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ध्यान में विचित्र आवाज़ें सुनाई देती हैं || आचार्य प्रशांत (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। गुरु, संत जो बताते हैं कि अलग-अलग तल में अलग-अलग ध्वनियाँ होती हैं। कहते हैं कि आप जैसे-जैसे अपनी सुरति ऊपर उठाते हैं, आपके अलग-अलग तलों पर अलग-अलग ध्वनियाँ आपको सुनाई देती हैं। और फिर आपको प्रकाश होता है या मौन होता है। क्या ध्यान में विशेष ध्वनियाँ सुनाई देती हैं? क्या मंत्रों की ध्वनियों का विशेष महत्व है?

आचार्य प्रशांत: नहीं, ध्वनि का आशय बस ये है कि जब कुछ कहा जाता है किसी भी श्रोता से — भले ही ऊँची-से-ऊँची बात कही गयी है — उसका आधार तो भौतिक ही होता है न। वो ध्वनि, वो भौतिक, माने प्राकृतिक आधार है। ध्वनि वह प्राकृतिक आधार है जिस पर बैठकर मौन आप तक पहुँचता है। तो ये आशय है। ध्वनि विशेष नहीं है, विशेष तो मौन ही है।

न ही अलग-अलग तलों की कोई अलग-अलग ध्वनियाँ होती हैं। संतों ने किन्हीं विशेष ध्वनियों की बात नहीं करी हैं। ये आपके सामने सब शब्द आयें, इसमें से कौनसा शब्द आपको अलौकिक लगा, बताइएगा? उल्टे संतों ने जितने जटिल और क्लिष्ट शब्द थे, उनको हटाकर बिलकुल ज़मीनी शब्दों का इस्तेमाल करा।

प्राकृत — आपको ताज्जुब होगा जानकर — संस्कृत से ज़्यादा पुरानी है। प्राकृत पहले थी, संस्कृत को तो निर्मित किया गया है। और बुद्ध ख़ूब पढ़े-लिखे थे। संस्कृत की जगह उन्होंने प्राकृत का उपयोग किया, पाली का उपयोग किया। प्राकृत माने वो सब आम भाषाएँ। तो उस पूरे सेट (समूह) को प्राकृत बोलते हैं। प्राकृत किसी एक भाषा को नहीं बोलते हैं।

तो जहाँ तक शब्द की बात है, भाषा के शब्द की बात है, उसमें तो विशेषता छोड़िए, जो एकदम ज़मीनी शब्द हैं, समझाने वालों ने उसका इस्तेमाल किया है।

तो जो संत का शब्द होता है, उसमें विशेषता ये नहीं होती कि वो भाषागत तौर पर कुछ ख़ास है, नहीं! उनके शब्द तो ऐसे ही होते हैं कि सागर में डूब रही थी, चक्की चल रही थी, मंदिर में सो रही थी, कुटिया में बैठी हुई थी। अब मंदिर, सागर, चक्की, पेड़ इन सब शब्दों में भाषाई तौर पर कुछ विशिष्टता है क्या? ये कोई विशेष शब्द हैं?

संत तो और जाकर जो बिलकुल आम शब्द होते हैं, उनको उठाते हैं। बात नीयत की है। वो जिस तरीक़े से इन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, ये शब्द फिर आपको मौन में ले जाते हैं। अन्यथा तो 'चक्की' शब्द आपने कितनी बार सुना भी होगा, कहा भी होगा, उससे कुछ लाभ नहीं होता। लेकिन जब संत बोलते हैं कि "दुई पाटन के बीच में, साबुत बचा ना कोय", तो अचानक से रोशनी हो जाती है।

अब वही जो 'चक्की' शब्द है, वो आध्यात्मिक शब्द बन गया। बात उसमें ध्वनि की नहीं है, बात उसमें उपयोगिता की है। जैसे कि एक साधारण सा शब्द, किसी कुशल आंतरिक वैज्ञानिक के हाथ में जाकर के एक धारदार हथियार बन गया हो। उसको ये मत समझिएगा कि ध्वनियों से कुछ होता है; ध्वनियों से कुछ नहीं होता।

लोग तो हम ऐसे हैं, हमने "ओम्" को भी एक ध्वनि मात्र बना दिया। ये एक तरह का षड्यंत्र रहा है। देखिए, अगर आपको बोल दिया जाए कि मंत्र की ध्वनि से ही लाभ हो जाता है, तो आप इस ज़िम्मेदारी से बच जाएँगे न कि मंत्र का अर्थ भी तो समझो। अब आप क्या करेंगे? मंत्र का अर्थ जाने बिना बस उसको दोहराएँगे और ये उम्मीद रखेंगे कि ध्वनि से ही कुछ लाभ हो रहा है।

ध्वनि से कोई लाभ नहीं होगा; अर्थ से लाभ होता है, बोध से लाभ होता है।

ध्वनि तो एक बहुत भौतिक चीज़ है। ध्वनि तो ये है, ठक-ठक (आचार्य जी मेज़ बजाते हुए)। कुछ आपके कान में आकर आघात करता है, इयरड्रम (कान का परदा) पर पड़ता है, उसको ध्वनि बोलते हैं। उससे क्या लाभ हो जाना है?

लेकिन ये जो एक वर्ग रहा है जिसकी इच्छा नहीं रही है कि सब लोगों तक शास्त्रों का अर्थ भी पहुँचे, उसने ये तरकीब निकाल ली। बोले, 'अर्थ की ज़रूरत ही नहीं है, ध्वनि पर्याप्त होती है। तुम अर्थ समझो ही मत। बस ऐसे बैठे-बैठे सुनो संस्कृत' — और संस्कृत आती नहीं ज़रा भी, लेकिन सुनो — 'और इससे तुम्हें लाभ हो रहा है।'

मैं आपको बहुत साफ़-साफ़ बोल रहा हूँ, अगर आपको संस्कृत नहीं आती है और आप संस्कृत के श्लोक सुन रहे हैं या मंत्र सुन रहे हैं, आपको इतना सा लाभ नहीं होगा। हाँ, ये ज़रूर होगा कि दिमाग़ सुन्न पड़ जाएगा।

सोचिए, आपको फ़्रेंच न आती हो और आपसे कोई तीन घंटे फ़्रेंच में बात करे, तो आपका क्या होगा, दिमाग़ कैसा हो जाएगा? शक्ल ऐसी हो जाएगी (झुंझलाने का अभिनय करते हुए)। तो बस यही होता है उन लोगों का जिन्हें संस्कृत नहीं आती, पर बैठे-बैठे मंत्र सुनते हैं।

मुझे बड़ा अजीब लगता है, रिकॉर्डेड मटेरियल आने लग गया है। पहले सीडीज़ आती थीं, अब तो यूट्यूब वग़ैरा पर उपलब्ध है, जिसमें रिकॉर्डेड मंत्रोच्चार होते हैं। और बहुत घरों में ये होता है कि उनको सुबह-सुबह लगा दिया जाता है। कहते हैं, 'सुबह-सुबह लगा दो।' और वो बज रहा है दो-तीन घंटे तक। पूछूँ, वो क्या बोल रहा है? बोल रहे हैं, 'उससे फ़र्क क्या पड़ता है, कोई अच्छी बात ही होगी!'

तुम्हें कैसे पता कोई अच्छी बात होगी? तुम्हें संस्कृत तो आती नहीं। बोले, 'नहीं।' भाई, संस्कृत सीख लो थोड़ी सी या कम-से-कम इतनी सीख लो कि वो जो बोला जा रहा है, उसका अर्थ जान लो। बोले, 'न! न! न! गुरुजी ने बताया है, ध्वनि से होता है। बस कानों में वेव्ज़ (तरंगें) पड़ती हैं और उससे तुम्हारी समाधि लग जाएगी।'

ये क्या बात है! ये क्या हो रहा है! अगर उन्हें आपको वेव्ज़ ही देनी होती, तो वो शब्दों का इस्तेमाल क्यों करते? वो जो शब्द हैं मंत्र में उनके कुछ अर्थ हैं न? तो फिर अर्थपूर्ण शब्दों का इस्तेमाल ही क्यों करते ऋषि? वो निरर्थक शब्द डाल देते, जिनके कोई अर्थ ही नहीं होते हैं। पर उन्होंने अर्थपूर्ण शब्दों का इस्तेमाल करा है, ताकि आप अर्थ समझो।

पर बिना समझे बहने का भी एक नशा होता है। और हम उस नशे के आदी हो चुके हैं। महामृत्युंजय मंत्र हो गया, गायत्री मंत्र हो गया — कितने ही लोग हैं, इनको जपते रहते हैं। अर्थ पूछो, आधों को भी न पता हो। और जिनको पता भी होता है, उनको अर्थ की गहराई नहीं पता। वो भी ऊपर-ऊपर से अर्थ पकड़ कर बैठे हैं। ज़्यादातर को तो अर्थ पता ही नहीं है, उन्हें बस ध्वनि पता है।

तो संत वाणी इस तरह की चीज़ के प्रति विद्रोह होती है। संत वाणी ने कहा, 'हम संस्कृत का इस्तेमाल ही नहीं करेंगे।' बुद्ध ने कहा, 'मैं प्राकृत का इस्तेमाल करूँगा।' और संतों ने कहा — 'हम मगधी का, अर्द्ध मगधी का, अवधी का, इनका इस्तेमाल करेंगे। संस्कृत बोलें ही क्यों, क्योंकि जहाँ हमने संस्कृत में बोला, तहाँ तुम उसको क्या बना लोगे एक? ध्वनि। और बस दोहराना शुरू कर दोगे श्लोक। और संस्कृत तुम्हें आती नहीं।'

तो उन्होंने कहा — 'हम हिंदी में भी, खड़ी भाषा में भी नहीं बोलेंगे।' कबीर साहब के समय में खड़ी बोली विकसित हो चुकी थी, लेकिन फिर भी उन्होंने खड़ी बोली में बात नहीं करी। उन्होंने बिलकुल ज़मीन की भाषा में बात करी। ताकि इस बात की संभावना बिलकुल न बचे कि किसी को मतलब पता ही नहीं चला।

वो बोलें, 'जो तुम्हारी भाषा है, मैं उसमें बात करूँगा, ताकि तुम्हें अर्थ पता चले। तुम लोगों ने आदत बना ली है बिना समझे दोहराने की। और ये आदत खा गयी है तुमको। मैं उस भाषा में बात करूँगा जिसमें तुम साफ़-साफ़ समझ सकते हो।'

तो उन्होंने आपको कोई ध्वनियाँ नहीं दी हैं। उन्होंने सार्थक शब्द दिये हैं। सार्थक समझते हैं? स-अर्थ: अर्थपूर्ण शब्द दिये हैं। ध्वनि का तो कोई अर्थ ही नहीं है। ध्वनि का क्या अर्थ है?

प्र: वो तर्क देते हैं, जैसे मंदिर के द्वार पर घंटी लगी है, बजती है, तो आपके वहाँ घंटी की झनकार होगी और ऊपर जाएँगे, तो शंख की झनकार होगा।

आचार्य: देखिए, ये जितनी बातें होती हैं न, ये सबको शांत नहीं करती हैं। ये ध्वनियों से आपका जो कंडीशन्ड सेंटर (संस्कारित केंद्र) है, बस वो एक्टिवेट (सक्रिय) होता है। आप अज़ान की ध्वनि सुना दें हिन्दू को, वह शांत नहीं हो जाता। और आप शंख की ध्वनि सुना दें मुसलमान को, वह शांत नहीं हो जाता। अगर ध्वनि में ही कुछ होता, तो अज़ान से हिन्दू को भी शांत होना चाहिए था और शंखनाद से मुसलमान को भी शांत होना चाहिए था — वो नहीं शांत होते।

ये तो आप कंडीशन्ड हैं। आपको बता दिया गया है कि फ़लानी ध्वनि पवित्र होती है, तो जब आप उस ध्वनि को सुनते हैं, तो आपको लगता है कुछ ख़ास हो रहा है; ध्वनि में कुछ नहीं होता। पर लोग बोलते हैं, 'अरे! ध्वनि में कैसे नहीं होता? जब आप मंदिर का घंटा सुनते हैं, देखिए शांत हो जाते हैं कि नहीं।' कौन शांत होता है, ये भी तो सोचो। सिर्फ़ वो होता है, जो पहले ही ये तय करके बैठा है कि घंटा विशेष होता है और मुझे शांत होना है — वो शांत हो जाएगा।

जो नास्तिक है, वो नहीं शांत होता। जो किसी अन्य धर्म का मानने वाला है, वो भी नहीं शांत होता। वो दूसरी चीज़ों से शांत होते हैं। वो दूसरी ध्वनियों से शांत होंगे। तो ध्वनि इत्यादि में कुछ नहीं रखा है। इस फेर में कोई न रहे कि कोई विशेष ओंऽऽऽ (आचार्य जी विचित्र ध्वनि निकालते हुए)। हाँ, उसका कोई साइकिडेलिक इफेक्ट (भ्रामक प्रभाव) हो सकता है। साइकिडेलिक समझते हैं? जैसे दिमाग़ पर जादू हो गया हो। वो सब चीज़ें करी जाती हैं।

आपने प्रकाश की भी बात की कि पहले ध्वनि होती है, फिर ऊपर जाते हैं, प्रकाश हो जाता है।

आप किसी डिस्को थीक में चले जाइए। वो लोग इन बातों को बेहतर समझते हैं। उनको पता है कि किस तरीक़े से ध्वनि और प्रकाश दोनों का इस्तेमाल करके आपको एक जादुई अनुभव दे देना है। वहाँ लाइटें कैसी रहती हैं, डांस फ्लोर पर? ऐसा कुछ नहीं होता कि आपको सब साफ़-साफ़ दिख जाएगा। लाइटें भी ऐसी हो रही हैं कि सब बदल रहा है, बदल रहा है, बदल रहा है।

और आप अगर आध्यात्मिक आदमी हों, तो वहाँ आपको एक जादुई एहसास भी हो सकता है। आप कह सकते हैं कि ये तो डांस फ्लोर थोड़ी है, ये तो समाधि स्थल है। ऐसा जादुई अनुभव हुआ कि पूछो मत! रोशनियाँ कभी हरी, कभी लाल खट-खट-खट-खट बदल रही हैं। कभी इधर से आ रही हैं, उधर से आ रही हैं, ऐसा-वैसा हो रहा है। और ध्वनियाँ भी वहाँ अजीब-अजीब सी उठ रही हैं। (श्रोतागण हँसते हैं)

और बहुत लोग चले जाते हैं। और उसे बोलते भी हैं, उस तरह के म्यूज़िक को ट्रांस (अर्द्धमूर्च्छा)। बहुत लोग ट्रांस में चले जाते हैं (आचार्य जी झूमने का अभिनय करते हैं)। अध्यात्म बेहोश होने का नाम तो नहीं होता न। ये सारा खेल एक तरह की साज़िश रही है आपको बेहोश ही रखने की।

अर्थ समझिए!

ये जादुई आवाज़ें, विशेष रोशनियाँ ये बच्चों की बातें हैं, इनमें हमें नहीं फँसना है। बच्चें इन बातों से बहलते हैं न कि बच्चे को दिखा दिया — 'ये देखो बेटा।’ उनके खिलौनों में होता है, एक बटन दबाया पीली रोशनी, फिर लाल रोशनी, नीली रोशनी। वो ऐसे चमत्कृत होकर देखता है। हंऽऽ (बच्चे की तरह किसी खिलौने को कोतुहल से देखते का अभिनय करते हुए) हम भी ऐसा ही करते हैं और हमको ऐसा कराया जा रहा है। 'अलग-अलग तरीक़े की रोशनियाँ उठेंगी, आँख बंद करो।'

विदेशियों में ये बहुत प्रचलित है। मुझे बड़ा झटका लगा था, मैं ऋषिकेश जब पहली बार गया था। वहाँ वो सब रोशनीबाज थे। वो आपस में करते थे कि एक बोलेगा, 'आज मुझे नीली दिखाई दी।' दूसरा बोलता है, 'मैं तो अब हरी पर पहुँच चुका हूँ।' एक कोई बोल रहा है, 'मुझे झूमरों की आवाज़ें सुनाई देती हैं। जैसे हवा जब बहे, खिड़की खुली हो और झूमर आवाज़ करें।' एक बोला, 'न, न, न, मुझे तो ऐसी आवाज़ आती है, जैसे आँधी चल रही है और यूकेलिप्टस (नीलगिरी) की पत्तियाँ आपस में रेसलिंग (कुश्ती) कर रही हों।' (श्रोतागण हँसते हैं)

एकदम, काल्पनिक बात नहीं बोल रहा हूँ, सचमुच यही था, उदाहरण दिया था। बोले, 'मैं जब जाता हूँ ध्यान में तो ऐसी आवाज़ आती है कि हवा चल रही है और यूकेलिप्टस की पत्तियाँ जो आवाज़ करती हैं ख़ासतौर पर।' एक बोले, ‘नहीं-नहीं, माइन इज़ पाइन। माइन इज़ पाइन (मेरा देवदार है)। और पाइन तो यूकेलिप्टस से ऊपर के स्टेटस (स्तर) का होता है न। देखो, मैं आगे निकल गया।’ क्या है!

इनके (संतों के) आगे इसीलिए नतमस्तक रहता हूँ। संतों ने इस तरह का दंद-फंद, बेकार की बातें कुछ नहीं करी। क्लीन, नीट स्पिरिचुअलिटी (साफ़, स्वच्छ आध्यात्मिकता)। एब्सोल्यूटली नीट (बिलकुल स्वच्छ)। कोई उसमें इधर-उधर की गंदगी नहीं। बेकार की कोई बात नहीं। कोई पारलौकिक अनुभव नहीं। कोई मिस्टिकल एक्सपीरियंसेज़ (रहस्यमय अनुभव) नहीं।

अध्यात्म का मतलब ये सब नहीं होता है, मिस्टिकल एक्सपीरियंस , ये हो गया, झूम गए। और फिर और उसको निचले तल पर गिरा दो तो 'भूत चढ़ गये'। वो भी अध्यात्म में ही गिना जाता है। आप किसी से जाकर बोलें, 'आध्यात्मिक हैं।' वो पहली बार में यही समझेगा कि आपका भूत-प्रेत में यक़ीन होगा। ठीक? क्योंकि अध्यात्म को इसी चीज़ से जोड़ दिया गया है — जो भूत-प्रेत में माने वही तो होता है आध्यात्मिक।

आप वापस जाएँगे, आप बोलिएगा, 'आचार्य जी से मिल कर आये हैं।' तुरन्त बोलेगा, 'हाथ दिखाया?' (श्रोतागण हँसते हैं) क्योंकि आचार्य का मतलब ही जुड़ गया है कि जो इस तरह की नालायकी करे, हाथ देखने वाली। आप बोलिएगा, 'हाथ नहीं, कुंडली दिखाकर आये हैं पूरी।' जैसे ही कुंडली बोलेंगे, तो बोलेगा, 'अच्छा, कुंडलिनी भी जगायी होगी आचार्य ने?' यही सब बन गया है अध्यात्म। इसमें नहीं पड़ना है!

नीट , साफ़ बिलकुल। कोई पूर्वाग्रह नहीं, कोई अंधविश्वास नहीं। कोई बेतुकी, कुतर्की बात नहीं। अध्यात्म क्या है? पार के अनुभव लेने को अध्यात्म नहीं बोलते।

'ये मेरी ज़िंदगी है और इसे मुझे ईमानदारी से और प्रेम से जीना है — बस इतना है अध्यात्म, इसके आगे कुछ नहीं है अध्यात्म। किसी दूसरी दुनिया का दर्शन करना है, ये नहीं होता अध्यात्म। स्वर्ग मिलेगा, पुण्य कमाना है — ये नहीं होता अध्यात्म। ये मेरी ज़िंदगी है आज की, इसको बेखौफ़ जीना है — ये होता है अध्यात्म। बस इतना है अध्यात्म।

आ रही है बात समझ में?

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