नागपंचमी में साँप को पकड़कर दूध पिलाते हैं, इसमें साँपों को बहुत कष्ट दिया जाता है। साँप मैमल नहीं, रेप्टाइल है; वह दूध नहीं पीता। पर ज़बरदस्ती एक छवि बनाई गई है, क्योंकि हमारे दिमाग में साँप का आदिम डर बैठा हुआ है। प्रतीक के तौर पर देखें तो साँप का अर्थ है प्रकृति का वो रूप जिससे आप बहुत डरते हो। शिव का साँप से संबंध प्रतीकात्मक है, उसमें यह सीख दी जाती है कि प्रकृति से सही संबंध रखोगे तो उससे डरोगे नहीं, और प्रकृति से न डरने का अर्थ है 'मृत्यु से न डरना'।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा सवाल साँपों को लेकर जो रहस्यवाद और मिस्टिसिज़्म है उसको लेकर है, कि जैसे बचपन से ही काफ़ी छवियाँ हमारे दिमाग़ में उनको लेकर हैं कहानियों के द्वारा, और काफ़ी फिल्में भी देखी हैं जैसे “नागिन” मूवी है, “इच्छाधारी नागिन” है, उनका पुनर्जन्म और नागमणि इस तरह की कहानियाँ हमने सुनी हैं। और भारत में भी साँपों को विशेष महत्त्व दिया जाता है, अलग-अलग त्यौहार मनाए जाते हैं, जैसे नागपंचमी और उन्हें दूध भी पिलाया जाता है। और जैसे कई धर्मगुरु भी हैं जिन्होंने ये कहा है कि साँप बहुत ऊँचा स्थान रखते हैं, कोई विशेष महत्त्व रखते हैं।
तो मैं जानना चाह रहा हूँ, क्या ये सब बातें सच हैं? क्या वास्तव में साँप कोई विशेष महत्त्व रखते हैं?
आचार्य प्रशांत: (इशारों में कहते हैं कि अब क्या बोलूँ इस पर, और सब हँसते हैं)।
एक प्राणी है, जी लेने दो उसे, काहे को कहानियाँ बना करके उसकी ज़िंदगी में उपद्रव करते हो। कौन से साँप के सिर पर आपने पत्थर लगा हुआ देख लिया भाई? नागमणि, कहाँ है? उसके सर को पकड़ेंगे तो अन्दर से मष्तिष्क निकलेगा,




