
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, शत-शत नमन। श्री अष्टावक्र जी, अध्याय दो के श्लोक नंबर 16 में कहते हैं, कि “द्वैत ही दुख का मूल है और अद्वैत-ज्ञान के अलावा इसका कोई इलाज नहीं है।”
“द्वैत ही दुख का मूल है,” ऐसा क्यों कहा गया है? इस पर थोड़ी स्पष्टता दीजिए।
आचार्य प्रशांत: द्वैत क्या है?
कई तरीकों से द्वैत की व्याख्या की गई है, परिभाषित किया गया है। लेकिन अगर हमारा मन द्वैत में जी रहा है, तो उसका अर्थ क्या है? और मन के लिए द्वैत के अर्थ और अंजाम क्या होते हैं? हम उसी पर ज़्यादा ध्यान देंगे अभी, अगर हम समझना चाहते हैं, कि जैसा आपने कहा कि द्वैत दुख का मूल है, ऋषि अष्टावक्र को उद्धृत करते हुए। तो दुख तो मन के लिए होता है न, मन दुख का अनुभव करता है। तो मन के लिए द्वैत क्या होता है? यह हम समझना चाहेंगे।
मन के लिए द्वैत होता है यह धारणा, यह विश्वास कि मैं हूँ और बाहर एक दुनिया है और मैं अधूरा हूँ। यह जो बाहर दुनिया बिखरी हुई है, इससे मुझे पूरापन मिल जाएगा। मैं हूँ, बाहर एक दुनिया है, यह दोनों अलग-अलग हैं और दोनों की अपनी पृथक सत्ता है। दोनों एक-दूसरे से अलग हैं और दोनों हैं, मिथ्या दोनों में कोई नहीं है; दोनों हैं। तो यहाँ से आया द्वैत कि दो हैं, एक मैं हूँ और एक मुझसे बाहर यह एक अनंत संसार है जो पसरा हुआ है। मैं अधूरा हूँ और इस संसार से मुझे पूर्ति मिल सकती है, क्योंकि हम दोनों अलग-अलग हैं न। हम दोनों अलग-अलग हैं, तो इस संसार के पास कुछ ऐसा हो सकता है, बल्कि है, जो मेरे पास नहीं है। समझना।
इस संसार के पास ऐसा कुछ हो सकता है जो मेरे पास नहीं है, क्योंकि मैं तो बहुत आधा-अधूरा हूँ। तो फिर संसार आपके लिए क्या हो जाएगा? मैं हूँ, अपूर्ण हूँ, क्षुद्र हूँ, अतृप्त हूँ। और बाहर यह संसार है, इतना बड़ा। ठीक? और यह संसार मेरे लिए ख़तरा भी हो सकता है। यह मुझे भय, कष्ट, मृत्यु दे सकता है। और यह संसार मेरी कामनाओं की पूर्ति का साधन और कारण भी बन सकता है। साधन और कारण तो छोड़ दो, यह संसार मेरे लिए साध्य भी बनेगा, क्योंकि मुझे जो चाहिए वही तो है। तो अंततः मुझे संसार ही चाहिए।
तो फिर मेरा और संसार का रिश्ता क्या हो जाएगा? द्वैत में व्यक्ति का और जगत का रिश्ता क्या हो जाएगा? भय और लोभ का। और लोभ इतना बढ़ेगा कि वह जगत को ही पूजना शुरू कर देगा, क्योंकि जगत से ही उसे प्राप्ति होनी है; तो जगत की ओर देखेगा, जगत को पूजने लगेगा। वह सीधे नहीं कहेगा कि “हे संसार, मैं तेरी पूजा कर रहा हूँ।” वह संसार में किसी तरह की छवियाँ निर्मित करेगा और उनकी पूजा शुरू कर देगा। क्योंकि पूरे संसार की पूजा कैसे करोगे, बड़ा मुश्किल हो जाता है। संसार में भाँति-भाँति की चीज़ें हैं, हर चीज़ सबको नहीं चाहिए न। सबको सब चीज़ें नहीं चाहिए। हालाँकि संसार में ऐसा कुछ भी नहीं है जो किसी को नहीं चाहिए।
तो पूरे संसार की आप पूजा नहीं करोगे, लेकिन संसार में आपको जो कुछ भी वांछनीय है, जिस भी चीज़ की आपको कामना है, आप उन सबको इकट्ठा करके उनकी पूजा करना शुरू कर दोगे। बात समझ में आ रही है?
और सबके लिए संसार में ऐसा कुछ न कुछ, बल्कि बहुत कुछ है ज़रूर, जो उनको चाहिए है। ठीक है न? जो चीज़ आप त्याग देते हो, वह किसी और को चाहिए होती है। जो आपके लिए बिल्कुल त्याज्य है, वह किसी और की कामना बन जाता है। ऐसा होता है कि नहीं? और संसार में कुछ भी ऐसा नहीं जो सबकी कामना हो, और कुछ भी ऐसा नहीं जो सबको त्याज्य हो। ले-दे कर के जिसको जो कुछ भी चाहिए, संसार से ही चाहिए। तो सब फिर संसार में निर्मित करते हैं अपने लिए एक पूज्य छवि। वह जो पूज्य छवि होती है, उसके माध्यम से आप कुछ नहीं कर रहे, संसार की ही आराधना कर रहे हो। आप संसार के ही सामने नमित हो गए हो, संसार की पूजा करना शुरू कर देते हो।
उसका प्रमाण यह है कि फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आप किसको पूजते हो। पूजते आप कामना के लिए ही हो, और कामना की जो वस्तु होती है, बताइए वह कहाँ होती है? स्थित कहाँ होती है वह? संसार में। कामना की जो वस्तु है आपकी, वह सदा स्थित कहाँ होती है? पाई कहाँ जाती है? संसार में ही तो पाई जाती है न।
तो द्वैत को ऋषियों ने इसलिए कहा है दुख का मूल, क्योंकि द्वैत हमें भ्रम में डालकर हमें भिखारी बना देता है।
हमारी सच्चाई यह है कि अनंत हैं हम और पूर्ण हैं हम, और कहीं इधर-उधर हाथ जोड़ने की, भिखारी बनने की कोई आवश्यकता है नहीं। पर द्वैत हमें यह जतला देता है कि एकदम खाली हैं हम, दरिद्र हैं हम, बेसहारा हैं हम, और हमारा मालिक बना देता है संसार को। और फिर इंसान जीवन भर कटोरा लिए-लिए फिरता है। इसलिए अष्टावक्र कह रहे हैं, कि द्वैत ही दुख का मूल है।
अब बात थोड़ी और आगे बढ़ेगी। एक तो यह है कि मैं भिखारी बन गया और संसार से भीख माँगने लगा। यह मेरी बात थी, मैं भिखारी बन गया, मैं संसार से भीख माँग रहा हूँ। अब ज़रा संसार की बात करते हैं कि संसार भीख देने में सक्षम कितना है? मैंने तो मान लिया है कि दुनिया से यह ले लूँ, वह ले लूँ। संसार भीख दे भी पाएगा क्या?
यह संसार क्या है? समझने वालों ने पाया है और समझाया है कि संसार आप ही की प्रतिछवि है, प्रतिध्वनि है, प्रतिबिंब है, अनुगूँज है। आप चल रहे हो, आपकी पदचाप है। संसार की आपसे पृथक कोई सत्ता नहीं है, आप ही का प्रक्षेपण है संसार। यह बात समझने में थोड़ी-सी जटिल हो जाती है कि संसार मेरा ही प्रक्षेपण कैसे है।
दो अर्थों में संसार हमारा प्रक्षेपण होता है, अस्तित्व के तल पर और अर्थ के तल पर। अस्तित्व के तल पर संसार ऐसे हमसे भिन्न नहीं होता, कि क्या आपके लिए संभव है कि आप संसार को द्विआयामी देख पाएँ, या चार आयामों में देख पाएँ? आप संसार को त्रिआयामी, थ्री-डायमेंशनल ही क्यों देखते हो? क्योंकि आपका अपना शरीर त्रिआयामी है, क्योंकि आपकी अपनी आँखें तीन आयामों के अलावा कुछ और देख भी नहीं सकतीं।
तो संसार को जो हमने त्रिआयामी सत्ता दी है, जो थ्री-डायमेंशनल एग्ज़िस्टेन्स संसार का हमें प्रतीत होता है, वह वास्तव में संसार का नहीं है, वह हमारा है। यूँ ही कल्पना कर लीजिए, ऐसा हो नहीं सकता पर कल्पना कर लीजिए कि कोई ऐसा जीव है, कोई कीट है, जो दो ही आयामों में होता है, एकदम चपटा है, ठीक है? एकदम चपटा। अब एकदम चपटा कुछ हो नहीं सकता; कुछ न कुछ तो उसको ऊँचाई चाहिए, भले ही एकदम न्यून ऊँचाई हो।
मान लीजिए कुछ एकदम चपटी चीज़ है, टू-डायमेंशनल। वह सिर्फ़ एक्स-वाई प्लेन में होती है। उसकी दुनिया भी फिर कैसी होगी? समझ में आ रही है बात? लीजिए, पूरी दुनिया हमारी यहीं धराशायी हो गई। हम कहते हैं, दुनिया ऐसी है, दुनिया वैसी है। भाई, दुनिया जैसी भी है, वह तुमको वैसी इसलिए प्रतीत हो रही है क्योंकि यह तुम्हारा जो मस्तिष्क है, यह सिर्फ़ थ्री-डायमेंशनल प्रोसेसिंग कर सकता है। तो इसीलिए तुम्हें यह थ्री-डायमेंशनल यूनिवर्स जो है, वह एक्सपीरियंस होता है। ये तुम्हारी आँखें तीन आयामों के अलावा कुछ, ये तुम्हारे कान एक बहुत सीमित फ़्रीक्वेंसी रेंज से आगे-पीछे सुन नहीं सकते। समझ में आ रही है बात?
हम अपने शरीर को भी कैसा देखते हैं? थ्री-डायमेंशनल देखते हैं। तो जिसका शरीर थ्री-डायमेंशनल है, उसे इस थ्री-डायमेंशनल ऑब्जेक्ट को रखने के लिए एक थ्री-डायमेंशनल स्पेस चाहिए न? अगर आपको लगता है कि आपका शरीर त्रिआयामी है, तो कोई थ्री-डायमेंशनल चीज़ रखने के लिए आपको क्या चाहिए होगा? टू-डायमेंशनल में काम चल जाएगा?
(श्रोता नहीं में सिर हिलाते हैं)।
तो इसलिए एक थ्री-डायमेंशनल हमने स्पेस अपने चारों ओर निर्मित कर रखा है। ठीक है? शरीर रहता है थ्री-डायमेंशन्स में और मन रहता है चौथी डायमेंशन, टाइम में। तो फिर चौथी डायमेंशन, टाइम, भी हमने निर्मित करी है। जो हमें अपने चारों ओर जो यह एग्ज़िस्टेन्शियल रियलिटी अनुभव होती है, उसमें यही तो होता है न एक्स, वाई, ज़ेड, टी। एक्स-वाई-ज़ेड बॉडी है, टी माइंड है। तो यह जो आप दुनिया देख रहे हो, यह आपसे पृथक नहीं है।
यह तो बात हुई दुनिया के अस्तित्व की। अब दुनिया का अर्थ ले लीजिए। आप सोचते हो कि दुनिया के पास जो अर्थ हैं, वो दुनिया के अपने हैं। नहीं, दुनिया के अपने नहीं हैं। किसी भी विषय में, ऑब्जेक्ट में, आप जो अर्थ देखते हो वह अर्थ उस ऑब्जेक्ट का नहीं है वह आपका है। आप किसी भी ऑब्जेक्ट में जो अर्थ देखते हो, वह अर्थ उस ऑब्जेक्ट में नहीं है; वह अर्थ आपका है।
एक गाय है, वह एक शेर को दिखती है। बताओ, शेर ने अभी-अभी जो देखा, उसका अर्थ क्या है शेर के लिए? मांस, शिकार, है न? हत्या, मृत्यु। और वही गाय उसके अपने बछड़े को दिखती है। बताओ, अभी-अभी बछड़े ने जो देखा, उसका अर्थ क्या है उसके लिए? दूध, मातृत्व, ममता। एक ही अर्थ होता है क्या किसी भी विषय का, किन्हीं भी दो लोगों के लिए? बोलिए। मैं भी जो आपसे बातें अभी यहाँ पर कर रहा हूँ, क्या उन बातों का आप सबके लिए एक ही अर्थ है, साझा अर्थ है? बिल्कुल नहीं।
ये बहुत साधारण बातें की गई हैं और अभी बहुत कम बातें की गई हैं, लेकिन फिर भी आप जितने लोग बैठे हुए हैं, सबने इन बातों का अपने-अपने अनुसार कुछ अलग-अलग अर्थ कर लिया होगा। समझ में आ रही है बात कि नहीं?
तो यह जो दुनिया है, यह वास्तव में आपसे बिल्कुल जुड़ी हुई चीज़ है। इतना आपको नहीं भी समझ में आ रहा होगा कि मैं ही यह दुनिया हूँ, कि मेरी ही छाया यह दुनिया है, तो भी इतना तो स्पष्ट हो रहा है न, कि मैं और दुनिया बिल्कुल एक सिक्के के दो पहलू हैं। इतना समझ में आ रहा है न?
द्वैत में यह बात समझी ही नहीं जाती। द्वैत कह देता है, मैं अलग हूँ, दुनिया अलग है। मैं अलग हूँ और उधर कोई और है जो अलग है। और जब उधर कोई और अलग है, तो फिर यह आशा उठ खड़ी होती है कि उधर वाले के पास कुछ मुझसे बहुत भिन्न और बहुत विशेष होगा, जो मेरे पास नहीं है, तो प्राप्ति हो जाएगी। अगर दूसरा बहुत अलग है, तो उससे कोई बहुत अलग चीज़ पाने की आशा भी आ जाएगी न।
अद्वैत में आप समझ जाते हो, कि अरे, यह दोनों तो एक ही माया के दो चेहरे हैं: मैं और जगत, जीव और जगत, स्वयं और संसार, यह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। और दोनों एक-दूसरे के बिना जी नहीं सकते। जीव कहता है, मैं जगत से आया। और जीव जब आँखें खोलता है तो उसने जगत को पाया। कौन कहेगा जगत है अगर जीव न हो? और जीव जैसा होता है, जगत उसके अनुसार होता है। तो जगत को रूपरेखा जीव देता है। और दूसरी ओर, जगत अगर न हो तो जीव कहाँ से आएगा? तो कुछ पता नहीं कि दोनों में पहले कौन आया, मुर्गी कि अंडा, द्वैत का यह हाल है। समझ में आ रही है बात?
अब अगर आप द्वैतवादी हो गए, तो आपको लगेगा कि मुझसे अलग कहीं कुछ है जो बहुत भिन्न है और वो मुझे मिल सकता है। कामना के माध्यम से मिल जाए, चाहे पूजा के माध्यम से मिल जाए, किसी भी माध्यम से मिल जाए। मिलेगा मुझसे बाहर कहीं कुछ है उससे। साधन बदल सकते हैं।
द्वैतवादी नास्तिक होगा; जिस अर्थ में नास्तिक शब्द का उपयोग होता है। द्वैतवादी नास्तिक होगा, वह कहेगा, मैं मेहनत करूँगा, मैं कमाऊँगा और दुनिया से बहुत सारा पैसा अर्जित करके लाऊँगा। और द्वैतवादी आस्तिक होगा, वह कहेगा, मेरे भगवान हैं बाहर मुझसे दूर कहीं; अलग है न वो। मैं खूब साधना करूँगा, मैं खूब पूजा करूँगा और वो प्रसन्न हो के मुझे वरदान दे देंगे। मुझे तृप्ति हो जाएगी।
द्वैतवादी नास्तिक भी हो सकता है, द्वैतवादी आस्तिक भी हो सकता है। लेकिन दोनों का मानना एक अर्थ में बिल्कुल साझा रहेगा, क्या? उधर, आउट देयर कुछ है जो मुझे तृप्ति और पूर्णता दे देगा? समझ में आ रही है बात?
और ऋषि अष्टावक्र क्या समझाते हैं? वह कहते हैं, बेटा, एक बात बताओ। तुम आईने के सामने खड़े हो जाते हो, जो चीज़ तुम्हारे चेहरे में नहीं है वह तुम्हें आईना दे देगा क्या? क्यों नहीं दे पाएगा? क्योंकि वो जो आईने में है वो तुम्हारा ही तो प्रतिबिंब है, अगर वो तुम्हारे पास नहीं है सर्वप्रथम तो आईने में कहाँ से आएगा? बात समझ में आ रही है?
जो तुम्हारे पास नहीं है, वो जगत तुम्हें कैसे दे पाएगा? क्योंकि जगत क्या है? तुम्हारा प्रतिबिंब भी है। तुम्हारे पास नहीं है, तो जगत से कहाँ से पा लोगे?
जगत के पास बहुत कुछ है निस्संदेह, पर जगत के पास जो कुछ है वो सर्वप्रथम तुम्हारे पास भी है। तुम में ही मौजूद है। प्रकृति के वही तीन गुणों से तुम निर्मित हो, सत, रज, तम, और उन्हीं तीन गुणों से संसार भी निर्मित है और तुम्हारी आकांक्षा है गुणातीत जाने की। आप जिस अतृप्ति को पाले हुए हो, जो अतृप्ति आपको भीतर-ही-भीतर खाए जा रही है, वो इन तीन गुणों का कुछ पाने की है या इन तीन गुणों के पार जाने की है? पार जाने की है।
अब वो जो तीन गुण हैं, उनका पिंड तो आप स्वयं भी हो न। उन तीन गुणों का पिंड तो आप स्वयं भी हो। तीन गुणों से तृप्ति मिल सकती है, तो अपने साथ ही कुछ तरकीब करके मिल गई होती। जब अपने साथ तृप्ति नहीं मिली, तो संसार से क्या मिलेगी? संसार के पास भी ले-दे के वही तीन गुण ही हैं, और इससे ज़्यादा तो कुछ है नहीं। और तुम्हें तीन गुणों से संतुष्टि होने वाली नहीं। तुम्हें जाना है तीनों गुणों के पार, माने प्रकृति के पार। माने तुम्हें जाना है त्रिगुणातीत। वही मुक्ति कहलाती है। तो तुम्हें संसार से कैसे मिल जाएगी वो चीज़? संसार तुमसे कुछ भिन्न तो नहीं।
जो बात तुमने कही, वो कहीं से टकरा कर लौट रही है गूँज के रूप में। जो तुमने कहा, उससे कुछ अलग सुनाई दे जाएगा क्या? संसार तुम्हारी अनुगूँज है। जो तुमने कहा, वही तुम्हें संसार से सुनाई दे जाता है। तुम बहुत कर्कश आदमी हो, संसार से तुम्हें मधुर गीत कैसे सुनाई दे जाएगा? संसार तुम्हें कुछ कैसे दे देगा, जो तुम्हारे पास पहले से ही नहीं है? बोलो न। संसार तुम्हारी छाया है। और यह उदाहरण सबसे सटीक बैठा है आज तक, संसार तुम्हारी छाया है; और सवेरा हो और साँझ हो, तो अपनी ही छाया बड़ी लंबी हो जाती है। आप बहुत छोटे से होते हैं छाया बड़ी लंबी प्रतीत होती है। आदमी भ्रमित हो जाता है। हमें लगता है, देखो, हम छोटे से हैं, संसार इतना बड़ा है।
लेकिन बताइएगा, आपकी छाया में कुछ ऐसा हो सकता है क्या, जो आपके पास नहीं है? बोलिए। आपकी छाया तो आपकी ग़ुलाम है। आप जिधर जाते हो, छाया उधर चल देती है। आपकी छाया तो आपके पैरों तले रहती है, है न?
तो जीव का और जगत का वही संबंध है, जो व्यक्ति और उसकी छाया का है। लेकिन अज्ञान में हम अपनी छाया से ही पचास चीज़ें माँगनी शुरू कर देते हैं। एक व्यक्ति को सोचिए, जो अपनी छाया के प्रति बड़ा कामातुर हो गया हो। अपनी छाया को देख रहा है, “वाह! क्या चीज़ है! कितनी लंबी है! क्या लंबाई है! और काली-काली है, टॉल, डार्क एंड हैंडसम है।”
अपनी ही छाया के प्रेम में पड़ गया है। जीवन भर क्या कर रहा है? वो अपनी ही छाया को पकड़ने का, प्राप्त करने का, पूजने का, कभी पटाने का प्रयत्न कर रहा है। यह आम इंसान की ज़िंदगी है। हम अपनी ही छाया के पीछे भाग रहे हैं। और बताइए, अपनी छाया को कोई पकड़ पाया आज तक? इसलिए द्वैत दुख है वह जीवन भर आपको दौड़ाता है, आपके हाथ कुछ नहीं आता है। समझ में बात आ रही है?
अद्वैत क्या कह रहा है? अद्वैत कह रहा है, ठीक है, तुम्हें दुनिया दिखाई दे रही है। बहुत सीधी बात है ईमानदारी की, गहन उसमें कोई दार्शनिक जटिलता नहीं है कि आप कहें कि अरे, अद्वैतवाद तो बड़ा भयंकर होता है, समझ में नहीं आता, साधारण लोगों के लिए नहीं है।
अद्वैत आपसे एक बहुत ईमानदारी का सवाल पूछता है। वह कोई वाद भी नहीं है, वह कोई मत नहीं है। जब आप कहते हो फलाना वाद या इज़्म, तो वह एक मत बन जाता है, एक ओपिनियन बन जाता है। अद्वैत कोई मत है ही नहीं, जिज्ञासा है। बताओ, जिज्ञासा में कोई ओपिनियन होता है क्या? जिज्ञासा में कोई मत होता है क्या? मत।
जिज्ञासा में किसी प्रकार की कोई सैद्धांतिक दृढ़ता या आग्रह होता है क्या? कुछ नहीं होता, वहाँ तो लोच होती है। वहाँ तो बस पूछा है। अद्वैत कहता है, यह बता दो। ठीक है, दुनिया सामने दिख रही है। बड़ी प्यारी लग रही है, कि बड़ी भयानक लग रही है, कि बड़ी अबूझ लग रही है, जैसी भी लग रही है। दुनिया को देखने वाला कौन है? यह बता दो, बस। तुम्हें कैसे पता कि जगत है भी, और अगर है तो वैसा ही है जैसा तुम्हें लगता है? और तुम बदल जाते हो, तुम्हारा अपना अनुभव यह रहा है कि तुम्हारा जगत बदल जाता है, हाँ या ना? तुम बदल जाते हो, तुम्हारा अपना अनुभव यही है कि जगत तुम्हारा बदल जाता है।
बहुत सारे बच्चे पैदा होते हैं, तो उनमें एक आरंभिक रंग-अंधता होती है। वो जब पैदा होते हैं, तो कुछ महीनों तक कुछ रंगों को नहीं देख पाते। बताइए, उनका जगत कैसा होता होगा? उन रंगों से खाली। फिर धीरे-धीरे वो बड़े होते हैं। अपने आप उन रंगों को देखना शुरू कर देते हैं, बहुत सारे बच्चों के साथ होता है। आप बदले, आपका जगत बदल गया कि नहीं? आपके जगत में आरंभ में दो ही रंग थे बस, मान लीजिए सफ़ेद और काला, और उनके बीच का ग्रे। और आप बड़े होते गए। आपका जगत रंगीन होता गया। तो यह जो जगत है, इसका अनुभव करने वाले तो तुम ही हो न।
तुम्हें कैसे पता कि जगत वैसा ही है जैसा तुम्हें लगता है? और सब प्राणियों के लिए, और जीवन की अलग-अलग अवस्थाओं में, जगत बदलता जाता है। अलग-अलग प्राणियों के लिए अलग है, और एक ही प्राणी के लिए भी अलग है जीवन की अलग-अलग अवस्थाओं में। बल्कि दिन के भी अलग-अलग समय, अलग-अलग आपकी मानसिक स्थिति में, आपकी दुनिया ही आपके लिए बदल जाती है कि नहीं बदल जाती है? बोलिए, हाँ या ना? बदल जाती है न।
तो अद्वैत कहता है, अच्छा, तो यह दुनिया जैसी भी है, वह लग तुमको ही रही है न कि वैसी है; तुम्हारे अलावा तो कोई नहीं है न प्रमाणित करने के लिए? तुम्हारे अलावा तो कोई भी नहीं है न जो प्रमाणित करे कि दुनिया ऐसी है?
आप कहते हो, नहीं साहब, पाँच और लोग हैं। वो मेरे दोस्त हैं यार। वे प्रमाणित कर रहे हैं। वे जो प्रमाणित कर रहे हैं, उनको भी कौन प्रमाणित कर रहा है कि वो हैं? तुम ही तो कर रहे हो। तो ले-दे के तुम अकेले ही हो, जो कहता है कि दुनिया ऐसी है; दुनिया ऐसी है। और अद्वैत नहीं कहता कि दुनिया ऐसी है, कि वैसी है, कि न ऐसी है न वैसी है, किसी तीसरे तरह की है। वह तो बस प्रश्न करता है। एकदम साधारण बालक की तरह आपके सामने खड़े हो जाता है और बहुत मासूमियत से आपसे सवाल करता है। यह अद्वैत वेदान्त है। कहता है, अच्छा, ठीक है। तो आप जानना चाहते हो जगत का सच। हम जगत का ही सच जानना चाहते हैं। हम भी आपके साथ हैं।
ऋषि कहते हैं, चलो, तुम जगत का सत्य जानना चाहते हो वत्स, मैं तुम्हारे साथ हूँ। लेकिन जगत का सत्य अगर जानना है, तो जानना पड़ेगा कि जगत प्रतीत किसको हो रहा है? जगत मुझे प्रतीत हो रहा है। तो फिर मुझे अपना सत्य जानना पड़ेगा। मैं कौन हूँ? मैं कैसा हूँ? मैं कहाँ से आता हूँ? ये सारे सवाल खड़े हो जाते हैं न। तो अद्वैत फिर इन प्रश्नों में जाता है।
अद्वैत कहता है, अच्छा, ठीक है मैं अपनी तो जाँच-पड़ताल कर लूँ। मैं कौन हूँ, जिसको यह जगत प्रतीत होता है। क्योंकि जगत तो मेरे लिए बदलता रहता है मेरी चेतना की स्थिति के अनुसार। मेरी चेतना की स्थिति मेरा जगत निर्धारित कर देती है। आज मैं ऐसा था मुझे एक चीज़ बहुत पसंद थी। कल मैं वैसा हो गया, मुझे उसी चीज़ से नफ़रत हो गई। यह हुआ है कि नहीं हुआ है? बोलो।
आप कुछ खा रहे हो, बड़ा रस ले-लेकर खा रहे हो। तभी कोई पीछे से दौड़कर आता है, बोलता है, “अरे-अरे-अरे-अरे, मक्खी गिरी हुई थी इसमें!” क्या हो गया? वही जो इतना पसंद था, तत्काल उससे घृणा हो गई, है न। उठाकर दूर फेंक देते हो, चीखने-चिल्लाने लगते हो। क्या स्वाद लेकर खा रहे थे, मन ऐसा खिला हुआ था और अब पूरे दिन यह खिला हुआ मन खिन्न रहेगा कि “मक्खी खा ली आज।” बदल गया जगत कि नहीं बदल गया? जो इतना प्यारा था, उसी से घृणा हो गई। जगत बदल गया कि नहीं बदल गया?
कहीं पर घुस गए हो और ऐसा भ्रम हो गया है कि यह मेरा ही घर है, और बड़ी देखभाल कर रहे हो उस जगह की, मान लो। कोई आकर बता देता है, “नहीं-नहीं, यह आपका नहीं, आपके पड़ोस वाला है।” वही जो अपना था, तत्काल बेगाना हो गया कि नहीं हो गया? जिसकी अभी तक परवाह कर रहे थे, झाड़ू-पोंछा कर रहे थे, दीवार पर दाग लगा था साफ़ कर रहे थे, उसको छोड़ देते हो उससे कोई लेना-देना नहीं। जगत बदल गया कि नहीं? अगर जगत को एक घर मानो, हम जगत में रहते हैं घर है हमारा; जगत को घर मानो, जगत बदल गया कि नहीं बदल गया? पूरा बदल गया न?
प्रसूति-गृह होते हैं, माताओं को बच्चे होते हैं। और अगर सरकारी अस्पताल वग़ैरह हो, तो इस तरह की घटनाएँ देखने को मिलती हैं बहुत बार। माँ को उसका बच्चा लाकर दिया, वह बड़े प्यार से उसे दुलरा रही है। आधे-एक घंटे उसको चूम लिया, चाट लिया, दुलरा लिया। जो-जो माँ-बेटे का रिश्ता होता है, वह सब हो गया। और पीछे से एक नर्स आती है, बोलती है, “ए मैडम, यह तुम्हारा नहीं है। तुम्हारा वाला उधर है।” यही बच्चा, जिसको ममता दे रही थी और पोषण दे रही थी अभी तक, उसको तुरंत ऐसे दे देते हो। जगत बदल गया न? बदल गया कि नहीं बदल गया?
तो इसलिए फिर वेदान्त में आपको इस तरह के इतने ही उदाहरण मिलते हैं, कि सीप को चाँदी समझ लिया, रस्सी को साँप समझ लिया, खंभे को भूत समझ लिया। यह सब एकदम बड़े, पुराने, चले आ रहे उदाहरण हैं कि एक ही चीज़ होती है, देखो, कितनों के लिए कितनी अलग-अलग हो जाती है। सरोवर के ऊपर चाँद चमक रहा है और हवा चल रही है। तो सरोवर में लहरें उठ रही हैं, और चाँद के कितने प्रतिबिंब बन जाते हैं, न जाने कितने बन जाते हैं और सब थोड़े-थोड़े अलग-अलग रहते हैं। लेकिन वस्तु एक ही है, सबको अलग-अलग दिखाई देती है।
तो यह जो अलग-अलग दिखाई देता है, यह वास्तव में कुछ है क्या? यह जो अलग-अलग दिखाई देता है, यह संसार है, प्रकृति। प्रकृति में बस विविधताएँ होती हैं, अनेकताएँ होती हैं। उसमें वास्तव में कुछ अलग-अलग है क्या? अलग-अलग जो दृष्टा होते हैं, उन्हीं के कारण यह संसार सबके लिए अलग-अलग हो जाता है। तो अद्वैत कहता है, हम दृष्टा की पहले जाँच-पड़ताल करेंगे, दृश्य की बाद में बात करेंगे।
आप डॉक्टर के पास जाएँ। आँखों के डॉक्टर के पास गए, नेत्र-चिकित्सक हैं। आप कह रहे हैं, डॉक्टर साहब, छह उँगलियाँ दिखाई देती हैं। अब मुझे बताइए, यह चिकित्सक आपके हाथ की चिकित्सा करे या आपकी आँख की?
श्रोता: आँख की।
आचार्य प्रशांत: एकदम सोच-समझकर बताइएगा, क्योंकि दुनिया में कमी है यह हम सबको दिखाई देता है। ठीक है? “यार, लाइफ़ में यह ठीक नहीं चल रहा है, वह ठीक नहीं चल रहा है। बदलना माँगता हैं, अपवर्ड मोबिलिटी माँगता हैं।” ये सब चलता है न सबका? ये दृष्टा है, ये (हाथ को इंगित करते हुए), ये सामने बैठा है चिकित्सक। “डॉक्टर साहब, यह न छह हो जाती है, कभी पौने सात हो जाती है, कुछ मज़ा नहीं आता है। कभी तो यह रेनबो पाम बन जाती है, इंद्रधनुषी पंजा, अलग-अलग रंग आते हैं। पता नहीं क्या-क्या होता रहता है।”
कोई मूढ़ ही चिकित्सक होगा जो हाथ की चिकित्सा शुरू कर देगा। ठीक है न? अगर चिकित्सक थोड़ा भी समझदार है, तो किसकी चिकित्सा करेगा? आँख की। यह (आँख) दृष्टा है, यह (हाथ) दृश्य है। अद्वैत इसकी (आँख) चिकित्सा करता है। यह (आँख) दृष्टा है, यह (हाथ) दृश्य है, अद्वैत दृष्टा की चिकित्सा करता है। वह कहता है, जो दिख रहा है, वह तो देखने वाले का फ़ंक्शन है। जो दिख रहा है, वह तो देखने वाले का फ़ंक्शन है। तुम्हें सब उलट-पुलट ही दिख रहा है बाबा, सबको सब उलट-पुलट दिख रहा है। क्यों? क्योंकि सब यहाँ से उलट-पुलट हैं। दृष्टा ही जो है, वही गड़बड़ है। तो जो दृश्य है, वह तो गड़बड़ दिखाई ही देगा न।
मैं ठीक हो जाऊँ। मैं ठीक हो जाऊँ, तो मैं जान जाऊँगा कि जगत क्या है। ये समझ में आ रही है?
इंसान जीवन भर तड़पता है, इसी द्वैत के फेरे में। “दुई पाटन के बीच में साबुत बचा न कोई।” तो चाहे ऋषि अष्टावक्र हों, ऋषियों की चाहे पूरी परंपरा हो, चाहे संत कबीर हों, चाहे संतों की पूरी परंपरा हो, सबने एक मत से यही कहा है कि द्वैत ही दुख का मूल है। “दुई पाटन के बीच में साबुत वचन न कोई।” सबने कहा है कि एक ही सत्य है, दो सत्य नहीं हो सकते। यह समझ में आ रही है बात?
उस बेचारे आदमी की दुर्दशा-व्यथा देखो। द्वैत समझना चाहते हो तो, जो जीवन भर अपनी छाया के पीछे भागा है, न पकड़ सकता है, न छोड़ सकता है; छाया है तो छूटेगी तो नहीं। आप कह दो कि आप महाज्ञानी हो गए हो, एकदम मुक्त पुरुष हो रहे हो, तो भी छाया तो रहेगी न। माने, संसार का अनुभव तो होता रहेगा। होता रहेगा कि नहीं? या ऐसा हुआ है कि आपको जानने में आया है फलाने थे, एकदम उन्हें बोध प्राप्त हो गया, तो उनको संसार का अनुभव होना ही बंद हो गया? ऐसा तो नहीं होता। अनुभव तो होगा कि पाँव के नीचे ज़मीन है। अनुभव तो होगा कि यहाँ माहौल में हवा है उसी से साँस ले रहे हो, जी रहे हो। यहाँ मेज़ पर हाथ रखोगे, तो त्वचा को लकड़ी का अनुभव तो होगा। होगा कि नहीं होगा?
तो यह सब तो रहेगा। छाया से कोई पिंड नहीं छुड़ा सकता। तो देखो दुर्दशा हमारी, न उसको पकड़ सकते, न छोड़ सकते। आँख खोलोगे, आँख खोलते ही क्या दिखाई देता है? आँख बंद भी कर लो, तो क्या दिखाई देता है? छोड़ा जाता नहीं और पकड़ में भी किसी के आता नहीं, इसलिए द्वैत दुख का मूल है।
तो अद्वैत कहता है, इस झमेले में हमें पड़ना ही नहीं है कि पकड़ना है या छोड़ना है, कि क्या करना है। हमें तो यह जानना है कि हमारा और उसका रिश्ता क्या है। जीव और जगत का, पुरुष और प्रकृति का संबंध क्या है, हमें तो यह जानना है। और वह जानने के लिए आप प्रश्न किससे करेंगे? जिज्ञासा किससे? जीव से ही तो करोगे न। जगत तो कोई उत्तर देने आएगा नहीं, जड़ है। तो फिर स्वयं से ही प्रश्न किया जाता है, कि तुम यह जो बात सोच रहे हो, यह कहाँ से आई? फलाने विषय में तुमने जो अर्थ भर दिए हैं, वो अर्थ कहाँ से आ गए?
यह सब जिज्ञासाएँ ही अद्वैत की विधियाँ हैं, स्वयं से ही प्रश्न करना। और जो एक चीज़ अद्वैत माँगता है, वह है ईमानदारी। क्योंकि ख़ुद से ही सवाल करने हैं, तो कुछ भी उलटा-पुलटा जवाब दे लो। एक दफ़े मुझे बड़ा कटाक्ष करना पड़ा था कि एकदम प्रचलन हो गया है, फ़ैशन बन गया है। अपने आप से पूछना, “मैं कौन हूँ?” और पहले से ही एक तयशुदा, पका-पकाया, रेडीमेड उत्तर दे देना, क्या? “मैं तो सच्चिदानंद-घन आत्मा हूँ।” और प्रसन्न हो जाना कि देखो, मुझे विधि आती है और मैं विधि के बिल्कुल अंत तक पहुँच गया।
ऐसे नहीं चलता, यह अद्वैत के नाम पर मज़ाक चल रहा है। कि जितने ज्ञानी, बुद्ध पुरुष थे, वो बता गए हैं कि भाई, तुम अपने आप को आत्मा कह सकते हो, या शुद्धता कह सकते हो, या पूर्णता कह सकते हो, या शून्यता कह सकते हो, या मौन कह सकते हो। तो ये सब आपको पहले से ही उत्तर पता हैं, तो बढ़िया मज़ा है। ख़ुद से ही पूछो, मैं कौन हूँ? मैं कौन हूँ? पूछते वक़्त ऐसे बनो जैसे पता नहीं है। है न? नहीं तो पता चल जाएगा कि मामला रिग्ड है, मैच फ़िक्स्ड है। तो ऐसे नहीं दिखाना है कि मैच फ़िक्स्ड है। ऐसे पूछो, मैं कौन हूँ? मैं कौन हूँ? और फिर ऐसे दर्शाओ जैसे अभी-अभी कौंधा हो, जैसे मौलिक उत्तर सूझा हो, ओरिजिनल आंसर हो, क्या? “मैं तो सच्चिदानंद-घन आत्मा हूँ।” और बोलो, देखा, आई क्रैक्ड इट।
नहीं, ये सब नहीं करना होता। यह एक सतत, जीवंत, निरंतर जिज्ञासा होती है। क्योंकि जैसे आपकी छाया आपके साथ लगातार है न, तो छाया का रूप, रंग, ढंग, सब बदलता रहता है। तो यह जिज्ञासा भी लगातार होनी चाहिए। जैसे जीवन लगातार है, जैसे श्वास लगातार है, जैसे छाया लगातार है, कि यह सब है क्या? ये अभी-अभी जो हुआ, क्या हुआ?
और जब वह लगातार होती है, तो उतनी स्थूल नहीं रह जाती, जैसी अभी मैं बता रहा हूँ। मैं जैसे बता रहा हूँ, वह बहुत ग्रॉस तरीका है। आप बड़े स्थूल तरीके से, “मैं कौन हूँ? मैं कौन हूँ?” ऐसे नहीं। आदमी अपने दिन भर के काम छोड़कर यही थोड़ी करता रहेगा, “मैं कौन हूँ, मैं कौन हूँ?” वह भीतर बहुत सूक्ष्म तरीके से एक संवेदनशीलता, एक अलर्टनेस, एक सेंसिटिविटी खड़ी रहती है, जो यह जानने को हमेशा आतुर रहती है कि भीतरी माहौल कैसा है। जैसे भीतर एक क्लाइमेट-सेंसर लगा हुआ हो, जो आप कुछ भी कर रहे हों, वह सेंसर लगातार सक्रिय है, एक्टिव है।
आप कुछ भी कर रहे हैं, आप अभी बैठे सुन रहे हैं लेकिन एक भीतरी सेंसर है, जो सुनने के साथ-साथ यह भी देख रहा है कि सुनी अपनी बात का सुनने वाले पर प्रभाव क्या हुआ। कि बाहर से जो शब्द आ रहे हैं, उनके उत्तर में भीतरी प्रतिक्रिया क्या हुई।
यह है जिज्ञासा की विधि, कि बाहर जो चल रहा है, वह चल रहा है। भीतर एक कंटीन्यूअस अलर्टनेस है। भीतर एक मैकेनिकल, डेडनेस नहीं है।
यंत्रवत जड़ता-सी स्थिति नहीं है भीतर। कि भीतर से क्यों कोई प्रतिक्रिया आ गई आपको पता ही नहीं चला, ऐसा नहीं है भीतर। भीतर से कुछ उठा और आप मुस्कुरा दिए। बोले, मुझे पता है, तू कहाँ से आया। कहाँ से आया? अरे, कल जहाँ से तू आया था, आज भी वहीं से आया। कल कहाँ से आया था? परसों जहाँ से आया था। बताओ, परसों कहाँ से आया मैं? साफ़-साफ़ जवाब दो। परसों तू वहीं से आया था, जहाँ से जन्म के पहले दिन आया था। जन्म के पहले दिन कहाँ से आया था मैं? जन्म के पहले दिन तू आया था माँ से और बाप से। अच्छा, माँ और बाप में कहाँ से आया था मैं? वहाँ से तू आया था, एकदम जो पहली माँ है, महामाँ, उससे आया था।
हैं! तो माने, महामाँ से उठ रहे हैं मेरे ये सारे। हाँ। और उसी को अहम्-वृत्ति बोलते हैं। महामाँ में वह सब कहाँ से आया? यह जानने के लिए महामाँ के पास जाना।
जहाँ तक मेरा मामला था, मैंने बता दिया। अब यही पूछना है कि अहम्-वृत्ति कहाँ से आती है? तो जाओ और अहम्-वृत्ति में प्रवेश करो। और जो अहम्-वृत्ति में प्रवेश करता है, जानने वालों ने कहा है, कि फिर वह अहम्-वृत्ति को विगलित ही कर देता है। न ख़ुद बचता है, न वृत्ति बचती है। मुक्ति हो जाती है।
लेकिन अभी भी मैंने आपको जिस तरीके से बताया, वह बहुत नाटकीय तरीका है। आपके पास इतना समय नहीं होगा। रियल-टाइम आप यह सब नहीं कर पाएँगे, जो मैंने आपको बोला, यह सब तो फिर ठहरकर करना पड़ेगा। और जीवन के प्रवाह में ठहरना संभव नहीं है। ठहरने का मतलब यह नहीं कि चल रहे थे, रुक गए।
तो यह जितनी मैंने बात बोली, वह एक क्षणांश में हो जानी चाहिए। यह होती है आंतरिक अलर्टनेस। यह जितनी बात अभी समझाई, “मुझमें कहाँ से आया, कल कहाँ से आया, परसों कहाँ से आया?” इसको ऐसे पलक झपकते देख लेना है, चुटकी बजाते देख लेना है। यह पूरी जो प्रक्रिया रही है अहम्-वृत्ति से लेकर के आज तक के जीवन की, वह एकदम ऐसे कौंध जाए, जैसे आकाश में बिजली। एक क्षण को कौंधी और सब दिख गया, सब समझ में आ गया। उसमें फिर शब्दों से काम नहीं चलता। मैं आपको शब्दों का सहारा लेकर समझा रहा हूँ। “अच्छा, तू कहाँ से आया? तेरा बाप कौन है? यह वो फलाना। कल कहाँ से आता था? घर बता, ठिकाना पता।” ऐसे नहीं हो पाता। आप ऐसे करने बैठोगे, तो गाड़ी निकल जाएगी। समझ में आ रही है बात?