नया उन्हीं के पास आता है, जिनमें हिम्मत होती है — पुराना ख़त्म करने की। क्योंकि तुम्हें असल में कुछ नया नहीं चाहिए, तुम्हें तो सिर्फ़ पुराने से मुक्ति चाहिए। हम अपने आप से और पुराने से ऊब चुके हैं, और इसके ख़त्म होने की चाह रखते हैं। यदि वास्तव में नया चाहिए, तो पुराने को जाने दो और श्रद्धा रखो — नया अपने आप आ जाएगा। अन्यथा सिर्फ़ नए की आकांक्षा करोगे, तो वही आकांक्षा पुराने को बनाए रखेगी।
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प्रश्नकर्ता: हमें लगता है जैसे हमें सब कुछ पता है कि अभी क्या होने वाला है। मतलब जैसे कहीं जा रहे हैं तो पता है कहाँ जा रहे हैं। कुछ भी ऐसा नहीं होता कि पता नहीं है कि क्या कर रहे हैं, मतलब उसका परिणाम क्या होगा। एक अच्छी तरह परिभाषित प्रणाली है। सब एक चक्र में घूम रहा है। जैसे मन में एक छवि है कि यहीं जा रहे हैं और यही होगा और अच्छे से पता है कि इसके अलावा और कुछ नहीं होगा। तो वही किए जा रहे हैं। उसी एक प्रणाली में चले जा रहे हैं। और जैसे लोग सीढ़ी पर चढ़ रहे हैं, उतर रहे हैं। ऐसा लग रहा है जैसे सब कुछ एक प्रणाली कि तरह है। कुछ भी अनिश्चितता नहीं है किसी भी चीज़ की। पूरा एक यंत्र की तरह है जो चल रहा है।
आचार्य प्रशांत: जैसे अंतरिक्षयान हो कोई और वो अंतरिक्ष में भटक रहा हो। छोटा-सा अंतरिक्षयान है। कहाँ को जा रहा है, किधर को, कुछ पता नहीं है। पर अंतरिक्षयान के अंदर हमें पता है चार कदम इधर क्या है और चार कदम उधर क्या है।
प्रश्नकर्ता: सर, जैसे मेट्रो में जा रहा हूँ मैं, मुझे पता है कि मुझे इस स्टेशन पर उतरना है। मैं कितना भी कोशिश कर लूँ, मैं उसी स्टेशन पर उतरुँगा, कुछ भी कर लूँ।




