प्रश्नकर्ता: आचार्य जी अकेलापन महसूस करती हूँ और पुरानी बातें याद आती हैं। इस पर आपने कहा था कि विद्रोह पूर्ण करना पड़ता है। हम जहाँ रहते हैं, जहाँ काम करते हैं, ये सारी जगह एक होती हैं तो विद्रोह पूर्ण करना पड़ता है। माताजी के गुजरने और घर के खराब माहौल के कारण हिम्मत जुटा कर अब मैं अपने घर से अलग रह रही हूँ, एक अलग जगह पर काम भी कर रही हूँ और चीज़ें कुछ बेहतर हो रही थी। मैं वीगनिज़म (विशुद्ध शाकाहार) के लिए कुछ करना चाहती थी। मैंने उसके लिए भी कुछ रिसर्च करना शुरू किया था। संस्था में काम करने के लिए भी मैंने अप्लाई किया था। इन सबके बीच मेरा एक रिलेशनशिप (सम्बन्ध) भी था जो कुछ दिनों पहले ही टूट गया।
इस रिश्ते में मेरे उन्हें समझाने पर उन्होंने माँसाहार छोड़ दिया था। वो चमड़े के उत्पाद उपयोग करते थे वो उपयोग करना उन्होंने छोड़ दिया था। कहीं-न-कहीं एक उम्मीद थी कि एक अच्छा रिश्ता बन सकता है। पढ़ाई वगैरह की चीज़ों में मैं मदद कर दिया करती थी। लगभग एक साल हम साथ रहे। लेकिन कुछ दिनों पहले उन्होंने मुझे यह कहकर छोड़ दिया कि मेरे पास तुम्हारे लिए समय नहीं है। यह सम्बन्ध मुझे बोझ लगता है और किसी ऐसी जगह काम करने के लिए मैं जा रहा हूँ जहाँ मानव तस्करी और उससे सम्बन्धित काम होता है। और उसके लिए मुझे अपनी पहचान छुपाकर रखनी पड़ेगी। और मैं तुमसे बातचीत नहीं कर पाउँगा, मिल नहीं पाउँगा तो आगे जाकर चीज़ें खराब ही होनी थी इसलिए इससे अच्छा है कि मैं अभी ही सब कुछ खत्म कर रहा हूँ।
उन्होंने यह कहा कि मैं अपनी ज़िंदगी की हर चीज़ से तंग आ चुका हूँ। मैंने आपकी विडियोज़ उनके साथ साझा की, किताबें भी दी थी लेकिन एक भी वीडियो उन्होंने देखी नहीं, एक भी किताब उन्होंने पढ़ी नहीं। उनका ये कहना था कि तुम्हारा यहाँ सत्र में जाना भी मुझे बहुत अजीब लगता है।
मेरा मन फिर से अकेला महसूस कर रहा है। ऐसा लगता है कि वो साथ रहने की कोशिश कर सकते थे, छोड़ना जरूरी नहीं था।
मेरा मन हमेशा चाहता है कि कोई हो साथ में। एक सुन्दर और सच्चे रिश्ते की कमी हमेशा महसूस होती है। ऐसे में मैं अपने मन को कैसे समझाऊँ कि सही काम करने पर ध्यान दे और बगल में किसी पुरुष का होना जरूरी नहीं, अकेले भी जिया जा सकता है एक सुन्दर लक्ष्य के लिए।




