सुपरस्टिशन का इलाज?

Acharya Prashant

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सुपरस्टिशन का इलाज?
असली धर्म की पहचान ही यही है कि ये आदमी फालतू की प्रथा, परंपरा, झाड़फूंक, टोना-टोटका, रस्मों, रिवाज़, अंधविश्वास, इस पर हँसेगा। वो ठुकराएगा भी नहीं वो हँसेगा, बोलेगा "और दिखाओ, और दिखाओ, अच्छा चुटकुला है मनोरंजन हो रहा है और करो, और करो कैसे होता है।" यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। मेरा नाम कमला है। सर, मैं एक बात कहना चाहती हूँ, हमारे बीच में एक समाज उभर रहा है जो कहता है कि हम बिल्कुल लिबरल हैं, हमें धर्म की कोई ज़रूरत नहीं है, और वो बाबा साहब को बहुत मानते हैं, और शिक्षित भी हैं।

लेकिन दूसरी तरफ़ मैं ये देखती हूँ वो कहते हैं, मुझे गीता वीता तो पढ़ना नहीं है, इसका तो कोई मतलब ही नहीं है क्योंकि धर्म से रिलेटेड है। लेकिन दूसरी तरफ़ यहाँ उनके घर में बच्चा हुआ, तो नामकरण के लिए पंडित जी को बुला रहे हैं। शादी के लिए पंडित जी को ढूँढ़ कर ला रहे हैं, ये सब भी चल रहा है।

हाँ, एक काम नहीं करते वो किसी बाबा जी के पंडाल में नहीं जाते हैं, ये उनकी ख़ासियत है। लेकिन वहीं दूसरी ओर अंगूठियाँ पहने मिलेंगे। और अगर वो बाबा साहब को मानते हैं तो इन सब चीज़ों से तो उनका कोई मतलब होना ही नहीं चाहिए। जहाँ तक मैंने बाबा साहब के बारे में पढ़ा है और आपसे जाना है। और भूत प्रेत में विश्वास करते हैं वो और घुंघट प्रथा, ये सब चीज़ मानते हैं वो जो कि मनुस्मृति में है। और फिर कहते हैं मैं धर्म को नहीं मानता हूँ।

आचार्य प्रशांत: देखिए कितनी मज़ेदार बात है। जो कहते हैं कि "साहब, हम तो लिबरल हैं, लिबरल एथिस्ट्स हैं, हमें गीता से क्या मतलब," ठीक है? आपने गीता का नाम लिया।

“हम लिबरल एथिस्ट्स हैं हमें गीता से क्या मतलब है।” आप उनको धर्म से जुड़ी सारी बुराइयों की गिरफ्त में पाओगे। अंधविश्वास भी वहाँ चल रहा होगा, भेदभाव भी वहाँ किसी न किसी तरह का चल रहा होगा। डर भी चल रहा होगा, शोषण भी चल रहा होगा। बस उनके अंधविश्वास मॉडर्न हो गए होंगे, वो ऐप बाजी कर रहे होंगे, किसी सड़क वाले बाबा के पास जाकर नहीं खड़े हो रहे होंगे, अंग्रेज़ी बोलने वाले बाबा जी के पास जाकर बैठ रहे होंगे वहाँ पर अंग्रेज़ी में प्रवचन चल रहा होगा, ये सब हो रहा होगा।

तो अब ये अपने आपको बोलते हैं कि "हम तो लिबरल हैं और एथिस्ट हैं और हमें रिलिजन से कोई लेना देना नहीं," और उलझे हुए ये अंधविश्वास और कर्मकाण्ड में ही हैं। और दूसरी ओर जो गीता का बंदा होता है उसको आप गीता के साथ पाते हैं लेकिन अंधविश्वास और कर्मकाण्ड से दूर पाते हैं।

तो बताइए, वास्तव में धर्म की गंदगी को कौन छोड़ पाया? जिसने गीता को छोड़ दिया या जिसने वास्तविक धर्म को पाया गीता के सहारे से?

प्रश्नकर्ता: वास्तविक धर्म को पाया गीता के सहारे से वो।

आचार्य प्रशांत: जितनी भी गंदगी है धर्म में, उसकी काट ये नहीं है कि आप बोल दो कि "मैं तो लिबरल एथिस्ट हूँ।" आप अपने आप को कितना भी लिबरल, कितना भी एथीस्ट बोलते रहो धर्म की गंदगी आपके अंदर मौजूद रहेगी क्योंकि वो हवाओं में है।

बच्चा पैदा होगा, घर में कोई मरेगा, शादी-ब्याह होगा, इन सब में आप क्या पाओगे? क्या चल रहा है? वही सब पुराना फिज़ूल कर्मकांड लौट के आ रहा है।

घर में कोई समस्या आ गई, आर्थिक नुकसान हो रहा है, प्रमोशन नहीं हो रहा है, कुछ नहीं हो रहा है, आप पाओगे कि आप चले जा रहे हो किसी न किसी तरीक़े से किसी ऑकल्ट टाइप के मिस्टिसिज़्म की शरण में। या सेल्फ-हेल्प नाम का एक नया धर्म आपको गिरफ्त में ले रहा है, वो भी वही है। अब ये सब चल रहा है। आपने क्या करा आपने कहा "मैं धार्मिक नहीं हूँ,” लेकिन हमने तो कहा कि मनुष्य तो होता ही है एक धार्मिक प्राणी। बस आप ये कर लोगे कि असली धर्म से दूर भागोगे तो नकली धर्म की गिरफ्त में आ जाओगे।

धर्म को छोड़ना संभव नहीं है, हाँ ये ज़रूर कर सकते हो कि असली धर्म को तो कह दो कि "अजि हटाओ, ये सब हम नहीं पढ़ते गीता वीता," ये कर सकते हो, लेकिन ये करोगे अगर तो नकली धर्म की गिरफ्त में आ जाओगे। नकली धर्म के और क्या-क्या तरीक़े होते हैं? आप बताओ। एक तो होता है ये सेल्फ-हेल्प बुक्स पढ़ना — *एनर्जी, मोटिवेशन, ऑरा, वाइब्रेशन, और?

श्रोता: पॉज़िटिव एनर्जी।

आचार्य प्रशांत: पॉज़िटिव-नेगेटिव, क्रिस्टल गेज़िंग, पास्ट लाइफ़।

श्रोता: एंजल थेरेपी।

आचार्य प्रशांत: एंजल थेरेपी, न्यूमेरोलॉजी। अब वो है, वो बहुत बोलती है, "मैं तो बहुत मॉडर्न हूँ। ओ! आय डोंट बिलीव इन दिस रिलीजियस शिट।" और उसका प्रिय जी है उसका नाम है "पी-डबल-आर-डबल-ई-वाई-ए-ए।" समझ रहे हो न क्या है? इनको किसी ने बोला है ऐसा नाम लिखोगे तो शुभ हो जाएगा। और वो अपॉइंटमेंट लेकर के बिल्कुल कोई इंटरनैशनल कार्ड रीडर है उसके पास मिलने जाया करती हैं। ठीक है, अब ये झाड़फूंक में नहीं बैठती है लेकिन तुम जो कर रहे हो वो मॉडर्न झाड़फूंक है।

तो ज़बरदस्ती कहोगे कि मैं धार्मिक नहीं हूँ तो नकली धर्म में ऐसे फँसोगे — नकली बट मॉडर्न, नकली लेकिन आधुनिक दिखता हुआ क्योंकि धर्म तो इंसान की सबसे केंद्रीय ज़रूरत है। "मैन डज़ नॉट लिव बाय ब्रेड अलोन," — जीसस। बहुत केंद्रीय ज़रूरत है, उसके बिना आप जी नहीं सकते।

तो गीता को ठुकराओगे तो जाके पपीते में फँस जाओगे। पपीताबाज़ी भी चलती है, पपीते को ऐसे काटो और उसके दो बीज लगाके ऐसे कर दो, "नाउ योर हज़्बैंड विल नो मोर लुक टुवर्ड्स हिज़ सेक्रेटरी।" वो सेक्रेटरी है, अब उसके बाद ऊपर से ऐसे काट दो उसको, ये सब चल रहा है। और जो असली धर्म के पास आता है, वो सबसे पहले अंधविश्वास से मुक्त हो जाता है। सबसे पहले।

असली धर्म की पहचान ही यही है कि ये आदमी फालतू की प्रथा, परंपरा, झाड़फूंक, टोना-टोटका, रस्मों, रिवाज़, अंधविश्वास, इस पर हँसेगा। वो ठुकराएगा भी नहीं वो हँसेगा, बोलेगा "और दिखाओ, और दिखाओ, अच्छा चुटकुला है मनोरंजन हो रहा है और करो, और करो कैसे होता है।” समझ में आ रही है बात ये?

तो ये सब जो अपने आप को मॉडर्न बोलते हैं आप जब पाते हो कि इन्होंने ही लाइन लगा रखी है मॉडर्न तांत्रिकों के दरवाज़ों पर, गाड़ियाँ खड़ी हुई हैं। पॉश कॉलोनीज़ में आप जाओ वहाँ पर कोई होगा फलाना सेंटर। कोई नाम बताओ कैसा *सेंटर? वेलनेस सेंटर, हीलिंग सेंटर। और एक बहुत पॉश कॉलोनी है वहाँ हीलिंग सेंटर लिख रखा है और उसमें कुछ ऐसे चित्र भी बना रखे हैं, वो भी उसको बोलते हैं मिस्टिकल है। कुछ भी साँप बना दिया है। साँप में मिस्टिकल क्या होता है? बेचारा रेप्टाइल* है, वो अपनी जान को रो रहा है, "मैं कहाँ फँस गया?" और जी कि मिस्टिसिज़्म है, और हम ये करेंगे।

कई घंटा बजाते हैं, बोलते हैं "हमारे यहाँ पर आओ।" वहाँ घंटा ऐसा घंटा भी नहीं होता पता नहीं क्या होता है, गोंग, गोंग थेरेपी! वो कहेंगे, "अब सुनो, ब्डुम!"

अपने आप को बोलते हो, लिबरल हो, मॉडर्न हो धर्म से तो कोई लेना-देना नहीं। धर्म से लेना-देना नहीं और ये नालायकी कर रहे हो, और यही काम जब गाँव में होगा तो कहोगे, "देखा, अनपढ़ है, जाहिल है। देखा, जाकर के वहाँ ओझा के पास बैठा है, भूत उतरवा रहा है।" वो गाँव वाला करे तो उसको अनपढ़, जाहिल बोलोगे और तुम शहर में मॉडर्न तरीक़े से कर रहे हो, तो तुम क्या?

तो ये सुपरस्टिशन अंधविश्वास की जो काट है वो है — "द ट्रू रिलिज़न।"

आईआईटी बॉम्बे में मैंने कहा था, वहाँ पर यही अंधविश्वास की बात हो रही थी। टॉपिक यही था कि इतना साइंटिफिक डेवलपमेंट हो गया तो भी सुपरस्टिशन क्यों बचा हुआ है? "साइंस वर्सेस सुपरस्टिशन।" मैंने कहा था क्योंकि साइंस अकेले अपने दम पर सुपरस्टिशन को नहीं हटा सकती।

“[सुपरस्टिशन का इलाज साइंस नहीं है। साइंस क्या है? साइंस एक बाहरी चीज़ है और सुपरस्टिशन बाहरी चीज़ों को विषय बनाता है, ऑब्जेक्ट बनाता है। सुपरस्टिशन नहीं है बाहर सुपरस्टिशन का ऑब्जेक्ट है बाहर, सुपरस्टिशन यहाँ है (मन में)।]

सुपरस्टिशन को हटाने के लिए साइंस तो चाहिए ही चाहिए साथ में स्पिरिचुअलिटी चाहिए। तब सुपरस्टिशन हटता है।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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