प्रचलित धारणा है कि अध्यात्म में आकर आदमी अकर्मण्य हो जाता है, यह धारणा बिल्कुल ग़लत है। अध्यात्म तो आलसी को भी कर्मनिष्ठ बना देता है। श्रीकृष्ण की पूरी सीख ही यही है — युद्ध सही रखो और परिणाम की परवाह मत करो। आध्यात्मिक समर्पण का अर्थ होता है — संग्राम। यदि संग्राम नहीं है तो जीवन कायरता भरा समर्पण है। आध्यात्मिक आदमी हमेशा चुनौतियों से जूझता हुआ मिलेगा। जो लड़ गया, वह समर्पित है और जो पीठ दिखा रहा है, वह घोर कर्ताभाव रखता है।
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तस्मादसक्त: सततं कार्यं कर्म समाचर । असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुष: ।।३.१९।।
इसलिए अनासक्त भाव से सदा शुभ कार्य या कर्तव्य कर्म उत्तम रूप से करते रहो, क्योंकि मनुष्य निष्काम रहकर कर्म का अनुष्ठान करते हुए श्रेष्ठ पद प्राप्त करता है।
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 3, श्लोक 19
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आचार्य प्रशांत: हमने समझा कि श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि मेरी तरह रहो अर्जुन; अनासक्त रहकर व्यक्तिगत रूप से अपने लिए कुछ न चाहते हुए भी सतत-निरंतर घोर कर्म में रत रहो।







