प्रश्नकर्ता: जब मैं हूँ ही नहीं तो मुझे होना क्यों पड़ता है? जब प्रकृति एक है तो इसके रुप-रंग में भेद क्यों है? ये कौन और कैसे तय करता है कि कौन इंसान बनेगा, कौन जानवर बनेगा, जीव-जंतु बनेगा, कीट पतंगा बनेगा, वनस्पति बनेगा इत्यादि? किस चेतना का अवतरण किस तरह के शरीर में होगा, इसका निर्धारण कौन और कैसे होता है? क्या कोई तथ्य-लॉजिक-फॉर्मूला है इसके पीछे? कृपया प्रकाश डालें।
आचार्य प्रशांत: कोई मजबूरी नहीं होती है। तुम कह रहे हो कि जब मैं हूँ ही नहीं तो मुझे होना क्यों पड़ता है? ये तो प्रतिपल का चुनाव है। उदाहरण के लिए — इस पल, इस सवाल को पूछ करके तुमने ये चुनाव करा कि तुम्हें होना पड़ेगा।
ये सवाल पूछना भी यही दर्शाता है ना कि कहीं कोई है जो ये सवाल पूछ रहा है। तुम पूछोगे अगर कि मुझे होना क्यों पड़ा, तो मेरा जवाब होगा क्योंकि तुम्हें ये सवाल पूछना था इसीलिए तुम्हें होना पड़ा।
होना, कोई वस्तुगत या ऑब्जेक्टिव घटना नहीं है। वो पल-प्रतिपल का सब्जेक्टिव चुनाव है। कोई ज़बरदस्ती नहीं कर दी गई है कि आप अपने-आपको जीव मानें, पुरुष मानें, किसी खास उम्र का मानें, किसी धर्म का मानें, वगैरह, वगैरह। मत मानिए।
जिस पल आपने अपने-आपको कुछ भी मानना बंद कर दिया, आप नही हैं। तो क्यों होना पड़ता है? क्योंकि आप चुनते हैं, और कोई बात नहीं है। आपकी मान्यता है, शास्त्रीय रूप से कहते हैं — तादात्म्य। आप कह देते हो कि वह मैं हूँ। तद अर्थात वह, उससे मैंने आत्मीयता जोड़ ली। उसको मैंने अपनी आत्मा का नाम दे दिया। उसको मैंने कह दिया — वह मैं हूँ, आत्म।
मत कहिए।




