जानना तुम्हारा स्वभाव है, करना तुम्हारी प्रकृति है। जब तुम कहते हो, ‘मैं काम कर रहा हूँ’, तो तुम ये मान के चलते हो कि जो कुछ हो रहा है, उसमें तुम्हारी भी कोई सत्ता है। तुम करने वाले हो ही नहीं। जो होना है, सो तो हो ही रहा है, “अनहोनी होनी नहीं, होनी होय सो होय”। जानो! तुम मात्र जानने वाले हो।
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प्रश्नकर्ता: जानने के लिए करने का क्या योगदान होता है, क्या कुछ करें?
आचार्य प्रशांत: जानना और होना या करना, ये दोनों आयाम ही अलग-अलग हैं। जो जान रहा होता है, उसकी अपनी कोई सत्ता नहीं होती कि वो करेगा, वो कर सकता नहीं है। जो करने वाला है और जो जानने वाला है, ये दोनों अलग-अलग होते हैं।
जो करने वाला है, उसको प्रकृति कहा जाता है। जो जानने वाला है, वो साक्षी है। जब ये दोनों आपस में घालमेल करने लगते हैं, उसी का नाम अहंकार हो जाता है। अहंकार का मतलब ही यही है कि करने वाला मैं हूँ।
तुम करने वाले हो ही नहीं। तुम मात्र जानने वाले हो। ये दोनों बिलकुल ऑर्थोगोनल है, अलग-अलग आयाम हैं, जैसे परपेंडिकुलर, एक्सेस। इनमें आपस में कोई संबंध नहीं है।
जानना तुम्हारा स्वभाव है, करना तुम्हारी प्रकृति है।




