न पढ़ाई में मन लगता, न ढंग का काम मिलता - युवा करे तो करे क्या? || आचार्य प्रशांत (2023)

प्रश्नकर्ता: सर, मैं अभी एक कॉलेज से ग्रेजुएट हुआ हूँ, जहाँ पर अभी सुनने में आया है कि एक लड़के ने सुसाइड (आत्महत्या) कर लिया क्योंकि उसके बैकलॉग्स थे और जब मैं भी कॉलेज में पढ़ रहा था तो को प्लेसमेंट का माहौल होता है कि किसकी कितने की पैकेज लगेगी और वो सब….।
उसमें बहुत से लोग कॉलेज छोड़ देते हैं क्योंकि वो प्रेशर को झेल ही नहीं पाते। तो आपने जैसे कहा था कि परीक्षा ख़राब हो जाए उसका प्रभाव मन पर नहीं पड़ना चाहिए। तो मेरा सवाल था कि हम ऐसे कैसे हो जाएँ कि ये सब होता रहे बाहर-बाहर और अन्दर असर न पड़े?
आचार्य प्रशांत: एनआईटी राउरकेला?
प्र: जी सर।
आचार्य: देखो, उसके लिए न तैयारी बहुत अच्छा हो बचपन से हो जाए, बचपन से नहीं करायी किसी ने तो ख़ुद ही कर लेनी चाहिए, अभ्यास ज़रूरी है। ऐसे समझो कि जब कोई घटना घटती है तो हम रिफ़्लेक्टेड कॉन्शियसनेस (परावर्तित चेतना), ये मैं पाश्चात्य दर्शन से उधार ले रहा हूँ। रिफ़्लेक्टेड कॉन्शियसनेस! ऐसे बोल लो, परावर्तित चेतना — हम उसके प्राणी होते हैं।
तो इसका मतलब ये है कि जैसे आईने में रिफ़्लेक्शन होता है न कि इधर कुछ हुआ तो उधर आईने में भी कुछ हो जाता है साथ में, तो ऐसे ही जब बाहर एक घटना घटती है तो उसके साथ में हमारे भीतर भी एक घटना घट जाती है। जैसे आईने के सामने अगर एक गेंद गिरे तो आईने के अन्दर भी एक गेंद?



