तुम ही मीरा, तुम ही श्रीकृष्ण

Acharya Prashant

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तुम ही मीरा, तुम ही श्रीकृष्ण
श्रीकृष्ण भी तुम्हीं में हैं, और मीरा भी। इन्हें मिलने दो, फिर आफ़तों में भी नाचोगे जैसे मीरा नाचती थी। परिस्थितियाँ कैसी भी हों, तुम मौज में रहोगे। मीरा होना अनिवार्य है; जीवन मिला ही इसीलिए है कि हमारी मीरा और हमारे श्रीकृष्ण मिल सकें। जिनमें यह मिलन नहीं होता, वे सूखे, उदास जीते हैं। समझ ही श्रीकृष्ण है; जब समझ जागेगी, तब मीरा नाचेगी। यही मिलन, यही योग, यही जीवन जीने की कला है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: आप मीरा जी के प्यार को क्या नाम देंगे? आप उसे भक्ति बोलेंगे या उसे श्रीकृष्ण के प्रति प्यार कहेंगे?

आचार्य प्रशांत: तो जसप्रीत (प्रश्नकर्ता) हम अपनी बात करें। मीरा हुए बिना, मीरा को जान नहीं पाओगे। बाहर-बाहर से देखोगे, दूर-दूर से समझने की कोशिश करोगे, कुछ बात बनेगी नहीं। जो तुम हो नहीं, उसको तुम जान सकते नहीं। मीरा क्या है और श्रीकृष्ण से क्या संबंध है उसका, इसके लिए मीरा ही होना पड़ेगा।

तुमने जो कभी नहीं खाया, उसका स्वाद तुम्हें कैसे बताया जाएगा शब्दों से? तुमने जो पानी कभी पीया नहीं, वो प्यास कैसे बुझाएगा तुम्हारी? और उसके बारे में मैं कुछ बता भी रहा हूँ कि H2O और दिन भर बताऊँ और सब समझा दूँ, कौन-कौन से बॉन्ड होते हैं, कॉवेलेंट बॉन्ड क्या होता है, हाइड्रोजन बॉन्ड क्या होता है, तो प्यास बुझ जाएगी? मीरा और श्रीकृष्ण के बारे में तुमको दुनिया भर की कहानी सुना दूँ तो होगा क्या? मीरा और श्रीकृष्ण होना पड़ेगा न। इसीलिए कहा कि अपनी बात करो कि, ‘हम कहाँ पर खड़े हैं’ वही असली सच है।

श्रोता: अगर कोई हो ऐसा?

आचार्य प्रशांत: अगर-मगर का सवाल नहीं है।

प्रश्नकर्ता: वैसा बनने के लिए भी तो जानना पड़ेगा।

आचार्य प्रशांत: वैसा जान-जान कर नहीं बना जाता। जब तुम कहते हो कि जान कर बनना है, बड़ी महत्त्वपूर्ण बात है, तो तुम ये कहते हो कि भविष्य में बनना है। कुछ होगा तब बनेंगे, और अभी क्या हैं? आधे-अधूरे। भविष्य में क्या हो जाएँगे? पूरे। अभी हैं अधूरे, यहीं पर चूक हो जाती है। अगर मैं उससे कह रहा हूँ कि मीरा हुए बिना, मीरा को नहीं जाना जा सकता तो ये इसीलिए नहीं कह रहा हूँ कि उसमें कोई योग्यता है। इसीलिए कह रहा हूँ कि मीरा जसप्रीत (प्रश्नकर्ता) में ही बैठी हुई है, उसका उसको पता नहीं है। उसको जब याद करेगी, तो सब समझ जाएगी अपने आप। ये याद दिलाने की कोशिश कर रहा हूँ।

भविष्य में नहीं घटेगी वो घटना, अभी घटेगी। अभी मीरा है वो, वही भर नहीं है, तुम भी हो और ये सारे भी हैं। और अब आगे की मज़े की बात सुनो, श्रीकृष्ण भी तुम्हीं हो मीरा ही भर नहीं। जान बस जाओ कि मीरा क्या और श्रीकृष्ण क्या, तो सब अभी होगा। वो जानना भविष्य में नहीं है, अभी है। समझना चाहते हो कि कैसे मीरा भी अभी हो और श्रीकृष्ण भी अभी हो?

मीरा प्रकृति है, तुममें जो कुछ तुम्हें प्रकृति से मिला है, वो मीरा है। ये शरीर, ये मन जो कुछ भी तुम्हें प्रकृति ने दिया है, वो मीरा है। श्रीकृष्ण चैतन्य हैं (इंटेलिजेंस), वो प्रकृति पर निर्भर नहीं करती, वो प्रकृति की साक्षी भर है। वो देखती है प्रकृति को और वो प्रकृति के साथ होती है, साक्षी रूप में। क्योंकि साक्षी तभी हो सकते हो जब बड़े करीब आ जाओ। साक्षी होना माने देखना, मुझे किसी को देखना है तो उसके बहुत करीब आना पड़ेगा, बहुत ही करीब। इस करीब होने को ही श्रीकृष्ण का रास कहते हैं कि श्रीकृष्ण प्रकृति के बड़े करीब आ गए, पुरुष प्रकृति के बिल्कुल पास आ गया। उसी को तुम्हारे एच.आई.डी.पी की भाषा में बोलते हैं, कि मन इंटेलिजेंट हो गया। इंटेलिजेंस क्या है? चेतना, और मन क्या है? प्रकृति। इंटेलिजेंस क्या है? श्रीकृष्ण, और मन क्या है? मीरा।

श्रीकृष्ण भी तुम्हीं में, मीरा भी तुम्हीं में; इन दोनों को मिल जाने दो। उसके बाद वैसे ही नाचोगे जैसे मीरा नाचती थी, उतने ही खुश रहोगे जैसे वो रहती थी।

पर वो तब तक तुम समझ नहीं सकते जब तक वो मीरा सोई पड़ी है, जब तक वो मीरा दूर है श्रीकृष्ण से। मीरा, मीरा तभी है जब तक वो श्रीकृष्ण के पास है और श्रीकृष्ण भी श्रीकृष्ण तभी हैं जब मीरा उन्हें याद कर रही है। राधा और मीरा ही श्रीकृष्ण पर निर्भर नहीं हैं, श्रीकृष्ण को भी उनका साथ चाहिए, और दोनों तुम्हारे ही भीतर हैं।

ये सिर्फ़ प्रतीक हैं, ये मिथोलॉजी जो होती है न, ये प्रतीक होती है। मन के गहरे सत्यों को बताने के लिए कुछ बातों का सहारा लिया जाता है। मीरा तो चलो ऐतिहासिक है पर राधा और श्रीकृष्ण की बात करीब-करीब पूरी प्रतीकात्मक है। प्रतीक मतलब जो एक तरफ़ को इशारा करता है, जो एक कोड है, उसको तुम्हें डीकोड करना पड़ेगा समझने के लिए। मीरा है तुम्हारे हाथ, तुम्हारे पाँव, तुम्हारी आँखें, तुम्हारी ज़बान, तुम्हारा पूरा शरीर, तुम्हारे मन की एक-एक हरकत।

ये दो तरीक़ों से हो सकती है।

पहला, बिल्कुल अचेतन होकर, बेहोशी में। तब तुम विरह में होते हो, तब तुम दुखी होते हो और बैचन होते हो। काम करते हो, पाँव चलते हैं, हाथ चलते हैं, मुँह से शब्द निकलते हैं, आँखें देखती हैं पर वो सब बड़ा अव्यवस्थित रहता है। जैसे हमारा रहता है, इधर को चलते हैं और उधर पहुँच जाते हैं, मन कभी इधर को भागता है, कभी उधर को भागता है। ये सिर्फ़ मीरा है, जो श्रीकृष्ण से दूर है और इस कारण ये मीरा पगलाई हुई है।

तुम्हारा मन पगलाया रहता है न? कभी एक लक्ष्य की ओर भागता है और कभी दूसरे की ओर। कभी सोचते हो, “क्लास अटेंड करूँ,” कभी भागने का मन करता है। कुछ जानते नहीं हो जीवन में कि किधर को जा रहे हो, नहीं पता क्यों पढ़ रहे हो, क्यों नौकरी कर रहे हो, कभी कोई आकर्षित करता है, कभी कोई। ये तुम्हारा मन है, ये तुम्हारा शरीर है, जो श्रीकृष्ण के वियोग में है, जो दूर है चेतना से। मिलन नहीं हो पा रहा इसीलिए बिल्कुल इधर-उधर पगलाया हुआ है, बेचैन है, भटक रहा है। यही जब योग में आ जाता है, योग माने मिल जाना। यही जब योग में आ जाता है, इंटेलिजेंस चमकने लग जाती है, तब यही मीरा बड़ी सुंदर हो जाती है। इसके गीत, इसके काम ऐसे हो जाते हैं कि फिर सैंकड़ों सालों तक याद रखे जाते हैं। इतनी ताक़त और इतना साहस आ जाता है उसमें कि समाज की परवाह करना छोड़ देती है।

तुम भी छोड़ दोगे, जब तुम्हारे कर्म चेतना से निकलेंगे, समझ से निकलेंगे – श्रीकृष्ण माने समझ और जब वहाँ से निकलेंगे तो जैसे मीरा बिल्कुल निर्भीक हो गई थी, तुम भी हो जाओगे। उसको ज़हर से भी डर नहीं लगा था। “राणा ने विष दिया, मानो अमृत दिया,” सुना है न? “मीरा रानी दीवानी कहाने लगी।” तुम्हें भी फिर दीवाना-दीवानी कहलाने में कोई अंतर नहीं होगा। मगन रहोगे। “ऐसी लागी लगन…”

प्रश्नकर्ता: “मीरा हो गई मगन।”

आचार्य प्रशांत: और मगन होने का मतलब समझते हो? एक तरह की खुमारी, एक हल्का सा नशा, जो बिना पिए आता है। एक बेखुदी, जिसमें तुम कहते हो कि, "होने दो जो हो रहा है, हम मौज में हैं।" जब तुम चलते भी हो तो ऐसा लगता है कि नाच रहे हो, बिना बात ही खुश रहते हो। स्थितियाँ कैसे भी रहती हैं तुम मौज में रहते हो, ये मीरा है। जो परवाह नहीं कर रही कि, "मेरी जात क्या है?" राजा के घराने से है, राजपूत है और गुरु किसको बनाया था? एक तथाकथित निचली जात के व्यक्ति को, जूते सीते थे, रैदास। परवाह ही नहीं उसको, वो अच्छे से जान गई है कि जात-पात में कुछ नहीं रखा। ऐसे ही तुम भी हो जाओगे, ये सब छोटी बातों की परवाह करना छोड़ दोगे। पर उसके लिए समझ का जगना ज़रूरी है, समझ ही श्रीकृष्ण है। ये बिल्कुल व्यवाहरिक बात बता रहा हूँ, काम की, अभी की।

जब समझ जागेगी, तो मीरा नाचेगी — उसी का नाम मिलन है, उसी का नाम योग है और उसी का नाम है, जीवन जीने की कला।

मीरा क्या है इसको देखो; एक साहसी औरत और एक समझदार औरत। मीरा वो है जो समझती भी है और नाचती भी है। गंभीर नहीं है वो, कि उदास है, मुँह लटकाकर बैठी हुई है। जब वो कहती है कि, "गिरधर-गोपाल मिलो तड़प रही हूँ," तो उसमें भी उसका आनंद है, वो किसी भी क्षण उदास नहीं है। वो अच्छे से जानती है कि श्रीकृष्ण को तो मरे हज़ारों साल बीत गए। जब वो गिरधर-गोपाल कह रही है, तो ये मत समझ लेना कि वो उसी मुरलीधर को बुला रही है जो यमुना किनारे खेला करते थे। वो सिर्फ़ उसका तरीक़ा है ये कहने का कि, "मुझे जीवन समझदारी में और प्रेम में जीना है।"

गिरधर-गोपाल समझदारी का, चेतना का दूसरा नाम है, प्रेम का दूसरा नाम है। मीरा होना अनिवार्य है हम सब के लिए, जीवन मिला ही इसीलिए है कि हमारी मीरा और हमारे श्रीकृष्ण मिल सकें। और जिनके जीवन में मीरा और श्रीकृष्ण नहीं मिलते, वो बिल्कुल सूखे, उदास घूमते रहते हैं, वो कुछ ऐसा बाहर पाने की कोशिश करते रहते हैं जो सिर्फ़ भीतर मिल सकता है। जो योग भीतर होना चाहिए था, उस योग को वो बाहर चाहते हैं। कैसे? कि, "थोड़ा पैसा मिल जाए, किसी से शादी कर लूँ, थोड़ी इज़्ज़त मिल जाए समाज में, घर बनवा लूँ, गाड़ी ख़रीद लूँ," बस यही सब साधारण बातें। वो कुछ ऐसा बाहर तलाशते हैं जो बाहर मिल नहीं सकता, वो सिर्फ़ भीतर ही मिल सकता है। समझ में आ रही है बात?

मीरा को एक व्यक्ति की तरह मत देखना जो बाहर है। हम सब मीरा और हम सब श्रीकृष्ण। यकीन नहीं हो रहा, कि “हम सब श्रीकृष्ण! मेरी शक्ल देखो, मैं श्रीकृष्ण जैसा लग रहा हूँ? मेरे पास न मोर पंख है, न मुरली है, मैं कैसे श्रीकृष्ण? मुझे तो नाचना भी नहीं आता मैं मीरा कैसे हो गई? मुझे ज़हर पीने से बड़ा डर लगता है। वो सड़क पर नाचने लगी थी नंगे पाँव, मैं ए.सी से बाहर नहीं निकल सकती।" तुम भी वैसे हो जाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा। सड़क पर नाचोगे और सड़क पर नाचना वो नहीं कि फ़िल्मी गाना है और उस पर सड़क पर नाचते हैं।

सड़क पर नाचने का मतलब है कि सारी आफ़तों के बीच भी नाचोगे, कि जीवन में संघर्श चलते रहेंगे और तुम नाचते रहोगे।

परिस्थितियाँ अपना काम करती रहें पर उससे तुम्हारे उत्सव में कोई अंतर नहीं पड़ेगा। तुम कहोगे, "रोज़ पार्टी है, लगातार पार्टी चल ही रही है।" तुम ये नहीं कहोगे कि, "दिवाली आ जाए तो उस दिन खुश हो लेंगे। बर्थडे कब है भाई?" एक सतत लगातार नृत्य चलता रहेगा, सेलिब्रेशन।

मज़ेदार है न मीरा?

“कहानी अच्छी है पर डरावनी है।”

वो सब कुछ जो मीरा ने छोड़ा था हमें तो वही चाहिए, महल चाहिए, पैसा चाहिए, इज़्ज़त चाहिए, हमें तो ये सब चाहिए। मीरा ने छोड़ा नहीं था, मीरा को कुछ मिल गया था। जब हीरे मिल जाते हैं तो ये छोटी-मोटी चीज़ें छूट जाती हैं। जिसको कोहिनूर मिल गया हो वो इधर-उधर के पत्थर रखेगा क्या? वो कहेगा, “जा।” तो मीरा ने त्यागा नहीं था, उसने फेंक दिया था। उसने कहा था कि अरबों की चीज़ मिल गई है तो ये दो-चार रुपयों की चीज़ों का क्या करना है। तो डरो मत कि, "पापा क्या कहेंगे? बड़ी दिक्कत!" उस असली को पा लो तो ये बाक़ी जितनी नकली चीज़ें हैं सब छूट जाएँगी।

तुम कैसे-कैसे तो सवाल करते हो। यहाँ आता हूँ संवाद में कोई कहेगा, "डर बहुत लगता है।" कोई कहेगा, "ये वाली आदत लग गई है कैसे छुड़ाएँ?" ये सब दो कौड़ी की बातें हैं, ये सब छूट जाएँगी जब मीरा बनोगे। फिर ये इधर-उधर की बातें कि दो रुपए खो गए, क्यों उदास हो? 2% नंबर कम आ गए। फिर नहीं ये सब बातें करते।

किसी पिंजरे में बंद हों दो खरगोश और वो इंच-इंच जगह के लिए लड़ते हों और जब मुक्त हो जाते हैं और पूरा जंगल उनका है, तो लड़ेंगे ये ज़रा-ज़रा से इंच के लिए? फिर कहेंगे कि, "हम बादशाह हैं, ये एक इंच की बात कौन करता है?" अभी तुम्हें एक इंच की बात करनी ही इसीलिए पड़ती है क्योंकि पिंजरे में बंद हो। मिल जाओ श्रीकृष्ण से, दूर नहीं हैं श्रीकृष्ण अपने भीतर हैं, मिलो उनसे।

मंदिर मत जाया करो कि श्रीकृष्ण के पाँव छूने हैं, ऐसे हो जाओ कि अपने पाँव छू सको।

और सब वैसे ही हो, क़ाबिलियत सब में है कि अपने ही पाँव छू सको। और उससे बड़ी कोई पूजा होती नहीं, आत्म-पूजा से। आत्म-पूजा तो तब करोगे न जब दूसरों की पूजा करना बंद करो। तुम्हारी नज़र हीरे पर पड़े कैसे, जब तुम्हारी नजर लगातार पत्थरों पर है, छोटी-छोटी चीज़ों पर है?

उस बड़े को जानो, वो तुम्हारा अपना है, तुम्हारे जान पाने की शक्ति, उसी के कारण अभी तुम मुझे समझ पा रहे हो। वही तुम हो, उसी के कारण अभी तुम मुझे सुन पा रहे हो। उसी के कारण अभी ऐसे मौन हो, वही मौन हो तुम — उसी का नाम श्रीकृष्ण है। उसकी अहमियत को जानो और उसी में जीना शुरु कर दो। फिर सब कुछ बढ़िया रहेगा, पढ़ोगे मौज में, खेलोगे मौज में, चलोगे मौज में, बेचैनियाँ हट जाएँगी। परिस्थितियाँ गड़बड़ हो सकती हैं, शरीर भी हो सकता है बीमार हो जाए, हो सकता है कभी रुपया-पैसा न रहे, ये सब चीज़ें आती-जाती रहती हैं, तुम्हारे हाथ में नहीं है, पर परिस्थितियाँ कैसी भी रहेंगी तुम मौज में रहोगे।

ये जो अभी रूखा-रूखा रहता है, उदास, गिरी पड़ी हालत, जैसे रस निचोड़ लिया गया हो, ऐसे नहीं रहोगे। कभी गन्ना देखा है, जब वो रस निकालने की मशीन में से हो कर बाहर आता है? और वो बड़ा ज़ालिम होता है, वो उसको दुबारा डालता है और फिर वो दुबारा बाहर आता है, फिर मोड़ कर डालता है। तो वो जो निचोड़ा हुआ, वैसे ही हमारी शक्ल है। ये कुछ नहीं है, ये वियोग है।

किसी काम में मन नहीं लगता है, कॉलेज आते हो तो ऐसे कि बस। न गर्मी है, न तेजी है, कहने को जवान हो कोई जोश नहीं है। न मन जवानों जैसा है, न शरीर जवानों जैसा है। मीरा नाच लेती थी, ऐसे नहीं थी कि पंद्रह मिनट नाची और हीट स्ट्रोक लग गया और बेहोश हो गई। हम में से ज़्यादातर की तो ये हालत है कि पंद्रह मिनट नाचने के बाद ख़त्म। श्रीकृष्ण को देखा है? श्रीकृष्ण की छवि देखी है? गीता भी बोल सकते हैं और चक्र भी है हाथ में, कि जब ज़रूरत होगी तो पूरी तरह लड़ भी लेंगे और समझ इतनी है कि उसमें से गीता आ जाती है।

सब तुम्हारे भीतर है। ये सब कुछ तुम्हारी अपनी पोटेंशियलिटी हैं, इनको पाओ। ऐसे थोड़ी कि जितनी मोटी तो श्रीकृष्ण की उँगली है, उतनी मोटी तो यहाँ पर कई लोगों कि कलाईयाँ हैं। जवानी का मतलब समझते हो?

दिनकर की पक्तियाँ हैं:

पत्थर-सी हों मांसपेशियाँ, लोहे-से भुज-दण्ड अभय, नस-नस में हो लहर आग की, तभी जवानी पाती जय।

ऐसा कुछ हमारे पास है नहीं। कहाँ पत्थर सी मांसपेशियाँ? यहाँ ऊपर तीसरी मंजिल पर एक जिम है, वो धूल फांक रहा है। कितने लोग जाते हो?

प्रश्नकर्ता: सर बंद रहता है।

आचार्य प्रशांत: अरे बंद इसीलिए हो गया क्योंकि तुम जाते नहीं हो। जिम बंद हो गया है, पर सड़क पर पत्थर तो अभी भी हैं। दो पत्थर ही लेने हैं, उस पर कपड़ा ही बाँधना है और बस काफ़ी है। और कुछ नहीं है तो खुला मैदान तो है न, उसमें दौड़ो। क्या बाँधता है तुम्हें? क्या रोकता है? उसके लिए बस उत्साह चाहिए। पर बुझा-बुझा मन न खेल पाएगा, न दौड़ पाएगा, न पढ़ पाएगा, न नाच पाएगा।

वो बुझा हुआ इसीलिए है क्योंकि अपनी समझ पर, अपने श्रीकृष्ण पर विश्वास नहीं है, श्रद्धा नहीं है, दूसरों के इशारों पर चले जा रहा है। जो तुम्हारे भीतर ही है उसके साथ नहीं होना चाहते। ये नहीं कहते कि, "ज़िंदगी अपने श्रीकृष्ण के मुताबिक बिताऊँगा।" तुम कहते हो कि, "जो दूसरे कह दें वही ठीक।" बाहर तुमने हज़ार मालिक बना रखे हैं। कहा था न मैंने कि कंकड़-पत्थर जोड़ रखे हैं और भीतर जो असली चीज़ है, उससे कोई सरोकार नहीं है।

मीरा एक श्रीकृष्ण की ओर देखती थी, हज़ारों से वो नहीं लगी रहती थी। तुम्हारी ज़िंदगी में हज़ारों हैं।

तुम ये नहीं कहते कि "अपनी एक चेतना, एक समझ के आधार पर चलूँगा," तुम्हारे सत्तर मालिक हैं। "पापा क्या कर लें?" दोस्तों ने कुछ आकर बोल दिया तो वो भी तुम्हारा मालिक हो गया। दुनिया क्या कर रही है उसकी ओर देखते रहते हो और उधर को ही चल दिए। अपने जानने से कुछ होता कहाँ है? समझ रहे हो बात को?

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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