
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम अभिषेक महाराज है, अभिषेक शुक्ला। लोग मुझे अभिषेक महाराज कहते हैं। मैं एक देवी मंदिर में मुख्य पुजारी हूँ और मैं वहाँ पर कर्मकांड और देवी अनुष्ठान करता हूँ। कई लोग मेरे पास में आते हैं, कई प्रकार की समस्याएँ लेकर के आ जाते हैं, जिसमें बहुत सारी बाधाएँ होती हैं कि भूत-चुड़ैल लग गए हैं। कोई बहुत सारे वशीकरण करने के लिए आ जाते हैं कि प्रेमी के ऊपर, प्रेमिका के ऊपर, पत्नी के ऊपर, पति के ऊपर। मुझे पता होता है कि ऐसा कोई भूत-चुड़ैल वग़ैरह है नहीं। लेकिन फिर भी मुझे उनके तल पर जाकर के उनके अंधविश्वास को अंधविश्वास से ही काटना होता है।
आचार्य जी, एक केस आया था। उनका बच्चा मंदबुद्धि है। शरीर तो विकसित है, लेकिन दिमाग़ छोटा-सा है। वो उत्तर प्रदेश में एक बाबा जी के पास में दिखाया था उसको। तो उनको लगा मन में कि हमारे बच्चे के ऊपर कुछ ऐसा है। तो वो बाबा के पास में लेकर गए, तो बाबा ने कहा कि “हाँ, इसके साथ में जब तुम आठवें महीने गर्भवती थी, तब तुम्हारी भाई की पत्नी ने तुम्हारे ऊपर तांत्रिक क्रिया करी थी। उसका परिणाम है कि इसका मस्तिष्क का विकास नहीं हो पाया। और ये तंत्र के कारण ऐसा हुआ है और ये तंत्र से ही सीधा हो जाएगा, हम सीधा कर देंगे।” उन्होंने ₹35 लाख उनसे ले लिए और वह ठीक नहीं कर पाए।
हम अब हमारे पास में उसको लेकर के आए, तो हमने सीधे दिल तोड़ने वाली बात बोली, क्योंकि कुछ डॉक्टर हैं, जिनसे हमने कुछ सुना है कि कुछ 23 क्रोमोसोम पुरुष के, स्त्री के कुछ मिलते हैं और कुछ मिसिंग होते हैं, तब ऐसे बच्चे पैदा हो जाते हैं। मैंने कहा कि इसकी कुछ थेरेपी वग़ैरह कराओ कि यह बता सके कि मेरे को सुसु आई, पोटी आई, ये कुछ बता दे बस। इससे ज़्यादा मैंने कि इसके अंदर सुधार नहीं हो सकता। और ये इतना करने के बावजूद यह ₹35 लाख इस बच्चे के लिए रख देते, क्योंकि वो तो कभी ठीक होने वाला नहीं तो उसकी सुविधा होती, और ये जाकर के वहाँ देकर के आ गए।
आचार्य प्रशांत: देखिए, वो जो झूठ है न, वो हमारी ज़िंदगी बन चुका है। जो कोई उस झूठ को स्वीकृति दे दे, वो हमारे बड़े काम का हो जाता है, हम हँसते-हँसते उसको पैसे दे देंगे।
उदाहरण के लिए बोल रहा हूँ, मैं एक गड़बड़ आदमी रहा हूँ पूरी ज़िंदगी। दावा मेरा ये है कि मैं बढ़िया आदमी हूँ। ठीक है? झूठ बोलने में, झूठ जीने में मुझे कोई अफ़सोस नहीं हुआ। हिंसा करने में कोई अफ़सोस नहीं हुआ। कपट करने में कोई अफ़सोस नहीं हुआ। शोषण करने में कोई अफ़सोस नहीं हुआ। किसी से डर जाने में कोई अफ़सोस नहीं हुआ। कहीं पर अपनी गरिमा गिरवी रखने में मुझे कोई अफ़सोस नहीं हुआ। मैं यह आदमी रहा हूँ। और इन सबके बावजूद मेरा मानना ये है कि मैं आदमी तो एक नंबर का हूँ। बढ़िया हूँ। ठीक? ये ज़्यादातर लोगों की कहानी है ज़िंदगी की, ज़्यादातर ऐसे ही हैं। भाई, थोड़ा कम, थोड़ा ज़्यादा, लेकिन ले-दे के लोग ऐसे ही होते हैं।
अब मैं अगर ऐसा रहा हूँ, तो इसका कर्मफल तो टूटेगा न मेरे ऊपर। मैं नशे में चल रहा हूँ, तो टकरा के गिरूँगा कहीं-न-कहीं, घुटना टूटेगा कि नहीं टूटेगा? इसमें कोई दैवीय बात नहीं है कि ऊपर से कोई आसमानी मुझ पर प्रकोप होगा या श्राप लगेगा, ऐसा कुछ नहीं है। आपने नशा करा है। आपने नशा करा है। सड़क पर निकलोगे तो घुटना टूटेगा या एक्सीडेंट होगा या कुछ और करोगे। आज नहीं होगा, तो कल होगा। होना तो पक्का ही है। नशा करते ही तय हो गया था कि कुछ दुष्परिणाम तो होगा। हो गया, अभी हो गया। तय हो गया।
लेकिन अगर मैं यह मान लूँ कि मेरे साथ आज जो कुछ बुरा हो रहा है, वो इसलिए हो रहा है, क्योंकि मैं तो आदमी ही बुरा हूँ, तो अहंकार को चोट लगती है। सच्चाई ये है कि मेरे साथ जो कुछ भी हो रहा है, वो कहीं-न-कहीं मेरी गलत हस्ती का परिणाम है। मैं बंदा ही गलत हूँ, इसीलिए मेरे साथ सब चीजें गलत होती हैं। पर मैं मानना नहीं चाहूँगा कि मैं बंदा ही गलत हूँ। मैं मानना चाहूँगा कि मेरे साथ जो गड़बड़ हो रही है, वो किसी प्रेत-बाधा के कारण हो रही है, वो किसी बाहरी संयोग के कारण हो रही है। जबकि तुम्हारे साथ जो कुछ हो रहा है, वो इसलिए हो रहा है, क्योंकि तुम गड़बड़ आदमी हो।
मैं बाबा जी के पास जाता हूँ, बाबा जी कहते हैं, “नहीं-नहीं, तुम आदमी गड़बड़ नहीं हो। तुम पर भूत चढ़ा है। मैं भूत उतार दूँगा।” देखिए, मेरे झूठ को कितनी स्वीकृति मिल गई। मेरी जो भीतर फॉल्सनेस है, उसको कैसा सहारा, कैसा रीइंफोर्समेंट मिल गया। अहंकार के लिए ख़ुद से बड़ी कोई चीज होती है? अगर अहंकार झूठ पर ही पलता हो और कोई आपके झूठ को सहारा, स्वीकृति, रज़ामंदी दे, तो अहंकार के लिए तो ये सबसे बड़ी बात हो गई न। वो उसके लिए सब कुछ, अपनी सारी धन-दौलत लुटा देगा। लेकिन कुल मिलाकर के काम वो एक ही करते हैं। वो आपको कभी यह जानने नहीं देंगे हम कि आपके साथ जो कुछ हो रहा है, उसके ज़िम्मेदार आप हो। कि आपको अपनी स्थिति बदलनी है, तो आपको अपनी हस्ती बदलनी होगी।
प्रश्नकर्ता: फिर जो भी ये उल-जुलूल उपाय देते हैं बाबा लोग, राज़ी-ख़ुशी उसको स्वीकार करते हैं। मैंने एक देखा कि हमारे वहाँ एक मुस्लिम समुदाय से हैं वो बाबा जी। उनके पास में उसी समुदाय से ही एक लड़का गया, उसने कहा कि मुझे कुछ भी हो, इस बार मुझे एमपीपीएससी क्लियर करनी है और टॉप में करनी है। डिप्टी कलेक्टर बनना है। तो उन्होंने उसको कुछ आयत दी। उस लड़के ने मुझे बताया कि तीसवें सिपारे की कुछ पाँचवीं आयत उन्होंने कहा और उसको कहा कि इतने हज़ार बार उसको लिखो, तो तुम एमपीपीएससी क्लियर कर लोगे।
और वहीं एक और समुदाय से देखा, उन्होंने कहा कि आप इक्कीस हज़ार बार महामृत्युंजय करो, तो आप एमपीपीएससी क्लियर कर लोगे। बाबा जी उनको बोल रहे हैं कि ग्यारह लीटर दूध ले जाकर के तीन चौराहा पार करना, फिर जो पहला पीपल का झाड़ दिखे उसमें वो दूध डोल देना। उसको बहुत अच्छे से स्वीकार कर रहे हैं और उसको कर भी रहे हैं।
आचार्य प्रशांत: और इन सब चीज़ों को धर्म के साथ जोड़ भी दिया जाता है। है न? कोई ये सब चीज़ें न माने, तो बोल देंगे धर्म में नहीं मानता, नास्तिक है।
तो अभिषेक जी, आप बस ये देखो न कि इंसान का जैसे जन्म ही होता है अपने झूठ की रक्षा करने के लिए। सच्चाई से बचने के लिए हम कितनी भी दूर तक जाने को तैयार हो जाते हैं। छोटी-सी सच्चाई है, परीक्षा पास करनी है तो मेहनत कर ले। पर उस छोटी-सी सच्चाई से बचने के लिए हम वो, क्या बोला आपने? वो तीसरे चौराहे पर पीपल के झाड़ पर भैंस का दूध और जो भी करना होगा, सब कर लेंगे। लेकिन जो सीधा काम है, वो कभी नहीं करेंगे। जैसे दुनिया में सबसे मुश्किल काम सबसे सीधा काम हो। सीधे काम के अलावा तिरछी चाल, ऐड़े पैडे कैसे चलना है, बता दो, सीधे चलने में बड़ी तकलीफ़ है। सब टेढ़े काम करने में हम माहिर हैं। ये जितने लोग हैं, ये सब वो लोग हैं जो सच्चाई से बचना चाहते हैं। और बाबा लोग इसमें सहयोगी बनते हैं, इसी कारण ये जाकर के बाबाओं के चरण छूते हैं और उनको पैसा देते हैं और इज़्ज़त देते हैं।
प्रश्नकर्ता: एक हमारे परिचित थे। जनरल मैनेजर थे वो कंपनी में, तो उनकी यकायक नौकरी एकदम से उनको निकाल दिया, टर्मिनेट कर दिया और उनकी नई जॉब लग नहीं रही थी। तो एक बाबा ने उनको कहा कि तुम इक्यावन हज़ार पार्थिव शिवलिंग बनाकर के पूजा करो, तो जॉब लग जाएगी। उन्होंने मिट्टी के गारे के बनाए और डेढ़ महीने तक उन्होंने वो किया और उसमें बहुत पैसा भी ख़र्च हुआ उनका। फिर वो एक ज्योतिष के पास में गए और ज्योतिष ने कहा कि ये-ये नग पहनना पड़ेगा और बुध-शनि इनके अठारह-अठारह, बत्तीस-बत्तीस हज़ार जाप और सवा लाख महामृत्युंजय के जप करने होंगे। इसके लिए इतना पैसा लगेगा और ये यज्ञ होगा। उन्होंने किया।
आचार्य प्रशांत: एक बात मुझे नहीं समझ में आती। महामृत्युंजय मंत्र बड़ा सुंदर और बड़े ऊँचे अर्थ का मंत्र है। उस पर कई बार मैंने बात भी करी है, उसकी व्याख्या दी है। बड़ी गहरी उसमें बात छुपी हुई है। ये बिना समझे कोई मंत्र जपने से क्या लाभ हो सकता है? आप कह रहे हो एक हज़ार एक बार उसको जपो या एक लाख एक बार जपो। मैं कह रहा हूँ, एक लाख एक बार नहीं, बस एक बार। उसको समझ लो भाई। पर एक लाख एक बार नहीं, एक करोड़ एक बार भी तुम जपते रहो, जपते रहो बिना समझे। तुम्हें क्या मिलेगा? यह काम तो मशीन भी कर सकती है। तुम्हें मतलब तो पता है नहीं। और तुम कह रहे हो, कभी कोई शब्द पकड़ लेता है, कभी कोई देवी का नाम पकड़ लेता है, कभी कोई मंत्र पकड़ लेता है, और कहते हैं इसको जपो, जपो, जपो। अरे क्या मिलेगा? तुम समझते भी हो क्या बात है? और जो समझ गया, वो समझ गया। वो इतनी बार जपे क्यों?
बोध से बड़ा जप कोई होता है? अर्थ की गहराई में मैं कभी डूबा नहीं। मैं क्या कर रहा हूँ बस, मैं दोहरा रहा हूँ। दोहरा रहा हूँ। तो दिमाग सुनना पड़ जाएगा और क्या होगा?
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं अपने अनुभव से बोल रहा हूँ कि नाम जप की साधना मैंने की और तीन महीने तक मैंने किया और मैं ऐसे विक्षिप्त समान रो रहा था बहुत, क्योंकि मैंने नाम जप इतनी ईमानदारी से किया कि शायद मतलब चौबीस घंटों में कुछ घंटे रहे होंगे जो मेरे खाने या सोने के लिए थे। बाक़ी दौरान मैं नाम जप ही करता था। तीन-साढ़े तीन महीने में मेरी स्थिति ऐसी हो गई कि मैं विक्षिप्त होकर के ज़ोर-ज़ोर से रो रहा था। मेरे परिचित लोग सब मुझे लेकर के आ गए कि अब पंद्रह दिन रुको, थोड़ा इलाज कराएँ, कुछ नहीं करना। तब सब कुछ बन गया। तब थोड़ा दिमाग़ आया ठिकाने और फिर पता चला कि ये मैं क्या ही कर रहा था और कुछ करता तो आगे और बढ़ जाता, तो पता नहीं ऐसी स्थिति में रहता कि मैं किसी से बात भी कर पाता।
आचार्य प्रशांत: आपको मालूम है दिमाग़ की ख़ुराक क्या है? मेंटल हेल्थ, मानसिक स्वास्थ्य का सबसे बड़ा सूत्र क्या है? एक सुलझा हुआ जीवन जीना, समझ से, बोध से, विवेक से जीना। ये मेंटल हेल्थ का, माने मन को तंदुरुस्त रखने का, मन को पोषक ख़ुराक देने का सबसे बड़ा सूत्र है। उसकी जगह उसके विपरीत, जब आप मन पर कोई चीज़ ज़बरदस्ती लाद देते हो कि फलाना शब्द ले लो, इसको बस दोहराते रहो, दोहराते रहो, दोहराते रहो। तो मन समझा तो कुछ है नहीं। बस दोहरा रहा है।
माने मन अपने पोषण, अपनी ख़ुराक, अपने स्वास्थ्य से आपने वंचित कर दिया, वो बीमार पड़ेगा। जैसे आप बोल रहे हो आप विक्षिप्त हो गए थे, तो ये विक्षिप्त होने का सूत्र है। जिसने गणित समझ ली, क्या फिर वो गणित के सवालों का रट्टा मारता है? जिसको बात समझ में आ गई है, सूत्र समझ में आ गया है, क्या वो गणित का प्रश्न-पत्र रट करके हल करता है? वो कहता है, मैं समझ लिया, हो गया। अब कोई भी सवाल ले आओ, हम हल कर देंगे। हमें अब दोहराते रहने की कोई ज़रूरत नहीं है।
दूसरी ओर एक ऐसे भी छात्र होते हैं, जिन्हें कुछ समझ में नहीं आया होता, तो सवाल रट के गए होते। वो सवाल रट के गए होते हैं। ये सवाल रटना, बार-बार याद करना। अरे अध्यात्म कोई स्मृति की बात थोड़ी है कि तुम रटे जा रहे हो, रटे जा रहे हो। पागल हो गए हो क्या? अध्यात्म बोध की बात है। समझने की बात है। मन का स्वास्थ्य है समझदारी, विवेक।
लोगों को बार-बार कहिए, देखो, तुम में क्षमता है, तुम जान सकते हो, यूँ ही सर मत झुका दो, यूँ ही कुछ मान मत लो। प्रश्न करो। बार-बार प्रश्न करो, जिज्ञासा करो। उत्तर मिले न मिले, तुम पूछते रहो। बात उत्तर की नहीं है। तुमने प्रश्न पूछा, इसमें भी तुम्हारा कुछ लाभ हो गया, उत्तर मिला चाहे ना मिला। और सवाल न पूछना, अभिषेक जी, बड़ी गंदी आदत बन जाती है। जिस किसी को आपने कभी सवाल पूछने पर डाँट दिया, जिस किसी के ऊपर आपने अनुशासन लाद दिया कि सवाल पूछोगे तो मार खाओगे, वो आदमी अब ज़िंदगी में हर तरह के अंधविश्वास का शिकार बनेगा।
अंधविश्वास बस यही नहीं होता है कि भूत-प्रेत, जादू-टोना, कि ज्योतिषी या कि ऑरा, एनर्जी, वाइब्रेशंस और क्या होता है वो रिक्की और टैरो और दुनिया भर की बातें, यही अंधविश्वास नहीं है।
कोई भी चीज़ जो आपने जानी नहीं है, पर मान ली है, वो अंधविश्वास है।
उदाहरण के लिए, मुझे बड़े होके बाप का बिज़नेस संभालना है। क्यों संभालना है? तुमने कोई सवाल किया कभी? तुमने जानने की कोशिश की कभी? तुमने कोई विकल्प तलाशा कभी? नहीं, लड़कियाँ हैं, लड़कियों को इतनी उम्र तक तो शादी कर लेना चाहिए। फिर कम-से-कम दो बच्चे होने चाहिए। क्यों होने चाहिए? हम न कह रहे कि होने चाहिए, न कह रहे नहीं होने चाहिए। पर तुम यह बताओ, तुम्हारी ज़िंदगी है। तुमने सवाल किया कभी? क्या कर रहे हो यार?
“तुमने इतनी अच्छी पढ़ाई करी है, ये सब करा है। तुम अभी इतने साल के हो गए। अभी तुम एक छोटी-सी कार में चलते हो। तुम्हारी बड़ी वाली कार कहाँ है? तुम्हारी इंपोर्टेड कार कहाँ है? यह सब होना चाहिए। अगर नहीं है, तो तुम्हारी ज़िंदगी में तुम लूज़र हो।” ये अंधविश्वास नहीं है क्या? यह भी तो अंधविश्वास है न कि आपने मान लिया कि ज़िंदगी में ऐसा-ऐसा तो होना ही चाहिए।
ये सब हम इसलिए मान लेते हैं, क्योंकि हम डरे लोग होते हैं। हमें बहुत डरा दिया गया होता है। और हमसे कह दिया गया होता है कि जो सामाजिक ताक़तें हैं, इनसे दब के रहना। नहीं तो तुम्हारा बड़ा नुक़सान कर देंगी। छोटे बच्चे को सिखाइए, सच्चाई सबसे बड़ी ताक़त है। और सच के सिवा किसी के सामने कभी सर मत झुकाना। अब न तो वो भूत-प्रेत से डरेगा, न नेताजी से डरेगा, न सेठ जी से डरेगा, न बाबा जी से डरेगा। वो क़िस्मत से भी नहीं डरेगा। ये होता है सच्चा धार्मिक आदमी।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं बहुत साधारण परिवार से हूँ। मैंने पढ़ाई किया, ग्रेजुएशन किया, एंटीवायरस में जॉब किया, कंप्यूटर हार्डवेयर नेटवर्किंग इंजीनियरिंग किया, डिप्लोमा कोर्स में ईआरपी किया। इधर मेरी रुचि इन सब चीज़ों में भी रही, क्योंकि मैं शुरू से जानना-जानना चाहता था कि ये है क्या? देवी के दर्शन करने की मन में बहुत इच्छा थी कि साक्षात देवी के दर्शन करना चाहता हूँ। तो धीरे-धीरे कुछ-कुछ मेरे संग में मान्यताएँ जुड़ी, ब्राह्मण परिवार से मेरा जन्म था तो गीता-पाठ होता था और मैं कुछ पूजा-पाठ भी किया करता था। तो मेरे संग में धीरे-धीरे मान्यताएँ जुड़ने लग गईं कि मेरे साथ में कुछ है, और फिर लोग आने लगे।
और मेरा स्वभाव था कि अगर कोई भी व्यक्ति मेरे सामने रोता हुआ दिखता था, दुखी दिखता था, तो तो मैं सोचता था कि इसको थोड़ा-सा समय मिल जाए। जैसे एक महिला आकर के रो रही हैं कि मेरी बेटी की शादी नहीं हो रही है और वो बहुत विचलित और बेचैन है। इतने दावेदारी से कि मैं कहता था कि तीन महीने के अंदर विवाह हो जाएगा, चिंता नहीं करो। उस समय वो बिल्कुल भौचक होकर के रुक जाती थी और फिर तीन महीने तक रोना थोड़ा बंद हो जाता था। उसके बीच में प्रयत्न चालू हो जाते थे, तो वो काम हो भी जाता। तो मैं ऐसे अंधविश्वास की काट अंधविश्वास से करने लगा।
मैं आपको कुछ एक और चीज़ बताना चाहता हूँ। कोई महिला है, उसको भूत-प्रेत हुए। वो मान रहे हैं कि हमको भूत-प्रेत है, हम तो जानते हैं कि नहीं है। अब वो लेकर के आए, उनको पता है कि उनको भूत-प्रेत है। अगर मैं ना बोल दूँ कि नहीं है, तुमको कुछ, तो वो किसी और बाबा के पास जाएँगे और वहाँ उनका क्या शोषण हो जाएगा, कह नहीं सकते। तो इसलिए मैं कहता हूँ कि हाँ, ठीक है, तुमको भूत चुड़ैल है। अब यहाँ पर मैं क्या करता हूँ कि कुछ आटे या कपड़े वग़ैरह का कुछ गुड्डा-वड्डा बनाया, महिला के ऊपर से उतारा कि और उसको ऐसा वातावरण में निर्माण करता हूँ कि मैं एक तंत्र और एक बहुत अच्छी क्रिया और यज्ञ हो रहा है।
और उस पुतले के अंदर बोलता हूँ कि तुम्हारी बाधा आ गई और पोटेशियम बीच में रख के और वो पुतले को रख के और घी की जगह ग्लिसरीन डलवा करके और उसको करवाता हूँ। जैसे ही ग्लिसरीन, पोटेशियम मिलता है, तो आग लग जाती है। धू-धू करके पुतला अपने आप जल उठता है। तो उस दौरान उस महिला को ये आभास हो जाता है कि ये अपने आप आग लगी और वो बाधा चली गई और वो मान जाती है और फिर वो ठीक हो जाती। ऐसे ही मैं अंधविश्वास से अंधविश्वास की काट करता चला आ रहा हूँ। मैंने देखा है कि ये अंधविश्वास पूरा सब दूर फैला हुआ है लेकिन ये कुछ स्तरों में बँटा हुआ है।
आचार्य प्रशांत: रोचक बात है।
प्रश्नकर्ता: स्तरों में है। पहला स्तर उन लोगों का है जो कि कम शिक्षित हो गए हैं, जो और उसमें आ जाते हैं। वो एक बाबा जी को मानते हैं, जो भभूत दे रहे हैं या मोर पंखा झाड़ा लेकर के बैठे हुए हैं, ऐसे बाबा जी पर उनका विश्वास होता है।
एक उनसे और ऊँचा तबका होता है, जो कि थोड़ा और वेल एजुकेटेड है। ज्योतिषों में उनका विश्वास है कि ये नग पहनना है। गोमेद पहनेंगे, सफेद हीरा पहनेंगे, पुखराज पहनेंगे, ये पहनेंगे, सोने में पहनेंगे, अष्ट धातु में पहनेंगे। वो चल रहा है।
तीसरे और इंग्लिश स्पीकिंग बाबा आ जाते हैं उसमें। उन लोगों का अलग ही चल रहा है कि योर ऑरा इज़ नॉट क्लियर एंड योर एनर्जी नॉट गोइंग टुवर्ड्स गुड राइट। जिस प्रकार से वह इस प्रकार से इंग्लिश बोल के और ऊँचे तबके को प्रभावित कर रहे हैं।
मैं ऐसा देखता हूँ कि एक परेशानी है कि एसिडिटी की है। शरीर में झुनझुनी हो रही है, सुइयाँ काट रही हैं या जो भी हो रहा है उनको, लेकिन वहीं नीचे में वो जो बाबा जी हैं, वो उसके ऊपर से मुर्गा उतार करके काट रहे हैं और पैसे ले रहे हैं। वहीं दूसरे जो हैं, वो बोल रहे हैं कि आपको गोमेद पहनना पड़ेगा, क्योंकि आपका राहु वक्री में चला गया है। आपका केतु ऐसा चला गया है। वहीं जो और दूसरे बाबा हैं, वो बोलते हैं कि अब आपको पंद्रह दिन के लिए हमारे रिट्रीट रिसॉर्ट पर आना होगा और हम आपका ऑरा क्लियर करेंगे। आग का कटोरा लेकर के घुमाएँगे। जबकि वो डॉक्टर के पास जाते, तो वो एसिडिटी की दवा से ही अच्छे हो जाते।
ये तीन स्तर में यहाँ पर लोग अंधविश्वास में ही घिरे हुए हैं। और यहाँ पर ये शिक्षित हैं, पढ़े-लिखे हैं।
मैं आपको एक और बताना चाहता हूँ कि एक एमपीपीएससी टॉपर हैं वो, मैं नाम नहीं लेना चाहता, लेकिन टॉपर हैं। वह एक मंदिर में दर्शन करने के लिए गए थे, हनुमान जी के मंदिर में। वहाँ बाबा जी बैठे थे, उन बाबा जी ने उनको बुला लिया अपने पास में और उनके परिचय पर लिख दिया कि आपके घर में तो ऐसे भूत... जबकि वो पूछने गए नहीं थे, वो दर्शन के लिए गए थे। और वहाँ पर उनका पूरा-पूरा उन्होंने वर्णन लिख दिया और उनके साथ में एक मनोचिकित्सक भी थे। वो उनको भी उन्होंने ऐसे ही पर्चा बनाकर दे दिया।
और आश्चर्य जब घटा हुआ मेरे सामने कि जब वो दोनों ही उस चीज़ को स्वीकार कर गए और घर आकर के वो महसूस कर रहे हैं कि उनके घर में बाधा घूम रही है।
आचार्य प्रशांत: पर्चा माने क्या लिख कर?
प्रश्नकर्ता: मतलब वो बाबा जी जो है, वो उनके भूत-भविष्य के बारे में पर्चे पर सब लिख देते हैं।
आचार्य प्रशांत: अच्छा, ये उनका तरीका है।
प्रश्नकर्ता: तरीका है बाबा जी का। अब वो स्वीकार कर लिया और उनके दिमाग़ में वो भ्रांतियाँ चालू हो गईं। अब वो हमारे पास में आए कि हमको घर में, हमारे हॉल में, एक साया घूमता हुआ दिखता है। मनोचिकित्सक है वो, बाईस साल से वो प्रैक्टिस कर रहे हैं। लेकिन उनको साया दिख रहा है। अब मैं कहूँ कि नहीं-नहीं, ऐसा कैसे बात कर रहे हो आप? आप मनोचिकित्सक हो। लेकिन उनको वो सुनना नहीं, क्योंकि बाबा जी ने उनके दिमाग़ में वो सारी की सारी चीज़ें इतनी प्रगाढ़ भर दीं और बाबा जी ने जो अपना ताइफ़ा करके रखा हुआ है, ये भीड़ लाखों लोग, वो नारियल का ढेर और सारा का सारा वो देख के वो उस चीज़ से प्रभावित हो गए।
अब आए हमारे पास में कि अब आप बताइए। मैं कि ठीक है, हम आते हैं, घर पर देखना पड़ेगा। अब गए, दरवाज़े पर जाते साथ ही मैं बोल रहा हूँ, अरे मेरा पाँव रुक गय! कोई ऐसी एनर्जी जो मुझे अंदर प्रवेश ही नहीं करने दे रही। वो और रहा कि हाँ, था वहाँ पर उनके हॉल में। गया, मैंने ये निकल के गई, ये गई है, ये भयंकर है ये। ये तो किसी के द्वारा श्मशान में से भेजी गई आत्मा है। वो और पसीने-पसीने हो रहे हैं। डरो नहीं, मैंने कहा, मैं हूँ ना। मैं अभी सब निकाल दूँगा यहाँ से। फिर हमने वहाँ पर प्रोसेस किया और वहाँ से वो। मैंने कहा, मैं सब लेकर के जा रहा हूँ और इसको श्मशान में दफन कर दूँगा, कोई चिंता नहीं करो। आज से सब ख़त्म। और दूसरे दिन से सब।
मैं जिस प्रकार अंधविश्वास से अंधविश्वास की काट करता हूँ, आचार्य जी, वो इस प्रकार से मैं कर देता हूँ। तो मेरा प्रश्न ये था कि क्या शिक्षा अंधविश्वास को नहीं काट सकती है? या ये कैसे शिक्षित हैं जो ये इस अंधविश्वास में इतने घुसे जा रहे हैं?
आचार्य प्रशांत: आपने कहा, तीन इस तरह लोगों के शिक्षा के अनुसार, जो सबसे ग्रामीण लोग हैं सीधे-साधे, उसमें कई अर्धशिक्षित या अशिक्षित भी हैं। वो तंत्र-मंत्र, जादू-टोना, प्रेत-बाधा इन चीज़ों के लिए बाबाओं के पास जाते हैं। फिर आपने कहा कि दूसरे तल के लोग हैं, जो थोड़ा पढ़े-लिखे, सामान्य शहरी मध्यम-वर्गीय लोग हैं। ये लोग आपने कहा कि ये ज़्यादा जाते हैं ज्योतिषों के पास में। ठीक है। और ये अपना पुखराज…
प्रश्नकर्ता: अंगूठियाँ हैं, मालाएँ हैं।
आचार्य प्रशांत: और ये सब करते हैं। और फिर आपने कहा जो तीसरा वर्ग है, शिक्षा के ही आधार पर, वो है ज़्यादा पढ़े-लिखे लोगों का जिनके पास प्रोफेशनल शिक्षा भी हो सकती है, इंग्लिश स्पीकिंग लोग हैं। वो जाते हैं इंग्लिश स्पीकिंग बाबा के पास। तो आप कह रहे हैं कि शिक्षा के आधार पर यदि तीन तल हो सकते हैं, तो तीनों तलों पर अंधविश्वास व्याप्त है। माने शिक्षा से कोई अंतर पड़ ही नहीं रहा। चाहे अशिक्षित हो, अर्धशिक्षित हो हम या बहुशिक्षित हो, वो सब एक बराबर ही बैठ रहा है। क्यों बैठ रहा है? बहुत अच्छा सवाल है।
आपके पास भी हज़ारों लोग आते हैं, मैंने सुना है। ज़्यादातर वो किस दूसरे और तीसरे वर्ग से होते होंगे।
प्रश्नकर्ता: दूसरे और तीसरे वर्ग से ही हैं।
आचार्य प्रशांत: ठीक। देखिए, शिक्षा आपको बस अधिक-से-अधिक ये बता सकती है कि बाहर की दुनिया कैसे चलती है। अब वो भी पूरा नहीं बता पाएगी, पूरा आपको कुछ नहीं समझ में आ सकता, क्योंकि अनंत ब्रह्मांड है। आप कितना इसके बारे में ज्ञान ले लोगे। बात ये भी नहीं कि वो ज्ञान अभी मनुष्य की पकड़ में आया नहीं है। मनुष्य को जो बातें पता भी हैं, वो भी किसी एक इंसान को सब आप कैसे बता लोगे?
आईआईटी में मैंने कहा था कि आप लोग यहाँ आईआईटी में बैठे हो और ज़्यादातर आप लोगों को न्यूटोनियन फ़िज़िक्स पता है। जो मॉडर्न फ़िज़िक्स है, जिसमें रिलेटिविस्टिक और क्वांटम आती हैं, वो अनिवार्य नहीं है किसी आईआईटीयन के लिए। न तो एंट्रेंस में पता होती है, न पता होती। तो मतलब जो फ़िज़िक्स का नॉलेज है, जो आप एक आईआईटीयन से एक्सपेक्ट करोगे, वो भी पूरा हो, कोई ज़रूरी नहीं है। और बाक़ी क्षेत्रों में तो बिल्कुल ही नहीं होगा।
आपने मनोचिकित्सक की बात करी। कोई प्रोफेशनली हाइली एजुकेटेड हो सकता है, लेकिन उसे मनोविज्ञान का थोड़ी ही ज्ञान हो जाएगा। इंजीनियर है, बहुत अच्छा इंजीनियर हो सकता है। वो आगे जाकर के हो सकता है मटेरियल साइंस में पीएचडी कर ले। लेकिन उसे साइकोलॉजी तो नहीं आ गई न।
तो माने पहली बात तो हमारी शिक्षा हमें बस यह दुनिया का ज्ञान देती है। दुनिया का, कि दुनिया कैसे चलती है, जिसमें इतिहास, भूगोल, गणित, सब भाषाएँ, ये सब आता है। साइंसेज़ आती हैं और आर्ट्स आती हैं। ये सब बाहरी चीज़ें हैं न, जो हमें इंद्रियों से दिखाई देती हैं। इसका ज्ञान मिलता है और वो ज्ञान भी मिलता है आधा-अधूरा। क्योंकि पूरा ज्ञान किसी एक इंसान को देना लगभग असंभव बात है। तो एक तो ये हुआ।
एक चीज़ है, जिस पर हमारी शिक्षा बिल्कुल-बिल्कुल मौन रहती है। वह है स्वयं का ज्ञान। मैं कौन हूँ? मेरा इस पूरी दुनिया से रिश्ता क्या है? मेरे भाव कहाँ से आ रहे हैं? मेरे संस्कार कहाँ से आ गए? मुझे जो पसंद है, न-पसंद है, वो कहाँ से आता है? ये सब हमें पता होता नहीं। तो शिक्षा के ये दो आयाम हैं, एक बाहरी, एक भीतरी। भीतरी का तो हमें कुछ पता ही नहीं। मुझे वो इंसान बहुत पसंद आ रहा है। वो इंसान पसंद क्यों आता है, वो नापसंद क्यों है, मैं नहीं जानता, बस है पसंद। भारत में सबको क्रिकेट पसंद है। ब्राज़ील में किसी को क्रिकेट पसंद नहीं है। सबको ये लगता है, हमें पसंद है। उस पसंद का स्रोत क्या है? कोई नहीं जानता कि बाहरी प्रभाव पड़े हैं और तुम्हारे ऊपर और ऐसा हो गया है तुम्हारे साथ, ये कोई नहीं जानता।
तो भीतर हमारे क्या चल रहा है, हमारी शिक्षा कभी बताती नहीं। और बाहर का जो कुछ हमारी शिक्षा हमको बताती है, हमें है उसका आधा-अधूरा ज्ञान। भाई, ये तो ज़माना सुपर स्पेशलाइजेशन का है ना। नाक के डॉक्टर को घुटने के बारे में नहीं पता होगा। और सिविल इंजीनियर को कंप्यूटर इंजीनियरिंग के बारे में नहीं पता होगा। यह तो यही चल रहा है हर क्षेत्र में। सब एक-दूसरे के क्षेत्रों को नहीं जानते हैं। तो कुल मिलाकर के हम जानते ही क्या हैं, बहुत कम। यानी कि जो बहुत पढ़ा-लिखा आदमी है, वो भी बहुत कम जानता और अपने बारे में तो बिल्कुल ही नहीं जानता। बिल्कुल ही नहीं जानता।
अब आपने एक उदाहरण दिया था कि वो महिला है, एसिडिटी और उसको लग रहा है भीतर भूत घुस गया है। अब ऐसा नहीं है कि बिल्कुल ही पता नहीं है कि उसके साथ चल क्या रहा है। बस वह भीतरी जगत में ध्यान देना होता है। इसका उसको कुछ प्रशिक्षण ही नहीं है। उसको ये भाव उठ रहा है कि मुझे कुछ हो रहा है, पर ये भाव कहाँ से आ रहा है, उसे पता चल जाता अगर उसने ख़ुद को ध्यान से देखा होता। पर हम ख़ुद को कभी ध्यान से देखते नहीं, क्योंकि ऐसा हमें कभी सिखाया गया नहीं। तो इसलिए अंधविश्वास व्याप्त है।
अंधविश्वास का क्या मतलब होता है? अंधविश्वास का मतलब होता है कुछ मान लेना बिना उसे जाने।
अब जानने के जब संस्कार ही नहीं हैं, तो जानना हो नहीं पाएगा और ज़िंदगी चलाने के लिए फिर मानना तो पड़ेगा न। जाने बिना माना, तो अंधविश्वास शुरू हो गया। चाहे कोई बहुत पढ़ा-लिखा आदमी हो, लेकिन उसे भी अपने आप को देखने की तमीज़ नहीं है, आत्मज्ञान नहीं है, तो वो फिर सोचता है दुनिया ऐसी है, दुनिया वैसी है। वो ऐसा क्यों सोच रहा है, ये उसने कभी देखा नहीं। भीतरी सच को जानने की हमको कोई प्रशिक्षण मिलती नहीं है, तो फिर हम कुछ भी और शुरू कर देते हैं।
उदाहरण के लिए, मुझ पर घर में कोई ध्यान नहीं देता। मैं एक 32 साल का पढ़ा-लिखा बेरोज़गार युवा हूँ, और पढ़ाई-लिखाई मेरी वैसे ही हुई है जैसे भारत में होती है, आम गाँव, कस्बे, शहर में। घर में कोई मुझे इज़्ज़त मिलती नहीं, एक रुपया कमा के लाता नहीं। हर कोई लानत भेजता रहता है, ये मेरी हालत है। ठीक? और रुपया-पैसा भी अब धीरे-धीरे मेरे हाथ में देना कम कर दिया गया है कि 32 का तो हो गया। कब तक बाप की कमाई खाएगा?
इसको भूत चढ़ने की संभावना बहुत ज़्यादा है। और इसे पता भी नहीं चलेगा कि इसको भूत क्यों चढ़ा है। ऐसा नहीं कि वो जानबूझकर साज़िश कर रहा है, उसे सचमुच लगेगा भीतर कुछ हो रहा है। पर जो भीतर हो रहा है, बस इसलिए हो रहा है, ताकि इसको कभी तो इज़्ज़त मिले। जिस क्षण उसको भूत चढ़ जाएगा, लोग उसको सम्मान की दृष्टि से देखेंगे। ऐसे खड़े हो जाएँगे, “अरे-अरे-अरे-अरे, देखो इस पे बाबा जी आए हुए हैं। चढ़े हुए हैं। इस पे देखो दादाजी चढ़ गए, इसके ये हो गया, वो हो गया।” और फिर उससे कोई छोटे-मोटे काम के लिए नहीं दौड़ाएगा, जाके तरकारी ले आओ, हल्दी ले आओ, हींग ले आओ। कोई नहीं कहेगा।
और अब अगर वो उस आवेग में आवेशित होकर के, अभी तो उस पर है आविष्ट है। कोई कह दे, वो दस हज़ार रुपए सामने रखो। दस हज़ार क्या, पचास हज़ार रख देंगे घर वाले सामने। सारी हसरतें पूरी हो गई न? ख़ुद को जानने का यही मतलब होता है कि हमारे भीतर कितनी कामनाएँ छुपी हुई या प्रकट उबल रही हैं। पर हम नहीं जानते कि हमारी कामनाएँ क्या हैं। वही कामनाएँ जो हैं, फिर बड़े विकृत, डिस्टोर्टेड तरीक़ों से सामने आती हैं। ये अंधविश्वास है।
प्रश्नकर्ता: आपकी बातें सुनके मुझे अंदर से ऐसे ठंडी साँसें आ रही हैं कि मैंने मेरी इतनी आयु ली, लेकिन ऐसी चीज़ें आज तक मुझे किसी ने नहीं बोलीं और एक गुत्थी जो मुझे ही समझ में नहीं आ रही थी, वो अब मुझे समझ में आ रही है, अभी आपकी बातें सुनके। मैं आपके सामने रखना चाहता हूँ, जो अभी शोषण की बात हो रही थी।
3 वर्ष पहले हमारे पास में एक महिला को लाया गया था। 1½ वर्ष हुआ था शादी को और उसको शरीर में चुड़ैल और भूत सब आ रहे थे। उसको कहीं और भी लेकर के गए हुए थे। तो उसको वहाँ गरम-गरम चिमटों से जलाया गया था, ज़ंजीरों से मारा गया था। फिर उसको लेकर के हमारे पास में आए और मैंने उसको देखा और मुझे लगा कि नहीं-नहीं, ऐसा कुछ नहीं है। मनोचिकित्सक वाली कोई बात नहीं है इसके साथ। मैंने सब परिवार को बाहर किया और उसको बोला कि देखो, सच बताओ, नहीं तो मैं भी मारूँगा। सच बताओ, बात क्या है?
फिर उसने जो बात मुझे बताई, अब आपके कहने से मुझे क्लिक होती है। उसने मुझे कहा कि मेरे को अभी तीन महीने पहले बेटी हुई है। जब से बेटी हुई है, जब से परिवार वाले मुझे तंग करते हैं। मेरी सास ने जो मुझे दहेज में वॉशिंग मशीन मिली थी, उसमें कपड़े नहीं धोने देती। उसमें गेहूँ भर दिए और बोलती, हाथ से कपड़े धो।
मेरा पति रात में आकर के 12-1:00 बजे तक मुझे तंग करता है। छोटी बच्ची दूध पीती, सोने को नहीं मिलता। दिन में भी सोने को नहीं मिलता। दिन भर काम में निकल जाता है। पति परेशान करता है 12:00 बजे तक, सुबह 5:00 बजे मुझे फिर उठना पड़ता है। तो बोले, मैं शरीर में बाधा ला के कि मैं को बाधा आ गई और मैं भड़ाम करके बेहोश हो जाती हूँ और 3 घंटे तक बेहोशी ही रहती और मस्त सोती।
अब दुविधा में हम फँस गए। अब क्या करें? हमने पूरे परिवार को बुलाया और कहा कि इसको भूत-चुड़ैल नहीं है, इसको सूर्य की पत्नी छाया देवी का इष्ट है। अगर इसको सूर्य की पहली किरण उगने के पहले उठाओगे, तो यह ऐसे ही पागलपने करेगी। और इसके पास में दारू पीकर के, शराब पीकर के कोई नहीं जाना चाहिए, नहीं तो यह पूरे खानदान को तबाह कर देगी। यह सुनकर के वो सारे डरे। उसको उस समय अच्छे से सोने दिया, 7-8 घंटे बढ़िया सोई। और पति ने दारू पीना भी बंद कर दिया। सब कुछ बढ़िया।
अब का समय ये है कि अब उसको पुत्र-रत्न की प्राप्ति हो चुकी है, पहले बेटी थी इसलिए तंग करते, बेटा हो चुका है। लेकिन मेरे छाया देवी घोषित करने के बाद में वो शोषित थी, अब वो शोषक हो चुकी है। अब अगर उसका पति कहीं बारात में या उसके दोस्तों के साथ में एक घूँट भी अगर पी ले, तो वो डंडे से उसका माथा फोड़ देती है। अपनी सास से पूरे घर का काम करवाती है और छाया देवी कभी भी आकर सास को भी चाँकट मार देती है।
आचार्य प्रशांत: जितनी हमारी सामाजिक कुरीतियाँ हैं, हम लिंग-भेद, मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण, जाति-भेद, उन सबका आप रिश्ता देख पा रहे हैं अंधविश्वास से। आपने कहा, दस में से छह जो आपके पास आती हैं कि हम पर भूत चढ़ा है, वो महिलाएँ होती हैं। कारण समझ रहे हैं? वही ज़्यादा सप्रेस्ड हैं। वही हैं जिन्हें इज़्ज़त कम मिलती है, वही हैं जिन्हें काम ज़्यादा करना पड़ता है। आपने उदाहरण में बताया, सोने को नहीं मिल रहा था उस बेचारी को, तो उसने कहा, मुझ पर भूत चढ़ा है। कम-से-कम इस बहाने सोने को मिलेगा।
अंधविश्वास जहाँ दिखाई दे, जान लीजिए अकेला नहीं होगा, उसके पीछे एक सड़ा-गला समाज ज़रूर होगा। जो समाज स्वस्थ होगा, जहाँ के इंसानों में आपस में सहज रिश्ते होंगे, वहाँ के लोगों में और परिवारों में अंधविश्वास नहीं पनपेगा।
हर आदमी चाहता है कि अपने आप को अभिव्यक्त करे। उसे अपने आप को अभिव्यक्त करने का जब सही ज़रिया नहीं मिलता, तो फिर वो बड़े ग़लत ज़रिए निकालता है। वो जो आदमी झूम रहा है न, ऐसे बाल खोल के झूम रहा है, ये सब कर रहा है। ये वो है शायद जिसे कभी मुँह खोलने की भी आज़ादी नहीं थी। और अब इसे आज़ादी मिल गई है ये सब करने से कि ये चिल्ला भी सकता है।
इसमें जाति का भी कोण है, इसमें सामाजिक प्रथाओं का बहुत तरीके का भी कोण है। घर में अगर पावर डिस्टेंस ज़बरदस्त है; बात सिर्फ़ महिला की नहीं है अगर पुरुषों द्वारा भी पुरुषों को दबाया गया है, जैसे बेरोज़गार लड़के का उदाहरण, तो वो कोण भी आता है और जो लिंग का कोण है, वो तो सामने है ही इसमें।
तो ये कुल मिलाकर के एक पूरे अस्वस्थ समाज की ओर इशारा है, जहाँ पुरानी बेड़ियाँ जितनी ज़्यादा हैं, वहाँ अंधविश्वास उतना ज़्यादा मिलेगा आपको।
प्रश्नकर्ता: जब यह घट रहा होता है, तो इसमें फिर मलाई खाने के लिए कुछ लोग आकर के बाबा जी बन जाते हैं। एक बाबा बन जाता है, एक ज्योतिष हो जाता है और एक ऐसे ऑरा क्लीनिंग करने वाले आ जाते हैं।
आचार्य प्रशांत: इंग्लिश स्पीकिंग बाबा।
प्रश्नकर्ता: इंग्लिश स्पीकिंग बाबा आ जाते हैं। और ये फिर अपने बाज़ार गर्म करने लग जाते हैं इन सब चीज़ों। तो मैंने देखा कि इन लोगों के हैं न, एक विशेष लक्षण बोले। जैसे एक बाबा ने बोला कि मैं बहुत उदास तालाब के किनारे बैठा था और पीछे से एक बाबा आए। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और अपनी शॉल निकाल के दी, “ले, आज के बाद ये शॉल जिसको तू उड़ाएगा, वो निरोगी हो जाएगा और तेरा नाम हो जाएगा।”
वहीं एक और बोल रहे हैं, कि “मुझे सपने में साक्षात देवी आई और उन्होंने कहा कि मैं तेरे शरीर में समाना चाहती हूँ और उन्होंने कहा, हाँ, समा जाओ और उनको दूसरे दिन से फिर देवी आने लगी और वो चौकियाँ लगा रही हैं।”
एक बोल रहे हैं, कि “मैं बचपन में जब पैदा हुआ था, तो मेरे माथे पर त्रिशूल बना हुआ था।” एक बोल रहे हैं, कि “मैंने वहाँ से ज्योतिष सीखा हुआ है।” एक जो इंग्लिश स्पीकिंग बाबा है, जो ऑरा क्लियर कर रहे हैं, वो क्लेम कर रहे हैं, कि “मैं एक पहाड़ी पर तेरह दिन तक बगैर मल-मूत्र त्याग करे में बैठा हुआ था।”
आचार्य प्रशांत: तो इनमें सब में रोचक बात ये है कि जितने भी दावे किए जाते हैं, इनमें से एक भी ऐसा नहीं होता जिसकी पुष्टि करी जा सकती हो। जिसको परखा जा सकता हो। जिसको सही या झूठ साबित किया जा सकता हो। अगर ऐसे सौ दावे हैं, तो सौ के सौ ऐसे होंगे कि विश्वास कर लो मुझ पर। विश्वास कर लो। मैं कहूँ, नहीं, मैं परखना चाहता हूँ, तो परखने का कोई ज़रिया ही नहीं है। सारी बातें वो कही जाएँगी जो बस मान्यता के तल की हैं या व्यक्तिगत विश्वास के तल की हैं, यही सारा झूठ है। यहीं पर पाखंड और अंधविश्वास है।
देखिए, सच्चाई तब होती है जब मैं जो दावा करूँ, उसको आप परख सको। मेरे दावे को आप परख सको और आप बोल सको कि हाँ, तुम जो बोल रहे हो ठीक है या कि मैंने देखा, तुमने जो बात कही, मैंने उसको परखा, वो गलत निकली। सिर्फ़ तब सच्चाई है। जहाँ कहीं किसी ऐसे को पाएँ जो आपको सत्य की जगह बस यक़ीन दे रहा हो कि नहीं, यक़ीन कर लो भाई, परख तो नहीं सकते, बस विश्वास कर लो। जान लीजिएगा कि धाँधली हो रही है।
कोई कहता है, मुझे फलानी बीमारी हुई है, तो आप उसकी ब्लड रिपोर्ट लोगे और वहाँ पर सामने में आ जाएगा और वो जो ब्लड रिपोर्ट है, आप दुनिया की किसी भी लैब में टेस्ट कराओगे, तो एक ही उसका परिणाम आएगा। लेकिन कोई कहे, मुझ पर भूत चढ़ा है, बताओ कैसे नापोगे? तो फिर तो कोई भी कुछ भी कह सकता है न। कोई फिर यही क्यों बोले मुझ पर भूत चढ़ा है? वो ये भी कह सकता है, मैं साक्षात भूत हूँ। लोग फिर इसीलिए उतर आते हैं, जो ये भी कहने लग जाते हैं कि मैं तो साक्षात भगवान हूँ। और उनका दावा भी मान लिया जाता है, क्योंकि हर आदमी डरा हुआ है कि क्या पता न मानूँ, तो मेरा ही कोई नुक़सान हो जाए। रिस्क कौन ले? इससे अच्छा मान ही लो। मानने में क्या जाता है?
प्रश्नकर्ता: मानने में उनको सुविधा लग रही होगी। ये मतलब अब समझ में आ रहा है आपकी बात सुनके कि ये जो ये इस चीज़ को बगैर परीक्षण के जो मान रहे हैं न, इनको इंस्टेंट आराम भी चाहिए और इन लोगों को मेहनत नहीं चाहिए। ये किसी और पर ज़िम्मेदारी छोड़ना चाहते हैं जैसे।
आचार्य प्रशांत: किसी और पर ज़िम्मेदारी छोड़नी है, आत्मसम्मान भी नहीं है। माने इंसान को जो कुछ भी अच्छे गुण एक अच्छा इंसान बनाते हैं, जब उन गुणों का अभाव होता है, तो फिर उस इंसान में अंधविश्वास पाया जाता है। अगर हम ऐसा समाज बना पाएँ, जहाँ शिक्षा में बच्चे से कहा जाए कि देखो, दुनिया की किसी भी चीज़ से ज़्यादा ज़रूरी है तुम्हारी भीतरी सच्चाई। बाहर की दुनिया ऐसे-ऐसे चलती है और बाहर की दुनिया बढ़िया चीज़ है। लेकिन भीतर की दुनिया में बाहर को मत घुसने देना, भीतर तुम्हारा अपना राज होना चाहिए।
और यही जो भीतर अपने राज की बात है, अपने वर्चस्व की बात है, यही वास्तविक धर्म है। जहाँ सत्य होता है, वहाँ अंधविश्वास नहीं हो सकता। और जहाँ तमाम तरीके के दुर्गुण होते हैं, वहाँ अंधविश्वास फैलता ही फैलता है।
प्रश्नकर्ता: ये तो बात उसके मान्यता और उन्होंने जो अपने पीछे कहानियाँ बनाई हुई होती हैं। अब दूसरे तल पर मैं ऐसा देखता हूँ कि ये वेशभूषा का भी कोई एक विशेष महत्त्व इनका आ जाता है। अब यहाँ पर हम फिर तीन तबकों को अगर मैं देखूँ, ये आपके सामने मैं रखता हूँ, तो पहला तबका जो बाबा जी का है, जो नीचे में आ रहा है, तो वो काला चौगा पहनेंगे, माथे पर काला पट्टा बाँधेंगे, उनके हाथ में एक मोर पंख रहेगा, एक डंडा या चाबुक भी हो सकता है।
दूसरे तबके पर हम जाते हैं, जो ज्योतिषों से आकर्षित है, जो बाबा जी को बोलता है कि नीचे वालों को, हम ऐसे अंधविश्वास में पड़ते नहीं हैं। लेकिन वहीं पंडित जी के पास जाकर के, पंडित जी।
आचार्य प्रशांत: पंडित जी कुंडली खोलेंगे, ज्योतिष जी जन्मपत्रा खोलेंगे।
प्रश्नकर्ता: फिर उन्होंने कहा कि ₹85,000 का गोमेद लाओ, पुखराज लाओ, वो पहनो। और उन्होंने जिसके पास में वो गए हैं, पत्रिका लेकर के, उन्होंने ख़ुद ने पूरी 10 उँगलियों में 20 अंगूठियाँ पहनी हुई हैं। और जाने कैसे-कैसे कड़े, नग वाले पहन रखे हैं। नीचे कुछ और बाबा हैं, जिनको कुछ देवी वो हो रहा है, कुछ माता आ रही हैं या भैरू जी आ रहे हैं या पितर आ रहे हैं। तो उन्होंने अपने एक वातावरण बना रखा। पूरा लाल है या पूरा पीला है या पूरा सफ़ेद कर रखा है। ऐसा उन्होंने वेशभूषा बना करके रखा हुआ। इनके पास जाते हैं।
ज्योतिषों को देखें, तो इन लोगों ने ये अंगूठियाँ, मोटे-मोटे वो हीरे, ख़ुद भी पहने, दूसरे लोगों को भी पहनाते हैं। उसके ऊपर हम और उन इंग्लिश स्पीकिंग बाबा के पास जाएँगे, तो वो इन दोनों का कॉम्बिनेशन लेकर के चलते हैं। और जो इंग्लिश स्पीकिंग बाबा के पास में जा रहे हैं, जो लोग जो कि हाइली क्वालिफाइड हैं समाज में, वो इन दोनों को बेवकूफ़ बोल रहे हैं। और मैं तो इन तीनों को तबकों को अंधविश्वासी देख रहा हूँ। तो ये कैसे इन लोगों को गाली बक रहे हैं या इनको बिल्कुल पिछड़ा समझ रहे हैं, जबकि ये तीनों की तीनों, और तीनों की वेशभूषा के कारण ही ये आकर्षित हो रहे हैं।
आचार्य प्रशांत: देखिए, वो जो ऊपर वाला है न, वो नीचे वाले की वेशभूषा को पिछड़ा बोल रहा है। वेशभूषा के अंदर क्या है, ये जानने का तो उसको सलीका ही नहीं है। और जो मध्यम तल का है, वो नीचे वाले की वेशभूषा को ही पिछड़ा बोल रहा है। उस वेशभूषा के अंदर जो इंसान है, उसको तो जानने का उसके पास कोई तरीका ही नहीं है।
एक फल होता है। कई बार वो अंदर से सड़ा होता है, लेकिन ऊपर से बिल्कुल बढ़िया दिखता है। तो बिक जाता है न। क्यों? क्योंकि छिलके के अंदर क्या है, हमें दिखाई नहीं देता। पूरी दुनिया छिलके वाली है। हमें किसी भी व्यक्ति का बस छिलका दिखाई देता है, माने बाहरी खोल। बाहरी खोल में दो चीज़ें आती हैं, एक है कपड़ा और दूसरा खाल। चेहरा दिखने में कैसा है? शरीर आकर्षक है कि नहीं? रंग साँवला है, कि गेहुँआ है, कि गोरा है? हम अगर जवान हैं तो हैंडसम है, सेक्सी है? ये सब क्या है? ये छिलके की पूजा चल रही है। बाहरी बात। उसी छिलके में कपड़ा भी आता है। आप कपड़े पर इतना ध्यान देते हो अगर, आप बाबा जी को गुणी और ज्ञानी मान लेते हो बस उनका कपड़ा देख के, इससे यही पता चलता है कि आपकी पूरी ज़िंदगी आपको इंसान पहचानने की तमीज़ आई नहीं। नहीं तो आप कपड़ों पर इतना नहीं मरते।
ये बात बाबाओं को भी पता है कि इंसान के भीतर झाँकने की तो किसी की हैसियत ही नहीं। और हर आदमी बस छिलका देख के निर्णय कर लेगा। तो सबके लिए आसान है फिर, कपड़े एक तरह के पहन लो और लोगों को बेवकूफ़ बनाओ। कपड़ा पहन लो, मुँह पोत लो, आपने कहा धुआँ कर लो, बाल एक तरह के कर लो, दाढ़ी एक तरह का कर लो, अंगूठी पहन लो, धागे बाँध लो और 100 तरीके के छिलके वाले काम कर लो। क्योंकि लोगों को उस कलेवर के पीछे, उस मुखौटे के पीछे, उस छिलके के पीछे जो इंसान है, उस इंसान को देखने की शिक्षा कभी दी ही नहीं गई है।
धर्म और अंधविश्वास छोड़िए, अपनी जो उनकी साधारण ज़िंदगी है उसमें भी उन्होंने निर्णय कैसे करें? लड़का लड़की देखने को जाता है। लड़का लड़की आपस में शादी का निर्णय कैसे करते हैं? क्या वो एक-दूसरे की सच्चाई जानते हैं कभी? क्या करते हैं? हाँ, दिखने में अच्छा है। कर लो शादी। खासकर लड़कों की तरफ से तो यही रहता है न, लड़की दिखने में आकर्षक है तो प्रेम हो जाता है। छिलके से ही तो प्रेम कर रहे हो। तो जब पूरी ज़िंदगी छिलके पर कुर्बान होकर बिताई है, तो बाबा जी भी अपना छिलका एक तरीके का कर लाते हैं, तो बाबा जी भी फिर राज करते हैं।
जिनको हम अच्छे घर भी कहते हैं न, उनमें जिस तरीके से हम बच्चों की परवरिश करते हैं। अगर वो किसी पाखंडी बाबा के चंगुल में नहीं फँसे हैं अभी तक, तो इसको बस चमत्कार ही माना जाना चाहिए। नहीं तो इंसान जैसे जन्म ही लेता है रूप-रंग के जाल में फँसने के लिए और रूप-रंग का जाल बस यही नहीं होता है कि बड़ी इमारत देखी या बहुत सारा कहीं पैसा देखा तो फिसल गए। बाबा जी भी रूप-रंग ही दिखा के फँसाते हैं।
एक उदाहरण बताऊँ। इंस्टाग्राम पर दो वर्ग हैं जो बहुत ज़्यादा चलते हैं और आप दोनों का संबंध देखिएगा। आजकल एक सॉफ्ट पोर्न, जहाँ छिलका दिखाया जाता है, और दूसरा बाबा जी की रील्स और एक ही व्यक्ति है जो दोनों चीज़ें देखता है। वो जवान लड़का बैठा हुआ है। वो सॉफ्ट पोर्न को भी देख रहा है और बराबर ही बराबर बाबा जी को देख रहा है। बाबा जी इंस्टाग्राम पर सुपरहिट है। क्यों? क्योंकि दोनों में ही छिलका दिखाया जा रहा है। दोनों ही स्पेक्टकल्स हैं। दोनों ही नैनाभिराम दृश्य हैं। आँखों को खींचने वाले दृश्य हैं।
हमें शिक्षा ही नहीं दी गई है कि इंद्रियों के आगे भी कुछ होता है, आप बढ़िया-सा अपना कुछ कर लीजिए। अभी आप सफेद हैं, थोड़ी देर में आप काले हो सकते हैं, नीले हो सकते हैं, आप पीले हो सकते हैं। आप हो जाइए अपना पूरा। आप भी नीले हो जाइए। चेहरा भी ऐसा ललाट नीला कर लीजिए। ये सब कर लीजिए। आप बिल्कुल इंस्टाग्राम वर्दी हो जाएँगे।
शिक्षा ही यही है, जो दिखता है, वो बिकता है। दिखो ऐसे कि मज़ा आ जाए बिल्कुल और अपने आसपास भी आकर्षक दिखने वालों का एक-एक जमघट-सा तैयार कर लो। एक नज़ारा पैदा करना है, लोग फिसल जाएँगे। लोगों को यह बताया ही नहीं गया है कि जो तुम्हारे भीतर बैठा है, फिसलने को तैयार, उसके प्रति सावधान रहो। कि भीतर देखो, तुम्हारे ही भीतर तुम्हारा दुश्मन बैठा हुआ है।
गीता कहती है, वो हमारा जो दुश्मन है, वही फिर बाहर हमें सौ तरीके से घुटने टेकने को मजबूर करता है। कभी रूप-रंग के आगे, कभी पैसे के आगे, कभी बाबा जी के आगे, कभी सत्ता के आगे, कभी नेताजी के आगे। वो एक ही दुश्मन है, वही हर जगह हमें कहता है, यहाँ भी शीश झुका दो, वहाँ भी सर झुका दो।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो मैंने अपने अनुभव से इसमें देखा, मैंने अभी आपसे बताया कि दूसरी वेशभूषा है। पहली उनकी मान्यता है। तीसरी बात में मैं ऐसा देखता हूँ कि वो लोग इसलिए भी उनके पास में जा रहे हैं कि वो हर एक चीज़ के लिए उनको स्वीकृति दे देते हैं। उदाहरण के लिए हम ये देखें कि वो महिला को अगर ऐसा कुछ प्रॉब्लम है, तो वो उसको जो सच है, वो नहीं बोल रहे हैं। वो उसको वो चीज़ बोल रहा है कि हाँ, वो नीचे वाला बोल रहा है कि हाँ, तुमको ऊपरी प्रेत ही है।
आचार्य प्रशांत: झूठ का समर्थन।
प्रश्नकर्ता: और वो दूसरा जो है, वो जो ज्योतिष है, वो उसको बोल रहे हैं कि हाँ, तुम पे राहु-केतु की द्वितीय और तुम्हारा वक्र नीचे चला गया है। अब तो तुम्हारी मृत्यु निश्चित है। और वहीं वो ऊपर बोल रहे हैं कि योर ओरा टोटली डिस्ट्रॉयड। अब आपको 15 दिन के लिए यह करना पड़ेगा, यह पद्धति है। यह सारी की सारी चीज़ें। तो वो बजाय उनको यह बताने के कि यह आप ही का है। यह आप ज़िम्मेदार हो, ये बताने के बजाय वो ज़िम्मेदारी कहीं और रख दी जाती है। कहीं और रख दी जाती है। और वो चीज़ उन लोगों को शायद बहुत अच्छी लग रही है।
आचार्य प्रशांत: मैं कमज़ोर हूँ, क्योंकि मेरे ग्रह-नक्षत्र बेकार चल रहे हैं। मैं ज़िंदगी में असफल हूँ, क्योंकि साहब मेरी तो कुंडली ही ऐसी है। मैं क्या करूँ? मैं ग़लत समय पैदा हो गया। मैं बीमार हूँ, क्योंकि मुझ पर डायन चढ़ी हुई है। तो कभी भी ज़िम्मेदारी मेरी तो है ही नहीं, तो मैं बच गया। मैं बेगुनाह साबित हो गया। ये तो अहंकार की पुरानी वृत्ति है न। अपनी दुर्दशा के लिए स्वयं ज़िम्मेदार होता है, पर वह कभी भी स्वीकार नहीं करेगा कि दायित्व उसका है। और जब उसका दायित्व नहीं है, तो फिर बाहरी परिस्थितियाँ सब गुनहगार हो जाती हैं। उसमें सहायता ये भूत-प्रेत भी कर देते हैं। गुनाह किसी और का है, दोष किसी और का है, मैं क्या करूँ? मैंने क्या किया? मैंने क्या किया?
प्रश्नकर्ता: मैं कृतार्थ हो गया, आचार्य जी। बहुत अंदर संतुष्टि हो रही है। जो प्रश्न अनसुलझे पड़े थे, अब वो सुलझते हुए दिख रहे हैं। मैं आपका बहुत-बहुत धन्यवाद करता हूँ और मैं आपका बहुत आभारी हूँ।
आचार्य प्रशांत: लोगों तक वास्तविक धर्म को लेकर के जाएँ, आपके पास बहुत-बहुत लोग आते हैं। आपके पास बहुत बड़ा अवसर है। वास्तविक धर्म जीवन को सँवार देता है, साहस से भर देता है, प्रेम से भर देता है। और नकली धर्म, जिसमें अंधविश्वास, तमाम तरह की और गंदी चीज़ें आती हैं, ये जो नकली धर्म है, ये ज़िंदगी को बर्बाद करके रख देता है। धर्म दोनों काम कर सकता है। या तो ज़िंदगी को बिल्कुल आसमान तक पहुँचा देगा या ज़िंदगी को पाताल में गाड़ देगा। लोगों तक असली धर्म को लेकर के आएँ। ये मेरी आपसे अपेक्षा रहेगी।