यह जो अलग-अलग दिखाई देता है, यह वास्तव में कुछ है क्या? यह जो अलग-अलग दिखाई देता है, यह संसार है, प्रकृति। प्रकृति में बस विविधताएँ होती हैं, अनेकताएँ होती हैं। उसमें वास्तव में कुछ अलग-अलग है क्या? अलग-अलग जो दृष्टा होते हैं, उन्हीं के कारण यह संसार सबके लिए अलग-अलग हो जाता है। तो अद्वैत कहता है, हम दृष्टा की पहले जाँच-पड़ताल करेंगे, दृश्य की बाद में बात करेंगे।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, शत-शत नमन। श्री अष्टावक्र जी, अध्याय दो के श्लोक नंबर 16 में कहते हैं, कि “द्वैत ही दुख का मूल है और अद्वैत-ज्ञान के अलावा इसका कोई इलाज नहीं है।”
“द्वैत ही दुख का मूल है,” ऐसा क्यों कहा गया है? इस पर थोड़ी स्पष्टता दीजिए।
आचार्य प्रशांत: द्वैत क्या है?
कई तरीकों से द्वैत की व्याख्या की गई है, परिभाषित किया गया है। लेकिन अगर हमारा मन द्वैत में जी रहा है, तो उसका अर्थ क्या है? और मन के लिए द्वैत के अर्थ और अंजाम क्या होते हैं? हम उसी पर ज़्यादा ध्यान देंगे अभी, अगर हम समझना चाहते हैं, कि जैसा आपने कहा कि द्वैत दुख का मूल है, ऋषि अष्टावक्र को उद्धृत करते हुए। तो दुख तो मन के लिए होता है न, मन दुख का अनुभव करता है। तो मन के लिए द्वैत क्या होता है? यह हम समझना चाहेंगे।
मन के लिए द्वैत होता है यह धारणा, यह विश्वास कि मैं हूँ और बाहर एक दुनिया है और मैं अधूरा हूँ। यह जो बाहर दुनिया बिखरी हुई है, इससे मुझे पूरापन मिल जाएगा। मैं हूँ, बाहर एक दुनिया है, यह दोनों अलग-अलग हैं और दोनों की अपनी पृथक सत्ता है। दोनों एक-दूसरे से अलग हैं और दोनों हैं, मिथ्या दोनों में कोई नहीं है; दोनों हैं। तो यहाँ से आया द्वैत कि दो हैं, एक मैं हूँ और एक मुझसे बाहर यह एक अनंत संसार है जो पसरा हुआ है। मैं अधूरा हूँ और इस संसार से मुझे पूर्ति मिल सकती है, क्योंकि हम दोनों अलग-अलग हैं न। हम दोनों अलग-अलग हैं, तो इस संसार के पास कुछ ऐसा हो सकता है, बल्कि है, जो मेरे पास नहीं है। समझना।






