डॉक्टर, विज्ञान और अध्यात्म: अंधविश्वास बनाम सत्य की लड़ाई

Acharya Prashant

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डॉक्टर, विज्ञान और अध्यात्म: अंधविश्वास बनाम सत्य की लड़ाई
ग़रीब आदमी को सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है वास्तविक धर्म की। और सबसे ज़्यादा ग़रीब ही होता है, जिसको लोक धर्म का चूर्ण चटा दिया जाता है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं डॉक्टर हूँ पेशे से। तो जब कोविड आया था, तो डॉक्टर्स के लिए वो एक नई सी बीमारी थी। तो उनके लिए भी एक गाइडलाइन बना पाना और ये कह पाना, कि पक्के तौर पर इस तरह से ट्रीटमेंट होता है। हम लोग देखते जा रहे थे, कि हर कुछ टाइम पर वो चेन्ज़ेस होता था। तो एक तरफ़ तो ये होता था कि सब लगे हुए हैं — साइंटिस्ट — उनके गाइडलाइंस के लिए, वैक्सीनेशन के लिए, और बहुत कड़ी मेहनत कर रहे हैं। और अपनी हार को भी स्वीकार कर रहे हैं।

और वहीं कोई दूसरा आदमी एक चूर्ण निकाल देता है, और कहता है कि ये कोविड इससे ठीक हो जाएगा। और यही चीज़ मैं देख पा रहा हूँ कि अध्यात्म में भी होती है। कि सच्चे अध्यात्म के लिए कोई सालों-साल मेहनत कर रहा है — तो उसको हम नहीं जान पाते हैं, लोगों तक बात नहीं पहुँच पाती है। और कोई रातों-रात सेंसेशन बन जाता है — मतलब हर कोई एकदम दीवाना हो जाता है कि यही है सच्चा अध्यात्म, चाहे वो कैसी भी अटपटी-सी बात कर रहा हो, खोखली-सी बात कर रहा हो।

आचार्य प्रशांत: जब ये गिना गया ना कि सबसे ज़्यादा बीमारी और मौत किन तबकों में हुई है — तो जो सबसे ज़्यादा अवैज्ञानिक थे, उनमें ही। यहाँ बात बस इतनी नहीं है कि डॉक्टर रिसर्च कर रहे हैं, और डॉक्टरों को श्रेय नहीं मिला। बल्कि डॉक्टरों के साथ तो मारपीट हो गई थी बीच-बीच में। और कोई आकर चूर्ण निकाल देता है, उसको श्रेय मिल जाता है। जो चूर्ण बनाने वाले को श्रेय दे रहे हैं, मरे भी सबसे ज़्यादा वही। ये एक ऐसी महामारी थी जिसमें एक बड़े हद तक हम अपनी तकलीफ़ के लिए ख़ुद ज़िम्मेदार थे।

बीमारी की पूरी प्रक्रिया के कई बिंदु थे जहाँ बीमारी को रोका जा सकता था। प्रिवेन्शन भी करा जा सकता था। शत-प्रतिशत नहीं, पर काफ़ी हद तक हमारे हाथ में था। प्रिवेन्शन भी हो सकता था। उसके बाद बीमार हो गए हैं, तब भी कई सावधानियाँ थीं जो बरती जा सकती थीं। उसके बाद कई प्रकार की दवाइयाँ थीं, जिनको लिया जा सकता था। उनका पूरा कोर्स था, जिनको फॉलो करा जा सकता था। काफ़ी कुछ था जो हमारे हाथ में था। काफ़ी कुछ हमारे हाथ में नहीं भी था।

उसके बाद भी इतने व्यापक पैमाने पर मौतें हुईं — मिलियंस में। कौन से वर्ग थे समाज के जो सबसे ज़्यादा इसकी चपेट में आए? वही तो चूर्ण। ऐसे ही चलता रहा है। हमारा चुनाव होता है, अध्यात्म के नाम पर भी — जिनको चूर्ण स्वीकार है, वो ऐसा चुनाव कर सकते हैं। पर फिर सबसे ज़्यादा दुख भी वही भुगतेंगे। आध्यात्मिक चूर्ण का, ग़रीबी का, अशिक्षा का, बहुत-बहुत सीधा और एकदम गहरा रिश्ता होता है। ग़रीब और अशिक्षित लोग होते हैं, वही ज़्यादा चूर्ण चाटते हैं। और जितना वो चूर्ण चाटते हैं, उतने ज़्यादा वे ग़रीब और अशिक्षित रह जाते हैं। इस पर बाकायदा एक नहीं, बहुत सारी रिसर्च हैं।

समाज कितना अंधविश्वासी और लोक-धार्मिक है — इसका सीधा कोरिलेशन शिक्षा के स्तर, समृद्धि के स्तर और महिला सशक्तिकरण के स्तर से है। जहाँ पर भी लोकधर्म और अंधविश्वास बहुत ज़्यादा पाए जाते हैं, वहाँ तीन चीज़ें हैं जो आँकड़ों में एकदम उभर कर आती हैं —

पहला, शिक्षा बहुत कम होगी। एवरेज नंबर ऑफ इयर्स ऑफ स्कूलिंग, वो बहुत कम निकलेंगे।

दूसरा, इनकम बहुत कम होगी। एवरेज फैमिली इनकम बहुत कम निकलेगी।

तीसरा, फर्टिलिटी रेट बहुत ज़्यादा होगा। चार का, पाँच का होगा।

देखिए ना, जो चूर्ण चाट रहे हैं उनका क्या हो रहा है फिर? और ये एक कुचक्र है, विषियस साइकिल। कमज़ोर हो, पढ़े-लिखे नहीं हो, ग़रीब हो — तो चूर्ण चाटोगे। और चूर्ण चाटोगे तो चूर्ण चाटने वाले ने चूर्ण बनाया ऐसा है कि वो तुम्हें और ग़रीब रखेगा और अशिक्षित रखेगा। जो बड़े-बड़े आप लोकधार्मिक आयोजन और जलसे देखते हैं, इसमें क्या पढ़े-लिखे लोग बहुत बैठे होते हैं? इसमें जो बेचारे बैठे होते हैं, उनकी स्थिति दयनीय है, उनको देखकर रोना आए।

अभी कहीं पर — हापुड़, हाथरस — यहीं पर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुछ महीने पहले भगदड़ मची थी, किसी बाबा जी के यहाँ। तो वहाँ का आपने वीडियो फुटेज और ये सब देखा होगा। 90% तो महिलाएँ मरी थीं, वो भी बिल्कुल ग़रीब महिलाएँ। और बच्चे कुछ छोटे-छोटे, वो अपने बच्चे ले कर आई थीं। और जो वहाँ पर उनके मरने के बाद जो पड़ा हुआ था — वो उनकी फटी साड़ियाँ, चप्पलें, चूड़ियाँ, ये सब सस्ते-सस्ते जो उनके झोले। अमीर थोड़े ही इन चीज़ों में मारे जाते हैं। कुंभ में भी वो दुखद भगदड़ मची थी। उसके बाद की आपने फुटेज देखी होगी। आपको क्या लग रहा था, वहाँ अमीरों की मृत्यु हुई है?

ग़रीब आदमी को सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है वास्तविक धर्म की। और सबसे ज़्यादा ग़रीब ही होता है, जिसको लोक धर्म का चूर्ण चटा दिया जाता है।

जो ग़रीब है वही सबसे कट्टर लोक-धार्मिक बनता है, वो जान दे देगा फिर। क्योंकि उसकी ज़िंदगी में और कुछ तो है ही नहीं। तो उसको ढाँढस के तौर पर, सांत्वना के तौर पर जो लोक धर्म का चूर्ण मिल जाता है — वो उसको अपना प्राण बना लेता है, "ये ज़िंदगी है मेरी।" उसके बाद आप उससे आकर बोलोगे ना कि तू तो मिथ्या भ्रम में जी रहा है, वो कट्टा निकाल के खड़ा हो जाएगा। कहेगा, "मेरे धर्म का अपमान मत करना। आस्था पर बहस की कोई गुंजाइश नहीं है।” उस बेचारे को पता भी नहीं है कि जिस चीज़ के पक्ष में वो जान देने को तैयार है, उसी चीज़ ने उसकी जान और ज़िंदगी बर्बाद कर रखी है।

देखते नहीं हो? अभी हमने कहा कि कोविड ऐसी त्रासदी थी, जिसमें कम से कम कुछ हद तक ये हमारे हाथ में था कि हम अपने आप को बचा पाए। करोड़ों में मौतें हुईं ना? दुनिया में इतनी सारी त्रासदियाँ होती रहती हैं, एक व्यक्ति भी मरे तो दुखद होता है। एक व्यक्ति की मृत्यु और एक करोड़ की मृत्यु में अंतर तो है, इतना तो हम मानेंगे। कहीं पाँच लोग, सात लोग, पंद्रह लोग, सौ लोग भी अगर हताहत हो जाएँ, तो उसका उल्लेख बार-बार होता है। होता है ना?

याद करिए कि कोविड के आँकड़े आपको पिछले चार बार में कितनी बार पढ़ने को मिले हैं? कोई नाम भी लेता है? हमने अपनी सामूहिक स्मृति — कलेक्टिव मेमोरी — में कोविड को दफ़न कर दिया है, ताकि हमें ये याद ना करना पड़े कि जो मौतें हुईं, उनमें से कम से कम आधी हमारी मूर्खता और हमारी ग़ैर-ज़िम्मेदारी के कारण हुईं। जितनी बार कोविड से संबंधित आँकड़े याद करोगे, उतनी बार ये स्वीकार करना पड़ेगा कि हम ज़िम्मेदार हैं इन मौतों के। उतनी बार स्वीकार करना पड़ेगा। हम याद ही नहीं करते।

9/11हर साल आता है, आप 9/11 की बात करते हो? 9/11, 9/11 — कितनी मौतें हुई थीं 9/11 में? कुछ हज़ार। कोविड जिस दिन फूटा था भारत में, कोई याद करता है? किसी अख़बार में छपता है कि "आज के दिन भारत में वो त्रासदी शुरू हुई थी जिसने स्वतंत्र भारत में सबसे ज़्यादा लोगों को काल के गाल में फेंक दिया।" कभी होता है? और सिर्फ़ अभी चार ही साल बीते हैं, कोई नहीं बात करता। यहाँ तक कि राजनीतिक पार्टियों के मैनिफ़ेस्टोज़ में, घोषणापत्रों में भी उसका ज़िक्र नहीं है। ना पक्ष, ना विपक्ष, कोई नहीं बात करना चाहता।

हमने उसको एक मास बरीयल दे दिया है, कोविड की पूरी बात को। क्योंकि वहाँ अगर हम ज़िम्मेदारी निकालने लगे, तो दिखाई देगा कि एक-एक आदमी ज़िम्मेदार है। सब कुछ ही बदला जाना चाहिए। हमने कहा, "हम ऐसे करेंगे जैसे कुछ हुआ ही नहीं था।" ऐसा सब जगहों पर नहीं है। कुछ विकसित देश हैं यूरोप के, जिन्होंने अपना पूरा मेडिकल सिस्टम ही रिवैम्प कर दिया कोविड के बाद। वो कह रहे हैं कि अगला म्यूटेशन कभी भी आ सकता है, हम तैयार हैं। अब आएगा तो हम तैयार हैं, जितनी तैयारी हो सकती है। पूरी तरह तैयार कोई भी नहीं हो सकता।

भारत जैसे कुछ देश हैं — भारत, पाकिस्तान। पाकिस्तान में भी बहुत मौतें हुईं। जिन्होंने क्या करा है? कलेक्टिव मेमोरी से ही वाइप आउट कर दिया — "नहीं, ऐसा तो कुछ हुआ ही नहीं था। कौन कह रहा है करोड़ लोग मरे? नहीं, ऐसा तो कुछ हुआ नहीं। तो हमें तो याद नहीं है, लेट्स गेट ऑन विद लाइफ़।" जब हम ये फ़ैसला कर लेते हैं ना कि हमें फैक्ट्स नहीं देखना, तब हमें को ही नहीं बचा सकता।

मैं समझता हूँ, ईविल की परिभाषा ही यही है — "द डेलीबरेट रिफ़्यूज़ल टू एकनॉलेज फैक्ट्स।” जो व्यक्ति इस स्थिति पर आ गया, अब आप उसे नहीं बचा सकते। शायद यही पॉइंट ऑफ नो रिटर्न है। जहाँ पर फैक्ट सामने खड़े हों, और आप कहें कि "नो, नो" अब कोई तर्क शेष नहीं रहता। अब क्या बताओगे? समस्या थी, समीकरण हल नहीं हो रहा था, तो कोई कहे कि "नहीं अभी संदेह है।" समझ में आती है बात। आपने सब हल करके सामने रख दिया, "हेंस प्रूव्ड," और तब भी वो व्यक्ति क्या कह रहा है? "नो! नहीं, ऐसा तो नहीं है।" अब आप कुछ नहीं कर सकते। ये ईविल है। यही ईविल है।

भीतरी पूर्वाग्रह — प्रिजुडिसेस — इतने ज़बरदस्त कि वो सच्चाई सामने खड़ी है, तब भी देखने से इनकार कर रहे हैं। उसके सामने अब आप कोई तर्क, तथ्य, सबूत रख दो वो नहीं सुनेगा। उसके लिए तो फिर वही है कि अर्जुन, "ये पहले ही मरे हुए हैं, इनकी मृत्यु पर अब कोई कष्ट नहीं होना चाहिए।" लेकिन कष्ट तो कृष्णों को होता है। करुणा, बुद्धों का अनिवार्य लक्षण है। तो पूरा प्रयास करते हैं, कि जड़ हो जाए पूरी तरह उससे पहले उसको जगाएँ। लेकिन बहुत बड़ी तादाद में लोग होते हैं जो कह देते हैं, "हमें अब नहीं जगना। हमारा वो बिंदु आ गया, जहाँ से अब हम बचाए नहीं जा सकते। हमें कितनी भी हक़ीक़त दिखा लो, हमें नहीं देखनी। बार-बार दिखा लो, हमें देखना ही नहीं है।”

शायद ये भी प्रकृति का एक तरीक़ा है। जैसे शरीर में होता है ना, कोई सेल या टिशू जब बहुत डैमेज हो जाता है, तो फिर शरीर उसका उपचार करने की कोशिश नहीं करता। कोशिश की जाती है पर शरीर ख़ुद ही समझ जाता है, कि इसका अब उपचार करने में बहुत संसाधन लग जाएँगे और बहुत समय लग जाएगा। उतने संसाधन और उतना समय दिए जाने चाहिए, बल्कि जो स्वस्थ कोशिकाएँ और ऊतक हैं, उनको। शरीर फिर स्वयं ही जो डैमेज्ड पार्ट होता है, उसको मार देता है। शरीर कहता है कि अब इसको बचाया अगर, तो इसको बचाने में बाक़ी शरीर नहीं बचेगा। शरीर ख़ुद ही मार देता है उस हिस्से को।

शायद वैसा ही कुछ आध्यात्मिक तल पर भी होता है। सब लोगों पर प्रयास करा जाता है कि सब बच जाएँ, पर कुछ ऐसे बिंदु पर पहुँच चुके होते हैं जहाँ अब उन पर बहुत ज़्यादा मेहनत लगेगी — तब भी पता नहीं बचे ना बचे, तो फिर उनको छोड़ देना बेहतर होता है। इनको बचाने में जो दूसरे बच सकते थे, वो भी नहीं बचेंगे।

दुनिया के आध्यात्मिक नक्शे पर हम तो नहीं चाहते कि भारत वो जगह बन जाए जिसको बचाना अब बहुत मुश्किल है, तो फिर छोड़ ही दो। पर हमारे चाहने ना चाहने से क्या होता है? फ़ैसला तो भारतीयों को करना है।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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