जिसने ये जान लिया, वो फिर कभी मरता नहीं || आचार्य प्रशांत (2023)

आचार्य प्रशांत: दो झूठ हैं जिनको एक साथ बोलना पड़ता है, और उन्हें हमेशा जोड़े में चलना ही पड़ेगा उनमें से सिर्फ़ एक झूठ पकड़ना मुश्किल हो जाएगा। जो पहला झूठ है वो अपनेआप को अहंकार मानने की मजबूरी है और जो दूसरा झूठ है वो बोलना पड़ता है आत्मा होने के कारण। इन दोनों झूठों को समझिएगा — अगर आपको स्वयं को अस्तित्वमान घोषित करना है, उस अर्थ में जिस अर्थ में हम कहते हैं कि हम हैं, तो आप सम्पूर्ण या समष्टि नहीं हो सकते। हम किस अर्थ में कहते हैं कि हम हैं? ये दुनिया है और इस दुनिया में हम हैं। ठीक है न?
जब भी हम कहते हैं कि हम हैं, तो उससे हमारा आशय होता है कि ये रहा संसार और इस संसार में हम हैं। हम इसी संसार से आये हैं, हम ऐसा कहते हैं। इसी संसार से हमारा भरण-पोषण होता है, इसी संसार से हमें हमारी मनचाही वस्तुएँ मिलती हैं, इसी संसार से हमें भय भी मिलता है, यहाँ कुछ हमसे छिन भी सकता है, यही हमारे सब रिश्ते नाते हैं। तो जब भी आप कहते हैं, ‘मैं हूँ’ तो आप बस ‘मैं’ नहीं कहते; आप कहते हैं, ‘मैं और संसार।’ भले ही आप संसार का नाम न लें पर मैं कहने भर में ‘मैं और संसार’ दोनों की आप बात कर देते हैं। ठीक है न?
तो मैं को अपने होने के लिए संसार चाहिए। आप नहीं कह पाऍंगे कि आप हैं; कोई पूछे कहाँ हैं? तो कहे, ‘कहीं नहीं हूँ।’ कोई पूछे कब हैं? तो कहें, ‘कभी नहीं हूँ।’ कोई पूछे, ‘क्या हैं आप?’ तो आप कहें, ‘कुछ नहीं हूँ।’ ऐसा नहीं हो पाएगा। सिर्फ़ आप यही तीन प्रश्न भी ले लीजिए तो आपकी हस्ती के साथ तीन जोड़ीदार तो यहीं जम गये। आप हैं; कोई पूछे, ‘कहाँ हैं?’ तो आपको बताना पड़ेगा, न बतायें वो अलग बात है पर कहीं होंगे, स्थान। तो मैंने अपनेआप को एक स्थान पर सीमित कर लिया, अपनेआप को मैं बोलते ही। ठीक है?
आप कहें, ‘हूँ’, तो कोई पूछेगा, ‘कब?’ आपने अपनेआप को एक समय पर भी सीमित कर लिया, आप ये नहीं कह सकते कि समय का कोई भी क्षण हो, मैं तो हूँ ही हूँ! बारहवीं शताब्दी में आप थे क्या? और बत्तीसवीं शताब्दी में आप होंगे क्या? तो एक तो आपने अपनेआप को एक स्थान पर सीमित कर लिया, एक समय पर सीमित कर लिया और फिर कोई ये भी पूछ सकता है कि हो तो क्या हो? तो आपने अपनेआप को एक पहचान में भी सीमित कर लिया।






