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परिपक्वता है अनावश्यक से मुक्ति || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2015)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: तुम पूछ रहे हो कि आज से चार-पाँच साल पहले खाते थे, पीते थे, खेलते थे, चैन की नींद सोते थे, अब नहीं होता, कुछ बदला है। तो तुम्हीं मुझे बताओ कि क्या बदला है।

प्रश्नकर्ता: बहुत कुछ बदला है।

आचार्य: क्या बदला है?

प्र: सर, हम लोग जब छोटे होते हैं तो हमारी ख़्वाहिश रहती है कि बड़ा हो जाऊँगा तो मैं ऐसा करूँगा। अब जब बड़ा हूँ तो अब कभी-कभी ऐसे लगता है कि काश मुझे कोई वो बचपन लौटा दे, वो माँ का प्यार और पिताजी की फटकार, वो एक कोने में छिपकर रोना। मतलब अब मैं विपरीत चाहता हूँ, ऐसा क्यों?

आचार्य: बड़े होने के दो अर्थ हो सकते हैं। एक अर्थ तो ये हो सकता है कि तुम्हारे ऊपर जो इधर-उधर से धूल है वो बड़ी होती जा रही है और दूसरा ये हो सकता है कि बड़े होने का अर्थ है कि आगे बढ़ना और तुमने उस धूल की सफ़ाई करी है आगे बढ़ने में। दोनों काम हो सकते हैं। एक उम्र तक तो तुम्हारे पास कोई विकल्प होता नहीं है। बाहर से जो भी बातें आ रही हैं तुम्हें माननी ही पड़ेंगी, स्वीकार ही करनी पड़ेंगी। तुम न जानते, न समझते, निर्भर और हो तुम दूसरों पर, तो जो कुछ भी तुम्हें बाहर से मिलता है तुम्हें लेना ही पड़ेगा।

पर उसके बाद दो रास्ते खुलते हैं। एक तो ये है कि जो बाहर से आ रहा है वो आता ही जाए और उसके आने की गति भी बढ़ती जाती है। पहले तो तुमसे समाज छोटी-मोटी अपेक्षाएँ ही रखता था, एक उम्र के बाद अपेक्षाएँ और बड़ी हो जाती हैं और बढ़ती ही जाती हैं, बढ़ती ही जाती हैं। तो बड़े होने का एक अर्थ तो ये हो सकता है कि दुनिया जो मुझसे चाहती है, जो माँगती है, मेरे ऊपर जो तथाकथित ज़िम्मेदारियाँ हैं और उन ज़िम्मेदारियों से सम्बन्धित जो तनाव हैं वो बढ़ते ही जाएँ। बड़े होने का एक अर्थ तो ये हो सकता है।

बड़े होने का दूसरा अर्थ ये हो सकता है कि ये तो रहने ही दो कि हमने अपने ऊपर तनावों को और बढ़ा लिया, हमारे ऊपर पहले से जो बोझ था हमने उसको भी साफ़ कर दिया। बड़े होने का अर्थ है साफ़ करना। अब ये तुम्हारे ऊपर है कि तुम बड़े होने की कौनसी परिभाषा चुनते हो।

बड़े होने का अर्थ हो सकता है कि मेरे सिर पर पाँच किलो वज़न था और मैंने उसको पचास किलो कर लिया, और अब मैं दबा जा रहा हूँ उस बोझ के नीचे। या बड़े होने का ये अर्थ भी हो सकता है कि मेरे सिर पर जो पाँच किलो वज़न था, मैंने वो पाँच किलो भी हटा दिया और अब मैं पूर्णतया मुक्त हूॅं। दुर्भाग्य की बात ये रहती है कि हममें से ज़्यादातर लोग बड़े होने की पहली परिभाषा ही चुनते हैं। हम सोचते हैं बड़े होने का अर्थ ही है अपने कन्धों पर और बोझ ले लेना। हमें पढ़ायी ही ये बात गयी है, और दुनिया हमारे साथ करती भी यही है।

तुम देखो क्या होता है, भारत में दूसरी-तीसरी, पाँचवीं-छठी तक तो क़रीब-क़रीब सभी बच्चे पढ़ जाते हैं, पर आठवीं-नौवीं तक आते-आते बच्चे स्कूलों से निकलना शुरू हो जाते हैं, ड्रॉप आउट होना शुरू हो जाते हैं, ख़ासतौर पर लड़कियाँ। उम्र बढ़ी नहीं ज़रा सी कि कहा जाता है कि अब पढ़कर क्या करोगे, अब खेल-कूदकर क्या करोगे, अब तो तुम आओ और ज़रा ज़िम्मेदारी लो। बाप अकेला कमाता है, माँ अकेली कमाती है, तुम भी ज़रा बोझ अपने ऊपर लो। समझ रहे हो न?

और ये शिक्षा भी तुम्हें बार-बार दी जाती है। तुम छोटे हो और तुम ज़रा मौज-मस्ती कर रहे हो, समाज उसको एक बार को झेल भी लेता है, स्वीकार कर लेता है, माफ़ कर देता है। पर अगर तुम अगर बड़े हो गये और तुमने नाचना-कूदना, उछलना-कूदना शुरू कर दिया तो कहा जाता है, ‘इस उम्र में ये सब शोभा नहीं देता’ या कहा जाता है ‘बच्चे जैसी हरकतें मत करो’ या कहा जाता है ‘अब ज़रा गम्भीरता आ जानी चाहिए तुममें, तुम बड़े हो गये हो।’ समझ रहे हो?

तो जो समाज ने तुम्हें परिभाषा दी है, उसमें बड़े होने का अर्थ ही होता है — अपना बोझ बढ़ाना, अपना जो सहज हास्य है, अपना जो सहज नृत्य है, खिलवाड़ है, उसको दबा देना, उसका क़त्ल कर देना। लड़कियाँ होती हैं, उनकी एक उम्र आ जाए उसके बाद कहा जाता है, ‘ये क्या तुम बात-बात पर हँसती रहती हो, अब ज़रा तुममें गम्भीरता आ जानी चाहिए।’

पढ़ाई-लिखाई में तुम जैसे भी थे, सातवीं-आठवीं-नौवीं तक चल जाता है, दसवीं में आते ही तुमसे कहा जाता है, ‘अब नहीं, अब दसवीं है, अब तुम बड़े हो गये हो, और महत्वपूर्ण एग्ज़ाम है, दसवीं है, बारहवीं है।' अब तुम क्या करोगे? जब यही परिभाषा लेकर तुम चल रहे हो तो तुम्हें अपना सारा हल्कापन बोझिल करना ही पड़ेगा। लेकिन मैं तुमसे कह रहा हूॅं, ये झूठी परिभाषा है बड़े होने की।

बड़े होने का वास्तविक अर्थ है कि नया बोझ तो लेंगे ही नहीं, पुराना भी हटा देंगे। पहले तो फिर भी हम थोड़ा-बहुत दब जाते थे, पहले तो हम फिर भी थोड़ा-बहुत कचड़ा अपने ऊपर लिये रहते थे, अब हम कचड़ा पूरा ही साफ़ कर देंगे। यही वास्तव में परिपक्वता है, यही एडल्टहुड (वयस्कता) है, ये ही मैच्योरिटी है। इसी को कहते हैं ‘बड़ा होना’। बड़ा वो नहीं है जिसके कन्धे झुक गये हैं, जिसके चेहरे पर तनाव है, जिसकी हँसी छिन गयी है, जो व्यर्थ ही गम्भीर है। बड़ा वो है जो हल्का है, जो उड़ रहा है, जिसका मन साफ़ है। समझ में आ रही है बात?

अब ऐसे व्यक्ति को दुनिया भले सम्मान न दे या पहचान न दे, पर ऐसे व्यक्ति पर फ़र्क नहीं पड़ता क्योंकि वो बड़ा हो चुका है। और दुनिया किनकी है? दुनिया ऐसे लोगों की है जो बड़ा हो ही नहीं पाये। मानसिक रूप से दुनिया की जो औसत उम्र है, वो तेरह-चौदह वर्ष से ज़्यादा की नहीं होगी, दुनिया वहीं पर जाकर रुक जाती है। समझ में आ रही है बात?

तुम्हारा दुश्मन तुम्हारा अपना मन है, तुम्हारी धारणाएँ ही दुश्मन हैं तुम्हारी। ये धारणा मन से निकाल दो कि तुम्हें गम्भीर रहना है। तुममें से कोई ऐसा नहीं है जिसे खेलने-कूदने का मन न करता हो। तुममें से कोई ऐसा नहीं है जिसका व्यर्थ ही दौड़ लगाने का मन न करता हो। तुममें से कोई ऐसा नहीं है जिसका सबकुछ छोड़-छाड़कर यूँही किसी पहाड़ पर कभी बैठ जाने का मन न करता हो। पर तुम्हें लगता है, 'यार! ये सब तो बचपना हो जाएगा, हम बचपना कैसे कर सकते हैं?' अपनेआप को बचपने की अनुमति दो।

जो बड़ा होता है, वो वो होता है जो अपने बचपने को दोबारा हासिल कर लेता है। बात समझ में आ रही है? बड़ा वो नहीं है जो बचपने को पीछे छोड़ आया है, बड़ा वो है जिसने अपने बचपने को दोबारा हासिल कर लिया है। वक़्त तुमसे तुम्हारा बचपन छीन रहा था, तुमने उसे छिनने नहीं दिया, यही तुम्हारा बड़प्पन है। और 'बचपन' से मेरा अर्थ है तुम्हारी सहजता, तुम्हारी निर्दोषता, तुम्हारी साफ़ आँखें, तुम्हारी निष्कपटता। इनको छिनने मत देना। किसी को ये हक़ न दो कि वो तुम्हें बताये कि बड़ा वो जो कपटी हो गया हो, कि बड़ा वो जिसने तमाम तरीक़े के छल सीख लिये हों। वो नहीं है बड़ा।

बेख़ौफ़ होकर के बच्चे बने रहो। जब बच्चा, बच्चा रहता है तो उसके पास बस सरलता होती है, और बच्चे की सरलता छिन जाती है उसके किशोर होने तक। पर बड़ा जब बच्चा होता है तो उसके पास सिर्फ़ सरलता ही नहीं रहती, उसके पास सरलता के साथ-साथ बोध भी रहता है। तो बड़ा जब बच्चा होता है तो बुद्ध जैसा हो जाता है, और उसका बच्चा होना अब कभी छिनेगा नहीं। बच्चे का बचपन तो छिन जाना है, पर बड़ा जब बचपन को पुनः प्राप्त करता है तो अब वो बचपन कभी छिनेगा नहीं, क्योंकि वो बचपन सरलता तो लिये ही है, बोधयुक्त भी है। अब वो नहीं छिनेगा।

तो समझदारी भी है और बचपना भी है, दोनों साथ-साथ हैं। ये हुआ बड़ा होना, अब हम बड़े हो गये हैं। समझदार भी हैं और बच्चे जैसे भी हैं। बोध भी है और निष्कपटता भी है। अनुभव तो हैं बहुत सारे, पर वो अनुभव हमारे ऊपर छा नहीं गये। अनुभव के बीच भी हम मलिन नहीं हो गये हैं।

वो गाना सुना है, ‘दिल तो बच्चा है जी’? मन में रहे, सारा अनुभव रहे, सारा ज्ञान रहे, पर हृदय से बच्चे रहो। अभी ये बात मैंने बच्चों से बोली होती तो बच्चे कहते, 'बात ठीक है' (सिर हिलाते हुए), लेकिन तुम कुछ ज़्यादा बड़े हो। तुम इतने बड़े हो कि तुम सबके बीच में एक ही बच्चा बैठा है, जिसकी दाढ़ी सफ़ेद है, बाक़ी सब बहुत-बहुत बड़े हैं। मैं छोटा सा, तुम अंकल जी, प्रणाम करूँ तुम्हें? आदर-सत्कार होना चाहिए तुम्हारा। बच्चे दौड़ भी लगाते हैं तो मज़े में लगाते हैं, और बड़े दौड़ लगाते हैं तो देखा है कितने गम्भीर रहते हैं? पूरा आयोजन होता है। और बच्चे दौड़ते हैं, दौड़ते हैं, दौड़ते-दौड़ते लगा कि कहीं और को मुड़ जाना है तो मुड़ गये। ठीक है, रुकना है तो रुक भी गये, कोई दौड़ते-दौड़ते आधे रास्ते में नाचने लग गया, कोई दौड़ते-दौड़ते अपने घर ही चला गया। बड़े बड़ी गम्भीरता के साथ दौड़ते हैं, रेस जीतनी है। बच्चे इस्तेमाल करते हैं क्या किसी का?

प्र: सर, वही कर सकता है जो किसी का यूज़ कर सकता हो और चालाक हो।

आचार्य: पर जो जितना चालाक होता है वो उतना मूर्ख होता है। वैसे चालाक है, पर उसकी चालाकी किसी काम की नहीं है, न उसके किसी काम की है, न किसी और के किसी काम की है। मूर्खता ही है उसकी चालाकी। व्यर्थ ही सबको परेशान कर रहा है।

प्र: यहाँ तो आपको आराम से सुन लेते हैं, लेकिन क्लास में तो बस पीछे बैठकर कुछ भी करते हैं। ऐसा क्यों है?

आचार्य: वहाँ ज़बरदस्ती बैठते हो, यहाँ जाने के तीन-तीन मौक़े थे उसके बाद भी बैठे हो। वहाँ कुछ हासिल करने के लिए बैठते हो, नम्बर आ जाएँगे, या इस डर से बैठते हो कि अटेंडेंस कट जाएगी। यहाँ न डर है न लालच है, यहाँ तो अपनी मर्ज़ी है, स्वेच्छा।

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