जगते में जागे नहीं सोते नहीं सोए, वही जाने कृष्ण को दूजा न कोय ||आचार्य प्रशांत, श्रीकृष्ण पर (2015)

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानी सा निशा पश्यतो मुनेः।।
वो जो सबके लिए रात है, उसमें संयमी जागृत रहता है।
वह जिसमें सब जगे होते हैं, वह दृष्टा मुनि के लिए रात्री है।
आचार्य प्रशांत: भगवद्गीता के दूसरे अध्याय से है। प्रश्न है कि सूफियों के बारे में चर्चा करते हुए आपने कहा था कि रात को जागने का बड़ा महत्त्व है। क्या कृष्ण भी ऐसा ही कुछ कह रहे हैं? रात से क्या अर्थ है? क्या प्राकृतिक रात-दिन की ही बात की जा रही है या कुछ और अर्थ निहित्त है? कृपया स्पष्ट करें।
एक दृष्टा के, संत के, कृष्ण के, कबीर के वचनों को वैसे ही नहीं सुना जा सकता या पढ़ा जा सकता कि जैसे हमारी आम बोल चाल की भाषा हो। प्रयोग उन्हें भी उन्हीं शब्दों को करना पड़ेगा जिनका आम जन मानस करता है क्योंकि भाषा वही है। पर भाषा का अर्थ ही होता है बंटवारा, नानात्व का आ जाना, विविधताओं को देखना। हर शब्द एक अलग वस्तु की ओर इशारा करता है।






