मनुष्य का सबसे बड़ा बंधन परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि उनकी अनिवार्यता से जुड़ी मान्यताएँ हैं। हम जिन चीज़ों को अपरिहार्य मानकर पकड़े रहते हैं, वही हमारे दुख का कारण बनती हैं। समाधान समस्याओं से लड़ने में नहीं, बल्कि अपनी मान्यताओं को निष्पक्ष होकर देखने में है। जैसे ही मन कुछ क्षणों के लिए अपने पूर्वाग्रहों को स्थगित करता है, सत्य की झलक मिलती है। वही झलक भीतर प्रेम जगाती है, और वही प्रेम व्यक्ति को अपने बंधनों को छोड़कर स्वतंत्रता, सत्य और वास्तविक जीवन की ओर बढ़ने का साहस देता है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार, सर। सर, आपने अभी मिनियन वाले खिलौने से समझाया, कि कैसे मान्यता के पीछे मान्यता के पीछे मान्यता, ये एक अंतहीन श्रंखला जैसी प्रतीत होती है, और जिसको ये सारी मान्यताएँ देखनी हैं, क्योंकि जानना ही समाधान है आप बताते हैं; और आपने बताया भी, ख़ुद को ख़ुद से देखना ही है। ये चुनौती एक डर का भाव उत्पन्न करती है कि “वन वर्सेस मेनी” और सीमित संसाधन, सीमित समय, सीमित समझ। इस चुनौती को किस प्रकार से देखा जाए? किस दृष्टि से देखा जाए? ये केंद्र शायद डर के केंद्र से ये सवाल आ रहा है। परंतु सर, ये है।
आचार्य प्रशांत: क्या काम है, जिसमें चुनौती सामने आ रही है?
प्रश्नकर्ता: अभी मान्यता के केस में ही आप देख लीजिए, एक ऑफिस वाली ज़िंदगी है, एक घर वाली ज़िंदगी है; इसमें प्रॉब्लम्स हैं। एंडलेस मान्यताएँ हैं, जिनको देख के, समझ के उसको सॉल्व करना है। सीमित समय और सीमित क्षमताओं से ऐसा प्रतीत होता है कि ये एक प्रॉब्लम सॉल्व हो रही है, ये एक प्रॉब्लम नहीं सॉल्व




