श्रीमद् भगवत गीता प्रथम अध्याय अर्जुन विषाद योग
धृतराष्ट्र उवाच | धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः | मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय || 1.1 ||
धृतराष्ट्र ने कहा, “हे संजय! धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र में युद्ध करने के लिए एकत्रित हुए मेरे पुत्रों और पांडवों ने क्या किया?”
आचार्य प्रशांत: जिज्ञासा से आरंभ हो रहा है श्रीमद भगवत गीता का पाठ और पहले ही सूत्र में सीख निहित है; कौरव-पांडव अविवेक की एक लंबी श्रंखला के परिणाम स्वरूप कुरुक्षेत्र में आमने-सामने आ गए हैं और उनको उस स्थिति में पहुंचाने में बहुतों का योगदान है, जिनमें धृतराष्ट्र भी सम्मिलित हैं। धृतराष्ट्र अब जिज्ञासा कर रहे हैं। संजय से पूछ रहे हैं कि बताओ अब आमने-सामने आ गए हैं। एकत्र हो गए हैं। क्या कर रहे हैं?
यहां यह प्रश्न गौण है कि संजय कैसे देख पा रहे होंगे? संजय कैसे सुन पा रहे होंगे? ऐसे प्रश्नों पर बहुत चर्चा नहीं होनी चाहिए। उन प्रश्नों में कोई केंद्रीयता नहीं है। क्या वेदव्यास ने सचमुच संजय को कोई दिव्य दृष्टि प्रदान करी थी। दिव्य दृष्टि जैसा कुछ होता भी है क्या? ऐसा कैसे हो सकता है कि संजय इतनी दूर से सब कुछ देख पा रहे हो, सुन पा रहे हो और अगर सब कुछ संजय नहीं देखा सुना है तो गीता के 700 श्लोकों में से प्रत्येक श्लोक वास्तव में मात्र संजय का ही है।
तो इस तरह की चर्चाएं बहुत होती रहती हैं। उनमें हमें नहीं पड़ना है क्योंकि वो मुद्दा अहम नहीं है। उस बात में कोई केंद्रीयता नहीं है। संजय ने कैसे देखा? अपनी आंखों से देखा, संदेशवाहकों से देखा, गुप्तचरों से देखा। या सुनी सुनाई बात बता दी। कुछ भी हो सकता है। जो कुछ भी हुआ हो उसका महत्व अप्राथमिक है।




