(गीता-13) रातों को जागने की एक खास वजह || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2022)

आचार्य प्रशांत: तो अर्जुन ने जो स्थितप्रज्ञ के लक्षण पूछे थे उसी पर बात आगे बढ़ती है। अड़सठवाँ श्लोक है दूसरे अध्याय का, श्रीमद्भगवद्गीता, सांख्य योग —
“हे अर्जुन! जिसकी इन्द्रियाँ शब्द आदि विषयों से पूर्णतया संयत हैं उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित है अर्थात् वही स्थितप्रज्ञ है।”
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।२.६८।।
(स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के) विविध लक्षण बताते हैं — हे महावीर अर्जुन, इसलिए जिसकी इन्द्रियाँ शब्दादि विषयों से पूर्णतया संयत हैं उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित है अर्थात् वही स्थितप्रज्ञ है।
~श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय २, श्लोक ६८)
इस श्लोक में कुछ भी नया नहीं है। अर्जुन के सामने बहुत बातें बहुत बार दोहरानी पड़ रही हैं। और ये जो दोहराने की विधि है, इसका वेदान्त में आप ज़बरदस्त उपयोग पाएँगे। वेदान्त में भी और अन्य जितने भी अच्छे आध्यात्मिक ग्रन्थ हैं, सभी में दोहराव खूब है। वो दोहराव क्या बताता है? दोहराव अभ्यास की आवश्यकता बताता है।
दोहराव माने अभ्यास। वही काम दोबारा, वही बात दोबारा, क्यों? क्योंकि मन पर भ्रष्ट और विकृत करने वाले प्रभाव तो लगातार पड़ ही रहे हैं न! वो प्रभाव लगातार पड़ रहे हों, और आप कहें कि मैंने गीता पढ़ ली एक बार जब मैं चौबीस साल का था। और कहें, ‘मैंने पढ़ ली, मैंने खत्म करके रख दी।’ तो बात बनेगी क्या?









