्ञा तोड़ दें तो अच्छी बात है, तुम तोड़ दो तो बुरी बात है। कृष्ण जो भी करेंगे, अच्छा होगा। कृष्ण प्रतिज्ञा का पालन करें, बहुत अच्छी बात है, कृष्ण प्रतिज्ञा तोड़ दें, वह भी अच्छी बात है। वो कृष्ण हैं न, वो जो भी करेंगे, अच्छा होगा।

आप कहेंगे, “यह क्या बात हुई?” नहीं, ऐसा ही है, भाई। आप कहोगे, “कानून तो सबके लिए बराबर होता है।” नहीं, नहीं होता है, जो कानून सबके लिए बराबर होता है, वह निश्चित अँधा होता है। अंधे के लिए ही सब कुछ बराबर होता है, सब अँधेरा है, सब बराबर है। कृष्ण ने प्रतिज्ञा का पालन किया, बहुत अच्छा करा, कृष्ण ने प्रतिज्ञा तोड़ दी, बहुत अच्छा करा। क्यों? क्योंकि कृष्ण ने करा। कर्ण भी तो अपनी प्रतिज्ञा का पालन ही कर रहा था, बहुत बुरा कर रहा था। कृष्ण प्रतिज्ञा का पालन करें, बहुत अच्छी बात है; कर्ण प्रतिज्ञा का पालन करे, बहुत बुरी बात है।

तुम अगर कृष्ण नहीं हो तो तुम जो भी करोगे, वह ग़लत ही होगा। दाएँ चलोगे, वह भी ग़लत, बाएँ चलोगे, वह भी ग़लत। तुम कहोगे, “यह कैसी बात है? हम पहले जैसे थे, उसके विपरीत हो गए, अब तो हम अच्छे हो गए न?” न, तुम पहले दाएँ चलते थे, तुम अब बाएँ चलते हो, लेकिन पहले भी तुम्हीं चलते थे, अब भी तुम्हीं चलते हो। तुम बदले कहाँ हो? तुम तो तुम्हीं हो। कर्म भर बदल दिए हैं, कर्ता नहीं बदला है।

और यह जो बात अभी हम कह रहे हैं, यह ख़तरनाक है। ख़तरनाक इसलिए क्योंकि अगर ग़लत कानों में यह बात पड़ गई, ग़लत हाथों में यह सिद्धांत पड़ गया तो तुम इसका दुरुपयोग करोगे। तुम कहोगे कि कुछ भी बुरा नहीं होता न। देखो, देवी भी तो मधुपान कर रही हैं, वो बुरा नहीं है तो हम भी मधुपान कर रहे हैं। तुम देवी हो? देवी मधुपान करें तो भी ठीक है, तुम मधुपान न भी करो तो भी ठीक नहीं है। देवी मधुपान करे तो भी ठीक है और तुम तो कुछ भी खान-पान करो, सब ग़लत है क्योंकि तुम तो जो भी कुछ खा पी रहे हो, वो सब कुछ तुम्हारे अहंकार को पोषण देने में जा रहा है।

तो यह तर्क मत देने लग जाना कि देखो हमारे तो ग्रन्थों में ही क्रोध का, और मधु का, और हत्या और हिंसा का उल्लेख है तो इसीलिए हम भी क्रोध करते हैं, और हिंसा और हत्या करते हैं। नहीं, नहीं साहब, आप क्रोध करेंगे तो ग़लत है। मैं तो एक बात आगे की कह रहा हूँ, आप क्रोध नहीं करेंगे तो भी ग़लत है, क्योंकि आप ही ग़लत हैं।

आप यह न कहिएगा कि आप क्रोध करेंगे तो आपने ठीक किया। हम तो कह रहे हैं कि क्रोध करें या न करें, आपने कुछ ठीक नहीं किया क्योंकि आप ही ग़लत हैं। जब आप ग़लत थे, जब क्रोध नहीं करते थे, क्रोध न करते हुए भी आप ग़लत थे तो क्रोध करते हुए आप सही कैसे हो जाएँगे। आप क्रोध करने से गलत नहीं हुए, आप तो ग़लत तब भी थे जब आप क्रोध नहीं करते थे।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, इस पूरे दृष्टान्त में जब भी देवी प्रकट होती हैं तो काफ़ी तेज़ दिखाया जाता है, और देवी का प्रकट होना तभी दिखाते हैं जब देवों द्वारा बुलाया जाता है। तो अगर जीवन में तेज़ नहीं है अर्थात देवी नहीं हैं तो क्या यही मतलब है कि अंदर के देव बुला नहीं रहे हैं? और तेज़ जो था वह दुर्योधन के जीवन में भी था, तो क्या उसके जीवन में जो तेज़ था, वह देवी नहीं, वह कुछ और था?

आचार्य: वह ऐसा है, जैसे तुम कहो कि किसी व्यक्ति के पास कभी रूपया-पैसा बिल्कुल पाया नहीं जाता। जैसे तुम कह रहे हो न कि तेज़ नहीं है, वैसे ही मैं उदाहरण ले कर समझा रहा हूँ कि मान लो कोई व्यक्ति जिसके पास पैसा नहीं है। और फिर तुम्हें पता चले कि नहीं, यह तो हर महीने अच्छा पैसा कमाता है पर पैसा कभी इसके पास होता नहीं। इसका क्या मतलब है? कमाता हर महीने अच्छा है लेकिन जब भी उसके पास जाओ तो सही में उसके पास पैसा नहीं होता, इसका मतलब क्या है?

वह एक बहुत मोटी किश्त भर रहा है। उसने कोई ऐसी चीज़ कर्ज़ ले रखी है जिसमें उसका सारा पैसा, माने सारा तेज़, लगातार व्यय होता रहता है। है तो बहुत कुछ, पर जितना है सब उधर को जा रहा है। एक तारीख़ को एक लाख आता है, दो तारीख़ को नब्बे हज़ार उधर निकल जाता है। अहंकार बढ़ाने-चढाने के लिए बड़ा भारी महल कर्ज़ पर खरीद रखा है, उसकी किश्त चुकाते हैं।

जिसके जीवन में तेज़ नहीं है, ऐसा नहीं कि उसके पास मूलतया तेज़ नहीं है। उसके पास जो तेज़ था, उसका सारा इस्तेमाल वह अपने रेत के पुतले की किश्त चुकाने में करता है। है तो बहुत कुछ, पर दिखाई बिल्कुल नहीं देता, ज़रा भी दिखाई नहीं देता, क्योंकि सब किश्त में बह जाता है।

जिस भी व्यक्ति को तुम निस्तेज़ पाओ, समझ लो कि बड़ा अहंकारी है। उसको आत्मा से जो तेज़ प्राप्त हो रहा है — और आत्मा से तेज़ सभी को प्राप्त होता है — आत्मा से उसको जो तेज मिल रहा है, उसको पूरा का पूरा खर्च कर देता है अपने रेत के पुतले को बचाने में।

तो फिर जब तुम देखते हो उसका जीवन, उसका चेहरा, उसकी आँखें, तो वहाँ कोई तेज़ दिखता नहीं। वो गया कहाँ? वो जो पीछे पुतला था, उसको बचाने में लग गया सब। हाँ, अब तुम पुतले की तरफ़ जाओगे और देखोगे तो वहाँ तुम बड़ा तेज़ पाओगे, जैसे तुम कह रहे थे न कि दुर्योधन के पास बड़ा तेज़ था। अहंकार के तल पर बहुत तेज़ था उसमें।

यह व्यक्ति खुद सड़क पर भले ही घूम रहा हो फटी जेब लिये, जेब में सौ रूपया भी मुश्किल से निकलता हो, लेकिन वो जो इसका कर्ज़े का महल है, उसको जाओगे देखोगे तो वहाँ बड़ी रौनक रहेगी। वैसे ही हम होते हैं, जीवन हमारा निस्तेज़ और दरिद्र होता है और जो हमारे अहंकार का जो महल होता है, उसमें बड़ी रौनक, रौशनी रहती है। बस वह जो महल है, वह रेत का है। तुमने रेत के महल में झाड़-फानूस लगवाए हैं, शैंडेलियर लगवाए हैं, सुनहरे रंग करवाया है। कहाँ?

और वो सुनहरे रंग, और उस झाड़-फानूस और उस साज़-सज्जा, उन सबकी कीमत तुमने अपने खून से, अपने जीवन से अदा करी है। किसी ने जैसे ज़िन्दगी भर अपना समय लगाया हो, अपनी ऊर्जा लगाई हो, खून बहाया हो, इसलिए ताकि वो अपने रेत के महल में साज़-सज्जा कर सके। इस व्यक्ति पर तुम्हें दया नहीं आएगी? यह व्यक्ति तुम हो। ज़िन्दगी भर मेहनत करी, करी, करी, करी, करते ही जा रहे हैं, करते ही जा रहे हैं, किसलिए? रेत के महल की चौथी मंज़िल पर रत्न जड़ित बाथ टब लगवाने के लिए। रेत के महल की चौथी मंज़िल पर रत्न जड़ित बाथ टब लगवाया है। पूरी ज़िन्दगी को बेच करके वह बाथ टब आया है।

क्या होगा, क्या होगा? नहाओगे कभी उसमें? नहा कभी नहीं पाओगे। हाँ, ज़िन्दगी पूरी गँवाओगे। पहले उसको लाने में गँवाओगे, और फिर जब उसमें नहाने जाओगे, तब और गँवाओगे।

प्र२: आचार्य जी, प्रथम अध्याय में जैसे बताया गया था कि विष्णु भगवान जब निद्रा में थे तो मधु और कैटभ दो राक्षस पैदा हो गए। तो ये क्या वैसे ही है जैसे बेहोशी में बच्चा पैदा हो गया? या ऐसा कुछ काम हो गया फिर उसके जो परिणाम होते हैं, वो बहुत घातक होते हैं। फिर देवी को आना पड़ता है।

आचार्य: बिल्कुल ठीक है।

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