ग़रीब आदमी को सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है वास्तविक धर्म की। और सबसे ज़्यादा ग़रीब ही होता है, जिसको लोक धर्म का चूर्ण चटा दिया जाता है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं डॉक्टर हूँ पेशे से। तो जब कोविड आया था, तो डॉक्टर्स के लिए वो एक नई सी बीमारी थी। तो उनके लिए भी एक गाइडलाइन बना पाना और ये कह पाना, कि पक्के तौर पर इस तरह से ट्रीटमेंट होता है। हम लोग देखते जा रहे थे, कि हर कुछ टाइम पर वो चेन्ज़ेस होता था। तो एक तरफ़ तो ये होता था कि सब लगे हुए हैं — साइंटिस्ट — उनके गाइडलाइंस के लिए, वैक्सीनेशन के लिए, और बहुत कड़ी मेहनत कर रहे हैं। और अपनी हार को भी स्वीकार कर रहे हैं।
और वहीं कोई दूसरा आदमी एक चूर्ण निकाल देता है, और कहता है कि ये कोविड इससे ठीक हो जाएगा। और यही चीज़ मैं देख पा रहा हूँ कि अध्यात्म में भी होती है। कि सच्चे अध्यात्म के लिए कोई सालों-साल मेहनत कर रहा है — तो उसको हम नहीं जान पाते हैं, लोगों तक बात नहीं पहुँच पाती है। और कोई रातों-रात सेंसेशन बन जाता है — मतलब हर कोई एकदम दीवाना हो जाता है कि यही है सच्चा अध्यात्म, चाहे वो कैसी भी अटपटी-सी बात कर रहा हो, खोखली-सी बात कर रहा हो।
आचार्य प्रशांत: जब ये गिना गया ना कि सबसे ज़्यादा बीमारी और मौत किन तबकों में हुई है — तो जो सबसे ज़्यादा अवैज्ञानिक थे, उनमें ही। यहाँ बात बस इतनी नहीं है कि डॉक्टर रिसर्च कर रहे हैं, और डॉक्टरों को श्रेय नहीं मिला। बल्कि डॉक्टरों के साथ तो मारपीट हो गई थी बीच-बीच में। और कोई आकर चूर्ण निकाल देता है, उसको श्रेय मिल जाता है। जो चूर्ण बनाने वाले को श्रेय दे रहे हैं, मरे भी सबसे ज़्यादा वही। ये एक ऐसी महामारी थी जिसमें एक बड़े हद तक हम अपनी तकलीफ़ के लिए ख़ुद ज़िम्मेदार थे।




