आचार्य: हर शब्द का अपना एक माहौल होता है, एक पृष्ठभूमि होती है, वो कहाँ से आ रहा है। तो जब मन में बहुत कुछ भरा रहे, संसार बहुत अर्थपूर्ण लगे तब शून्यता शब्द की प्रासंगिकता है।
जब लगे कि आगे-पीछे जो कुछ है, ऊपर-नीचे जो कुछ है, स्मृतियों में जो कुछ है, भविष्य में जो कुछ है उसका बड़ा मूल्य है। तो उस स्थिति के लिए फिर सन्तों ने समझाया शून्यता। कि तुम इनका मूल्य बहुत मान रहे हो, वास्तव में इनका मूल्य शून्य है। ठीक है? शून्यता इस परिप्रेक्ष्य से निकल कर आ रही है। जब लगे कि किसी चीज़ की क़ीमत बहुत है, अर्थ बहुत है, तब तुम कह देते हो शून्यता कि नहीं इसकी क़ीमत शून्य है, मन को खाली रखो।
जैसे ही समझ जाओगे कि किसी चीज़ की क़ीमत शून्य है वैसे ही मन उस चीज़ को छोड़ देगा। क्योंकि मन चीज़ों को पकड़ता ही इस उम्मीद में है कि जिस चीज़ को पकड़ा है उसकी क़ीमत बहुत ज़्यादा है। क़ीमत अगर शून्य है तो क्यों पकड़ा जाएगा? कुछ भी नहीं पकड़ा जाएगा। मन खाली हो गया, बोझ उतर गया, यह शून्यता हो गयी।
और अद्वैत की पृष्ठभूमि यह है कि मन प्राकृतिक तौर पर द्वैत में जीना चाहता है, ऐसी ही उसकी संरचना है। तुम्हें मन को द्वैत सिखाना नहीं पड़ेगा, मन के लिए द्वैत बड़ी सीधी-सरल बात है। मन की भाषा में द्वैत-ही-द्वैत है। क्या है द्वैत? दूरी, भेद, अन्तर, विभाजन। मैं छोटा हूँ, बाहर कुछ बड़ा है, वो मिल गया तो मेरा छुटपन ख़त्म हो जाएगा, यह द्वैत है।
अगर मुझे कष्ट मिल रहा है तो उस कष्ट का कारण कहीं बाहर है कोई, यह द्वैत है। मैं अलग हूँ, संसार अलग है, जीव और संसार दो पृथक इकाइयाँ हैं, यह भावना द्वैत है। और यह भावना, मैंने कहा, मन को सिखानी नहीं पड़ती, यह भावना मन में होती-ही-होती है। यह मन की प्रकृति है।









