बहुत पास है, लेकिन दिखता नहीं || आचार्य प्रशांत, वेदान्त पर (2020)

आचार्य प्रशांत: हम जैसे जीते हैं, हमारे लिए दो हैं, एक संसार और एक हम। संसार और एक हम, कुछ हम संसार की बात करते हैं, कुछ हम अपनी बात करते हैं। जब हम अपनी बात करते हैं तो भी हम अपने आप को देखते उन्हीं उपकरणों से और उसी तरह हैं जैसे हम संसार को देखते हैं। तो जिन आँखों से हम इन दीवालों को देख रहे हैं, इस पंखे को देख रहे हैं पूरी दुनिया को देख रहे हैं उसी आँख से हम अपने शरीर को भी देखते हैं और इस शरीर को ही हम नाम दे देते हैं ‘मैं’ का, ठीक है।
तो ये जो पूरा विभाजन हमने करा है संसार और अपने बीच में, वो वास्तव में विभाजन दृश्य जगत के क्षेत्र के मध्य का है। समझिएगा, आपको दुनिया दिखाई दे रही है दिखाई देने वाली दुनिया में दो हिस्से हैं, एक हिस्सा है ये मेज़ और दूसरा हिस्सा है इस मेज़ पर रखा हुआ ये हाथ। इस मेज़ को मैं संसार कह देता हूँ, इस हाथ को मैं, ‘मैं’ कह देता हूँ लेकिन मेज़ में और संसार में, मेज़ में और इस हाथ में समानता है और वो ये कि दोनों ही है दृश्य जगत के ही हिस्से। दृश्य जगत माने वो जगत जो मुझे आँखों से बाकी इन्द्रियों से अनुभव होता है, ठीक है। हम जब कहते भी हैं कि हम खुद को जानना चाहते हैं या हम जब कहते भी हैं कि हम अपनी देखभाल कर रहे हैं या अपने बारे में कुछ ज्ञान इकट्ठा कर रहे हैं? तो वास्तव में हम वो जानकारी इकट्ठा कर रहे होते हैं आँखों से देखी गयी दुनिया के बारे में ही, आँखों से ही देखी जा रही दुनिया के एक हिस्से को हमने नाम दे दिया है ‘मैं’ का।
अच्छे से समझिएगा! हमारा जो ‘मैं’ भी है वो आँखों के पीछे वाला नहीं है वो आँखों के आगे वाला है। इन्हीं आँखों ने इस मेज़ को देखा और इन्हीं आँखों ने मेज़ पर रखे हाथ को देखा ठीक है। तो आप चाहे मेज़़ के बारे में बात करें और जाँच-पड़ताल करें, चाहे आप हाथ का अन्वेषण करें, ये दोनों ही चीज़ें आती हैं ‘अविद्या’ के अन्तर्गत, अविद्या, ठीक है।
तो ‘अविद्या’ का मतलब ये नहीं है कि आप उसकी बात करने लग जाएँ जिसको आप ‘मैं’ समझते हैं, जिसको आप सब्जेक्ट, अनुभोक्ता, ज्ञाता जानते हैं। हम तो चाहे जिस भी चीज़ की बात करें वो आएगा अविद्या के अन्तर्गत ही।






