मदद का एकमात्र अर्थ होता है चेतना को उसके अंजाम तक ले जाना। इसके अलावा मदद का कोई अर्थ नहीं होता। कमज़ोर की सेवा करने का अगर मतलब यह है कि कमज़ोर, कमज़ोर बना रहे, तो यह सेवा नहीं, साज़िश है। कमज़ोर की हमेशा मदद ही नहीं करनी होती, संहार भी बहुत ज़रूरी होता है। दुर्बल की तो एक ही सहायता हो सकती है कि उसको दुर्बल रहने ही मत दो। पर यदि कमज़ोरी ताकत बनना ही नहीं चाहती, तो उसका संहार करना भी सीखो।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, कर्तव्य से संबंधित दो प्रश्न आएँ हैं, निधि जी हैं, पूछ रही हैं क्या किसी कमजोर की हेल्प करना हमारा कर्तव्य नहीं है? और कर्तव्य संबंधित एक और प्रश्न है कि आचार्य जी कर्तव्य शब्द समाज में इतना प्रचलित क्यों है? कर्तव्य शब्द की क्या उपयोगिता है और गीता क्यों कहती है कि हमारे कर्तव्यों और कामना में एक गहरा रिश्ता होता है?
आचार्य प्रशांत: बोध कथा है, ज़ेन बोध कथा है। एक ज़ेन गुरु, ज़ेन मास्टर चले जा रहे हैं उनके साथ में उनका शिष्य है। तो वह पूछता है, "हु इज़ द बुद्धा?" बुद्ध कौन है? वे चल रहे हैं। वहाँ कुछ फलों के पेड़ हैं। वे चुप रहते हैं, कुछ बोलते नहीं। पहले पेड़ के नीचे से निकलते हैं, कुछ नहीं वहाँ से निकल जाते हैं। दूसरे पेड़ के नीचे से निकलते हैं, कुछ नहीं! वहाँ से भी निकल जाते हैं। और तीसरे पेड़ के नीचे से निकल रहे होते हैं, तो एक फल ऊपर से गिर पड़ता है। कोई फल, मान लो अमरूद, जामुन—कुछ भी। तो वह गिर पड़ता है वो उसे उठाकर खा लेते हैं और चल देते हैं। ऐंड द डिसाइपल वाज इनलाइटेंड ऐट दैट मूमेंट। वो कथाएँ ऐसे ही समाप्त होती हैं।
बस, इतने से इशारे से उस शिष्य को बुद्धत्व प्राप्त हो गया। समझ में आ रही है बात? नहीं था, तो नहीं था। पूछे कि "तुमने फल क्यों खाया?" तो ऐसा अजीब जवाब आया कि खोपड़ी में नहीं समाया। "तुमने फल क्यों खाया?" "क्योंकि सामने आया।" यह क्या जवाब है? "तुमने फल क्यों खाया?" "क्योंकि सामने आया।" और कोई उत्तर नहीं है इसका। पशुओं जैसी बात है ना? रोटी रखी थी, तो हमने खा ली। नहीं रखी होती, तो नहीं खाते।





