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हमें जन्म लेना ही क्यों पड़ता है? || आचार्य प्रशांत (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
16 min
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प्रश्नकर्ता: जब मैं हूँ ही नहीं तो मुझे होना क्यों पड़ता है? जब प्रकृति एक है तो इसके रुप-रंग में भेद क्यों है? ये कौन और कैसे तय करता है कि कौन इंसान बनेगा, कौन जानवर बनेगा, जीव-जंतु बनेगा, कीट पतंगा बनेगा, वनस्पति बनेगा इत्यादि? किस चेतना का अवतरण किस तरह के शरीर में होगा, इसका निर्धारण कौन और कैसे होता है? क्या कोई तथ्य-लॉजिक-फॉर्मूला है इसके पीछे? कृपया प्रकाश डालें।

आचार्य प्रशांत: कोई मजबूरी नहीं होती है। तुम कह रहे हो कि जब मैं हूँ ही नहीं तो मुझे होना क्यों पड़ता है? ये तो प्रतिपल का चुनाव है। उदाहरण के लिए — इस पल, इस सवाल को पूछ करके तुमने ये चुनाव करा कि तुम्हें होना पड़ेगा।

ये सवाल पूछना भी यही दर्शाता है ना कि कहीं कोई है जो ये सवाल पूछ रहा है। तुम पूछोगे अगर कि मुझे होना क्यों पड़ा, तो मेरा जवाब होगा क्योंकि तुम्हें ये सवाल पूछना था इसीलिए तुम्हें होना पड़ा।

होना, कोई वस्तुगत या ऑब्जेक्टिव घटना नहीं है। वो पल-प्रतिपल का सब्जेक्टिव चुनाव है। कोई ज़बरदस्ती नहीं कर दी गई है कि आप अपने-आपको जीव मानें, पुरुष मानें, किसी खास उम्र का मानें, किसी धर्म का मानें, वगैरह, वगैरह। मत मानिए।

जिस पल आपने अपने-आपको कुछ भी मानना बंद कर दिया, आप नही हैं। तो क्यों होना पड़ता है? क्योंकि आप चुनते हैं, और कोई बात नहीं है। आपकी मान्यता है, शास्त्रीय रूप से कहते हैं — तादात्म्य। आप कह देते हो कि वह मैं हूँ। तद अर्थात वह, उससे मैंने आत्मीयता जोड़ ली। उसको मैंने अपनी आत्मा का नाम दे दिया। उसको मैंने कह दिया — वह मैं हूँ, आत्म।

मत कहिए।

आपकी विलुप्ति, आपका मिटना तो कभी भी हो सकता है। आप बहुत मेहनत कर कर के अपने-आपको बचाए रखते हैं। कोई पूछता है कि मैंने मानव देह में जन्म क्यों लिया? मैंने पशु देह में जन्म क्यों नहीं लिया? या मैं लड़का बन के क्यों पैदा हुआ और लड़की बन के क्यों नहीं पैदा हुआ?

कौन कह रहा है कि आप जो पैदा हो गए थे, वो पैदा होकर के आपने सौ साल का करार कर लिया है। आप इसी क्षण अपनी देह सम्बन्धी सब पहचानों से मुक्त हो जाइए, आप कुछ नहीं हैं। बिल्कुल कुछ नहीं हैं।

लोग पूछते हैं — ऐसा क्यों होता है कि कोई अमीर के घर में पैदा होता है, कोई गरीब के घर में पैदा होता है और कुछ लोग तो बेचारे ऐसे होते हैं जो अंग-भंग के साथ पैदा होते हैं। कोई पैदा होता है तो उसका दिल नहीं होता, किसी की टाँग नहीं होती, किसी की आँख नहीं होती। ये सब क्यों होता है?

अरे भाई, सब एक से ही पैदा होते हैं। आपको कैसे पता कि आप बिल्कुल ठीक हैं? कोई एक हाथ के साथ पैदा हो तो आप उसके साथ सहानुभूति दिखाने लगते हैं। आप कहते हैं कि अरे-अरे बेचारे की एक ही हाथ है। अपने-आपको क्यों नहीं बोलते, "इस बेचारे के पास दो ही हाथ हैं"? चार क्यों नहीं हो सकते थे?

पर चूँकि आप ज़्यादातर लोगों को देखते हैं कि उनके दो हाथ हैं तो आप जब किसी का देखते हैं कि एक हाथ है तो तुलनात्मक रूप से कह देते हैं कि ज़रूर ये अपना कर्मफल भोग रहा है बेचारा, हम सब के दो हाथ है, इसके एक ही हाथ है।

और किसी दिन आपको पता चले कि कोई पैदा हो गया है जिसके चार हाथ हैं और चारों बिल्कुल सही और स्वस्थ हाथ हैं, फिर क्या करोगे? फिर तो तुम्हें पूरी मानव जाति को अभागा घोषित करना पड़ेगा। कहोगे सब अभागे हैं, दो ही हाथ वाले रह गए हैं, ज़रूर बीमार हैं। वो देखो, पहला स्वस्थ पैदा हुआ है मानव, उसके चार हाथ हैं।

ये कर कर के, जो बेचारा किसी दूसरे तरीके की देह के साथ पैदा हुआ है, आप उसके भीतर ये भावना, ये मान्यता डाल देते हो कि जैसे उसने कोई पाप कर दिया है, पुराने कर्मफल का परिणाम इत्यादि भोग रहा है।

इसी तरीके से हम कहते हैं कि ऐसा क्यों होता है कोई मनुष्य पैदा होता है, कोई गधा घोड़ा पैदा होता है। जो गधा-घोड़ा पैदा हो रहा है, वो अपने गधे-घोड़े पैदा होने को लेकर के परेशान है क्या?

आपको कैसे पता कि आप बहुत श्रेष्ठ योनि में पैदा हो गए हो? कैसे पता? बल्कि आप जिस योनि में पैदा हो गए हो, अब आपके सामने झंझट है कि आप उस योनि से मुक्त हो जाओ। गधे-घोड़े को कोई झंझट नहीं है। वो तो जैसा है स्थिर है, टिका हुआ है। उसको कहीं पहुँचना नहीं, कुछ करना नहीं। गधा पैदा हुआ है, गधा ही मर जाना है।

आप इंसान पैदा हुए हो, आप कहते हो अब तो मुझे मुक्त होना पड़ेगा, साधना करनी पड़ेगी, जीवन में कुछ चीज़ें हैं जो हासिल करनी है। गधे घोड़े को कुछ हासिल करना नहीं। तो इन बातों में कोई आध्यात्मिक रहस्य नहीं छुपा हुआ है।

आमतौर में हम समझ लेते हैं कि इन बातों में जैसे कोई मिस्टिकल डाइमेंशन (रहस्यवादी आयाम) है और इस ग़लतफ़हमी ने बड़ा नाश किया है अध्यात्म के पूरे क्षेत्र का। कि कोई ऐसा क्यों पैदा हुआ? कोई वैसा क्यों पैदा हुआ? अरे, जो जैसा पैदा हुआ, सब एक बराबर हैं। ये बात आपको अजीब लगेगी। क्यों अजीब लगेगी मैं बताता हूँ — आप अमीर हैं मान लीजिए, और कोई गरीब पैदा हुआ है। और मैं कहूँ कि जो जैसा पैदा हुआ है सब एक बराबर हैं। आप ये बात मान ही नहीं पाओगे। क्यों? क्योंकि आप अपनी अमीरी को लेकर के बड़े उत्सुक हो, बड़े आग्रही हो। आपने अपनी अमीरी से बड़ा रिश्ता जोड़ रखा है। आपकी नज़रों में आपकी अमीरी का बड़ा मूल्य है।

अब मैं कह दूँ कि जो अमीर है और जो गरीब है सब एक बराबर ही पैदा हुए हैं। अमीर पैदा हुआ हो, चाहे गरीब पैदा हुआ हो कोई अन्तर नहीं है। तो मैंने तो ये कह दिया ना कि आपकी सारी अमीरी दो कौड़ी की है। ये बात आपको बिल्कुल नागवार है।

अगर आप ये मान लें कि जो अमीर घर में पैदा हुआ बच्चा है और जो गरीब घर में पैदा हुआ बच्चा है, दोनों बराबर ही हैं, खेल है बस। तो इस बात को मानने का अर्थ ये होगा कि आपने अमीरी को मान लिया — दो कौड़ी का, मूल्यहीन। अमीरी कुछ है नहीं। तभी तो अमीर-गरीब एक बराबर हुए।

ये बात आप कैसे मान पाओगे? क्यों नहीं मान पाओगे? क्योंकि जीवन भर आपने लग करके मेहनत करी है अमीर होने के लिए। अब अचानक कोई आपको आके बता देता है कि कोई बच्चा चाहे अमीर घर में पैदा हो चाहे गरीब घर में पैदा हो, सब एक बराबर है। ये बात मानने में बड़ी मुश्किल है।

इसी तरीके से आपको अपनी देह पे बड़ा नाज़ है, क्योंकि देह केंद्रित ही तो हम अपना जीवन जीते हैं। मेरी देह ऐसी, मेरी देह वैसी। मैं मेरी देह हूँ। कौन हूँ मैं? मैं शरीर हूँ। शरीर हूँ मैं।

अब कोई बच्चा पैदा हुआ है जिसमें शारीरिक रूप से कुछ ऐसा है जिसको आप त्रुटि बोलते हैं। अब मैं कह दूँ कि आप और वो एक बराबर हैं। ये बात आपको स्वीकार करने में बड़ी दिक्कत आएगी। क्यों? क्योंकि जीवन भर किस मान्यता में जिए हैं आप? मैं शरीर हूँ। और अगर ये मान लिया कि शरीर ऐसा हो चाहे वैसा हो, बात एक बराबर है। तो वास्तव में क्या कह दिया गया? कि शरीर की कोई कीमत नहीं है भाई। शरीर तुमको ऐसा (सीधा) मिला हो, चाहे तुमको शरीर ऐसा (आड़ा-तिरछा) मिला हो, एक बात है।

बहुत सुडौल शरीर है, चाहे अष्टावक्र शरीर है, आठ जगह से टूटा हुआ, एक ही बात है। तो अब उन सब लोगों का क्या होगा जो बिल्कुल शरीर केंद्रित जीवन जीते हैं? उनके मुँह पे तो थप्पड़ पड़ गया ना। तो हम ये नहीं मानेंगे कि चाहे अमीर घर में पैदा हो बच्चा, चाहे गरीब घर में पैदा हो, चाहे आदमी पैदा हो, चाहे जानवर पैदा हो, एक ही बात है। हम ये नहीं मानेंगे।

हम नहीं मानेंगे कि काला-गोरा पैदा हुआ, लड़का पैदा हुआ, लड़की पैदा हुई, एक ही बात है।

उल्टे हम क्या करते हैं? हम बड़ी चतुराई दिखाते हैं। फिर हम बताते हैं कि पता है कुछ रूह होती है, रूह। और वो रूह ना कर्मफल के सिद्धांत पर चलती है। और हम कहते हैं कि वो जो पुराना कर्मफल है ना, वो आगे को हस्तांतरित हो जाता है। कैरी-फॉरवर्ड होता है, कैरी-फॉरवर्ड।

तो जो पिछले जन्म के गुनहगार होते हैं, वो इस जन्म में गरीब पैदा होते हैं। पिछले जन्म जिन्होंने चुरा के शक्कर खाई थी, वो चींटी पैदा हुए। बता रहे हैं हम तुमको।

और हिंदुस्तान ने तो गजब ही ढा दिया। जिनलोगों को दबा कर रखना था, शोषण करना था, कह दिया — पता है ये निचली जात में क्यों पैदा हुआ है? ये पिछले जन्म का गुनहगार है इसीलिए इस बार ये छोटे घर में, निचली जात में पैदा हुआ है।

तो ये आगे-पीछे का व्यर्थ का झमाल पैदा करके हमने अपनी देह केंद्रिता को, धन केंद्रिता को और अपनी कुत्सित मानसिकता को बचाए रखा, वैध ठहराए रखा। समझ में आ रही है बात?

घर में लड़की पैदा हुई। एक बड़ी रूपवती दिख रही है बचपन से ही और एक का रंग कुछ दबा हुआ है। हिंदुस्तान में दबे हुए रंग को लेकर बड़ी धारणाएँ हैं। नैन-नक़्श उसके बड़े साधारण से हैं। तो हम बोल देते हैं कि नहीं नहीं नहीं, वो बेहतर है, ये ऐसी ही रह गई, ऐसा है वैसा है।

भाई, दोनों बराबर है। भेद और खोट, दोनों देखने वाले की आँख में है। तुम एक प्रकार के उत्तेजना केंद्रित सौंदर्य के पुजारी हो तो इसीलिए तुम एक लड़की और दूसरी लड़की, एक लड़के और दूसरे लड़के में भेद-भाव कर ले जाते हो। वरना तो दोनों ही बराबर ही हैं पर तुम भेद-भाव कर ले जाओगे। और उस भेद-भाव को जायज़ ठहराने के लिए क्या बोलोगे? ज़रूर ये इनके पिछले जन्मों के कर्मों का नतीजा है या ज़रूर इसमें कोई मिस्टिकल ख़ुफ़िया रहस्य है।

फिर कोई गुरुजी अवतरित होंगे और बोलेंगे, "पूर्णिमा की रात को जो औरतें रात में एक बजे से लेके ढाई बजे तक चाँद के नीचे सोती हैं और जीभ बाहर निकालकर ओस पीती हैं, उनको चाँद समान ही सौंदर्यवान पुत्री प्राप्त होती है।"

कहेंगे, "अच्छा, ये बात है देखो। इसी विधि से तो चूक गई इसकी अम्मा। यही तो नहीं करी वो, तो घर में ये पैदा हो गई है काली-कलूटी।" तुम ज़बरदस्ती रंग-भेद अपना करके लड़की में मनोविकार भर रहे हो। उसमें कोई दिक्कत नहीं है। वो जैसी पैदा हुई है, वो ठीक है।

प्रकृति में जो जैसा पैदा होता है, सब ठीक होता है। प्रक्रति इस मामले में बिल्कुल मूल्य-निरपेक्ष है। वहाँ कुछ गलत होता ही नहीं। पर बहुत नुस्खे हैं। तथाकथित अध्यात्म में ही बहुत नुस्खे हैं पुत्र प्राप्त करने के। ये पुत्र और पुत्री का भेद अध्यात्म में कहाँ से आ गया बताना। आत्मा का कोई लिंग होता है?

अगर सच ही आखिरी है, अगर आत्मा ही एक मात्र सच्चाई है तो लिंग-भेद कहाँ से आ गया भाई? रंग-भेद कहाँ से आ गया? जाति-भेद कहाँ से आ गया? धन-भेद कहाँ से आ गया? बताओ मुझे, कहाँ से आ गया?

पर हम इनसब तरह के भेदों को बड़ा मूल्य देते हैं। और मूल्य ही नहीं देते, हम उन्हें जायज़ ठहराने के लिए, जस्टिफाई करने के लिए, सहारा किसका लेते हैं? कर्मफल के सिद्धांत का, अगले और पिछले जन्म के सिद्धांत का।

ये झूठी बातें हैं, मत करो। पुनर्जन्म बहुत ही सूक्ष्म बात है। उसको पहले समझो। यूँ ही उसका दुरुपयोग मत करो। कर्मफल का सिद्धांत भी बहुत सूक्ष्म बात है, उसको समझो। औने-पौने तरीकों से उसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।

कोई राज़ नहीं है अस्तित्व में, ये सब कोई राज़ की बात नहीं है कि पत्ता, पत्ता क्यों है और तोता, तोता क्यों है। ये कोई राज़ की बात नहीं है।

लोग यही सोचते हैं कि अध्यात्म का मतलब यही है कि बिल्ली, बिल्ली क्यों है और कुत्ता, कुत्ता क्यों है।

अध्यात्म ये पूछने में नहीं है कि क्या कोई जीवात्मा थी जो बिलारी बन के पैदा हुई, और दूसरी जीवात्मा कुकुर बनके पैदा क्यों हुई। ये आध्यात्मिक प्रश्न नहीं है। अध्यात्म अपने ऊपर सवाल उठाने का नाम है।

बिल्ली और कुत्ते को देखने वाला कौन है? मैं। बिल्ली और कुत्ते को लेकर सवाल किसके मन में उठ रहा है? मेरे।

तो सवाल यही उठना चाहिए कि मेरे पास यही है क्या सोचने के लिए, बिल्ली और कुत्ता? अध्यात्म में ये नहीं है कि पीपल के पेड़ पर जीवात्माएँ वास करती हैं क्या? ये सब आध्यात्मिक प्रश्न नहीं होते।

आध्यात्मिक प्रश्न मात्र एक होता है — ये जो मेरी अंदरूनी तड़प है, ये जो भीतर अहं बैठा हुआ है जो बेचैन रहता है, वो चाहता क्या है और उसको शांति कैसे मिले? बस ये आध्यात्मिक प्रश्न है।

बाकी सब जो अंडक-बंडक इधर-उधर की बातें चल रही हैं, वो अध्यात्म के नाम पर सस्ता छिछोरा मनोरंजन है। ये बात याद रख पाएँगे आप लोग?

अध्यात्म में बस एक प्रश्न है उसके अलावा दूसरा नहीं। क्या? ये जो भीतर है, जो कुछ पाने पर भी परेशान रहता है कुछ गँवाने पर भी, दिन में भी परेशान रहता है रात में भी, सर्दी में भी गर्मी में भी, बचपन में भी बुढ़ापे में भी, अमीरी में भी गरीबी में भी, ये जो कुछ है भीतर जो द्वैत के दोनों ही सिरों पर बैठ करके कुछ पाता नहीं, उसको तृप्त, शांत, मौन कैसे करूँ?

वो मैं हूँ, वो मैं ही हूँ जो परेशान है। उसकी मूल परेशानी दूर कैसे करूँ, इस प्रश्न के अलावा अध्यात्म में और कोई प्रश्न बिल्कुल नहीं होता। तुम्हें आ रही है बात समझ में?

नीले रंग के पर्दे लगाएँ या गुलाबी रंग के? ये आध्यात्मिक सवाल नहीं है। कुछ आ रही है बात समझ में? कितने मुख वाले रुद्राक्ष की माला धारण करें? ये आध्यात्मिक सवाल नहीं है। पर ये सब बड़े मनोरंजक सवाल हैं। और इन सवालों में उलझना अहंकार को बहुत पसंद आता है।

अध्यात्म अधिकांश प्रश्नों के उत्तर नहीं देता। गौर से सुन लीजिए। अधिकांश-अधिकांश प्रश्नों के उत्तर नहीं देता अध्यात्म, सीधे उन्हें खारिज कर देता है। क्या बोलता है? अप्रासंगिक, इर्रेलेवेंट। क्या बोलेगा अध्यात्म? इर्रेलेवेंट।

आ रही है बात समझ में?

खेद की बात ये है कि ज़्यादातर सवाल जो पूछे ही नहीं जाने चाहिए, वो अध्यात्म के नाम पर पूछे भी जा रहे हैं, उनके जवाब भी दिए जा रहे हैं, वो प्रचलित भी हो रहे हैं। वो सब इर्रेलेवेंट है, अप्रासंगिक है।

वास्तव में अध्यात्म है ही यही। जान लो कि जीवन में अधिकांशतः जो हमारे मुद्दे मौजूद हैं, हमारे मन में जो सवाल मौजूद हैं, वो क्या हैं? अप्रासंगिक, इर्रेलेवेंट , उनकी कोई हैसियत ही नहीं। उन सवालों के जवाब खोजने की ज़रूरत ही नहीं। वो सवाल ही व्यर्थ हैं।

अध्यात्म ये नहीं है कि गए और कहा, "गुरुजी, गुरुजी, मेरी जिज्ञासा का समाधान करें।" कुछ भी औंडा-पौंडा बोल दिया और गुरुजी कह रहे हैं, "ठीक, ठीक।"

गुरुजी वास्तव में गुरुजी हैं तो सौ में से नब्बे सवाल में क्या कहेंगे वो? "हटाओ, क्या पूछ रहे हो ये? कोई सवाल है ये? ये मुद्दा होना ही नहीं चाहिए। ये सवाल होना ही नहीं चाहिए।"

तुम्हारे लिए उत्तर ये है मेरे पास कि ऐसे हो जाओ कि तुम्हारे पास ये सवाल बचे ही नहीं। ऐसे हो जाओ कि इस तरह की छोटी जिज्ञासाएँ तुम्हें उठे ही नहीं। यही मौन है, यही शांति है, यही मुक्ति है। और किस चीज़ से मुक्ति मिलती है? इसी चीज़ से तो, कि छोटे-छोटे मुद्दों में उलझे रहते थे जीवन में, पार लग गए। अब ये सब चीज़ें चलती रहती हैं, हमें कोई फ़र्क पड़ता नहीं।

इससे ये भी समझ गए होगे कि आध्यात्मिक आदमी का दुनिया के ज़्यादातर मुद्दों को लेकर दृष्टिकोण क्या होगा। क्या दृष्टिकोण होगा? क्या राय होगी? "जी, कौन सा मुद्दा कहा आपने?"

लोग आएँगे इतना बड़ा माईक सीधे मुँह में खोंस देंगे, कहेंगे, "बताइए-बताइए, आप इस मुद्दे के बारे में क्या सोचते हैं?" और वो क्या जवाब देंगे? "हम इस मुद्दे के बारे में सोचते ही नहीं।"

तुम्हारी समस्या ही यही है, तुम्हारी तकलीफ़ ही यही है कि तुम ऐसे मुद्दों के बारे में बहुत सोचते हो, बहुत उलझे हुए हो, जिन मुद्दों की कोई हैसियत नहीं। जिन मुद्दों के बारे में सोच-सोच के तुम अपनी ज़िंदगी को नर्क बना रहे हो।

तो क्या आध्यात्मिक आदमी की ज़िंदगी में कोई मुद्दा नहीं होता? केंद्रीय मुद्दा होता है बस। एक मुद्दा होता है, वो उसी एक मुद्दे पर अपनी जान झोंक देता है, सारी ऊर्जा लगा देता है। और फिर चूँकि वो अपनी सारी ऊर्जा को बिल्कुल एकाग्र करके, एक जगह केंद्रित करता है। तो उसकी ऊर्जा फिर सार्थक फल लाती है। उसे सफलता मिलती है।

आम आदमी की ऊर्जा बिखरी रहती है हज़ार चिन्दी-चिन्दी सवालों के जवाब देने में। "ये मुद्दा अभी ज़रूरी है, ये बात ही बड़ी हो गई। अब ये हो गया, अब वो हो गया।"

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