असली धर्म की पहचान ही यही है कि ये आदमी फालतू की प्रथा, परंपरा, झाड़फूंक, टोना-टोटका, रस्मों, रिवाज़, अंधविश्वास, इस पर हँसेगा। वो ठुकराएगा भी नहीं वो हँसेगा, बोलेगा "और दिखाओ, और दिखाओ, अच्छा चुटकुला है मनोरंजन हो रहा है और करो, और करो कैसे होता है।"
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। मेरा नाम कमला है। सर, मैं एक बात कहना चाहती हूँ, हमारे बीच में एक समाज उभर रहा है जो कहता है कि हम बिल्कुल लिबरल हैं, हमें धर्म की कोई ज़रूरत नहीं है, और वो बाबा साहब को बहुत मानते हैं, और शिक्षित भी हैं।
लेकिन दूसरी तरफ़ मैं ये देखती हूँ वो कहते हैं, मुझे गीता वीता तो पढ़ना नहीं है, इसका तो कोई मतलब ही नहीं है क्योंकि धर्म से रिलेटेड है। लेकिन दूसरी तरफ़ यहाँ उनके घर में बच्चा हुआ, तो नामकरण के लिए पंडित जी को बुला रहे हैं। शादी के लिए पंडित जी को ढूँढ़ कर ला रहे हैं, ये सब भी चल रहा है।
हाँ, एक काम नहीं करते वो किसी बाबा जी के पंडाल में नहीं जाते हैं, ये उनकी ख़ासियत है। लेकिन वहीं दूसरी ओर अंगूठियाँ पहने मिलेंगे। और अगर वो बाबा साहब को मानते हैं तो इन सब चीज़ों से तो उनका कोई मतलब होना ही नहीं चाहिए। जहाँ तक मैंने बाबा साहब के बारे में पढ़ा है और आपसे जाना है। और भूत प्रेत में विश्वास करते हैं वो और घुंघट प्रथा, ये सब चीज़ मानते हैं वो जो कि मनुस्मृति में है। और फिर कहते हैं मैं धर्म को नहीं मानता हूँ।
आचार्य प्रशांत: देखिए कितनी मज़ेदार बात है। जो कहते हैं कि "साहब, हम तो लिबरल हैं, लिबरल एथिस्ट्स हैं, हमें गीता से क्या मतलब," ठीक है? आपने गीता का नाम लिया।




