
प्रश्नकर्ता: नमस्कार, सर। सर, आपने अभी मिनियन वाले खिलौने से समझाया, कि कैसे मान्यता के पीछे मान्यता के पीछे मान्यता, ये एक अंतहीन श्रंखला जैसी प्रतीत होती है, और जिसको ये सारी मान्यताएँ देखनी हैं, क्योंकि जानना ही समाधान है आप बताते हैं; और आपने बताया भी, ख़ुद को ख़ुद से देखना ही है। ये चुनौती एक डर का भाव उत्पन्न करती है कि “वन वर्सेस मेनी” और सीमित संसाधन, सीमित समय, सीमित समझ। इस चुनौती को किस प्रकार से देखा जाए? किस दृष्टि से देखा जाए? ये केंद्र शायद डर के केंद्र से ये सवाल आ रहा है। परंतु सर, ये है।
आचार्य प्रशांत: क्या काम है, जिसमें चुनौती सामने आ रही है?
प्रश्नकर्ता: अभी मान्यता के केस में ही आप देख लीजिए, एक ऑफिस वाली ज़िंदगी है, एक घर वाली ज़िंदगी है; इसमें प्रॉब्लम्स हैं। एंडलेस मान्यताएँ हैं, जिनको देख के, समझ के उसको सॉल्व करना है। सीमित समय और सीमित क्षमताओं से ऐसा प्रतीत होता है कि ये एक प्रॉब्लम सॉल्व हो रही है, ये एक प्रॉब्लम नहीं सॉल्व हो रही है, और कई प्रॉब्लम्स छूट रही हैं। ज़“वन वर्सेस सो मेनी प्रॉब्लम्स* और सो मेनी मान्यताएँ।” इससे ये जो ओवरवेल्मिंग स्थिति पैदा होती है, वो करना तो पड़ेगा ही, परंतु इसको किस दृष्टि से, कैसे देखा जाए?
आचार्य प्रशांत: आपको सचमुच पता है कि कौन-सी प्रॉब्लम्स आपकी हैं? आपको कैसे पता कि जिसको आप अपनी प्रॉब्लम बोल रहे हो, पहली बात वो आपकी है; और दूसरी बात, बड़ी है? आपको ये भी कैसे पता कि आपकी जो वास्तविक समस्या है वो आपको पता भी है?
प्रश्नकर्ता: सर, मुझे ऐसा लगता है कि वास्तविक समस्या मेरी शायद भय और डर है, उन समस्याओं के प्रति।
आचार्य प्रशांत: नहीं आपको भय लग रहा है कि “मेरी ट्रेन छूट रही है।” आपको कैसे पता कि वो ट्रेन आपकी है?
प्रश्नकर्ता: मेबी, शायद इस वक़्त वही ट्रेन समझ आ रही है कि यही ट्रेन पर चढ़ना चाहिए।
आचार्य प्रशांत: तो बस ये “शायद” हटाईए न। “शायद, शायद, शायद, शायद;” ऐसे ट्रेन पकड़ते हैं? ख़ुद ही हँसी आ गई न? पहुँच गए वहाँ पर नई दिल्ली, अठ्ठारह प्लेटफॉर्म है। ऐसे ही बिल्कुल, भँवरा कभी इस फूल पर, कभी उस फूल पर। हमारा भँवरा कभी इस बोगी में, कभी उस ट्रेन पर ऐसे “शायद, शायद” करके। आपको कैसे पता कौन-सी ट्रेन आपकी है?
और आप बिल्कुल, मैं देख रहा हूँ रक्तचाप बढ़ा हुआ है, पसीने छूट रहे हैं कि “मेरी ट्रेन छूट रही है।” आपको कैसे पता वो ट्रेन आपकी है भी?
प्रश्नकर्ता: सर, कई बार जैसे जो मैंने समझा है वीडियो में, आप कहते हो कि एब्सोल्यूटली क्या करना है वो नहीं है।
आचार्य प्रशांत: छोड़ो न, आप रिलेटिवली बताओ न। एब्सोल्यूटली का तो आपने कवच धारण कर लिया कि “आचार्य जी पारमार्थिक की बातें मत करो।” मैं व्यवहारिक बातें ही कर रहा हूँ। बताओ कैसे पता आपको? क्या पता है, बताओ?
प्रश्नकर्ता: जिस स्थिति में इस वक़्त हो अगर और उस स्थिति से बाहर आने के लिए जो कुछ करने के लिए लगे कि ये रास्ता है, और वो रास्ता अगर न हो पा रहा हो तो?
आचार्य प्रशांत: आप जिस स्थिति में हैं, उससे बाहर आना कठिन कौन-सी चीज़ बना रही है?
प्रश्नकर्ता: सर, मेबी स्किल्स, एक्सपीरियंस।
आचार्य प्रशांत: उँगलियाँ फँस गई भाई (कप को हाथ में उठाते हुए), आपसे बात करते-करते।
प्रश्नकर्ता: सॉरी सर।
आचार्य प्रशांत: मदद करीए, आप क्या आप बस सॉरी बोल के चल लोगे? अब आपका कुछ दायित्व बनता है न? आपने मेरी उँगलियाँ फँसा दीं। मेरी उँगलियाँ फँस गई हैं, मेरी स्थिति देखो। मेरी मदद करो, मैं फँसा हुआ हूँ। बहुत भारी चुनौती है। मैं बाहर नहीं आ पा रहा। मैं क्या करूँ?
प्रश्नकर्ता: आपको छोड़ना पड़ेगा।
आचार्य प्रशांत: फिर से बोलो।
प्रश्नकर्ता: कप को छोड़ना पड़ेगा।
आचार्य प्रशांत: फिर से बोलो।
प्रश्नकर्ता: कप को छोड़ना पड़ेगा।
सर, इस चीज़ को मैं फाइनेंशियल प्रॉब्लम के कॉन्टेक्स्ट में किस तरह से समझ सकता हूँ?
आचार्य प्रशांत: कमाई कम है या ख़र्चे ज़्यादा हैं?
प्रश्नकर्ता: कमाई कम है, ख़र्चे बिल्कुल भी ज़्यादा नहीं हैं।
आचार्य प्रशांत: ठीक है। तो कमाई तो कम हमेशा ख़र्चों के ही संदर्भ में होती है। जब ख़र्चे ज़्यादा ही नहीं हैं तो कमाई कैसे कम हो गई?
प्रश्नकर्ता: है सर, कम तो है।
आचार्य प्रशांत: तो माने ख़र्चे ज़्यादा हैं।
प्रश्नकर्ता: हाँ ख़र्चे ज़्यादा हैं सर। हाँ, ख़र्चे ज़्यादा हैं, परंतु मैं अपने संदर्भ में अपने ख़र्चों की बात कर रहा था।
आचार्य प्रशांत: फिर फँस गया। बताओ क्या करूँ?
प्रश्नकर्ता: कप छोड़ना पड़ेगा।
आचार्य प्रशांत: हाँ चलो अब अगला सवाल बताओ।
प्रश्नकर्ता: माफ़ी चाहूँगा सर मैं।
आचार्य प्रशांत: आपको कैसे पता? आपको कैसे पता कि आप जो ख़र्चे कर रहे हो वो आपको करने ही चाहिए? आपको ये भी कैसे पता कि आप जो ख़र्चे नहीं कर रहे हो, वो आपको नहीं करने चाहिए?
प्रश्नकर्ता: करंट स्थिति के हिसाब से, शायद।
आचार्य प्रशांत: अरे, करंट स्थिति तो ये रही, लो फिर फँस गया मैं। अगर ये सचमुच मुझे स्थिति इतना दुख दे रही है, सचमुच, सचमुच; तो मैं इसे छोड़ूँगा न। और अगर नहीं छोड़ना तो फिर मैं क्यों बोलूँ कि दुख दे रही है? फिर तो मुझे इससे कुछ मिल रहा होगा, तो पकड़ रखा है। तो फिर दुख है ही नहीं, तो मैं नाटक क्यों करूँ कि दुख है।
अब इसमें बढ़िया कुछ मीठा-मीठा है। अच्छा सेब डला है, अच्छा केला डला है, आहा! हा! तो एक तरफ़ तो मैं मज़े ले रहा हूँ और दूसरी तरफ़ बोलूँ कि मैं फँस गया हूँ। एक तरफ़ तो मिठास की चुस्कियाँ चल रही हैं ज़िंदगी में, आहा! हा!
ये मीठा आपको पीने को मिला?
प्रश्नकर्ता: नहीं मिला।
आचार्य प्रशांत:तो मेरा व्यक्तिगत स्वार्थ है, देखो मैं पी गया। लेकिन मैं फँस गया हूँ, मेरा शोर सुनने को मिला? अरे, इतनी देर से शोर मचा रहा हूँ सुना नहीं तुमने?
प्रश्नकर्ता: नहीं सर।
आचार्य प्रशांत: अरे, मैं फँस गया हूँ! अब सुनने को मिला?
प्रश्नकर्ता: जी।
आचार्य प्रशांत: अच्छा। ये मिठास चखने को मिली? (चाय पीते हैं)।
प्रश्नकर्ता: नहीं।
आचार्य प्रशांत: कितना स्वार्थी आदमी हूँ न मैं, जो मीठा-मीठा ले रहा हूँ, वो तो अपनी ज़िंदगी में मस्त, चुपचाप, कहीं कोने में, मैं चखे जा रहा हूँ। और फिर उसके कारण जो कीमत अदा करनी पड़ रही है, उसको लेके शोर मचा रहा हूँ। और कोई भी कीमत तुम देते तो अपने स्वार्थों की ही हो। इसमें मीठा-मीठा न होता, तो मैं फँसा भी न होता। मीठा-मीठा तो मैं अपना पीए जा रहा हूँ, पीए जा रहा हूँ, किसी को नहीं बताऊँगा कि क्या मौज लेता हूँ। हाँ, फँस गया हूँ, ये मैं दुनिया भर में नगाड़ा पीट रहा हूँ।
प्रश्नकर्ता: एक चीज़ पूछ सकता हूँ सर, इसमें मैं?
आचार्य प्रशांत: आप सारी पूछो, कहीं रुके हो अभी तक?
प्रश्नकर्ता: सॉरी सर।
आचार्य प्रशांत: किस बात की? तुम्हें कैसे पता कि कौन-सी बात सॉरी बोलने की है? चलो, बोलो आगे।
प्रश्नकर्ता: सर, मुझे ऐसा लगता है कि स्थितियों या उस सिचुएशन के प्रति मेरा रिस्पॉन्स, शायद प्रॉब्लम है।
आचार्य प्रशांत: रिस्पॉन्स अपने-आप आ जाता है, अगर सिचुएशन साफ़-साफ़ समझी जाए तो। रिस्पॉन्स कर्म होता है न? हम कर्म की तो परवाह करते नहीं, हमें तो कर्ता की परवाह करनी है। क्या हम समझते भी हैं कि सचमुच हमारी स्थिति क्या है? या बहुत सारी बस मान्यताएँ हैं कि “ऐसा तो करना ही है।” अब करो।
अरे भाई, हर जगह विकल्प है, नहीं तुम बंधक हो कि कुछ काम करने ही करने हैं। हर काम को न करने का भी विकल्प है, और हर काम को सौ गुना और ज़्यादा करने का भी विकल्प है।
पर मान्यता एक पटरी बिछा देती है, कि “इसी पटरी के बीच में चलना; न इधर, न उधर।” और फिर फँस जाते हो।
एक समय था जब मैं लोगों से आमने-सामने बातचीत किया करता था। ये चला होगा 2016 से ले 18 था। 19 तक चला होगा, 18 तक। तो ये तीन साल क़रीब ऐसा था जब मैं; और दो-दो घंटे बात होती थी। कई बार चार-चार घंटे बात होती थी। एक ही इंसान को बैठा करके उसके साथ लंबी बातचीत। सैकड़ों लोगों से बात करी होगी, कई बार एक ही दिन में दो-दो, तीन-तीन लोगों से। और एक भी बार ऐसा नहीं हुआ कि…, और मेरे जो सामने आएगा, सोचो वो बहुत ही परेशान आदमी होगा तभी वो अपने ऊपर इतना भारी कष्ट वो डालेगा कि मेरे सामने आए।
एक-एक से एक दुखी, कोई आत्महत्या को तैयार, कोई कुछ, कोई कुछ। कोई कह रहा है, “जेल जाना पड़े जेल चला जाऊँगा।” आसानी से तो कोई आता नहीं मेरे पास। लेकिन हर मामले में बात एक ही निकलती थी, कुछ पकड़ कर बैठे हो जिसको अपने लिए ज़रूरी समझ रहे हो, जो तुम पकड़कर के बैठे हो वो तुम्हारे लिए ज़रूरी नहीं है। तुम्हें कुछ त्यागने को नहीं कहा जा रहा, तुम्हें देखने को कहा जा रहा है। त्यागा तो उस चीज़ को जाता है न जो ज़रूरी हो, जो किसी काम की हो। चूँकि तुम स्वयं को नहीं जानते, इसलिए ये भी नहीं जानते कि जो तुमने पकड़ रखा है, वो तुम्हारे किसी काम का नहीं है। हाँ जो तुमने पकड़ रखा है उसको ढोने के लिए अब तुमको हज़ार लानतें झेलनी पड़ती हैं, यही तुम्हारी परेशानी है। बाक़ी चाहो तो दो घंटे आकर के बैठकर के जो तुम्हारे स्पेसिफ़िक्स हैं वो बता लो, पर वो भी बता लोगे तो दो घंटे बाद निष्कर्ष यही निकलेगा।
लोग आते थे एकदम बारीक से बारीक बात में मुझे घुसना पड़ता था, रेशा-रेशा खोलना पड़ता था, पूरी उनकी जन्मपत्री, पिछले बीस साल, आगे दस साल की आशाएँ, पत्नी ऐसी, बच्चा ऐसा, सास ऐसी, माँ ऐसी, बॉस ऐसा, व्यापार ऐसा; एक-एक बात आती थी, उगाड़ी जाती थी। लोग झूठ बोल रहे होते थे, घुस-घुस के उनसे सच्चाई निकलवानी पड़ती थी।
पर अंत में निष्कर्ष हमेशा एक ही निकला; तुम ख़ुद अपनी मुसीबत हो। कोई तुम्हारा दुश्मन नहीं है, किसी तुम स्थिति में फँसे नहीं हुए हो। तुम कुछ पकड़े हुए हो। जो फंदा तुम्हारे गले में पड़ा हुआ है, वो तुम्हारी ही बाहों का है।
जैसे कोई ऐसे, या ऐसे, अपना गला घोंट रहा हो और फिर चिल्लाता फिर रहा हो, “मुझे बचाओ!” कुछ भी नॉन-नेगोशिएबल नहीं है। हर जगह तुम्हारे पास विकल्प है, चुनाव है। कुछ भी आवश्यक या अनिवार्य नहीं है। सब बदला जा सकता है, फँसो मत, अपने आप को मजबूर मत बनाओ।
होली-काउज़ बाँध कर बैठे हो, सबकी ज़िंदगी में वही होती हैं। अर्थ समझते हो न, “होली-काउज़?” ऐसी मान्यताएँ, जिनको पवित्र बना रखा है। इसको अंग्रेज़ी में कह देते हैं, एक कहने का तरीका है, “होली-काउज़।” कर्तव्य, इज़्ज़त, ममता; इस त्रिकोण में दुनिया की सारी समस्याएँ समाई हुई हैं। कोई कर्तव्य का मारा हुआ है, कोई इज़्ज़त का मारा हुआ है, कोई ममत्व का मारा हुआ है; पर इस त्रिकोण से बाहर कोई समस्या नहीं होती।
प्रश्नकर्ता: ये जो तीन चीज़ें आपने अभी बोली, इस से पहले मेरे को नहीं समझ आ पा रहा था, पर ये तीन चीज़ें से जैसे कुछ पिन-पॉइंट थोड़ा कुछ हुआ। पर ये पिन-पॉइंट मैं, ये क्षमता मैं कैसे विकसित कर सकता हूँ? ये पिन-पॉइंट करने की?
आचार्य प्रशांत: जो कुछ भी मानते हो उसको कम से कम पाँच मिनट के लिए परे रखना सीखो, बस पाँच मिनट के लिए। और जो मानते हो उसको लिख लो अपने सामने; निष्पक्षता पैदा होती है। सस्पेंशन ऑफ़ बिलीफ़, सच्चाई भीतर आए, इतनी आसानी से बिलीफ़ मानती नहीं है। बिलीफ़ मरना नहीं चाहती, तो उसको कम से कम सस्पेंड करना सीखो, पाँच मिनट के लिए।
मान लो अच्छा कि अगर वो मानने भर से, कि “मैंने माना कि कुछ मानने की ज़रूरत नहीं है।” वो मानने भर से दरवाज़े में एक झिर्री खुलेगी, प्रकाश दिखाई देगा। तुम आकर्षित हो जाओगे, कहोगे, “ये कुछ है, कुछ है। अगर मैं अपनी इस मजबूरी को किनारे कर दूँ तो कुछ है, ज़रा-सा खुला दरवाज़ा, कुछ रोशनी-सी आई। क्या मैं पूरा खोल सकता हूँ?”
मान्यता अपना किवाड़ बंद करके रखती है सच्चाई के लिए, वो बहुत डरी होती है, और किवाड़ बंद करके, किवाड़ के पीछे बंदूक लेकर खड़ी होती है।
कि किवाड़ तो बंद है ही, अगर कोई उदण्डी, अपनी उद्दण्डता में किवाड़ गिरा के भी भीतर आ गया, तो क्या करूँगी? गोली मार दूँगी! वो दरवाज़ा ज़रा-सा खुलना ज़रूरी है। वो थोड़ा-सा भी खुलेगा न तो बाहर की साफ़ हवा थोड़ी अंदर आएगी, थोड़ी रोशनी आएगी। ख़ुद ही कहोगे ऐसे चौंक के, “ये क्या है? ये क्या है? ये कुछ नया हुआ अभी-अभी मान्यता को बस पाँच मिनट के लिए परे किया और कुछ नया हो गया। मुझे मुझे थोड़ा और चाहिए।” फिर ख़ुद ही कहोगे, “कैन आई हैव अ लिटिल मोर ऑफ इट? थोड़ा-सा और मिलेगा। वन स्लाइस मैंगो?” फिर पूरा दरवाज़ा ही खुल जाता है।
जानते हो, ध्यान की जितनी विधियाँ हैं, जितने तथाकथित आध्यात्मिक अनुभव होते हैं, उन सबका उद्देश्य यही था; कि तुम न जाने कितनी शताब्दियों से एक अँधेरे, सीलन-भरे, बदबूदार कमरे में बंद हो, और तुम इसी को ज़िंदगी कहते हो। तो वो जो विधियाँ थीं, उनका उद्देश्य था कि थोड़ा-सा दरवाज़ा या खिड़की या रोशनदान खुल सकता है क्या? तुम्हें थोड़ी-सी भी आहट या ख़बर लग सकती है बाहर की? रंग है, फूल हैं, ख़ुशबुएँ हैं, ताज़गी है, रोशनी है, ये हो सकता है।
और फिर विधि बनाने वालों ने माना ये था कि तुम्हें थोड़ी-सी अगर बाहर की फ़िज़ा रुच गई, तो तुम फिर ख़ुद ही रोशनदान से कूद के बाहर भाग जाओगे; दरवाज़ा तोड़ के भाग जाओगे; सुरंग खोद के भाग जाओगे। थोड़ा-सा तो तुमको पता चले, कि अच्छा, ऐसा भी हो सकता है। अच्छा, ऐसा भी हो सकता है।
ग्रंथ के साथ बैठने का भी यही उद्देश्य होता है, कि थोड़ी देर के लिए, थोड़ी देर के लिए कोई और दुनिया खुल जाए। और फिर जो ग्रंथकार होता है, उसने बड़ी प्यारी, बड़ी बड़ी दिली उम्मीद ये रखी होती है, कि थोड़ी देर के लिए मैंने तुम्हारे लिए एक नई दुनिया खोली न; अब तुम ख़ुद ही अपनी प्रेरणा से अपने पाँव पर चल के उस दुनिया में प्रवेश करोगे।
गुरु के सामने बैठने का भी औचित्य यही होता है, थोड़ी देर के लिए तुम्हें कुछ ऐसा दिख जाए जो किसी और देश का है, किसी और लोक में ही पहुँच जाओ। थोड़ी देर के लिए, थोड़ी देर के लिए तुम्हें प्रमाण मिल जाए कि जैसे तुम हो, वैसा होना ज़रूरी नहीं है। है कोई और, जो तुमसे बहुत, बहुत, बहुत अलग भी हो सकता है। और वैसा होना संभव है। तुम्हें प्रमाण मिल गया, हाँ, मैंने देखा, मैंने सामने देखा, अभी देखा। कोई है जो मुझसे बिल्कुल अलग आयाम का है। और वो बात तुम्हें इतनी जँच जाए, कि तुम कहो मुझे भी फिर मेरे जैसा नहीं रहना।
लोग आते हैं, टिप्पणियाँ करके जाते हैं, “आचार्य जी, आपके सामने जब तक बैठते हैं तो माहौल बढ़िया रहता है और सब ठीक रहता है। पर जब सत्र समाप्त हो जाता है, तो मैं फिर से बहक जाता हूँ।”
सत्र में जो हो रहा है, वह बहुत हद तक मैं संभाल सकता हूँ। पर सारा खेल ही इस बात का है कि तुम्हें सत्र से, और इस माहौल से, और मुझसे प्यार कितना गहरा हो गया। जब तक मैं सामने हूँ, तब तक तो ठीक है। बात ये है, जब सामने नहीं हूँ, तब भी क्या गूँज कायम है मेरी? और सारी विधियाँ वहाँ पर आकर ठहर जाती हैं, मजबूर होकर रुक जाती हैं, क्योंकि कोई भी सत्र अनंतकाल तक नहीं चल सकता। और हर ग्रंथ का एक आख़िरी पन्ना होता है, उसके बाद तो तुम्हें ख़ुद ही देखना है न। और वो तुम्हारी ईमानदारी की बात, तुम्हें कितना देखना है। और ईमानदारी का मतलब भी यही होता है, सच्चाई से प्यार।
तो प्यार के अलावा तो कोई विधि ही नहीं होती पागल। प्यार है तो सब है, नहीं है तो नहीं है।
तुम्हारे परीक्षाओं में कम अंक जानते हैं क्यों आते हैं? क्योंकि तुम जानते ही नहीं हो कि परीक्षा कब शुरू हुई थी। तुम्हारी स्थूल परीक्षा होती है, जो महीने में छह-बार या आठ-बार हो जाती है, वो स्थूल परीक्षा है, वो तो घंटे-भर की होती है बस। तुम्हारी परीक्षा वास्तविक उस क्षण से शुरू हो जाती है, जिस क्षण सत्र समाप्त होता है।
तुम कहोगे, जब सत्र चल रहा है तब परीक्षा क्यों नहीं है? क्योंकि तब मैं हूँ। तब बहुत हद तक मेरी ज़िम्मेदारी है संभाल लेना अगर तुम आ गए हो तो सत्र में। मुझे तुमने जिस कुर्सी पर बैठा दिया है, उस कुर्सी की मर्यादा ये है कि जब तक सत्र चल रहा है, तब तक तुम्हें संभालना मेरी ज़िम्मेदारी है। पर जिस क्षण सत्र समाप्त होता है, तुम्हारी परीक्षा शुरू हो जाती है। अब ज़िम्मेदारी तुम्हारी है पूर्णतया। और तुम उस परीक्षा में असफल रहते हो। इसीलिए फिर वो जो महीने में सात-आठ बार वाली स्थूल परीक्षा होती है, उसमें भी असफल रहते हो।
सत्र समाप्त होने के बाद शुरू होता है। तुम सोचते हो, 12:00 बज गए, सत्र समाप्त हो गया। नहीं, नहीं बेटा, अब तो खेल शुरू हुआ है। बहुत है, सब अपनी-अपनी नज़र में बहुत होशियार हैं। और जैसे ही अभी 12:00 बजेगा, सत्र समाप्त होने का समय, लंबी टाँग, ये लंबी निकलेगी टाँग। वो सोचेंगे कि सत्र समाप्त हो गया। नहीं, समाप्त नहीं हुआ। कुछ समाप्त हुआ भी है, तो शायद मेरे लिए हुआ है। तुम्हारे लिए तो अब शुरू हुआ है खेल, क्योंकि अब तुम अपनी ज़िम्मेदारी पर हो। मैं तो गया, स्क्रीन पर पर्दा गिर गया। मैं तो गया, अब तेरा क्या होगा रे कालिया?
बहुत सोचते हैं, ध्यान की ज़रूरत तब है जब आचार्य जी सामने हैं। पागल, जब आचार्य जी सामने हैं तो ध्यान तो वो डंडा मार के निकलवा लेते हैं, वहाँ तुम्हारी सहभागिता की फिर भी थोड़ी कम ज़रूरत है। अभी ये सब यहाँ बैठे हैं, मज़ाल है कि ध्यान न दें। ध्यान की ज़रूरत तुम्हें तब है जब मैं सामने नहीं हूँ। पर जैसे स्कूली बच्चे होते हैं न, घंटी बजती है और निक्कर फाड़ के भागते हैं बाहर, टन टन टन टन टन टन टन टन, हो! ये तुम्हारी हालत है।
2016 की बात है, वो सत्र भी होगा अंग्रेज़ी चैनल पर, कहीं न कहीं। ऋषिकेश में, मिथ डिमोलिशन टूर था, उसमें एक जगह थी उसका नाम था कैफ़े ऋषिकेश, गंगा किनारे, गंगा के बिल्कुल ऊपर। तो वहाँ की जो रिकॉर्डिंग्स हैं, उसमें सब गंगा के बहने की आवाज़ भी आती। सत्र चल रहा था, लाइट चली गई। हमारे पास तब ये सब जो बड़ी-बड़ी लाइटें, इनकी नहीं व्यवस्था होती थी। वो छोटा-सा, वो होता था, क्या बोलेंगे उसे? हैंडीकैम, कैमकॉर्डर, क्या? वो जो इतना-सा छोटू-सा। कैमकॉर्डर एक इतना होता था, वो सामने रखा जाता था, उससे रिकॉर्डिंग होती थी।
तो लाइट चली गई। अब लाइट चली गई, तो अब रिकॉर्डिंग क्या करेगा वो? मैं चुप हो गया। सामने बैठे थे, जितने सामने बैठे थे सब विदेशी थे। एक भी भारतीय नहीं था उसमें। सब विदेशी थे, क़रीब रहे होंगे पचास-सत्तर, या जितने भी ऐसे लोग, पंद्रह-बीस मिनट तक एकदम अँधेरा है बस गंगा की आवाज़ आ रही है। यही आधी रात के आसपास का समय रहा होगा। चुप बैठे रहे पंद्रह-बीस मिनट, फिर लाइट आ गई। लाइट आ भी गई, मैं तो भी कुछ नहीं बोला। मैं आधे घंटे तक बस चुपचाप बैठा रहा और वो भी ऐसे ही बस चुपचाप बैठे रहे। सत्र चल रहा था।
शायद अंतर ये था कि उनमें जिज्ञासा इतनी थी कि वो अपना देश छोड़कर भारत के एक छोटे से शहर में कुछ खोजने आए थे, और हमें ज़्यादा आसानी से मिल जाता है। उनके लिए मेरे मौन में भी सत्र चल रहा था, और तब चल रहा था जब मुझे बहुत कम लोग जानते थे। 2016 की बात है, उनके लिए मेरे मौन में भी सत्र था। आप मेरे शब्दों को भी फ़ास्ट-फ़ॉरवर्ड कर देना चाहते हो। मैं उनके साथ चुप बैठ पाया, क्योंकि उनका उद्देश्य था, भारत आए हैं, भारत से कुछ जानना है, सीखना है। मैं आपके साथ ये थोड़ी कर पाऊँगा कि रात में 3:00 बजे 4:00 बजे तक मैं बस चुप होकर बैठ जाऊँ और आप मेरे साथ चुप बैठे रहो स्क्रीन के सामने।
पहले हुआ करता था, चेन्नई की बात होगी 2018-19 की। सत्र हो रहा था, मुश्किल से बीस-तीस लोग रहे होंगे। रात में शुरू हुआ 9:00 बजे, सुबह 5:00 बजे तक बात चलती रही। फिर खिड़की से उजियारा दिखाई देने लगा। तो मैं चुपचाप उठा, बाक़ी जितने लोग थे सब चुपचाप उठे, हम बस बाहर निकल गए, चलते रहे, चलते रहे, एक घंटे में लौटकर आए। या आपके साथ थोड़ी कर सकता हूँ? मुझे आपके साथ आपके बंधनों का सम्मान करना पड़ता है। और जब मुझे आपके बंधनों का सम्मान करना पड़ता है, तो मैं आपको बंधनों के पार की झलक कैसे दिखलाऊँ? और जब मैं आपको वो झलक ही नहीं दिखला पा रहा, तो आप में प्यार कैसे जगाऊँ?
आप कहते हो, हमें सुबह 7:00 बजे नुनू को स्कूल बस में बिठाना है और उनके लिए टिफ़िन तैयार करना है 8:00 बजे तक, तो आचार्य जी आप न 12–12:30 से आगे मत जाया करिए। तुम देखो तुम क्या कर रहे हो, तुम मुझे अपने बंधनों में बाँध रहे हो। तो मैं तुम्हें आज़ादी की झलक कहाँ से दिखाऊँगा?
मैं आऊँगा अभी बोधस्थल, तो जितनी हमारी देवियाँ हैं, अब लिखकर भेजा करती हैं बहुत दिन से आप क्यों इधर से फ़रार हैं? तो सत्र रखे जाएँगे बहुत सारे, और वो दिन में रखे जाएँगे, क्योंकि रात में सत्र रख दूँ तो देवी जी के देवा नाराज़ हो जाएँगे।
मैं अभी चुप हो जाऊँ उस रात की तरह आधे घंटे के लिए, तो न जाने कितने लोग तो पहले ऐप डिलीट करेंगे फिर दोबारा डाउनलोड करेंगे। उन्हें लगेगा कि अटक गया है कुछ, एकदम स्थिर होकर के बैठ गए हैं, कुछ बोल नहीं रहे ज़रूर कोई टेक क्लिच है।
मैं आपको कैसे झलक दिखलाऊँ? जिनको मैं आज से दस-बारह साल, पंद्रह साल पहले गंगा किनारे, ऊपर हिमालय तक ले जाता था, उनको तो मैं पानी से और रात के कोहरे से बात करके दिखा देता था कि ये भी करी जा सकती है। बुलाता था बादलों को और चाँद से कहता था, गाओ! और वो गाता था, और लोगों को दिखता था कि कुछ हो सकता है। कुछ ऐसा भी हो सकता है।
आपको कैसे दिखाऊँ? आपको झलक ही नहीं मिल पा रही। आपको यक़ीन ही नहीं होता फिर कि रोशनी कुछ होती है, ख़ुशबू कुछ होती है, ताज़गी कुछ होती है। मुझे आपसे आपकी शर्तों के मुताबिक़ बात करनी पड़ती है। और आपको लगता है आप जीत गए। आप जीत नहीं गए, आपने मुझे हार दिया। नहीं तो बहुत सारी बातें जो मुझे बहुत बोलकर बतानी पड़ रही हैं, वो मौन में संप्रेषित हो जाती हैं। सामने बैठो, बस चुपचाप बैठकर के आँखों में देखो, काम हो जाता है, और हुआ है। आपको कैसे जताऊँ? फिर उल्टे-पूल्टे मुझे प्रयोग करने पड़ते हैं। कभी इसमें (कप) बोलता हूँ, ये देखो, वो देखो।
सारी बात देखो यक़ीन आने की है। आप अपनी दुनिया में जी रहे हो, तो उसको लेकर के तो आपको यक़ीन होगा ही न कि वो है, क्योंकि उसके होने का प्रमाण आपको रोज़ मिलता है। वो है, उसी में आप जी रहे हो, खा रहे हो, साँस ले रहे हो, सो रहे हो, उठ रहे हो, वही है, आपकी दुनिया है। उसका तो आपको प्रमाण मिला ही हुआ है। कोई दूसरी भी दुनिया हो सकती है, इसका प्रमाण आपको कैसे मिले? वो तभी मिल सकता है जब मैं थोड़ा-सा आपको वहाँ कुछ देर के लिए ले जाऊँ। तो फिर आपको यक़ीन आए।
अब मेरी हालत पर तरस खाओ, मेरी दुनिया वहाँ है, और मैं वहाँ से आपकी दुनिया में आता हूँ ताकि आपका हाथ पकड़ करके आपको भी उस दुनिया की थोड़ी झलक दिखला सकूँ। पर आप मेरे साथ वहाँ को तो चलते नहीं, थोड़ी देर को भी। हाँ, आपने मुझे यहाँ बाँध लिया है अपनी शर्तों में। आप कहते हो, नहीं, हम यहाँ हैं, आप भी यहीं रहो। तो मेरा ये कि मेरी दुनिया भी छूटी, और मैं आपको भी कोई लाभ नहीं दे पा रहा। मैं आपकी दुनिया का नहीं हूँ; ये सब आपके रस्मो-रिवाज़, आपके तौर-तरीके, इनसे मुझे क्या लेना-देना! आपका उठना बैठना जीना मरना मैं ये सब परे रखा आया था इसीलिए आपके सामने यहाँ बैठ पा रहा हूँ।
मैंने आपको जो बोला था उसमें यही बात आपको अटकी होगी, कि ये कह रहे हैं कि अगर यहाँ फँसे हो तो छोड़ दो। अरे, ऐसे थोड़ी ही छोड़ा जाता है! मैं तुम्हें कैसे यक़ीन दिलाऊँ कि ऐसे ही छोड़ा जाता है। कैसे यक़ीन दिलाऊँ, बताओ?
जो साइकिल न चलाए हो बिल्कुल, उसको कैसे यक़ीन दिलाओगे कि न किसी ने न इधर से पकड़ रखा, न उधर से पकड़ रखा, फिर भी गिरोगे नहीं? दिला सकते हो यक़ीन? वो तो एक ही तरीका होता है, कि कहो कि अच्छा, हमने पीछे से पकड़ रखा है, साइकिल चलाओ। वो चला रहा है, चला रहा है, पीछे से चुपचाप धीरे-से छोड़ दो, धोखा देना पड़ता है थोड़ा। मैं भी देता हूँ। उसके बिना तुम मानोगे नहीं।
ऐसे सैद्धांतिक तौर पर कैसे समझाऊँ कि चलती रहेगी साइकिल, नहीं गिरोगे? करो भरोसा। मैं कहूँगा, छोड़ दो। तुम कहोगे, “छोड़ दिया तो गिर जाएँगे।” एक बार को अपना आग्रह परे रखो। ठीक है? यहीं से शुरुआत कर लो, सस्पेंशन ऑफ़ बिलीफ़। ये मत कहो कि मैंने अपनी मान्यता त्याग दी। कहो, कि मान लो कि मैं पाँच मिनट के लिए ये न मानूँ तो? यहीं से शुरुआत कर लो, हो जाएगा। ठीक है।