प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, संसार से हमारे सम्बन्ध के बारे में बताइए।
आचार्य प्रशांत: जगत है किसके लिए? अहंकार के लिए। तो ‘जगत’ शब्द का प्रयोग करते ही एक नहीं, दो की बात हो रही है। जब हम कहते हैं, ‘आओ, जगत की बात करें’, तो ऐसा लगता है किसी एक इकाई की बात कर रहे हैं; किस इकाई की बात कर रहे हैं? जगत की। जबकि जैसे ही आप कहते हो, ‘जगत’, तो आप एक की नहीं, दो की बात कर रहे हो। दूसरा कौन है? जो जगत की बात कर रहा है।
जगत ख़ुद तो आकर कह नहीं रहा है न कि मेरी बात करो? कोई और है न जो जगत को देख रहा है, जगत के विषय में चर्चा करना चाहता है; जगत का दृष्टा। जगत दृश्य है। दो हैं; और इन दोनों के विषय में हम देख चुके हैं कि कैसे ये परस्पर आश्रित हैं। है न?
जगत की कोई बात ही न करे, अगर दृष्टा न हो उसका। और जो दृष्टा है जगत का, वो जगत के बिना रह ही नहीं सकता। कोई देखा है ऐसा व्यक्ति जो दुनिया में न रहता हो? मुझे कोई ऐसा इंसान दिखाओ जो दुनिया में नहीं रहता। वो, ये हो सकता है किसी और दुनिया में रहता हो, ये भी हो सकता है वो अपनी दुनिया में रहता हो, लेकिन ऐसा तो नहीं हो सकता न कि वो दुनिया में ही नहीं रहता?
तो इंसान का अर्थ ही है — दुनिया, जगत, संसार। संसार की कोई बात नहीं कर सकता, अगर नहीं होगा इंसान। और इंसान है अगर, तो दुनिया में ही है। इंसान किस पर आश्रित है?
प्र: दुनिया पर।







