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नौकरी के निर्णय - कुछ लोगों को लालच से ज़्यादा आज़ादी प्यारी होती है
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, हमे अपने कैरियर का चुनाव किस आधार पर करना चाहिए? क्या हमें अपना कैरियर अपने व्यक्तित्व के आधार पर चुनना चाहिए या जिसमे रुचि हो और सफलता मिले उस आधार पर?

आचार्य प्रशांत: नहीं, आमतौर पर हम, जिसे कैरियर कह रहे हैं, वो चुनते ही ऐसे हैं कि देख लेते हैं कि अर्थव्यवस्था में कौन-कौनसे क्षेत्र हैं जिनमें रोटी-पानी का जुगाड़ हो सकता है, जिनमें नौकरियाँ मौजूद हैं या व्यवसाय की संभावना है। और फिर उनमें से जहाँ हमारी गुंजाइश बैठ रही होती है, या जहाँ हमें ज़्यादा लाभ और सुविधा दिखाई दे रहा होता है, हम उधर घुस जाते हैं। ठीक है न? आमतौर पर हमारा तरीका यह होता है।

तरीका ही यह है कि बाहर देखकर के तय करो कि क्या काम करना है। वो आसान तरीका है न। बाहर तुम्हारे आठ तरह की थाली रखी हुई है, तुम्हें उसमें से कोई उठा लेनी है। इतना तो पक्का ही है कि जो भी थाली उठाओगे, उसमें कुछ खाने का मौजूद होगा। तो आदमी को सुविधा लगती है। कहता है, “ये आठ पकी पकाई थालियाँ रखी हैं। ये आठ पके पकाए जो क्षेत्र हैं अर्थव्यवस्था के, वो तैयार हैं मुझे नौकरी देने के लिए। मैं इनमें से किसी को भी चुन लेता हूँ। मैं किसी को भी चुनूँ, एक चीज़ तो निश्चित और साझी रहेगी, क्या? पैसा आता रहेगा। एक सुव्यवस्थित नौकरी तो तैयार ही है। एक पूरा क्षेत्र पहले से ही निर्मित खड़ा है जहाँ रूपए-पैसे का आदान-प्रदान हो रहा है, काम धंधा चल रहा है।" हम ऐसे चलते हैं क्योंकि यह रास्ता सुविधा का है।

जो दूसरा रास्ता है, जो असली है, लेकिन जिसमें थोड़ी असुविधा है, वह यह है कि तुम देखो कि तुम्हारे मन की जो हालत है, जैसा तुम्हारा व्यक्तित्व है, और दुनिया का जो हाल-चाल है, कौनसे काम की ज़रूरत है। ज़रूरत-आवश्यकता — अभी तुम उसमें यह नहीं देख रहे हो कि कौन-कौनसा काम करने के लिए उपलब्ध है। तुम्हारा पैमाना बदल गया है। जो तुम्हारा मापदंड है, जो तुम्हारा क्राइटेरिया है वह बदल गया है। अब वह यह नहीं है कि उपलब्धता; “उपलब्धता किन-किन नौकरियों की है भाई? देखना जरा, यह पाँच वैकेंसी निकली हैं।”

'उपलब्धता' नहीं है अब पैमाना, अब पैमाना है 'आवश्यकता'। अब आप यह नहीं देख रहे कि कौनसी नौकरियाँ मिल रही हैं, अब तुम यह देख रहे हो कि कौनसा काम आवश्यक है किया जाना, चाहे दुनिया के लिए, चाहे अपने लिए। लेकिन जो काम आवश्यक है किया जाना, उसमें तो यह कतई आवश्यक नहीं कि नौकरी उपलब्ध हो।

वह काम ज़रूरी है कि किया जाए, लेकिन यह तो बिलकुल भी आवश्यक नहीं कि वह काम करने के तुम्हें कोई पैसे देगा। क्योंकि वह कोई ऑर्गेनाइज्ड सेक्टर (व्यवस्थित क्षेत्र) तो है नहीं अर्थव्यवस्था का कि तुम कहो, “ठीक है, अब हम इस क्षेत्र में काम-धंधा शुरू कर देते हैं, या नौकरी की अर्ज़ी डाल देते हैं।”

तो यह जो है असंतुलन आ जाता है। यहाँ बात बेमेल हो जाती है। जहाँ उपलब्धता है काम की, तुम पाते हो वह काम तुम्हारे लिए आवश्यक नहीं, गैर-ज़रूरी है। और जो काम आवश्यक है तुम्हारे लिए, तुम पाते हो कि उन कामों में नौकरियाँ उपलब्ध ही नहीं हैं।

उस तरह का कोई क्षेत्र, हो सकता है अर्थव्यवस्था में हो ही ना। यह तो छोड़ दो कि उस क्षेत्र में नौकरी नहीं है, यह भी छोड़ दो कि उस क्षेत्र में कंपनी नहीं है, यह भी हो सकता है कि वैसा अर्थव्यवस्था में कोई क्षेत्र ही ना हो। अब आप कह रहे हैं, “लो, बड़ा चिंतन-मनन करा और यह बात समझ में आई कि दुनिया में कौनसा काम करने लायक है, करना ज़रूरी है, लेकिन जो काम करना ज़रूरी है उसमें नौकरी तो छोड़ दो वह सेक्टर ही नहीं विद्यमान है।”

तब क्या करना पड़ेगा? तब मेहनत करनी पड़ेगी। तब यह नहीं इंतजार करना होगा कि वहाँ पर कोई आएगा, अपनी कंपनी बनाएगा, और तुमको नौकरी देगा। तब तुम्हें वहाँ अपने लिए ख़ुद नौकरी तैयार करनी पड़ेगी। और जब अपने लिए ख़ुद नौकरी तैयार की जाती है, तब तुम नौकर नहीं रह जाते। बात आ रही है समझ में?

यह ज़िम्मेदारी का काम हो गया। यह सुविधा का काम नहीं है, यह आरामतलबी का काम नहीं है, इसमें मेहनत लग जाती है। लेकिन तुमको भीतर-ही-भीतर यह परम संतोष रहेगा कि तुम वह कर रहे हो जो आवश्यक है। यही धर्म है, यही अध्यात्म है — वह करना जो आवश्यक है, बजाय इसके कि वह करो जो उपलब्ध है, सुलभ है, सुविधा पूर्ण है। वह तो कोई भी कर लेता है।

अपने लिए काम तैयार करो। और यह वही लोग कर सकते हैं जिनमें लालच कम हो, क्योंकि जो अपने लिए काम तैयार कर रहे हैं, उन्हें कोई आएगा थोड़े ही भरोसा देने, गारंटी देने कि, “भैया तुम अपने लिए काम तैयार करो और अगले साल से महीने का एक लाख गिरने लगेगा।” ऐसा होने नहीं वाला।

जिनको भरोसा चाहिए, जिनको तयशुदा आय चाहिए, उनके लिए यह आवश्यकता वाला रास्ता बंद हो जाता है। या जो लोग बड़े उत्सुक रहते हैं जल्दी से जीवन में खर्चे खड़े कर लेने के लिए, उनके लिए भी यह रास्ता बंद हो जाता है।

अब आप पच्चीस के हुए नहीं, अट्ठाईस के हुए नहीं, परिवार खड़ा कर लिया, पीछे एक बच्चा, दो बच्चा है, पत्नी घर में है, काम करती नहीं। इस तरह की तुमने घर में व्यवस्था चला रखी है। तो अब तुम थोड़े ही वह काम कर पाओगे जीवन में जो आवश्यक है। अब तो तुम वो सारे काम करोगे जो करने के लिए तुम्हारी गृहस्थी और तुम्हारी मजबूरियाँ तुम्हें आदेश देंगी।

तो यह जो रास्ता है, यह मेहनत का है। और यह रास्ता आज़ाद तबीयत के लोगों का है। जो अपने ऊपर बंधन रखकर नहीं चल रहे किसी किस्म के, वही ऐसे काम कर पाएँगे, जो आवश्यक है। बाकियों को सज़ा यह मिलेगी कि वो सब वो काम करेंगे जिसके लिए वो विवश हैं। देख लो, मजबूरी में काम करना है या आज़ादी में करना है।

दुनिया का अजब दस्तूर यह है कि मजबूरी में किए जा रहे कामों में रोकड़ा मोटा मिलता है, और आज़ादी में जो काम किए जा रहे हैं, उसमें कौन इतना बेशर्म है कि अभी रोकड़ा भी माँगेगा? उसको तो इतनी मोटी चीज़ मिल ही गई न, क्या? आज़ादी। आज़ादी मिल गई, साथ में रोकड़ा भी चाहिए! बेशर्मी का काम हो जाएगा।

जो जितना गुलामी का काम कर रहा होता है, वह उतना मजबूर हो जाता है मोटा रोकड़ा माँगने के लिए। कहता है, “यार एक तो तुम बेगारी करा रहे हो, जिंदगी खराब कर रहे हो मेरी, ऊपर से क्या पैसा भी बढ़िया नहीं दोगे? और पैसा निकालो, और पैसा निकालो। पैसा दो न, पैसा!” वो वास्तव में तनख्वाह नहीं, मुआवजा ले रहे होते हैं। “मुआवजा देना, मुआवजा। ज़िंदगी बर्बाद कर रहे हो, तो मुआवजा तो दोगे, कि नहीं, कॉम्पन्सेशन ?"

दो तरह के नोट होते हैं जो अपनी जेब में जाते हैं। एक ऐसे मिलता है जैसे खैरात, और एक ऐसे मिलता है जैसे प्रसाद। मंदिर तुम प्रसाद के लिए थोड़े ही जाते हो, मंदिर तुम जाते हो भगवान के लिए, साथ में प्रसाद मिल जाता है।

जो आदमी ज़िंदगी में सही काम कर रहा होगा, उसको पैसा ऐसे ही मिलेगा, जैसे प्रसाद मिलता है। उसे प्रसाद का लालच थोड़े ही होगा। वह प्रतिमा के सामने इसलिए थोड़े ही गया था कि लड्डू पाएगा। उसका तो मन भर गया है दर्शन से ही, लड्डू तो अतिरिक्त है। वह मिल गया तो बहुत अच्छी बात, नहीं भी मिला होता तो माँग कौन रहा था? “हमें यह काम करने को मिला, यही हमारा अहोभाग्य है। ख़ुशनसीबी है हमारी कि हम यह काम कर पा रहे हैं, साथ में लड्डू भी मिल गया — प्रसाद है भाई, प्रसाद।” और दूसरी तरफ? दूसरी तरफ खेल खैरात का, मुआवजे का, यह सब चलता है।

अब आप मुझसे पूछोगे कि, “आचार्य जी, मुआवजे के क्षेत्र में मेरे पास विकल्प है, चार तरह के मुआवजे — मुआवजा एक, मुआवजा दो, मुआवजा तीन, मुआवजा चार। तो थोड़ा मेरी मदद करिए, कि मैं इनमें से कौनसा चुनूँ?" मैं कहूँगा, यह तुम भला सवाल लेकर आए हो मेरे सामने कि, “आचार्य जी, कोबरा से कटवाऊँ, करैत से कटवाऊँ, वाइपर से कटवाऊँ, या अजगर के मुँह में घुस जाऊँ।” मैं क्या बताऊँ! आज मैं कह रहा था न आईआईएम में कि, 'काम आशिक़ी की तरह होना चाहिए, लव अफेयर , जुनून की तरह कि करने में ही धन्य हो गए, तृप्त हो गए।'

वह कौनसा आशिक़ है, जो दिन भर आशिक़ी करे, और शाम को खड़ा हो जाए, “पैसा देना। वह दिन भर जो तुम्हारे लिए किया है उसका थोड़ा पैसा भी तो दे दो”? इसको तो फिर आशिक़ी नहीं कहते, इसके लिए तो दूसरा नाम होता है न। ज़्यादातर लोग जो अपने-आपको प्रोफेशनल बोलते हैं और काम करते हैं, वो इसी श्रेणी के हैं; गंदा नाम है, गाली जैसा नाम है, भले ही उनको कितना भी पैसा मिलता हो।

(प्रश्नकर्ता को संबोधित करते हुए) जो जवाब तुम चाहते थे, वह तो मिला नहीं। “पता नहीं, क्या बता गए। काम कुछ आएगा नहीं जीवन में। थोड़ा बता देते कि और मसालेदार मुआवजा किस तरीके से मिल सकता है, तो कुछ काम भी आती आपकी बात। वही ढाक के तीन पात — आज़ादी, आशिक़ी। अरे! इनसे किसी का पेट भरता है? दिन भर आशिक़ी करेंगे, तो खाएँगे क्या? यही बात तो ताऊजी समझा गए।” तुम्हें भी ताऊजी जैसी ज़िंदगी बितानी है तो बिताओ।

पैसा आ जाएगा, पहली बात तो यह है। पैसा आ जाता है। काम वह चुनो जो तुम दिल से कर सकते हो बिना पैसे के भी, पैसा आ जाता है। दूसरी बात — खर्चे कम रखो न, ताकि इस तरह की शर्त ना रखनी पड़े कि इतना पैसा तो कम-से-कम चाहिए-ही-चाहिए। तीसरी बात — दुनिया के प्रति थोड़ी उपेक्षा का भाव रखो। दुनिया को बहुत सम्मान मत दिया करो। दुनिया के प्रति थोड़ी कंटेंप्ट (निंदा), थोड़ी अवमानना का भाव रखो। तुम्हारी तीन-चौथाई समस्या तो दुनिया से तुलना करने की है।

तुम्हें मिल भी गया कोई ऐसा काम जो तुम दिल से कर सकते हो, तो तुम्हारी आफत खड़ी हो जाती है कि तुम्हारा भैया लाख-डेढ़ लाख कमा रहा है। और भैया कैसा है जानते तुम बखूबी हो। कहो तो आज तुमको विकल्प दे दें कि तुम्हारी ज़िंदगी भैये की ज़िंदगी से अदल-बदल कर दी जाए। मंजूर है? बोलो, प्रस्ताव स्वीकार है? तब तो कहोगे, “नहीं, नहीं, नहीं, अंदर की बात तो यह है कि मुझे पता है कि मेरा भैया कितना...” अब आध्यात्मिक चर्चा है, नहीं तो उपयुक्त शब्द का इस्तेमाल कर देता मैं।

तुलना करना बंद करो! आधे खर्चे तो हमारे बस इसलिए होते हैं क्योंकि हमें वह सब करना है, जो दूसरे भी कर रहे हैं। फलाना खर्चा, यह सब लोग कर रहे हैं तो मुझे भी करना है। तुम्हें वाकई ज़रूरत है खर्चा करने की? इतना डूबो न काम में कि खर्चा इत्यादि करने का समय ही ना बचे। फिज़ूल-खर्ची के लिए भी तो मोहलत चाहिए न, फिज़ूलखर्ची के लिए भी तो मन खाली चाहिए न? और जितना खर्चा सहज जीवन-यापन के लिए आवश्यक है उतना मिल जाएगा, डरते क्यों हो?

आज आईआईएम में, उन्होंने एंटरप्रेन्योरशिप (उद्यमिता) को लेकर सवाल पूछा था। मैं समझता हूँ कि आध्यात्मिक आदमी के सामने यह एक बड़ा प्रबल और आकर्षक विकल्प होना चाहिए — स्वावलंबी होना, स्वरोजगार करना। क्योंकि देखो, बहुत-बहुत खुशकिस्मत होगे तुम अगर तुम्हें ऐसी कोई संस्था मिल जाए जो ऐसा काम करती हो जो तुम्हारे दिल का हो। बड़ा मुश्किल होता है। दस हज़ार में से किसी एक आदमी की ऐसी ख़ुशनसीबी होती है कि उसे इस तरह का कोई संस्थान, कोई कंपनी, कोई ऑर्गेनाइजेशन ही उपलब्ध हो जाए जो ऊँची-से-ऊँची कोटि का काम कर रहा है और उसके साथ काम करने को मिल जाए। ये सबका ऐसा नसीब होता नहीं।

तो अधिकांशतः तो तुमको ऐसा कोई मौका मिलेगा नहीं। जब ऐसा मौका नहीं मिलेगा, तो क्या करोगे? उन्हीं सब मूर्खतापूर्ण जगह पर जाकर कर्मचारी बन जाओगे, जहाँ पूरी दुनिया खप रही है? नहीं, तब स्वरोजगार करना चाहिए। अपना काम करो, सही काम करो। यही दो विकल्प हैं।

या तो तुम्हें कोई ऐसा दल, समूह, संस्था मिल जाए जिसके साथ तुम दिल से जुड़ सको, जो ऊँचे-से-ऊँचा काम कर रही हो संस्था। तुम जितना ऊँचा काम कर सकते हो उससे भी ज़्यादा ऊँचा काम कर रही है संस्था। या तो तुम्हें ऐसा कुछ मिल जाए, पर ऐसा मिलेगा नहीं। जब ऐसा मिलेगा नहीं, तब दूसरों के मोहताज मत हो जाओ, कुछ अपना काम शुरू कर लो। और कुछ से मेरा मतलब यह नहीं कि कुछ भी, यूँ ही। कुछ से मेरा मतलब है, वह काम जो आवश्यक है। सब जवान लोगों को यह करना चाहिए। खर्चे छोटे रखो और जिगरा बड़ा रखो। यही सही काम करने में ज़रूरी है — खर्चे छोटे और जिगर बड़ा।

प्र२: प्रणाम आचार्य जी, जैसे एंटरप्रेन्योरशिप (स्वरोजगार) करने के लिए ऐसी संस्थान चाहिए जो हमें नए-नए कौशल सिखा सकें। तो जब हम आईआईटी और आईआईएम की प्रतियोगी परीक्षा में जा रहे होते हैं तब उसी समय दिमाग़ में और कई सारे आइडिया आने लगते हैं कि ये करें कि कुछ और करें। ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए?

आचार्य: नहीं, पहली बात तो यह कि एंटरप्रेन्योरशिप सिखाने में आईआईटी का या आईआईएम का कोई बड़ा योगदान नहीं होता। ये सोचना कि तुम उन संस्थानों में चले जाओगे तो एंटरप्रेन्योरशिप सीख जाओगे, ऐसा कुछ नहीं होता। कितने प्रतिशत स्नातक या परास्नातक हैं इन संस्थानों के जो एंटरप्रेन्योर निकल रहे हैं? निकलते हैं, कई निकलते हैं, और कई बहुत ऊँचे भी जाते हैं, उनको सबको हमारा नमस्कार है। पर ऐसा भी होता है कि बीटेक के थर्ड-ईयर में कंपनी बना ली। यूँ ही, कुछ थोड़ा-बहुत रुपया-पैसा डालकर। ये सब करके कंपनी क्यों बना ली? कि सीवी पर लिखेंगे कि लड़के में एंटरप्रेन्योरियल स्पिरिट (स्वरोजगार की क्षमता) है, और वो लिखने से नौकरी अच्छी लग जाएगी। या वो लिखने से बाहर की किसी यूनिवर्सिटी (विश्विधालय) में एडमिशन (प्रवेश) मिल जाएगा। तो यह सब भी होता है।

तो ऐसा नहीं है कि जिन संस्थानों का तुमने नाम लिया, वो फेक्ट्रियाँ हैं जहाँ से एंटरप्रेन्योर निर्मित हो रहे हैं। ऐसा कुछ नहीं है। आर्थिक स्वावलंबन, स्वरोजगार, सबसे पहले एक आंतरिक आज़ादी की बात है — मुझे जीवन में करने लायक सही काम मिल गया है, और मुझे वही करना है; मैं मजबूर नहीं हूँ दूसरे काम करने के लिए, जब मैं जान गया हूँ कि सही क्या है; ना मुझे पैसा मजबूर कर पाएगा, ना समाज मजबूर कर पाएगा, ना मेरे अनुभव की कमी, ना मेरी अपरिपक्वता — यह कोई भी मुझे मजबूर नहीं कर पाएँगे।

एक बार जो चीज़ दिख गई है कि सही है, वह करनी है, उससे नहीं हट सकते — एंटरप्रेन्योरशिप यहाँ से आती है। ऐसा थोड़े ही है कि तुम आईआईटी से कंप्यूटर साइंस कर लोगे तो तुम एंटरप्रेन्योर बन जाओगे, कुछ भी नहीं।

तुमने अभी प्रतियोगी परीक्षाओं की बात करी, तुम कैट के हंड्रेड परसेंटाइलर हो जाओ, तो? ये तो बात नियत की होती है, इरादे की, जिगर की होती है।

मैं नहीं कह रहा हूँ कि इसमें कौशल की या ज्ञान की ज़रूरत नहीं पड़ती है। स्किल भी चाहिए, नॉलेज भी चाहिए पर वह दूसरे तीसरे नंबर की चीज़ें हैं पहले नंबर की चीज़ क्या है? इरादा। नियत साफ होनी चाहिए, वह पहली बात है। और वह पहली चीज़ ठीक है तो दूसरे-तीसरे नंबर पर जो चीज़ें बैठी हुई हैं, अनुभव, कौशल, ज्ञान, वह आदमी धीरे-धीरे खुद ही इकट्ठा कर लेता है। वह कई बार किसी संस्थान के माध्यम से इकट्ठा हो सकता है और कई बार वह अनुभव से भी हो जाता है, धीरे-धीरे।

तुम्हें क्या मैं सूची बताऊँ उन बड़े उद्योगपतियों की, सफल एंटरप्रेन्योर्स की जिन्होंने बहुत कम औपचारिक शिक्षा ली हुई है! जानते नहीं हो उनके नाम? कुछ तो ऐसे थे जिनको शिक्षा मिल रही थी, जो पढ़ाई कर रहे थे, वह ड्रॉपआउट (बीच में छोड़कर) करके निकल लिए। बच्चा-बच्चा उन नामों से परिचित है।

यह कह करके मैं तुम्हें प्रोत्साहित नहीं कर रहा हूँ कि अनपढ़ रह जाओ। बात का उल्टा अर्थ मत निकाल लेना कि “आचार्य जी बोल गए कि एंटरप्रेन्योरशिप तो वही लोग कर सकते हैं जो बिलकुल जाहिल हों।” जो जितना कम पढ़ा-लिखा होगा वह उतना सफल होगा — यह नहीं बोल रहा हूँ मैं। मैं यह बोल रहा हूँ कि किसी ऊँचे संस्थान की डिग्री को अनिवार्य मत मान लेना। अनिवार्य नहीं है, मददगार हो सकती है। पर मददगार भी तभी होगी जब सर्वप्रथम तुम्हारा इरादा होगा। पहले नंबर की चीज़ इरादा है, नियत होनी चाहिए। और वह नियत बहुत कम लोगों में होती है।

तुम आईआईटी , आईआईएम की बात कर रहे हो, जहाँ से निकलते ही तुमको लाखों तनख्वाह में मिलने वाला हो, तुम वह बँधी-बँधाई तनख्वाह और सुरक्षा और सम्मान को छोड़कर के एंटरप्रेन्योरशिप कर कैसे पाओगे?

तुम देख नहीं रहे हो कि और ज़्यादा मुश्किल हो जाएगा लालच को छोड़ना। एक आम आदमी के सामने तो बस भय होता है कि — एक आम आदमी जब एंटरप्रेन्योरशिप करने चलता है तो उसके सामने तो बस भय होता है कि, “मैं इससे कमा पाऊँगा या नहीं कमा पाऊँगा”, लेकिन तुम किसी ऊँची जगह से डिग्री ले लो और अब चलोगे तुम एंटरप्रेन्योरशिप करने तो तुम्हारे सामने भय तो होगा ही, साथ में लालच भी होगा। भय यह होगा कि, “मैं जो करूँगा वह चलेगा कि नहीं चलेगा।” और लालच यह होगा कि, “भाई, बिना कुछ करे ही यह लाखों वाली नौकरी मिल तो रही है।” तो बताओ तुम्हारा काम आसान हो जाएगा या मुश्किल हो जाएगा?

प्र२: मुश्किल।

आचार्य: लेकिन फिर कह रहा हूँ, यह कहकर मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि तुम ऊँची शिक्षा लो ही मत। मैं बस यह बता रहा हूँ कि ऊँची शिक्षा से ज़्यादा ज़रूरी होता है ऊँचा इरादा। और ऊँचा इरादा हो तो बहुत दफे ऊँची शिक्षा के बिना ही काम बन जाता है।

प्र३: जैसे अभी आपने इरादे की बात करी तो जैसे सौरमंडल की ऊर्जा सूर्य से आती है वैसे ही ये इरादा कहाँ से आता है? इसका स्रोत क्या है? क्या वो हमारे मन से आती है?

आचार्य: तकलीफ-तकलीफ। सबसे ज़्यादा तेजी से कब भागते हो? जब पीछे कुत्ता पड़ा होता है न, तो ऊर्जा कहाँ से आई?

प्र३: तकलीफ।

आचार्य: हाँ, तो दुनिया में दो ही तरह के लोग होते हैं; एक जिन्हें मंजूर नहीं होता कुत्ते से ज़िंदगी नुचवाना, और दूसरे जो कहते हैं कि, “अरे भाई है अपना, भाई! पी लेने दो इसे खून अपना।”

ये ऐसे नहीं हैं जिनमें भ्रातृत्व भाव बहुत ज़्यादा है, ये वो लोग हैं जिनमें आलस बहुत ज़्यादा है। ये दुनिया से अपना शोषण इसलिए नहीं करवाते कि इन्हें दुनिया से बड़ी सद्भावना है, यह बस ऐसे आलसी हैं कि लुट भी रहे हैं, पिट भी रहे हैं तो भी ज़िंदगी बचाने के लिए, किसी बेहतर जगह पहुँचने के लिए श्रम नहीं करेंगे। उल्टे झूठ और बोलना शुरू कर देंगे, ख़ुद से भी और दूसरों से भी। वो कहेंगे, “ये हमारी ज़िंदगी में यह सब जो कुत्ते हैं न, जो हमारा खून पीते हैं, अरे इनको तो हमने ही बुलाया है। यह खून थोड़े ही पी रहे हैं हमारा, यह तो प्यार में चाट रहे हैं।”

दर्द के अलावा दवा और कहीं से नहीं आ सकती, और स्वीकार करना कि दर्द में हो, अहंकार को अखरता है। अहंकार दस तरह के झूठ-मूठ के दर्द स्वीकार कर लेगा, स्वीकार ही नहीं कर लेगा प्रचारित-विज्ञापित कर देगा। कहेगा, “अरे, यहाँ कंधे में दर्द हो रहा है; बाएँ नथुने में दर्द हो रहा है; एक सौ अट्ठारवे बाल में दर्द हो रहा है।" यह सब जो दो कौड़ी के दर्द हैं, यह खूब इधर-उधर बता देगा। कहे, “क्या हो रहा है?” तो कहेगा “नहीं, बड़ी तकलीफ है।”

“क्या तकलीफ है?”

“अरे, वह इस बार दस रुपय कट गये तनख्वाह में।”

जो असली दर्द है, जो भीतर दिल को रौंदे रहता है, हम उसकी चर्चा ही नहीं करते। जिसने उस दर्द की चर्चा करनी शुरू कर दी, उसकी ज़िंदगी में ऊर्जा-ही-ऊर्जा आ जाती है। वह फिर दर्द से दूर भाग जाता है। असली दर्द की तो तब तुम चिंता करोगे न, जब सब तरह के दो-कौड़ी के दर्दों की उपेक्षा करना शुरू करोगे। यह दो-कौड़ी के दर्द ही हम दिन-रात जपते रहते हैं।

“क्या हो गया?” “शर्ट फट गई, हाय-हाय!” हफ्ता भर इसी दुःख में बिता दिया कि शर्ट फट गई है। किसी की गाड़ी पर डेंट (गड्ढा) लग गया, किसी के दाँत में कीड़ा लग गया, किसी ने कोई संदेश लिखा है, उसका जवाब नहीं आ रहा — दो कौड़ी के दर्द, दो कौड़ी की चिंताएँ।

और मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि, यह दो कौड़ी के दर्द हटा दोगे तो परम-आनंद मिल जाएगा। बात साफ समझिएगा। मैं कह रहा हूँ, इन दो कौड़ी के दर्दों को हटाओ, ताकि जो असली दर्द है उसका एहसास हो सके। मैं दर्द से मुक्ति की बात नहीं कर रहा हूँ, मैं असली दर्द के निडर एहसास की बात कर रहा हूँ। यह छोटी-मोटी तकलीफे हम इसीलिए गिनते रहते हैं ताकि असली तकलीफ की ओर हमें देखना ना पड़े। मैं चाह रहा हूँ कि हम इंसान की तरह, सूरमा की तरह असली दर्द की बात करें अपने, और फिर देखो कैसी ऊर्जा उठती है।

बड़ा भयानक, बड़ा घातक दर्द है वह असली दर्द। छाती बिंधी हुई है, और हम ऐसे हैं कि जैसे किसीको कैंसर हो, और पूछ रहा है, “डॉक्टर साहब, यह दाढ़ी के बाल बहुत सफेद हो रहे हैं।” कह रहे हैं “अरे नहीं, इसकी बात मत करो, तुम्हें कोई और बीमारी है उसकी बात करो।” “हाँ-हाँ, बिलकुल सही कह रहे हैं आप, पिछवाड़े में दाना निकला है एक।” “अरे पिछवाड़े का दाना भूल जा भाई, तुझे कोई और तकलीफ है, उसकी बात कर।” “हाँ-हाँ, बिलकुल सही कह रहे है आप, मुँह से दुर्गंध आती है।” “अरे पागल! यह भी तेरी तकलीफ नहीं है, ये किन बातों का रोना रो रहा है? यह कौनसी झूठी माला जप रहा है? असली तकलीफ की बात कर।” “हाँ-हाँ-हाँ, बिलकुल सही कह रहे हैं आप, गैस बहुत बनती है।”

हर आदमी सौ तकलीफे लिए हुए है, सिर्फ असली तकलीफ को छुपाने के लिए। एक बार असली तकलीफ से आँखें चार करो, और फिर देखो कि ज़िंदगी बदलती है या नहीं बदलती है।

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