जिस किसी में सत्य के प्रति अर्जुन जैसी प्रगाढ़ निष्ठा होगी, उसे श्रीकृष्ण मिल ही जाएँगे। तुम्हारे भीतर वो प्रश्न उठें तो सही, जो अर्जुन में उठते थे। केन्द्रीय बात है मुक्ति और बोध की — वो अगर है, तो फिर कुछ-न-कुछ हो ही जाएगा। जिसे चाहिए, उसे मिल ही जाता है, चाह मूल है। हर मार्ग पर तुम्हें अपनी मुमुक्षा का, अपनी आतुरता का परिचय देना ही पड़ता है — उसके अलावा कोई रास्ता नहीं है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। योगीजन द्वारा बताया गया मुक्ति मार्ग साधारण लोगों के लिए बहुत दुष्कर और दुस्साध्य होता है। लेकिन ये भी सत्य है कि इसी कठिन मार्ग से गुज़रने पर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दृष्टि प्रदान की थी; हालाँकि यह बहुत संकरा मार्ग है। क्या साधारण जन के लिए मोक्ष या मुक्ति का कोई सुलभ मार्ग हो सकता है, जो योगियों द्वारा बताये गए कठिन मार्ग से अलग हो?
आचार्य प्रशांत: श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दृष्टि यूँही नहीं प्रदान कर दी थी, अर्जुन ने कई तरीकों से अपनी पात्रता का परिचय दिया था। ऐसा नहीं है कि योगियों का मार्ग संकीर्ण या संकरा होता है, और कोई दूसरा मार्ग होता है जो सुलभ या सरल हो। हर मार्ग पर तुमको अपनी मुमुक्षा का, अपनी आतुरता का परिचय देना ही पड़ता है, उसके अलावा कोई रास्ता नहीं है।
सुन रहे हो न, श्रीकृष्ण क्या कह रहे थे अर्जुन से? अर्जुन होना आसान बात नहीं है। अर्जुन होने का अर्थ होता है ये उपदेश ग्रहण करना कि मोह पर बाण चला दो; प्रकृति के, रक्त के, अतीत के जो नाते हैं, उनकी बहुत परवाह मत करो। अर्जुन तो पीछे हटने को तैयार हो रहा था, कह रहा था कि घरेलू बातचीत है, छोड़िए, इसमें रक्तपात ठीक नहीं है। और श्रीकृष्ण उससे कह रहे हैं कि जो तुम सोच रहे हो वो बात छोटी है, असली बात ज़्यादा बड़ी है; असली बात मैं तुम्हें बताता हूँ, "तुम युद्ध करो।" अर्जुन होना आसान है? और पचासों तरह की शंकाएँ हैं अर्जुन के मन में! एक शंका ये तक उठी उसे बीच में कि श्रीकृष्ण कहीं उसे भ्रमित तो नहीं कर रहे।







