समय: एक विशेष सत्र, मात्र गंभीर जिज्ञासुओं के लिए || आचार्य प्रशांत कार्यशाला (2023)

आचार्य प्रशांत: स्वागत है! और मेरी मेज़ पर ये दोनों रीडिंग्स (पठन सामग्री) रखी हुई हैं जो आपको दी गयी थीं पढ़ने के लिए। तो कितने लोग हैं जो इसमें से कम-से-कम आधी सामग्री पढ़ पाये? आधी भी जिन्होंने पढ़ ली हो वो बता दें। (कुछ श्रोता हाथ उठाते हैं)
ठीक है। कितने लोग हैं जो एक-चौथाई भी नहीं पढ़ पाये हैं? (कुछ श्रोता हाथ उठाते हैं) कोई समस्या की बात नहीं है। हम यहाँ पढ़ने के लिए ही बैठे हैं। आप बता देंगे तो मुझे सुविधा रहेगी। अच्छा, और कितने लोग हैं जो समय की कमी के कारण या किसी अन्य वजह से एकदम देख ही नहीं पाये हैं, जो ये सामग्री है? बता दीजिए साफ़-साफ़। (कुछ श्रोता हाथ उठाते हैं)
ठीक है, ठीक है। मुझे ऐसा लग रहा था कि ऐसा होगा, तो इसलिए मैं चाहता था कि रजिस्ट्रेशन्स (पंजीकरण) भी जल्दी हो जाएँ और आपको जो सामग्री दी जाए वो इतनी ज़्यादा रहे भी नहीं। लेकिन इस फ़ॉर्मेट (प्रारूप) पर अभी पहली बार प्रयोग कर रहे हैं, अगली बार सामग्री इससे कम रहेगी, क्योंकि मैं देख पा रहा हूँ कि ज़्यादातर लोग नहीं ही पढ़ पाते हैं उतना। और दूसरा मैं चाहता था कि आपको ये कम-से-कम दस दिन पहले मिल जाए। लेकिन शायद ये हुआ है कि ज़्यादातर लोगों ने रजिस्ट्रेशन ही दस दिन के भीतर-भीतर किया है, तो उनको पर्याप्त समय मिला नहीं है।
हम ऐसे करते हैं कि हमारा जो विषय है — काल, समय — सबसे पहले उसका जो सैद्धान्तिक पक्ष है वो आपके सामने रख देता हूँ, ताकि एक बुनियाद बन जाए। और उसके बाद फिर आपके प्रश्न ले लेंगे। ठीक है? तो जो नहीं भी पढ़ पाये हैं उनको भी एक आधार मिल जाएगा। और फिर वो सवाल उस आधार पर कुछ कर पाएँगे। ठीक है?
तो शुरुआत वहीं से होगी जहाँ से शुरुआत होती है — जो प्रथम है, प्रधान है, जिसको आदि बिन्दु कहते हैं। शुरुआत वहाँ से हम करेंगे जहाँ दिक्-काल नहीं है, जहाँ कुछ भी नहीं है — न स्पेस






