उम्र बढ़ जाने से तुम व्यस्क नहीं हो जाते। उसके लिए यहाँ दिमाग में कुछ होना चाहिए। कोई एक होता है जो बड़ा हो पाता है। कोई-कोई होता है जो वास्तव में बड़ा हो पाता है। उसको कहते हैं-खिलना, अपनी पूर्णता को प्राप्त होना। कोई-कोई होता है, बाकी तो सब ऐसे जैसे हमारे ऑफिस में डहेलिया है, ये लगे हुए हैं।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या जीवन दुख है? ऐश माने क्या? क्या उम्र का बढ़ना परिपक्वता की निशानी है?
आचार्य प्रशांत: ज़िंदगी बोझ है, ज़िंदगी बोरियत है, ज़िंदगी थकान है, ज़िंदगी नर्क है, ज़िंदगी ऐश कैसे हो सकती है। खबरदार! हमसे कहा कि ज़िंदगी आनंद है। ये मत बता देना हमें, ये शब्द वर्जित हैं।
हाँ, हमें बताओ कि ज़िम्मेदारी कर्तव्य है, ज़िम्मेदारी आँसू है, ज़िंदगी ट्रेजिडी (त्रासदी) है, ज़िंदगी अलसाई आँखें हैं जो थोड़ा और सोना चाहती हैं पर ज़बरदस्ती उठना पड़ रहा है, हम मान लेंगे।
हमें बताओ कि ज़िंदगी एक ऐसा कॉलेज है जहाँ हम पढ़ना नहीं चाहते, ठीक। ज़िंदगी एक ऐसा ऑफिस है जहाँ हम काम नहीं करना चाहते, ठीक। ज़िंदगी एक ऐसा घर है जहाँ हम रहना नहीं चाहते, ठीक। ज़िंदगी एक ऐसी बीवी है जिसके साथ हम जीना नहीं चाहते, ठीक। ज़िंदगी ऐसे कपड़े हैं जो हम पहनना नहीं चाहते, ठीक।
लेकिन ज़िंदगी मस्ती है और मौज है और आनंद है, ये मत कह देना! एफआईआर कर देंगे। (सभी हँस पड़ते हैं) तुम्हें पता भी है ऐश क्या होती है? कभी करी है ऐश?




