मोह इतना सघन हो जाता है कि तुम सत्य से इनकार करने लगते हो। बात सीधी है, कचरा है लेकिन उसके साथ बहुत रहे हो, उससे पहचान जोड़ ली है, तो अब कचरे को कचरा नहीं बोलोगे। क्योंकि कचरे को कचरा बोला तो खुद को कचरा बोला; पहचान जोड़ ली है न। यही अहंकार है– पहचान जोड़ लेना और फिर जिस वस्तु से सम्बद्ध हो, उसके सारे गुण अपने ऊपर ले लेना। चोट पड़ रही हो कर्मफल की, और सहारा मिल रहा हो गुरु का ग्रन्थ का, ये दोनों जब एकसाथ हो रहे हों तो फिर नासमझी छूट जाती है।
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प्रश्नकर्ता: लाइफ़ (ज़िन्दगी) में हमारे पास बहुत सी *चॉइसेस (विकल्प) हैं लेकिन जो सही रास्ते, सही काम हैं, उसके लिए तो कोई चॉइस ही नहीं है। तो बीच में जो छोटे-छोटे काम हैं, छोटी-छोटी चॉइस हैं, जैसे आज कहाँ चले आये, कुछ खा लिया, कोई ये खा लिया, कोई वो खा लिया, वो अलग चीज़ है लेकिन जो सही काम है, उसमें कोई चॉइस ही नहीं है?
आचार्य प्रशांत: होनी नहीं चाहिए, पर हम उसमें भी बना लेते हैं। होनी तो बिलकुल नहीं चाहिए, वहाँ पर तो निर्विकल्प होना चाहिए तुमको, पर तुम वहाँ पर भी तो विकल्प निकाल ही लेते हो न।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कल हमने ‘अनहद’ किया था, उसका क्या तात्पर्य है? मतलब, किसलिए?
आचार्य प्रशांत: एक इशारा था कि अपने बिना भी कर्म हो सकता है। पाँव चल रहे हैं, हाथ चल रहे हैं, कर्म तो है ही पर तुम्हारे निर्देश पर नहीं हो रहा, किसी और के इशारे पर हो रहा है। तुम नहीं तय करोगे कि झूमना है कि उछलना है, कि क्या करना है; एक शब्द आएगा और वो तुम्हें सुझा जाएगा। और सारा खेल बस तुम्हारे और उस शब्द के बीच का होगा।




