जानते-बूझते कुछ नहीं, बस किए जा रहे हैं — यही अंधविश्वास है। कोई भी चीज़ इसलिए ठीक नहीं हो जाती, क्योंकि वो पीछे परंपरा से आ रही है। हमेशा पूछा करो — क्यों? जो सवाल नहीं पूछ सकता, वो इंसान ही नहीं है। आपकी जिज्ञासा ही आपको इंसान बनाती है। पीछे से सिर्फ़ वो लेना है जो कभी पीछे नहीं छूट सकता। पीछे से आप वेदांत दर्शन ले सकते हो, क्योंकि वो उस विषय की बात करते हैं, जो समय के साथ बदलता ही नहीं है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा फैन बॉय मोमेंट है ये। सर, तो मेरा प्रश्न ये है कि अभी फ़िललहाल बोर्ड्स हुए थे और उसके लिए पेरेंट्स ने, कि बच्चे अच्छा करें तो उन्होंने अलग-अलग तरीक़े की पूजाएँ की थीं। 100 नारियल फोड़े थे कि बच्चों के भाग्य खुल जाएँ। और ऐसे ही और भी पढ़ा था कि जैसे स्टार्टअप्स होते हैं तो उसके जो स्टार्टअप के फाउंडर्स हैं, आई.आई.एम. के पास आउट हैं, आई.आई.टी. के पास आउट हैं, वो भी ऐसे गृह-शांति पूजन ये सब कर रहे हैं।
तो ये परंपरा है या अंधविश्वास है? और कैसे समझें कि एक परंपरा रोशनी की ओर ले जा रही है या और अंधेरे की ओर धकेल रही है? ये प्रश्न था मेरा।
आचार्य प्रशांत: जो भी चल रहा है, हाँ, वो चल रहा है। ये एक तथ्य है कि वो चल रहा है। तो पूछो अपने आप से कि “क्यों चल रहा है?” बस यही है। अगर समझ में आ गया कि क्यों चल रहा है, और फिर तुम उसे चलाते हो तो बढ़िया है। कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि जो चल रहा है, वो क्यों चल रहा है, पर तुम्हें फिर भी वही करना है, तो अंधविश्वास है।




