जवान आदमी को ऐसी कमज़ोर बातें शोभा नहीं देतीं || आचार्य प्रशांत (2023)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, समय को लेकर संघर्ष लगता है, जैसे कि सबके पास चौबीस घंटे होते हैं तो मेरे पास भी चौबीस घंटे ही हैं, लेकिन जब कुछ काम करने जाता हूँ तो उसमें एक बार मन कहता है, ‘कोई बात नहीं, आराम करो।’ और जब समय निकल जाता है तो पीछे से डंडा पड़ता है।
जैसे कि सत्र लेना है और आज मुझे कोई काम नहीं है, तो मैं आराम से सत्र ले सकता हूँ, लेकिन जब बाहर से कोई रिश्तेदार मुझे बोल रहा है, ‘चलो यार! कहीं चलते हैं!’ तो एक अवरोध सा रहता है मन में। मतलब जब तक कोई बाहर से परेशान नहीं कर रहा है, तब तक तो ठीक है। क्षमा चाहूँगा, मैं थोड़ा सा घबरा रहा हूँ अभी आपके सामने।
आचार्य प्रशांत: नहीं, मेरे ही सामने नहीं घबरा रहे न आप, रिश्तेदारों के सामने भी घबराये हुए हो।
देखो, थोड़ा सा मामला मेरे लिए असहज हो जाता है जब कोई बेवजह की लाचारगी ज़ाहिर करता है। अब जवान आदमी हो और बैठकर के बोल रहे हो रिलेटिव्स आ जाते हैं डिस्टर्ब (परेशान) कर देते हैं। न बच्चे हो, न कि बूढ़े हो गये कि आश्रित हैं अब तो हम, दूसरे लोग देखभाल करेंगे। उसके बाद आकर के अपनी बेचारगी ज़ाहिर कर रहे हो, जैसे ही ऐसा कर देते हो मैं उसी समय उखड़ जाता हूँ।
कोई लाचार हो नहीं, लाचार बना बैठा हो, उसका क्या कोई उपचार कर देगा! ‘मैं दीन हूँ, मैं दुर्बल हूँ!’ तो हो फिर, जाओ, मैं क्या करूँ? ‘मैंने सोचा था आज सत्र में बैठूँगा पर रिलेटिव आ गया, उसने बोला कचौड़ी खाऍंगे, मैं चला गया।’ मैं क्या करूँ अब इसमें? खाओ कचौड़ी! मैं भी चला जाऊँ कचौड़ी खाने, फिर? मेरे भी हैं रिलेटिव्स, ऐसे मैं आसमान से थोड़े ही टपका था। (श्रोता हॅंसते हुए)



