हमने ज्ञान को बड़ी एक परालौकिक चीज़ बना दिया है की ज्ञान माने आसमानों पर क्या हो रहा है। वही ज्ञान है। कभी मैंने आपसे कहा कि उपनिषद् साफ-साफ बताते हैं। विद्या और अविद्या दोनों चाहिए। और आसमानों की बात तो बाद में हो जाएगी। उपनिषद् कहते हैं कि जो ज़मीन की बात नहीं समझता, वो अगर आसमानों की बात करे तो दो चांटा लगाओ उसको।
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प्रश्नकर्ता नमस्ते आचार्य जी, नीति गायकवाड़ जी है महाराष्ट्र से, उनका कहना है कि आचार्य जी कल मैं मूवीसे आ रही थी। अकेले रात को ११.४० का लगभग समय रहा होगा। और उस वक्त मुझे बहुत ज़्यादा डर लग रहा था। सारा ज्ञान जो था, उस वक्त मेरे काम नहीं आया। जो कैब ड्राइवर था वो कहीं गलत जगह न ले जाए तो मेरा सारा ध्यान इसी पर चला गया। ऐसे में मुझे लगा कि लड़कियों को शायद ज्ञान वगैरह से पहले फिजिकली और मेंटली स्ट्रांग बनना पड़ेगा। तभी ज्ञान उनकी कोई मदद कर पाएगा। क्या यह बात सही है?
आचार्य प्रशांत: ये जो आप सही पूछ रहे हो, ये भी तो ज्ञान की ही बात है न? ज्ञान का किसी भी स्थिति में अर्थ होता है सच क्या है झूठ क्या है? इसका निपटारा वो तो आप कैब में फंसे हुए हो, चाहे आप पिक्चर देख रहे हो, चाहे घर पहुँच गए हो, आपको तो हमेशा ही जानना पड़ेगा न कि सच झूठ क्या है, ज्ञान तो आपको हर क्षण में चाहिए।
आप लड़की हो तो आपको कितना पैसा होना चाहिए, आपको कितने बजे फिल्म देखनी चाहिए, आपको किस तरह से कैब करनी चाहिए आपके पास कोई हथियार होना चाहिए, आपके पास और क्या बंदोबस्त होने चाहिए ये सब भी तो ज्ञान की ही बातें है न? या ज्ञान का अर्थ बस यह होता है कि अहम ब्रह्मास्मि? आप संस्था से सत्र सुनती है, क्या नाम है उनका
प्रश्नकर्ता:







