आचार्य प्रशांत: देखते हैं दुनिया को; उसमें पहली डुएलिटी (द्वैत) तो पैदा होने के साथ ही आ जाती है। पहली डुएलिटी है कि — ये मैं हूँ और ये रहा संसार, और ये दोनों अलग-अलग हैं। पैदा होने के कुछ ही समय बाद शरीर का बोध आ जाता है, और फिर वो और गहरा, और गहरा ही होता जाता है। मैं हूँ-संसार है, मैं हूँ-संसार है। दोनों अलग-अलग हैं, दोनों साथ-साथ हैं। दोनों अलग-अलग हैं और दोनों साथ-साथ हैं। उसी द्वैत को और आगे बढ़ाती है — ‘भाषा’। भाषा कहती है! दो संसार है — ‘एक वस्तुओं का, एक विचारों का।’ तो मेरे सामने ये बोतल रखी हो सकती है, ये अपनेआप में एक ऑब्जेक्ट (वस्तु) है, और एक मन है जिसमें उस ऑब्जेक्ट की एक छवि है। तो द्वैत निर्मित हो गया, देयर इज़ इन ऑब्जेक्ट एंड देयर इज़ इन इमेज (एक वस्तु है और एक छवि है)। एक है वर्ल्ड ऑफ़ सेंसेस(इन्द्रियों का जगत), और एक है वर्ल्ड ऑफ़ आइडियाज़ (विचारों का जगत)। वर्ल्ड ऑफ़ सेंसेज़ वो है! ‘जो यहाँ दिख रहा है, जिसको आप छू सकते हैं, पकड़ सकते हैं, देख सकते हैं।’ और वर्ल्ड ऑफ़ आइडियाज़ वो है! ‘जो इसकी छवि मन में निर्मित हो रही है।’
एक द्वैत पहले से ही था, एक द्वैत भाषा ने जोड़ दिया। और अभी उम्र कुछ भी नहीं हुई है हमारी। फिर हम थोड़ा और आगे बढ़ते हैं, तो एक तीसरा द्वैत और जुड़ जाता है― ‘वो है धर्म का।’ ऑर्गेनाइज़्ड रिलीजन (संगठित धर्म) कि एक ये दुनिया है, और एक कोई इससे पार की दुनिया है। एक कोई क्रिएटर (निर्माता) है, एक कोई क्रिएशन(निर्माण) है। एक है वर्ल्ड ऑफ़ सफरिंग (दुख की दुनिया), और एक है वर्ल्ड ऑफ़ ब्लिस (सुख की दुनिया)। बहुत ज़्यादा समय बीतता नहीं है, और द्वैत में हमारी ट्रेनिंग बिलकुल पक्की हो जाती है। एकदम गहराई से द्वैत बैठ जाता है, और वो सत्य ही लगने लगता है। कि ऐसा ही तो है, ऐसा ही तो हैं, हाँ ठीक है। नतीजा ये होता है― ‘कि जीवन भर कुछ भी वो नहीं रह जाता, जो वो है।’ बस वो अपने विपरीत-का-विपरीत बनकर रह जाता है।
द्वैत में जीने का अर्थ; ये होता है कि ‘मैं डायरेक्ट ऑब्जर्वेशन (प्रत्यक्ष अवलोकन) अब नहीं कर सकता।’ मैं किसी भी वस्तु को, व्यक्ति को, संसार को, जीवन को सिर्फ़ उसके विपरीत-के-विपरीत के रूप में जानता हूँ। एक तुलनात्मक रूप में जानता हूँ। मैं कुछ भी देखता हूँ, तो मैं उसको नहीं देखता। मैं उसको, उसके









