जब-जब तुम सच्चाई की ओर नहीं बढ़ते, तब-तब जीवन दुख, दरिद्रता, कष्ट, रोग और बेचैनियों से भर जाता है। अधर्म अपने चरम पर चढ़ जाता है, और विवश होकर तुम्हें आँखें खोलनी पड़ती हैं। तब मानना पड़ता है कि तुम्हारी राह ग़लत थी, और ग़लत राह को छोड़कर तुम्हें सत्य की ओर मुड़ना पड़ता है। अतः जब तुम अंधेरे को पीठ दिखाते हो, तो श्रीकृष्ण को अपने समक्ष पाते हो। यही श्रीकृष्ण का अवतरण है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
हे भारत! जब-जब धर्म की हानि होती है तथा अधर्म का अभ्युत्थान होता है, तब-तब मैं स्वयं का सृजन करता हूँ अर्थात् जन्म लेता हूँ।
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ७
प्रश्नकर्ता: वह धर्म ही क्या जिसे किसी की रक्षा की आवश्यकता हो; सत्य तो स्वयं सिद्ध होता है। श्रीकृष्ण किस धर्म की रक्षा की बात कर रहे हैं?
बहुत सारे महात्मा लोग आज भी यह कहते हुए कि वेद अपौरुषेय हैं, क़ुरआन अल्लाह की किताब है, इसी बात को दिल-ओ-जान से लगाए बैठे हैं और जो उनकी बातों को नहीं मानता, उसके दुश्मन बन जाते हैं, दंगे-फ़साद करते हैं। उन्हें बस ये छोटी-सी किताब दिखाई देती है। इतना बड़ा जो विश्व-ब्रह्माण्ड है, उसमें उनको कुछ दिखाई नहीं देता। आचार्य जी, समझाने की कृपा करें।










