दृष्ट्वा मां त उपव्रज्य कृत्वा पादाभिवन्दनम्। ब्रह्माणमग्रत: कृत्वा पप्रच्छ: को भवानिति।।
“मुझे देखकर सनकादि ब्रह्माजी को आगे करके मेरे पास आये और उन्होंने मेरे चरणों की वन्दना करके मुझसे पूछा कि आप कौन हैं?”
~ हंस गीता, श्लोक २०
इत्यहयं मुनिभि: पुष्टस्तत्त्वजिज्ञासुभिस्तदा। यदवोचमहं तेभ्यस्तदुद्धव निबोध मे।
प्रिय उद्धव! सनकादि परमार्थतत्त्व के जिज्ञासु थे; इसलिए उनके पूछने पर उस समय मैंने जो कुछ कहा, वह तुम मुझे सुनो। ~ हंस गीता, श्लोक २१
वस्तुनो यदानानात्वमात्मन: प्रश्न ईदृश:। कथं घटेत वो विप्रा वक्तुर्वा मे क आश्रय:।।
ब्राह्मणों यदि परमार्थरूप वस्तु नानात्व से सर्वथा रहित है, तब आत्मा के संबंध में आप लोगों का ऐसा प्रश्न कैसे युक्ति संगत हो सकता है? ~ हंस गीता, श्लोक २२







